आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
आत्मतत्त्वविवेकः
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया ।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
श्रीगणेशाय नम
आत्मतत्त्वविवेकः
श्रीमदुदयनाचार्यविरचितः
[ सानुवादः ]
स्वाम्यं यस्य निजं जगत्सु जनितेष्वादौ, ततः पालनं,
व्युत्पत्तेः करणं, हिताहितविधिव्यासेधसम्भावनम् ।
भूतोक्तिः, सहजा कृपा, निरुपधिर्यत्नस्तदर्थात्मक-
स्तस्मै पूर्णगुरुत्तमाय जगतामीशाय पित्रे नमः ॥
प्रथम, जनित इस विश्वमात्र पर सहज स्वाम्य जिसका छाया,
ततः पालना, बोध, हिताहित विधिनिषेध जगने पाया ।
सहज सदुक्ति, अकृत्रिम कृपा, वो उसी हेतु जिसकी माया,
गुरुश्रेष्ठ उस जगत्पिता को नमोवाक्य पहुँचे गाया ॥
सृष्टिके आदिकालसे ही अपने द्वारा रचित इस सम्पूर्ण जगत्के
ऊपर जिसका स्वाभाविक स्वामित्व विराजमान है, अथवा ( यहाँ
'निजम्' पदके सावधारण होनेके कारण ) एकमात्र जो जगत्का
अधिपति है, ऐसा नहीं कि उस जगदीश्वरके अतिरिक्त किसी अन्यका
भी सहाधिपत्य या आंशिक आधिपत्य हो, तथा स्वोत्पादित जगत्की
रक्षा भी पिताके समान जो स्वयं करता है, एव जिस प्रकार पिता
अनेक प्रकारकी शिक्षा देकर बालकको व्युत्पन्न करता है, वैसे ही जो
परमात्मा प्रयोज्य प्रयोजक देहका आश्रय कर पद पदार्थकी तथा घट-
पटादिनिर्माणकी व्युत्पत्ति भी पुत्रस्थानीय संसारको स्वयं कराता है,
जो वैदिक विधिवाक्यो द्वारा हित कार्योंमे प्रवृत्तिका तथा निषेधवाक्यो
द्वारा अहित कार्योंसे निवृत्तिका करानेवाला भी स्वयं है, पुत्रतुल्य
संसारके लिये श्रुतियोंके रूपमे जिसकी स्वभावतः यथार्थ उक्तिया है,
२ आत्मतत्त्वविवेके
इह खलु निसर्गप्रतिकूलस्वभावं सर्वजनसंवेदनसिद्धं दुःखं
जिहासवः सर्व एव तद्धानोपायमविद्वांसोऽनुसरन्तश्च सर्वाध्यात्मवि-
देकवाक्यतया तत्त्वज्ञानमेव तदुपायमाकर्णयन्ति, न ततोऽन्यत् ।
प्रतियोग्यनुयोगितया च आत्मैव तत्त्वतो ज्ञेयः । तथाहि—यदि
नैरात्म्यं, यदि वात्मास्ति वस्तुभूतः, उभयथापि नैसर्गिकमात्म-
ज्ञानमतत्त्वज्ञानमेव इत्यत्राप्येकवाक्यतैव वादिनामत आत्मतत्त्वं
विविच्यते ।
जगत्पर जिसकी अकारण एवं निर्व्याज अनुकम्पा है तथा उसीके
लिये जिसके सारे प्रयत्न हैं; मनु-कपिल प्रभृति पूर्वगुरुओंसे भी श्रेष्ठ
उस जगत्पिता परमेश्वरको ( मेरा ) नमस्कार है ।
संसारमे दुःख वह बस्तु है, जो स्वभावतः प्रतिकूल लगनेवाली
और सबोंके अनुभवमे भासित होनेवाली है । अर्थात् वह ऐसी वस्तु
नहीं, जो किसीके अनुभवमें न आती हो या अनुकूल लगती हो ।
[L15
क्षणभङ्गवादः ३
तत्र बाधकं भवेदात्मनि१ क्षणभङ्गो२ वा बाह्यार्थभङ्गो वा
गुणगुणिभेदभङ्गो३ वा अनुपलम्भो वेति।
आत्मज्ञान ( नैरात्म्यपक्षमे देहाभिन्नरूपमे असन् आत्माका भान होनेसे
और आत्मास्तित्वपक्षमे आत्माका देहादिसे अभिन्न रूपमे भान होनेसे )
अतत्त्वज्ञान ही है—इस बातमे भी सभी वादियोंका ऐकमत्य ही है।
यद्यपि स्वाभाविक आत्मज्ञानके अन्दर "अहं सुखी" यह ज्ञान भी है
और यह तत्त्वज्ञान ही है, क्योंकि न्यायमतसे सुखादिक आत्माके ही
धर्म हैं। अतः सभी स्वाभाविक आत्मज्ञानको अतत्त्वज्ञान कहना
ठीक नहीं है। तथापि इसे अतत्त्वज्ञानकी कोटिमे माननेके दो कारण
हैं। एक यह कि आत्माका सुखी आदि होनेका ज्ञान कादाचित्क
होनेसे "स्थूल गौर, इत्यादि मिथ्याज्ञानोंसे सदा तिरस्कृत रहता है।
दूसरा यह कि "आत्मा वाऽरे द्रष्टव्य श्रोतव्यो मन्तव्य " इत्यादि श्रुति-
वचनके अनुसार मनन द्वारा हुआ असन्दिग्धज्ञान ही निर्बाध रूपसे
तत्त्वज्ञान है। क्योंकि मननजन्य ही आत्मज्ञान मिथ्याज्ञानको निवृत्त
करनेमें समर्थ है। इसलिये आत्माके वास्तविक स्वरूपका यहाँ विवेचन
किया जाता है।
जिस आत्माका नास्तिक निषेध करते हैं, तथा आस्तिक अस्तित्व
स्वीकार करते हैं, उस आत्मामें चार प्रकारके बाधक हो सकते हैं।
१—सब पदार्थ क्षणिक हैं; २—ज्ञानसे भिन्न बाह्यवस्तु नहीं है,
३—गुण और गुणीमें भेद नहीं है तथा ४—शरीरसे भिन्न आत्माकी
उपलब्धि नहीं होती है। इनमे क्षणिकवाद नित्य आत्माके होनेमे
बाधक है। दूसरा, ज्ञानसे भिन्न किन्तु ज्ञान-सुख आदिका आश्रय-
भूत आत्माके होनेमे बाधक है, तीसरा भी, ज्ञानरूप गुणसे भिन्न
१. तत्रात्मनि बाधक भवेत् १ पु० पा०
२. क्षणभङ्गादिपदत्रय तत्साधकप्रमाणपरम्, अनुपलम्भे तु स्वरूपस्यैवा-
सिद्धिरिति शाङ्करी ।
३. भाव स्वोत्पत्त्यव्यवहितोत्तरक्षणवृत्तिध्वंसप्रतियोगी नचेति क्षणभङ्गे
विप्रतिपत्ति । एकदेशिमतेनान्त्ये विधिकोटिप्रसिद्धि, निषेधकोटिप्रसि-
द्धिस्तु अलीके सौगताना मते।
४ आत्मतत्त्वविवेके
तत्र न प्रथमः प्रमाणाभावात् । यत् सत् तत् क्षणिकं१
यथा घट , सच्च विदादाध्यासितः शब्दादिरिति२ चेत् न, प्रति-
बन्धासिद्धेः३ ।
सामर्थ्यासामर्थ्यलक्षणविरुद्धधर्मसंसर्गेण भेदसिद्धौ तत्सिद्धि-
रिति चेत् न, विरुद्धधर्मसंसर्गासिद्धेः ।
आत्मारूप गुणीके होनेमे बाधक है । और चौथा शरीरसे भिन्न
आत्माके अस्तित्वमे बाधक है । अर्थात् इन बाधकोंके कारण
आस्तिकोंका नित्य ज्ञान सुखादिका आश्रयभूत तथा देहेन्द्रियादिसे भिन्न
आत्मा नहीं सिद्ध हो पाता है ।
पूर्वोक्त चारों बाधकोंम प्रथमसे (क्षणिकवादसे) हमारे अभिमत
आत्माका बाध नहीं हो सकता है । क्योंकि क्षणिकवादमें कोई प्रमाण
नहीं है । यदि “जो सत् है वह क्षणिक है, जैसे बनकर तुरत
ध्वस्त हुआ घडा। विवादके विषय शब्द आत्मा आदि सत् वस्तु भी
सत् हैं इसलिये क्षणिक हैं' इस अनुमानको क्षणिकत्वमें प्रमाण
कहें, तो वह ठीक नहीं क्योंकि 'जो सत् है वह क्षणिक है यह व्याप्ति
ही असिद्ध है ।
“सामर्थ्य और असामर्थ्य' रूप विरुद्धधर्मोंके सम्बन्धसे सभी
सत् पदार्थोंमे भेदकी सिद्धि होगी और उसके बाद क्षणिकत्वकी सिद्धि
हो जायगी। जैसे बखारमें स्थित बीज अङ्कुरके लिये असमर्थ है
और खेतमे डाला गया वह अङ्कुर करनेमे समर्थ है । इसलिये समर्थ-
१ यत् सत् तत् क्षणिकं यथा जलधर, सन्तश्च भावा इमे
सत्ता शक्तिरिहाथकर्मणि मिते सिद्धेषु सिद्धा न सा ।
नाप्येकैव विधाऽ यदापि परतः नैव क्रिया वा भवेत्
द्वधापि क्षणभङ्गसङ्गतिरत साध्ये च विश्राम्यति ॥
ज्ञानश्री—क्षणभङ्गाध्याये प्रथमपादे पृ० १
२ अनुमितिकारणीभूत व्याप्तिपक्षधर्मताज्ञानजनको उदाहरणोपनयामकौ
द्वावेवावयवौ इति बौद्ध म मते ।
३ प्रतिबन्धो व्याप्ति, तदसिद्धेरित्यर्थ ।
क्ष. भ. १. २. ५
प्रसङ्गविपर्ययाभ्यां¹ तत्सिद्धिरिति चेत् न, सामर्थ्यं हि
करणत्वं² वा योग्यता वा । नाद्यः, साध्या³विशिष्टत्वप्रसङ्गात् ।
जाता है कि बखारमे रहनेकी अवस्थामे वह बीज भिन्न था और
खेतमे डाला गया वह भिन्न हो गया । इस तरह भेदकी और क्षणिकत्वकी
क्रमश सिद्धि हो गयी—ऐसा कहना ठीक नहीं है । क्योंकि एक
ही बीजमे सामर्थ्य और असामर्थ्य-रूप विरुद्ध धर्मका सम्बन्ध ही नहीं
हो सकता है ।
"बखार का बीज यदि अङ्कुर-समर्थ होता तो अङ्कुर उत्पन्न कर देता,
नहीं करता है, इसलिये वह अङ्कुर समर्थ नहीं है । इस प्रकारके प्रसङ्ग
और विपर्ययसे बीजमे बखारमे रहनेकी दशामे असामर्थ्य और
खेतमे रहनेकी दशामें सामर्थ्यरूप विरुद्ध धर्मोका सम्बन्ध सिद्ध हो
जाता है इस तरह कुशूलस्थ और क्षेत्रस्थ बीजका सुतरा भेद सिद्ध हो
जाता है।" यह कहना भी ठीक नहीं है । क्योंकि यहा सामर्थ्यका
कौन सा अर्थ अभीष्ट है ? फल पैदा कर देना अथवा उसकी योग्यता
रखना ? प्रथम अर्थ सम्भव नहीं । क्योंकि पूर्वोक्त प्रसङ्ग और विपर्ययमे
आपादक भी आपाद्यरूप ही हो जायगा । क्योंकि तब आपके प्रसङ्गका
यह स्वरूप होगा—बखारका बीज यदि अङ्कुर करे तो अङ्कुर करे । एव
क्षेत्रस्थ बीज यदि अङ्कुर न करता तो अङ्कुर न करता—इस प्रकार दोनो
प्रसङ्गोंमे जो ही साध्य है, वही साधन भी हो जाता है । इसी तरह
दोनों ही विपर्ययोंमें भी साध्य साधन एक ही हो जाते है । उक्त
प्रसङ्गोंके विपरीत विपर्ययोंका स्वरूप यह होगा—कुशूलस्थ बीज अङ्कुर
नहीं करता है, इसलिये अङ्कुरासमर्थ है अर्थात् अङ्कुर नहीं करता है ।
एव क्षेत्रस्थ बीज अङ्कुर करता है इसलिये अङ्कुर समर्थ है अर्थात्
अङ्कुर करता है । यहा भी साध्य और साधन अभिन्न हो गये । किसी
साध्यकी सिद्धिके लिये साधनको उससे भिन्न होना चाहिये ।
१. प्रसङ्गतद्विपर्ययाभ्याम्—१ पु० पा०
२. करणं वा—१ पु० पा०
३. साध्यं व्यापकम् आपाद्यानुमेयसाधारणम् । तथा चापाद्यानुमेयाभ्यामा-
पादकानुमापकयोरविशेषप्रसङ्गादित्यर्थः ।
६ आत्मतत्त्वविवेके
व्यावृत्ति¹भेदादयमदोष इति चेन्न, तदनुपपत्तेः । व्या-
वर्त्यभेदेन विरोधो हि तन्मूलम्² । स च न तावन्मिथोव्या-
वर्त्यऽश्लेषाद् गोत्वाश्वत्ववत्, तथा सति विरोधादन्यतरापाये³
बाधासिद्ध्योरन्यतरप्रसङ्गात् ।
यदि ऐसा कहो कि—"सामर्थ्य हेतु असमर्थव्यावृत्तिरूप है और
कारित्व साध्य अकारिव्यावृत्तिरूप है । दोनों व्यावृत्तियोंके भिन्न
होनेसे सामर्थ्यरूप साधन और कारित्व (करना) साध्यमें भी भेद
होकर साध्य-साधनमें ऐक्यापत्ति दोष नहीं आ सकता तो यह भी
असङ्गत है । क्योंकि इन दोनों व्यावृत्तियोंके परस्पर भिन्न होनेका
मूल है—समर्थ और कारीरूप व्यावत्र्यमें भेद होनेसे उक्त व्या-
वृत्तियोंका परस्पर विरोधी होना । किन्तु इन व्यावृत्तियोंमें आत्य-
न्तिक या आंशिक किसी प्रकारका विरोध सिद्ध नहीं हो सकता है ।
कारण, जैसे गोत्व (अगोव्यावृत्ति) और अश्वत्व—(अनश्वव्या-
वृत्ति) रूप व्यावृत्तियोंम आत्यन्तिक विरोध है, क्योंकि गोत्व धर्म
सभी अश्वोंका परित्यागकर गोमात्रमे ही रहता है, एव अश्वत्व धर्म
भी सभी गौओंका परित्यागकर अश्वमात्रमे ही रहता है, वैसे ही
सामर्थ्य और कारित्वरूप व्यावृत्तियोंमे भी यदि आत्यन्तिक विरोध
माना जाय तो सामर्थ्य हेतुसे कुशलस्थ (बखारस्थित) बीजमे कारित्व
साध्यका आपादन अर्थात् पूर्वोक्त प्रसङ्ग ही नहीं बन सकता है ।
क्योंकि उक्त विरोधके कारण बीजरूप पक्षमें सामर्थ्यरूप हेतु और
कारित्व रूप साध्य एक साथ रह नहीं सकते, इसलिये पक्षमे किसी
एक का अभाव अवश्य रहेगा । एसी दशामें पक्षभूत बीजमे यदि
सामर्थ्य हेतु रहा तो कारित्व साध्य नहीं रह सकता इस प्रकार
१ सामर्थ्यपदम् असमर्थव्यावृत्तिपरम्, करण पदञ्च अकरणव्यावृत्तिपरमतो
व्यावृत्तिभेदान्न साध्याविशिष्टत्वप्रसङ्ग इति भाव ।
२ व्यावत्र्यमिह व्यावृत्याश्रयो विशेष्य व्यावृत्युपग्राह्य मिति यावत् तन्मूलम्
व्यावृत्तिभेदमूलमित्यर्थ ।
। ' '५१५' '
नापि तदाक्षेपप्रतिषेधाभ्यां वृक्षत्व-शिंशपात्ववत्, परापर-
भावानभ्युपगमात् ।
अभ्युपगमे वा समर्थस्याप्यकरणमसमर्थस्यापि वा करणं
प्रसज्येत ।
बाधदोष¹ तथा कारित्व साध्य रहा तो सामर्थ्य-हेतु नहीं रह सकना, इस
प्रकार असिद्धि दोष आ जाता है । एवं कारित्व हेतुसे सामर्थ्य सिद्ध
करनेमें भी बाध और असिद्धि दोष हो जायगा । क्योंकि विरोधके कारण
हेतुके रहनेपर साध्य नहीं रहेगा और साध्यके रहनेपर हेतु ही नहीं रह
सकेगा । ऐसे ही अकारित्व हेतुसे असामर्थ्यरूप साध्यका अनुमान
करनेमे भी बाध और असिद्धि दोष हो जाते हैं। क्योंकि अकारित्व
रहने पर सामर्थ्यके न होनेसे बाध होगा तथा असामर्थ्य रहने पर
कारित्वका न रहना ध्रुव होनेसे अकारित्व हेतुमे स्वरूपासिद्धि दोष हो
जायगा । इस तरह कुशूल-( बखारी ) स्थ और क्षेत्रस्थ बीजमे पूर्वोक्त
प्रकारसे दिखाया गया प्रसङ्ग और विपर्यय-रूप अनुमान ही दूषित
हो जाता है और क्षणिकत्वसिद्धिके योग्य नहीं रह जाता है ।
"सामर्थ्य और कारित्वरूप व्यावृत्तियोंका वृक्षत्व और शिंशपात्व-
के समान कुछका ग्रहण और कुछका परित्याग कर आंशिक विरोध भी
मानना ठीक नहीं है। अर्थात् जैसे शिंशपात्व-धर्म वृक्षत्वके साथ
सीसमके वृक्षमे रहता भी है, और वृक्षत्व-धर्म वाले आम्रादि वृक्षों-
का परित्याग भी करता है, वैसे ही सामर्थ्य और कारित्व-धर्ममे भी
परस्पर आंशिक विरोध रहेगा और उतनेसे ही दोनों व्यावृत्तियोंमें
भेदकी सिद्धि हो जायगी" यह भी नहीं कह सकते हो । क्योंकि वृक्षत्व
और शिंशपात्वके समान सामर्थ्य और कारित्वमें व्याप्यव्यापकभाव
नहीं मानते हो । अर्थात् आपसमे जहाँ व्याप्यव्यापकभाव रहता है,
वहीं आंशिक विरोध भी रह सकता है ।
यदि इसके लिये व्याप्यव्यापकभाव मानो तो जैसे वृक्ष होता हुआ
१. यदि कारित्वं सामर्थ्येन प्रतिषिध्येत तदाऽभावाद्बाधः स्यात्, यदि कारि-
त्वेन सामर्थ्यं प्रतिषिध्येत तदाऽऽपादकासिद्धिरित्यर्थ इति शङ्करमिश्रः ।
८ आत्मतत्त्वविवेके
नाप्युपाधिभेदात् कार्यत्वानित्यत्ववत्, तदभावात् ।
न च शब्दमात्रमुपाधिः, पर्यायशब्दोच्छेदप्रसङ्गात् ।
नापि विकल्पभेदः, स्वरूपकृतस्य तस्य व्यावृत्तिभेदकत्वेऽ-
भी आम सीसम नहीं रहता, वैसे ही समर्थ भी अकारी (नहीं
करनेवाला) हो जाय और असमर्थ भी करनेवाला हो जाय। सारांश
यह है कि जो व्यापक होता है वह व्याप्यके बिना भी रह जाता है।
इसलिये यदि सामर्थ्यको व्यापक और कारित्वको व्याप्य मानो तो
समर्थको भी नहीं करनेवाला मानना पड़ेगा। अथवा यदि कारित्वको
व्यापक और सामर्थ्यको व्याप्य मानोगे तो असमर्थको भी करनेवाला
मानना पड़ेगा, जो सर्वथा अयुक्त है।
यदि कहो कि कार्यत्व और अनित्यत्वके समान सामर्थ्य और
कारित्वरूप व्यावृत्तियोंमें भी उपाधिकृत¹ भेद है, तो वह भी ठीक नहीं
है। क्योंकि यहां कोई उपाधि ही नहीं है। अर्थात् कार्यत्व और
अनित्यत्व-धर्ममें गोत्व अश्वत्वके समान आत्यन्तिक या वृक्षत्वशिंशपात्व-
क्षणभङ्गवाद ९
समर्थव्यावृत्तेरपि भेदप्रसङ्गात् । विषयकृतस्य तु तस्य भेद-
कत्वेऽन्योन्याश्रयप्रसङ्गात्¹ ।
न च निर्निमित्त एवायं व्यावृत्तिभेदव्यवहारोऽतिप्रसङ्गात् ।
नापि द्वितीयः । सा च सहकारिसाकल्यं वा प्रातिस्विकी
वा ?
क्योकि सामर्थ्य और कारित्व रूप व्यावृत्तियोंको भिन्न करनेवाला जो
ज्ञानरूप उपाधियोंमें भेद है, उसे स्वरूपकृत मानते हो या विषयकृत ?
यदि प्रथम पक्ष कहो तो असमर्थव्यावृत्ति ( सामर्थ्य ) भी अपने ही से
भिन्न होने लगेगी । क्योंकि असमर्थव्यावृत्तिके ही अनेक बार करके
हुए ज्ञान विषयके एक होनेपर भी स्वरूपत अर्थात् अपने अपने
व्यक्तित्त्वके विचारसे भिन्न भिन्न हैं। यदि द्वितीय पक्ष कहो तो अन्यो-
न्याश्रय दोष आ जायगा । क्योंकि सामर्थ्य और कारित्व रूप विषयमे
भेद ज्ञानभेदके अधीन होगा और उनके ज्ञानोंमे भेद उन्हीं विषयोंके
भेदके अधीन होगा । इस प्रकार अन्योन्याश्रय दोष हो जाता है ।
यदि सामर्थ
न तावदाद्यः पक्षः, सिद्धसाधनात् परा^१नभ्युपगमेन हेत्व-
सिद्धेश्च । यत् सहकारिसमवधानवत् तद्धि करोत्येवेति को नाम
नाभ्युपैति^२ यमुद्दिश्य साध्यते । न चास्मत्काले सहकारि-
समवधानवत्त्व^३ मस्माभिरभ्युपेयते, यतः प्रसङ्गः प्रवर्त्तेत ।
प्रातिस्विकी तु योग्यता अन्वयव्यतिरेक^४विषयीभूत बीजत्वं
वा स्यात्, तदवान्तरजातिभेदो^५ वा सहकारिवैकल्यप्रयुक्तकार्या-
भाववत्त्वं वा ?
सबोंके समवधानके कारण मानते हो अथवा प्रातिस्विकी योग्यता मानते
हो ? अर्थात् स्वभावसे ही प्रत्येक बीजमे यह योग्यता है ?
यहाँ प्रथम पक्ष ठीक नहीं है। क्योंकि तब आपके प्रसङ्ग और
विपर्ययका स्वरूप यह होगा 'कुशूलस्थ बीज यदि अपने सहकारियोंसे
युक्त होता तो अङ्कुर करता, नहीं करता है, इसलिये सहकारियोंसे
युक्त नहीं है । इस स्थितिमें यहाँ सिद्धसाधनदोष आ जाता है । एव
स्थिरवादियोंको कुशूलस्थ बीजमें सहकारियोंका समवधान अस्वीकृत
होनेके कारण प्रसङ्गमे दिया हुआ हेतु भी असिद्ध है । क्योंकि जो
सहकारियोंके सहित है, वह करता ही है" इसे कौन नहीं मानता है ?
जिसके प्रति यह साधन कर रहे हो । एव अङ्कुर नहीं करनेवाले
कुशूलस्थ बीजमे हम सहकारियोंका योग तो मानते नहीं कि आपका
दिया कारित्वका प्रसङ्ग लागू हो ।
आपका द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि बीजमें स्वाभाविक
अङ्कुर योग्यता तो तीन प्रकारकी हो सकता है । प्रथम बीजके रहते
अङ्कुर होता है और उसके अभावमे नहीं होता, इसलिये अन्वय-
व्यतिरेकज्ञानका विषयभूत बीजजातिका होना ही अङ्कुर योग्यता है ।
१. पर स्थिरवादी । २ नाभ्युपगच्छति—१ पु० पा०
३. समवधानवत्तास्माभि—१ पु० पा०
४ अन्वयव्यतिरेकेतिपदम् अन्वयव्यतिरेकग्रहपरम् ।
५. बौद्धाभिमतं कुर्वद्रूपत्वम् ।
क्षणभङ्गवादः १९
न तावदाद्यः, अकुर्वतोऽपि बीजजातीयस्य प्रत्यक्षसिद्धत्वात् ।
तवापि तत्राविप्रतिपत्तेः ।
न द्वितीयः१, तस्य२ कुर्वतोऽपि मयानभ्युपगमेन दृष्टान्तस्य
साधनविकलत्वात् । को हि नाम सुस्थात्मा प्रमाणशून्यमभ्युप-
गच्छेत् । स हि न तावत् प्रत्यक्षेणा३नुभूयते, तथानव४सायात् ।
दूसरा, बीजकी किसी अवान्तरजाति—(कुर्वद्रूपत्व) का होना । और
तीसरा, केवल सहकारिहीनताके ही कारण अंकुर न कर सकना । अर्थात्
पत्थरके टुकड़ोंके समान नहीं कि जो सहकारियोंके विद्यमान रहनेपर
भी अंकुर नहीं करते ।
इनमें प्रथम प्रकार (बीजजातिका होना) ठीक नहीं है । क्योंकि
तब आपके प्रसङ्ग और विपर्ययका यह स्वरूप होगा "कुशूलस्थ पदार्थ
यदि बीजजातिका होता तो अंकुर करता, नहीं करता है, इसलिए वह
बीजजातिका नहीं है" । किन्तु अंकुर नहीं करते हुए भी धान्यादिक
बीजजातिके हैं, यह प्रत्यक्षसिद्ध है । उनके बीजजातिके होनेमें तुम्हें
भी विवाद नहीं है ।
बीजका कुर्वद्रूपत्वजातिका होनारूप द्वितीय प्रकारकी योग्यता-
का मानना भी ठीक नहीं है । क्योंकि तब आपके प्रसङ्गका यह
स्वरूप होगा "कुशूलस्थ बीज यदि कुर्वद्रूपत्व-जातिवाला होता तो क्षेत्र-
पतित बीजके समान अंकुर करता" । पर यहाँ मैं अंकुर करनेवाले
क्षेत्रस्थ-बीजमें भी कुर्वद्रूपत्वनामकी जाति नहीं मानता, इसलिये
आपका दृष्टान्त हेतुशून्य है । दृष्टान्त वही होता है, जिसे वादी प्रति-
वादी दोनों एक सा मानते हों । पर कौन स्वस्थ दिमाग वाला व्यक्ति
होगा, जो इस तरहकी प्रमाणशून्य वस्तुको माने । क्योंकि वह
१ नापि द्वितीयः—३ पु० पा०
२. तस्य = जातिविशेषस्य ।
३. प्रत्यक्षम् = निर्विकल्पकम् । निर्विकल्पकस्यैव तन्मते प्रामाण्यस्वी-
कारादित्यर्थः ।
४. अनवसायात् = अनुव्यवसायाभावादित्यर्थः ।
२२ आत्मतत्त्वविवेके
नाप्यनुमानेन, लिङ्गाभावात् । यदि न कश्चिद्विशेषः, कथं
तर्हि करणाकरणे इति चेत्, क एवमाह नेति । परं किं जाति-
भेदरूपः¹ सहकारिलाभालाभरूपो वेति नियामकं प्रमाणमनु-
मरन्तो न पश्यामः ।
तथापि योऽयं सहकारिमध्यमध्यासीनोऽक्षेपकरणस्वभावो²
भावः, स यदि प्रागप्यासीत् तदा प्रसह्य कार्यं कुर्वाणो गीर्वाण-
शापशतेनापि अपहस्तयितुं न शक्यते इति चेत्, युक्तमेतत्
यद्यक्षेपकरणस्वभावत्वम्³ भावस्य प्रमाणगोचरः स्यात्, तदेव कुतः
सिद्धमिति नाधिगच्छामः ।
(कुर्वद्रूपत्व जाति) प्रत्यक्ष से नहीं मालूम पड़ती है । कारण, क्षेत्रस्थ
बीजको देखकर—यह कुर्वद्रूपत्व-जातिवाला है—ऐसा किसीको अनुभव
नहीं होता है ।
अनुमानसे भी कुर्वद्रूपत्वकी सिद्धि नहीं हो सकती है, क्योंकि
इसमे कोई लिङ्ग ( साधन ) नहीं है । यहाँ जो तुम यह पूछो कि "यदि
बखार और खेतके बीजमें कोई विशेषता नहीं है, तो क्यों एक अंकुर
करता है और एक नहीं करता ?" तो विशेषता नहीं है—ऐसा कहता
कौन है ? परन्तु वह विशेषता क्या कुर्वद्रूपत्व-जातिका होना और न
होना है ? अथवा सहकारियोंका लाभ और अलाभरूप है ? इसका
निर्णय करनेवाले प्रमाणका अन्वेषण करते हुए हम उसे ( प्रमाणको )
नहीं पाते हैं ।
' तो भी, जो यह सहकारियोंके मध्यमे रह अविलम्ब अङ्कुरोत्पादक-
स्वभाववाला भाव पदार्थ है, वही यदि पहले ( बखारमे ) भी था, तो
उस समय भी अङ्कुरोत्पत्ति करता हुआ वह आपकी देवताके सौ
शापोंसे भी नहीं रोका जा सकता है" किन्तु ऐसा कहना भी तुम्हारा तब
१. जातिभेदः = कुर्वद्रूपत्वम् ।
२. स्वोत्पत्तिक्षणे एव कारित्वमक्षेपकारित्वम् ।
३. धर्मत्वं ' पु० पा०
क्षणभङ्गवादः १३
प्रसङ्गतद्विपर्ययाभ्यामिति चेत्, न, परस्पराश्रयप्रसङ्गात् ।
एवं स्वभावत्वसिद्धौ¹ हि तयोः प्रवृत्तिः, तत्प्रवृत्तौ चैवंस्वभा-
वत्वसिद्धिरिति ।
स्यादेतत् । कार्यजन्मैव अस्मिन्नर्थे² प्रमाणं, विलम्बकारि-
स्वभावानुवृत्तौ कार्यानुत्पत्तिः सर्वदेति चेत्, न, विलम्बकारिस्व-
भावस्य सर्वदैवाकरणे तत्त्वव्याघातात् । ततश्च विलम्बकारित्वस्य
ठीक हो जबकि भाव-वस्तुका अविलम्ब कार्य उत्पन्न करदेनारूप
स्वभाव प्रमाणित हो । किन्तु वही ( उक्त स्वभाव ) कैसे सिद्ध है, इसे
हम नहीं समझ पाते ।
यदि यह कहो कि “बीज यदि अविलम्ब अङ्कुर करनेका स्वभाव-
वाला न होता तो पत्थरके समान बादमे भी अङ्कुर नहीं करता, किन्तु
अङ्कुर करता है, इस लिये वह अविलम्ब अङ्कुर करनेका स्वभाववाला
है” इस प्रसङ्ग और विपर्य्ययसे उक्त स्वभाव सिद्ध हो जायेगा—
तो यहां अन्योन्याश्रयदोष आ जायगा । क्योंकि कहीं भी पहले इस
प्रकारके स्वभावका होना प्रसिद्ध हो तो उक्त प्रसङ्ग और विपर्य्ययकी
प्रवृत्ति हो सके तथा पहले उक्त प्रसङ्ग और विपर्य्ययकी प्रवृत्ति हो
तब उक्त स्वभावका होना सिद्ध हो । इस प्रकार प्रत्येकको अपनी
सिद्धिके लिये एक दूसरेकी अपेक्षा होनेसे किसीकी भी सिद्धि नहीं
हो सकती है ।
“अस्तु, कार्यकी उत्पत्ति ही बीजके अविलम्बकारी स्वभावका
होनेमे प्रमाण है । क्योंकि यदि यह विलम्बकारी स्वभावका हो तो
उसका वह स्वभाव सदा बना रहेगा, इस प्रकार कभी भी कार्यकी
उत्पत्ति ही नहीं होगी । इससे सिद्ध होता है कि बीज अविलम्बकारी
स्वभावका ही है” यह युक्ति देना भी ठीक नहीं है, क्योंकि विलम्बकारी
स्वभाववाला पदार्थ यदि कभी भी कार्य न करे तो उसका विलम्बकारित्व
अर्थात् विलम्बसे करना यह विशेषण ही असङ्गत हो जायगा । इसलिये
'विलम्बकारी, इस पदका “जब तक सहकारियोंका असंनिधान रहे
१. स्वभावसिद्धौ—१ पु० पा० २. अस्मिन् अलोपकारित्वे ।
९४ आत्मतत्त्वविवेके
यावत्सहकार्यसन्निधानं तावन्न करोतीत्यर्थः । एवं च कार्य-
जन्म सामग्र्यां प्रमापयितुं शक्यते न तु जातिभेदे । ते तु किं
यथानुभवं विलम्बकारिस्वभावाः परस्परं प्रत्यासन्नाः कार्यं कृतवन्तः?
किं वा यथा त्वत्परिकल्पनं विप्रकारिस्वभावाः ? इत्यत्र कार्य-
जनन¹मजागरुकमेवेति ।
नापि तृतीयः, विरोधात् । सहकार्याभावप्रयुक्तकार्याभाव-
चाथं सहकारिविरहे कार्य्याक्षेति व्याहतम् । तस्माद् यद् यद्-
भावे एव यन्न करोति तत् तत् सद्भावे तत् करोत्येव इति तु
स्यात् । एतच्च स्थैर्यसिद्धेरेव परं बीजं सर्वस्वमिति ।
तब तक नहीं करनेवाला" यह अर्थ है । अर्थात् वह सामग्रीके जुटनेपर
ही कार्य करेगा । इस प्रकार कार्यकी उत्पत्ति तो सामग्रीके जुटावमे
प्रमाण हो सकती है न कि तुम्हारी कल्पित कुर्वद्रूपत्व जातिके होने
में । तब क्या वे बीज अनुभवके अनुसार विलम्बकारी स्वभावके
होते हुए भी सहकारियोंसे मिलकर कार्य किये ? अथवा जैसी कि
तुम्हारी कल्पना है—क्षिप्रकारी (अविलम्बकारी) स्वभावके होनेके
कारण ? इसमे कार्य जन्म प्रमाण होनेमें उदासीन है । अर्थात् स्व
कपोलकल्पनाकी अपेक्षा अनुभवको ही प्रमाण मानना समुचित है ।
बीजके स्वाभाविक अङ्कुरयोग्यतापक्षमे तीसरा प्रकार भी ठीक
नहीं है, क्योंकि स्ववचनमे ही विरोध हो जायगा । अर्थात् कुशूलस्थ
बीजको तुम भी सहकारीरहित मानते हो । ऐसी दशामे तुम्हारे
प्रसङ्गका यह स्वरूप होगा "सहकारीरहित बखारका बीज यदि
सहकारीके बिना कार्य (अङ्कुर) न करता हो तो कार्य करे" । यह
परस्पर व्याहत वचन है । इसलिये यह तो हो सकता है कि" जो ही
जिस वस्तुके बिना जिस कार्यको नहीं करता है, वही उस वस्तुके आ
जानेपर उस कार्यको कर देता है"। किन्तु यह तो हमारी स्थैर्य-
सिद्धिका ही एकमात्र मूल है । क्योंकि उक्त नियममें एक ही बीजका
पहले सहकारीके बिना और पीछे सहकारीके साथ रहना सिद्ध होता
हुआ उसके क्षणिकत्वका विरोध करता है ।
१. कर्मोपजनन—३ पु० पा०
क्षणभङ्गवादः १५
एतेन समर्थव्यवहारगोचरत्वं हेतुरिति निरस्तम् । तादृग्-
व्यवहारगोचरस्यापि बीजस्याङ्कुराकरणदर्शनात् । नासौ मुख्यस्तद्-
व्यवहारः१, तस्य जनननिमित्तकत्वात्, अन्यथा ऽनियम-
प्रसङ्गादिति चेत्, कीदृशं पुनर्जंननं मुख्यसमर्थव्यवहारनिमित्तम् ?
न तावदक्षेपकरणं, करणमेवेत्येतत्स्वभावत्वेना२प्युपपत्तेः । ततश्च
जनननिमित्त३ एवायं व्यवहारो न व्याप्तिसिद्धिरिति ।
इससे “समर्थव्यवहारका विषय होना अर्थात् अङ्कुरसमर्थ कहा
जाना ही अङ्कुरकारी होनेमे हेतु है” यह भी खण्डित हो गया।
क्योंकि अङ्कुरसमर्थ कहे जाते हुए भी कुशूलस्थ बीजका अङ्कुर
नहीं करना देखा जाता है ।
यदि 'कुशूलस्थ बीजमे अङ्कुरसमर्थत्वका व्यवहार मुख्य (वास्त-
विक) नहीं है, क्योंकि वास्तविक व्यवहारका कारण तो कार्यका पैदा
करना है, जो कि खेतमे बोये गये बीजमें ही है । अन्यथा भ्रमवशान्
पत्थरमें किया गया अङ्कुर समर्थत्वका व्यवहार भी वास्तविक व्यवहार
हो जायगा" । तो फिर किस प्रकार कार्य पैदा करना वास्तविक समर्थ
व्यवहारका कारण मानते हो ? यहां अविलम्बसे कार्य पैदा करना
समर्थ व्यवहारका निमित्त नहीं हो सकता है, क्योंकि वह असिद्ध है ।
कारण यह है कि कोई भी कारण अपने सहकारियोंके बिना कार्य नहीं
करता, इसलिये विलम्बसे कार्य करना स्वाभाविक है, जो कुशूलस्थ
बीजमें भी है ही । व्यवहारमे अनियम तो इसीसे मिट जायगा कि
बीज सहकारियोंके जुटनेपर ही करता है, और सहकारियोंके जुट
जानेपर करता ही है । इसलिये पत्थरमे अङ्कुर समर्थत्वका व्यवहार
वास्तविक क्यों कर होगा ?
इसलिये कदाचित् अङ्कुर पैदा करना ही अंकुर समर्थत्व-व्यवहारका
निमित्त है, न कि अविलम्ब पैदा करना । अत कुशूलस्थ बीज अंकुर
समर्थ कहा जायगा । पत्थर तो कभी भी अंकुर नहीं करता, इसलिये यह
अङ्कुर समर्थ नहीं कहा जा सकता ।
१. तत्र व्यवहार —१ पु० पा० २. स्वभावत्वे—१ पु० पा० ।
३. जनननिबन्धन —१ पु० पा०
१६ आत्मतत्त्वविवेके
स्यादेतत् । एतावतापि भावस्य कः स्वभावः समर्थितो
भवति ? न हि क्षेपाक्षेपाभ्यामन्यः प्रकारोऽस्तीति चेत् , 'न,
दूषणाभिधानसमये१ निश्चयाभावेनैव संदिग्धासिद्धिनिर्वाहे कथापूर्व-
रूप२पर्यवसानात् । उत्तरपक्ष३समये तु सोऽपि न दुर्वचः ।
इस प्रकार "जो समर्थ व्यवहारका विषय होता है, वह अङ्कुर
करता है" यह व्याप्ति असिद्ध है । अतः प्रसङ्गोपस्थापनमे मूल शैथिल्य
हो जाता है । अथवा "जो सत् है वह क्षणिक है" यह व्याप्ति नहीं
सिद्ध हो सकती है । अतः पूर्वमे कहा गया आपका अनुमान क्षणिक-
वादमे प्रमाण नहीं हो सकता है ।
"अस्तु, फिर भी भाववस्तुके कौनसे स्वभावका आप समर्थन
करते हैं ? विलम्बसे करनेका या अविलम्बसे ( तत्क्षण ) करनेका ?
इन दो प्रकारोंसे भिन्न तीसरा प्रकार नहीं हो सकता है । अर्थात्
किसी भी पदार्थको या तो विलम्बसे कार्य करनेवाला अथवा अविलम्ब
कार्य करनेवाला माना जा सकता है । यदि विलम्बसे कार्य करना
स्वभाव मानें तो सहकारियोंका योग रहनेपर भी नहीं करेगा । यदि
अविलम्ब ( तत्क्षण ) कार्य करना स्वभाव माने तो सहकारीकी विना
प्रतीक्षा किये अकेला ही कर देगा" इस प्रकारका उपर्युक्त प्रश्न नहीं
कर सकते हो । क्योंकि इस प्रकारके प्रश्नसे तुम्हारा अभिप्राय मालूम
होता है कि तुम सभी भावोंका अविलम्बकारित्व स्वभाव मनवा कर
प्रकृतमे यह प्रसङ्ग देना चाहते हो कि "बखारका बीज अविलम्बकारी
होता तो अङ्कुर कर देता" । किन्तु तुम्हारे पक्षमे दोष देनेके समय
भावोंके स्वभावको अनिश्चय द्वारा सन्देहमे डाले रखकर ही तुम्हारे
साथ हो रही हमारी जल्पकथाका पूर्वरूप पूरा हो जाता है । क्योंकि
भाव स्वभाव का निर्णय हुए बिना तुम्हारे पूर्वोक्त प्रसङ्गमे सन्दिग्धा-
सिद्धिदोष बिना प्रयासके ही आ जाता है और तुम्हारा प्रसङ्ग खटाई
में ही रह जाता है ।
१. दूषणावसरे—१ पु० पा०
२. पूर्वरूपम् = परपक्षखण्डनम् ।
३. उत्तरपक्षः—स्वपक्षस्य स्थैर्यस्य स्थापनम् ।
क्षणभङ्गवादः १७
तथाहि करणं प्रत्यविलम्ब इति कोऽर्थः ? किमुत्पत्तेरनन्तर-
मेव करणं, सहकारिसमवधानानन्तरमेव वा । विलम्ब इत्यपि
कोऽर्थः ? किं यावन्न सहकारिसमवधानं तावदकरणं, सर्वथैवाकरण-
मिति वा । तच्च प्रथमचतुर्थयोः प्रमाणाभावादनिश्चयेऽपि द्वितीय-
तृतीययोः प्रत्यक्षमेव प्रमाणम् । बीजजातीयस्य १ हि सहकारिसम-
वधानानन्तरमेव करणं करणमेवेति प्रत्यक्षसिद्धमेव । तथा सह-
कारिसमवधानरहितस्याकरणमित्यपि ।
अत्र च भवानपि न विप्रतिपद्यत एव, प्रमाणसिद्धत्वात् विपर्य-
अपने पक्षका समर्थन रूप कथाके उत्तरपक्षके अवसरमें तो भावों
का स्वभाव बतलाना भी कठिन नहीं है । क्योंकि कार्य करनेमे
अविलम्बका क्या अभिप्राय है ? क्या जब ही वह कारण जन्म
ले, उसके दूसरे क्षणमें ही कार्य करना ? या कभीका जन्मा होकर
भी अपने सहकारियोंके बाद ही कार्य करना ? तथा विलम्बसे भी
करनेका क्या अभिप्राय है ? क्या जबतक सहकारियोंका सन्निधान
न हो तबतक न करना ? अथवा कभी भी न करना ? इन चारों
पक्षोंमें प्रथम और चतुर्थ पक्ष असिद्ध है । क्योंकि पैदा होते ही
करनेमें कोई प्रमाण नहीं है । एवं यदि कभी भी न करे तो संसार
मे कभी कोई कार्य ही न दीख पड़े ।
इनमे दूसरा और तीसरा पक्ष यदि आपको अभिप्रेत हो तो उसमें
प्रत्यक्ष ही प्रमाण है । क्योंकि बीजजातिका सहकारियोके योगमे
ही करना और अवश्य करना यह तो प्रत्यक्ष-सिद्ध ही है । इसी तरह
सहकारियोंके अभावमे नहीं करना भी प्रत्यक्षसे ही सिद्ध है । इन
दूसरे और तीसरे पक्षोंके माननेमें आपको भी विरोध नहीं होगा,
क्योंकि ये प्रत्यक्षसिद्ध हैं । बल्कि इनके न माननेमें ही अनेक
बाधायें हैं ।
१. क्षणिकत्ववादिभिरेकस्यां व्यक्तौ करणाकरणयोरनङ्गीकारात् बीज-
जातीयस्येत्युक्तम् ।
१८ आत्मतत्त्वविवेके
ये बाधकाच्च। तथाहि यदि सहकारिविरहेऽकुर्वाणस्तत्समव-
धानेऽपि न कुर्यात्, तज्जातीयमकारणमेव१ स्यात्, समवधानासम-
वधानयोरुभयोरप्यकरणात्।
एवं तत्समवधानविरहेऽपि यदि कुर्यात्, सहकारिणो न
कारणं स्युः, तानन्तरेणापि करणात्। तथा चानन्यथासिद्धान्वय-
व्यतिरेकवतामप्यकारणत्वे कार्यस्याकस्मिकत्वप्रसङ्गः२। तथा
च कादाचित्कत्व३विहतिरिति।
क्योंकि सहकारियोंके अभावमे न करनेवाला कारण यदि सह-
कारियोंके सन्निधानमे भी कार्य न करे तो वह जाति ही अकारण हो
जायगी। क्योंकि सहकारीका सन्निधान और असन्निधान दोनों दशाओं
में यह वस्तु नहीं करती है। जैसे कि मिट्टी, पानी आदि सहकारियोंके
योगमे अथवा अभावमे भी पत्थरसे अंकुर नहीं पैदा होता, इसलिये
समझा जाता है कि पत्थर जाति ही अंकुरके प्रति अकारण है।
इसी प्रकार सहकारियोंके असन्निधानमे भी यदि कार्य करे तो
सहकारी पदार्थ कारण ही न कहे जॉय, क्योंकि उनकी बिना अपेक्षा
किये ही कार्य कर देता है। इस प्रकार जो वस्तु अन्यथासिद्ध नहीं
है और कार्यके साथ अन्वय-व्यतिरेक सहचार वाली है, वह भी यदि
कारण न हो तो विश्वका कार्यमात्र ही आकस्मिक (बिना कारणका)
हो जायगा। अर्थात् कार्योत्पत्तिकी कोई व्यवस्था ही नहीं रह
जायगी। ऐसी दशामे कार्यका किसी समयमे नहीं रहना और पीछे
हो जाना—यह नहीं बनेगा। क्योंकि कार्यको कारणके अधीन माननेसे
ही कारणके अभावमे कार्यका नहीं होना और कारणकी सत्तामे कार्यका
होना—यह व्यवस्था बन पाती है। बिना कारणके कार्य माननेमें तो
कब कार्य होगा और कब नहीं होगा—इसका ठिकाना ही नहीं रहेगा।
इस स्थितिमे कार्य या तो सदा ही रहेगा या कभी न होगा।
१. तज्जातीयमवारणं स्यात्—१ पु० पा०
२. कार्यस्याकारणत्वप्रसङ्गः—२ पु० पा०
३. किञ्चित्कालेऽसतः किञ्चित्कालसत्त्वं कादाचित्कत्वम्।