आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीगणेशाय नम
आत्मतत्त्वविवेकः
श्रीमदुदयनाचार्यविरचितः
[ सानुवादः ]
स्वाम्यं यस्य निजं जगत्सु जनितेष्वादौ, ततः पालनं,
व्युत्पत्तेः करणं, हिताहितविधिव्यासेधसम्भावनम् ।
भूतोक्तिः, सहजा कृपा, निरुपधिर्यत्नस्तदर्थात्मक-
स्तस्मै पूर्णगुरुत्तमाय जगतामीशाय पित्रे नमः ॥
प्रथम, जनित इस विश्वमात्र पर सहज स्वाम्य जिसका छाया,
ततः पालना, बोध, हिताहित विधिनिषेध जगने पाया ।
सहज सदुक्ति, अकृत्रिम कृपा, वो उसी हेतु जिसकी माया,
गुरुश्रेष्ठ उस जगत्पिता को नमोवाक्य पहुँचे गाया ॥
सृष्टिके आदिकालसे ही अपने द्वारा रचित इस सम्पूर्ण जगत्के
ऊपर जिसका स्वाभाविक स्वामित्व विराजमान है, अथवा ( यहाँ
'निजम्' पदके सावधारण होनेके कारण ) एकमात्र जो जगत्का
अधिपति है, ऐसा नहीं कि उस जगदीश्वरके अतिरिक्त किसी अन्यका
भी सहाधिपत्य या आंशिक आधिपत्य हो, तथा स्वोत्पादित जगत्की
रक्षा भी पिताके समान जो स्वयं करता है, एव जिस प्रकार पिता
अनेक प्रकारकी शिक्षा देकर बालकको व्युत्पन्न करता है, वैसे ही जो
परमात्मा प्रयोज्य प्रयोजक देहका आश्रय कर पद पदार्थकी तथा घट-
पटादिनिर्माणकी व्युत्पत्ति भी पुत्रस्थानीय संसारको स्वयं कराता है,
जो वैदिक विधिवाक्यो द्वारा हित कार्योंमे प्रवृत्तिका तथा निषेधवाक्यो
द्वारा अहित कार्योंसे निवृत्तिका करानेवाला भी स्वयं है, पुत्रतुल्य
संसारके लिये श्रुतियोंके रूपमे जिसकी स्वभावतः यथार्थ उक्तिया है,