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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 530 में से

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पृष्ठ 52

क्षणभङ्गवादः ३
तत्र बाधकं भवेदात्मनि१ क्षणभङ्गो२ वा बाह्यार्थभङ्गो वा
गुणगुणिभेदभङ्गो३ वा अनुपलम्भो वेति।
आत्मज्ञान ( नैरात्म्यपक्षमे देहाभिन्नरूपमे असन् आत्माका भान होनेसे
और आत्मास्तित्वपक्षमे आत्माका देहादिसे अभिन्न रूपमे भान होनेसे )
अतत्त्वज्ञान ही है—इस बातमे भी सभी वादियोंका ऐकमत्य ही है।
यद्यपि स्वाभाविक आत्मज्ञानके अन्दर "अहं सुखी" यह ज्ञान भी है
और यह तत्त्वज्ञान ही है, क्योंकि न्यायमतसे सुखादिक आत्माके ही
धर्म हैं। अतः सभी स्वाभाविक आत्मज्ञानको अतत्त्वज्ञान कहना
ठीक नहीं है। तथापि इसे अतत्त्वज्ञानकी कोटिमे माननेके दो कारण
हैं। एक यह कि आत्माका सुखी आदि होनेका ज्ञान कादाचित्क
होनेसे "स्थूल गौर, इत्यादि मिथ्याज्ञानोंसे सदा तिरस्कृत रहता है।
दूसरा यह कि "आत्मा वाऽरे द्रष्टव्य श्रोतव्यो मन्तव्य " इत्यादि श्रुति-
वचनके अनुसार मनन द्वारा हुआ असन्दिग्धज्ञान ही निर्बाध रूपसे
तत्त्वज्ञान है। क्योंकि मननजन्य ही आत्मज्ञान मिथ्याज्ञानको निवृत्त
करनेमें समर्थ है। इसलिये आत्माके वास्तविक स्वरूपका यहाँ विवेचन
किया जाता है।
जिस आत्माका नास्तिक निषेध करते हैं, तथा आस्तिक अस्तित्व
स्वीकार करते हैं, उस आत्मामें चार प्रकारके बाधक हो सकते हैं।
१—सब पदार्थ क्षणिक हैं; २—ज्ञानसे भिन्न बाह्यवस्तु नहीं है,
३—गुण और गुणीमें भेद नहीं है तथा ४—शरीरसे भिन्न आत्माकी
उपलब्धि नहीं होती है। इनमे क्षणिकवाद नित्य आत्माके होनेमे
बाधक है। दूसरा, ज्ञानसे भिन्न किन्तु ज्ञान-सुख आदिका आश्रय-
भूत आत्माके होनेमे बाधक है, तीसरा भी, ज्ञानरूप गुणसे भिन्न
१. तत्रात्मनि बाधक भवेत् १ पु० पा०
२. क्षणभङ्गादिपदत्रय तत्साधकप्रमाणपरम्, अनुपलम्भे तु स्वरूपस्यैवा-
सिद्धिरिति शाङ्करी ।
३. भाव स्वोत्पत्त्यव्यवहितोत्तरक्षणवृत्तिध्वंसप्रतियोगी नचेति क्षणभङ्गे
विप्रतिपत्ति । एकदेशिमतेनान्त्ये विधिकोटिप्रसिद्धि, निषेधकोटिप्रसि-
द्धिस्तु अलीके सौगताना मते।