आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ आत्मतत्त्वविवेके
इह खलु निसर्गप्रतिकूलस्वभावं सर्वजनसंवेदनसिद्धं दुःखं
जिहासवः सर्व एव तद्धानोपायमविद्वांसोऽनुसरन्तश्च सर्वाध्यात्मवि-
देकवाक्यतया तत्त्वज्ञानमेव तदुपायमाकर्णयन्ति, न ततोऽन्यत् ।
प्रतियोग्यनुयोगितया च आत्मैव तत्त्वतो ज्ञेयः । तथाहि—यदि
नैरात्म्यं, यदि वात्मास्ति वस्तुभूतः, उभयथापि नैसर्गिकमात्म-
ज्ञानमतत्त्वज्ञानमेव इत्यत्राप्येकवाक्यतैव वादिनामत आत्मतत्त्वं
विविच्यते ।
जगत्पर जिसकी अकारण एवं निर्व्याज अनुकम्पा है तथा उसीके
लिये जिसके सारे प्रयत्न हैं; मनु-कपिल प्रभृति पूर्वगुरुओंसे भी श्रेष्ठ
उस जगत्पिता परमेश्वरको ( मेरा ) नमस्कार है ।
संसारमे दुःख वह बस्तु है, जो स्वभावतः प्रतिकूल लगनेवाली
और सबोंके अनुभवमे भासित होनेवाली है । अर्थात् वह ऐसी वस्तु
नहीं, जो किसीके अनुभवमें न आती हो या अनुकूल लगती हो ।
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