आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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तत्र न प्रथमः प्रमाणाभावात् । यत् सत् तत् क्षणिकं१
यथा घट , सच्च विदादाध्यासितः शब्दादिरिति२ चेत् न, प्रति-
बन्धासिद्धेः३ ।
सामर्थ्यासामर्थ्यलक्षणविरुद्धधर्मसंसर्गेण भेदसिद्धौ तत्सिद्धि-
रिति चेत् न, विरुद्धधर्मसंसर्गासिद्धेः ।
आत्मारूप गुणीके होनेमे बाधक है । और चौथा शरीरसे भिन्न
आत्माके अस्तित्वमे बाधक है । अर्थात् इन बाधकोंके कारण
आस्तिकोंका नित्य ज्ञान सुखादिका आश्रयभूत तथा देहेन्द्रियादिसे भिन्न
आत्मा नहीं सिद्ध हो पाता है ।
पूर्वोक्त चारों बाधकोंम प्रथमसे (क्षणिकवादसे) हमारे अभिमत
आत्माका बाध नहीं हो सकता है । क्योंकि क्षणिकवादमें कोई प्रमाण
नहीं है । यदि “जो सत् है वह क्षणिक है, जैसे बनकर तुरत
ध्वस्त हुआ घडा। विवादके विषय शब्द आत्मा आदि सत् वस्तु भी
सत् हैं इसलिये क्षणिक हैं' इस अनुमानको क्षणिकत्वमें प्रमाण
कहें, तो वह ठीक नहीं क्योंकि 'जो सत् है वह क्षणिक है यह व्याप्ति
ही असिद्ध है ।
“सामर्थ्य और असामर्थ्य' रूप विरुद्धधर्मोंके सम्बन्धसे सभी
सत् पदार्थोंमे भेदकी सिद्धि होगी और उसके बाद क्षणिकत्वकी सिद्धि
हो जायगी। जैसे बखारमें स्थित बीज अङ्कुरके लिये असमर्थ है
और खेतमे डाला गया वह अङ्कुर करनेमे समर्थ है । इसलिये समर्थ-
१ यत् सत् तत् क्षणिकं यथा जलधर, सन्तश्च भावा इमे
सत्ता शक्तिरिहाथकर्मणि मिते सिद्धेषु सिद्धा न सा ।
नाप्येकैव विधाऽ यदापि परतः नैव क्रिया वा भवेत्
द्वधापि क्षणभङ्गसङ्गतिरत साध्ये च विश्राम्यति ॥
ज्ञानश्री—क्षणभङ्गाध्याये प्रथमपादे पृ० १
२ अनुमितिकारणीभूत व्याप्तिपक्षधर्मताज्ञानजनको उदाहरणोपनयामकौ
द्वावेवावयवौ इति बौद्ध म मते ।
३ प्रतिबन्धो व्याप्ति, तदसिद्धेरित्यर्थ ।