आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्ष. भ. १. २. ५
प्रसङ्गविपर्ययाभ्यां¹ तत्सिद्धिरिति चेत् न, सामर्थ्यं हि
करणत्वं² वा योग्यता वा । नाद्यः, साध्या³विशिष्टत्वप्रसङ्गात् ।
जाता है कि बखारमे रहनेकी अवस्थामे वह बीज भिन्न था और
खेतमे डाला गया वह भिन्न हो गया । इस तरह भेदकी और क्षणिकत्वकी
क्रमश सिद्धि हो गयी—ऐसा कहना ठीक नहीं है । क्योंकि एक
ही बीजमे सामर्थ्य और असामर्थ्य-रूप विरुद्ध धर्मका सम्बन्ध ही नहीं
हो सकता है ।
"बखार का बीज यदि अङ्कुर-समर्थ होता तो अङ्कुर उत्पन्न कर देता,
नहीं करता है, इसलिये वह अङ्कुर समर्थ नहीं है । इस प्रकारके प्रसङ्ग
और विपर्ययसे बीजमे बखारमे रहनेकी दशामे असामर्थ्य और
खेतमे रहनेकी दशामें सामर्थ्यरूप विरुद्ध धर्मोका सम्बन्ध सिद्ध हो
जाता है इस तरह कुशूलस्थ और क्षेत्रस्थ बीजका सुतरा भेद सिद्ध हो
जाता है।" यह कहना भी ठीक नहीं है । क्योंकि यहा सामर्थ्यका
कौन सा अर्थ अभीष्ट है ? फल पैदा कर देना अथवा उसकी योग्यता
रखना ? प्रथम अर्थ सम्भव नहीं । क्योंकि पूर्वोक्त प्रसङ्ग और विपर्ययमे
आपादक भी आपाद्यरूप ही हो जायगा । क्योंकि तब आपके प्रसङ्गका
यह स्वरूप होगा—बखारका बीज यदि अङ्कुर करे तो अङ्कुर करे । एव
क्षेत्रस्थ बीज यदि अङ्कुर न करता तो अङ्कुर न करता—इस प्रकार दोनो
प्रसङ्गोंमे जो ही साध्य है, वही साधन भी हो जाता है । इसी तरह
दोनों ही विपर्ययोंमें भी साध्य साधन एक ही हो जाते है । उक्त
प्रसङ्गोंके विपरीत विपर्ययोंका स्वरूप यह होगा—कुशूलस्थ बीज अङ्कुर
नहीं करता है, इसलिये अङ्कुरासमर्थ है अर्थात् अङ्कुर नहीं करता है ।
एव क्षेत्रस्थ बीज अङ्कुर करता है इसलिये अङ्कुर समर्थ है अर्थात्
अङ्कुर करता है । यहा भी साध्य और साधन अभिन्न हो गये । किसी
साध्यकी सिद्धिके लिये साधनको उससे भिन्न होना चाहिये ।
१. प्रसङ्गतद्विपर्ययाभ्याम्—१ पु० पा०
२. करणं वा—१ पु० पा०
३. साध्यं व्यापकम् आपाद्यानुमेयसाधारणम् । तथा चापाद्यानुमेयाभ्यामा-
पादकानुमापकयोरविशेषप्रसङ्गादित्यर्थः ।