आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ आत्मतत्त्वविवेके
व्यावृत्ति¹भेदादयमदोष इति चेन्न, तदनुपपत्तेः । व्या-
वर्त्यभेदेन विरोधो हि तन्मूलम्² । स च न तावन्मिथोव्या-
वर्त्यऽश्लेषाद् गोत्वाश्वत्ववत्, तथा सति विरोधादन्यतरापाये³
बाधासिद्ध्योरन्यतरप्रसङ्गात् ।
यदि ऐसा कहो कि—"सामर्थ्य हेतु असमर्थव्यावृत्तिरूप है और
कारित्व साध्य अकारिव्यावृत्तिरूप है । दोनों व्यावृत्तियोंके भिन्न
होनेसे सामर्थ्यरूप साधन और कारित्व (करना) साध्यमें भी भेद
होकर साध्य-साधनमें ऐक्यापत्ति दोष नहीं आ सकता तो यह भी
असङ्गत है । क्योंकि इन दोनों व्यावृत्तियोंके परस्पर भिन्न होनेका
मूल है—समर्थ और कारीरूप व्यावत्र्यमें भेद होनेसे उक्त व्या-
वृत्तियोंका परस्पर विरोधी होना । किन्तु इन व्यावृत्तियोंमें आत्य-
न्तिक या आंशिक किसी प्रकारका विरोध सिद्ध नहीं हो सकता है ।
कारण, जैसे गोत्व (अगोव्यावृत्ति) और अश्वत्व—(अनश्वव्या-
वृत्ति) रूप व्यावृत्तियोंम आत्यन्तिक विरोध है, क्योंकि गोत्व धर्म
सभी अश्वोंका परित्यागकर गोमात्रमे ही रहता है, एव अश्वत्व धर्म
भी सभी गौओंका परित्यागकर अश्वमात्रमे ही रहता है, वैसे ही
सामर्थ्य और कारित्वरूप व्यावृत्तियोंमे भी यदि आत्यन्तिक विरोध
माना जाय तो सामर्थ्य हेतुसे कुशलस्थ (बखारस्थित) बीजमे कारित्व
साध्यका आपादन अर्थात् पूर्वोक्त प्रसङ्ग ही नहीं बन सकता है ।
क्योंकि उक्त विरोधके कारण बीजरूप पक्षमें सामर्थ्यरूप हेतु और
कारित्व रूप साध्य एक साथ रह नहीं सकते, इसलिये पक्षमे किसी
एक का अभाव अवश्य रहेगा । एसी दशामें पक्षभूत बीजमे यदि
सामर्थ्य हेतु रहा तो कारित्व साध्य नहीं रह सकता इस प्रकार
१ सामर्थ्यपदम् असमर्थव्यावृत्तिपरम्, करण पदञ्च अकरणव्यावृत्तिपरमतो
व्यावृत्तिभेदान्न साध्याविशिष्टत्वप्रसङ्ग इति भाव ।
२ व्यावत्र्यमिह व्यावृत्याश्रयो विशेष्य व्यावृत्युपग्राह्य मिति यावत् तन्मूलम्
व्यावृत्तिभेदमूलमित्यर्थ ।