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आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

प्रकाशक
चौखम्बा विद्याभवन
(भारतीय संस्कृति एवं साहित्य के प्रकाशक तथा वितरक)
चौक (बनारस स्टेट बैंक भवन के पीछे)
पो० बा० नं० १०६९, वाराणसी २२१००१
दूरभाष : ३२०४०४
सर्वाधिकार सुरक्षित
द्वितीय संस्करण १९९२
मूल्य १५०-००
अन्य प्राप्तिस्थान
चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन
के० ३७/११७, गोपालमन्दिर लेन
पो० बा० नं० ११२९, वाराणसी २२१००१
दूरभाष : ३३३४३१
*
चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान
३८ यू. ए., बंगलो रोड, जवाहरनगर
पो० बा० नं० २११३
दिल्ली ११०००७
दूरभाष : २३६३९१
मुद्रक
धोजो मुद्रणालय
वाराणसी

THE
VIDYABHAWAN PRACHYAVIDYA GRATHAMALA
59
ĀTMATATTVAVIVEKA
OF
UDAYANĀCĀRYA
Edited with Critical Hindi Translation
By
Acharya Kedarnath Tripathi
Ex Head of the Deptt of Darshan, B H U &
Ex-Senior Scholar, ‘Shastra-Chudamani’
Ministry of Education, Govt. of India.
CHOWKHAMBA VIDYABHAWAN
VARANASI

© CHOWKHAMBA VIDYABHAWAN
(Oriental Publishers & Distributors)
CHOWK (Behind The Benares State Bank Building)
Post Box No. 1069
VARANASI 221001
Telephone : 320404
Second Edition
1992
Also can be had of
CHAUKHAMBA SURBHARATI PRAKASHAN
K. 37/117, Gopal Mandir Lane
Post Box No. 1129
VARANASI 221001
Telephone : 333431
CHAUKHAMBA SANSKRIT PRATISHTHAN
38 U. A., Bungalow Road, Jawaharnagar
Post Box No 2113
DELHI 110007
Telephone : 236391

समर्पणम्
स्मृतिमात्रावशेषस्वरूपायाः परमसौभाग्यशालिन्याः
दिवङ्गतधर्मपत्न्याः श्रीमत्याः गङ्गादेव्याः
पुण्यस्मृतौ समर्पितोऽयं कृति-

  • पुष्पोपहारः

कर्तृपरिचयः
सारण्य (सारन) मण्डले पुण्ये ग्रामे विष्णुपुराभिधे ।
जनिस्त्रिपाठिनो लब्ध्वा रामादेर्यो विहारिणः ॥
न्यायवैशेषिके शुक्लात् सूर्यनारायणाद् गुरोः ।
वेदान्तान् श्रीहरिहरात् कृपालोश्च द्विबेदिनः ॥
श्रुत्वा, वादविदग्रणी स विदितः केदारनाथ कृती,
शून्याब्ध्यभ्रदृगङ्किते (२०४०) शुभतमे सवत्सरे वैक्रमे ।
मार्गाख्ये शुभमासि वै सितदले पूर्णत्वमाप्ते विधौ,
ग्रन्थ ह्येतमचीकरत् सुखमनूद्याचार्यवर्योदयम् ॥
कर्तुरन्याः कृतयः
१ तर्कसङ्ग्रहन्यायबोधिन्या संस्कृत कल' व्याख्या ( प्रकाशिता )
२ „ पदकृत्यस्य हिन्दी 'कला' व्याख्या „
३ „ दीपिकाया हिन्दी 'कला' व्याख्या „
४ सांख्ययोगकोश ( संस्कृते मौलिको ग्रन्थ ) ( प्रकाशित )
५ ब्रह्मसूत्रविज्ञानामृतभाष्यम् ( सटिप्पण सम्

शुभाशीर्वादाः
परमहंसपरिव्राजकाचार्याभिनवशङ्कराचार्याणां ब्रह्मलीनानन्त-
श्रीकरपात्रस्वामिचरणानाम्—
अनन्तश्रीविभूषित १००८ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज,
निगमबोधघाट, दिल्ली-६
वर्तमान सञ्चारस्थान, भागलपुर दिनाङ्क ५-४-१९६५
आत्मतत्त्वविवेक, परमभगवद्भक्त महापण्डित श्रीमदुदयनाचार्यका
सुप्रसिद्ध ग्रन्थ है। यह संस्कृतभाषामे है तथा उसकी टीका भी संस्कृत-
भाषामें है। अतः संस्कृतभाषा न जाननेवाले मनीषियोंके लिये इस
ग्रन्थसे लाभ नहीं हो सकता था, यह बात खटकनेवाली थी। इस
कमीको दूर करनेके लिये राजकीय संस्कृत महाविद्यालय, भागलपुरके
दर्शनविभागके प्राध्यापक पं० केदारनाथत्रिपाठीने हिन्दीमे इस ग्रन्थकी
टीका लिखकर बहुत उपयुक्त कार्य किया है। टीका सरल और सुबोध
होनेके साथ साथ शिष्ट भी है। इससे जिज्ञासुओंको बहुत लाभ होगा।
इति शिवम्।
करपात्र स्वामी

प्राक्कथनम्
सम्पूर्णानन्द-संस्कृत-विश्वविद्यालयस्य न्यायवैशेषिक-विभागा-
ध्यक्षपदं पुनस्तत्रैव कुलपतिपदं चालङ्कृतवतां नैयायिक-
शिरोमणीनां पण्डितराज श्रीबदरीनाथशुक्ल-
महाभागानाम्—
भारतवर्ष दार्शनिकज्ञानके प्रादुर्भावकी प्रथम भूमि है। भारतीय
ज्ञान मानव-जीवनके उन्नयन और संस्कार-परिष्कारका एकमात्र
अनिवार्य साधन है। दार्शनिकज्ञान ही वह परम औषध है, जिससे
मनुष्यके सब प्रकारके तापोंकी निवृत्ति हो सकती है। यह वह प्रकाश
है, जिससे मनुष्यके घोर आन्तर तमका निरास होकर उसके वास्तव
स्वरूपकी अभिव्यक्ति होती है। जिसके फलस्वरूप मनुष्य अनादिकालसे
सञ्चित संकीर्णताओंसे मुक्ति पाता है। और अपने आपके सम्बन्धमें
उसकी चिरप्ररूढ बहुविध भ्रान्तियोंका उन्मूलन होता है।
भारतका दार्शनिकज्ञान अनुसन्धाता विद्वानोंद्वारा कई शाखाओंमें
विभाजित हुआ है। इस विभाजनको आस्तिक और नास्तिक दो
श्रेणियोंमें प्रधानरूपसे समझा जाता है। आस्तिक, दार्शनिकज्ञानकी
वह शाखा है, जिसमें आत्माके अभयत्त्वकी पूरी प्रतिष्ठा की गयी है।
इस शाखामें आत्माको नितान्त नित्य बताकर उसको सभी प्रकारकी
भीतियोंसे मुक्त किया गया है। जैसे, न्याय और वैशेषिक दर्शनमें
आत्मा नितान्त नित्य माना गया है। इसे कर्त्ता और भोक्ता माननेपर
भी उसके नित्यत्वकी रक्षा इस मान्यताके आधारपर की गयी है कि
कार्य और कारण, धर्म और धर्मीमें अत्यन्त भेद है। इसीलिये आत्मा
सुख-दुःख आदिका कारण और आधार होनेपर भी सुख-दुःख आदिके
अनित्य होनेसे अनित्य नहीं हो पाता है।
सांख्य और योगदर्शनमें कार्य-कारणमें तथा धर्म-धर्मीमें अभेद
माना गया है। अतः उस मान्यताके अनुसार आत्मामे कार्य और
अनित्य-धर्मके सम्बन्धसे अनित्यत्वकी आपत्तिका भय था। किन्तु
॰ परिहारके लिए उन दर्शनोंने प्रकृतिको ही सभी कार्योंका कारण

?
Let's see: how was 'झ' printed in older fonts?
In old Hindi (especially Nirnaya Sagar Press or similar), 'झ' was printed as:
A letter looking like 'म' with a tail or a squiggle, or like 'ञ'?
Wait, no! In some fonts, 'झ' is 'झ्' + 'ञ' -> wait, the letter 'झ' in Hindi:
Look at:
Is letter 1 'झ'?
Wait, does it have a tail at the bottom?
No, letter 1 is a perfect rectangle-bottom like 'म'.
Wait, what about letter 2?
Look at letter 2:
It has a top bar. Under it, a loop on left, and a vertical bar.
Wait, is it 'हा'?
Wait, what if the word is:
"महावात्या"? But it has 'त' and 'से'!
Wait, could it be "महावातात्"? No, 'त' then 'से'.
Wait, could it be "महाघातसे"?
Let's look at glyph 3:
Is it 'या'?
Wait, could it be "महायातनासे"? No, only 5 letters:
1: म
2: ह/हा
3: घा/या
4: त
5: से
Wait, look at glyph 3:
It has two loops on the left: top loop and bottom loop, then a vertical bar. That is 'घ' with 'ा' = '

( घ )
संगत् अभयसे कैसे सम्पन्न बनाया जाय । इस आवश्यकताकी पूर्तिके
लिये ही भारतवर्षके महान् नैयायिक उदयनाचार्यने अनेक महनीय
ग्रन्थोंकी रचना की । जिनमें आत्मतत्त्वविवेकका प्रमुख स्थान है।
इस ग्रन्थमें न्याय वैशेषिकदर्शनद्वारा अनुमोदित वैदिक आत्मसिद्धान्त-
के ऊपर बौद्धदार्शनिकोंके मुख्य आक्षेपोंका निष्पक्षरूपसे उपपादन करते
हुए उनका युक्तिपूर्ण निराकरण किया गया है ।
किन्तु यह ग्रन्थ आचार्यकी संक्षिप्त और गूढ तथा पुरातन शैली एवं
भाषामे निबद्ध होनेके कारण दुरूह है । जिस तत्त्वका ज्ञान मानवमात्र-
के लिये उपयोगी हो, उसका सर्वजनसंवेद्य भाषाके माध्यमसे प्रतिपादन
होना आवश्यक है । इसी दृष्टिसे काशीहिन्दूविश्वविद्यालयके भू० पू०,
दर्शनविभागके अध्यक्ष, पण्डितप्रवर श्रीकेदारनाथत्रिपाठीजीने इस
कठिन ग्रन्थको हिन्दीभाषाके माध्यमसे सुलभ बनानेका संकल्प लिया
और इस कार्यको बड़ी कुशलतासे सम्पन्न किया ।
आत्माकी नित्यता, वाह्यवस्तुके रूपमें मान्यता, ज्ञानादिगुणोंकी
आश्रयता तथा प्रत्यक्षगम्यताके बाधकरूपमें बौद्धदार्शनिकोंने जिन तर्कों-
को बड़े आडम्बरसे प्रस्तुत किया था, उन सबोंके, श्रीत्रिपाठीजीने, मूल-
ग्रन्थोक्त उत्तरोंको अत्यन्त विशदरूपसे निरूपित किया है। त्रिपाठीजी
की व्याख्यामे पूरे मूलग्रन्थका पंक्तिशः स्पष्टीकरण हुआ है और व्याख्या
में ऐसी सरणी एवं भाषाका उपयोग किया गया है, जिससे त्रिपाठीजी
की यह कृति एक नूतन रचनाका स्पष्ट आभास देती है। मैंने व्याख्याके
अनेक भागोंको पूरी सावधानीसे देखा है, और त्रिपाठीजीको सर्वत्र
सफल एवं मूलग्रन्थका मर्मज्ञ पाया है। इस व्याख्याकी रचनाके लिये
श्रीत्रिपाठीजीको मेरा हार्दिक धन्यवाद है और उनसे निवेदन भी है कि
वे अभी और ऐसी रचनाओंद्वारा दर्शनके अध्येताओंको उपकृत करनेके
प्रयासमें अनवरत लगे रहें ।
बदरीनाथ शुक्ल
१७।१२।८३ १८, विवेकानन्दनगर,
वाराणसी

श्रीगणेशाय नमः
प्रस्तावना
दिव्यद्वालेन्दुभालं गरलगलमलङ्कारिगाङ्गाम्बुमालम् ,
व्यालालिक्षिप्तवक्षःस्थलममलवपुर्लग्नभस्मावलेपम् ।
गौरीवामार्धरूपं त्रिनयनममरैरन्तराराध्यमानम् ,
तूर्णामिष्टप्रदं तं दुरितभरहरं शङ्करं सस्मरामः ॥
न्यायशास्त्रकी प्रशस्ति एवं इसकी परम्परा
श्रुतिसे लेकर स्मृति-पुराणपर्यन्तने न्यायविद्याकी अन्यतम विद्याके
रूपमें प्रशंसा की है। मुण्डकोपनिषद्के प्रथम मुण्डकमे आया है—
"द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद् ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च।
तत्र परा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेद शिक्षा कल्पो व्याकरण
निरुक्त छन्दो ज्योतिषमिति । इतिहासपुराण न्यायो मीमांसा धर्मशास्त्रा-
णीत्यपरा" इति । अर्थात् शिक्षा कल्प आदि अङ्गसहित उपनिषद्गर्भ
चारो वेद परविद्या हैं । तथा न्यायादि-उपाङ्गसहित वेदोपबृंहणस्वरूप
इतिहास-पुराण अपरविद्या हैं। उक्त श्रुतिमें न्यायशब्दका उपादान
न्यायशास्त्रके लिये है। मीमांसा और धर्मशास्त्रके भी न्यायशब्दवाच्य
होनेपर भी उन दोनोंका साक्षात् उल्लेख होनेसे उक्त श्रुतिमें न्यायशब्द-
वाच्य न्यायशास्त्र ही है।
पद्मपुराणके उत्तरखण्डमे उल्लिखित है—
"कणादेन तु सम्प्रोक्तं शास्त्रं वैशेषिकं महत्।
गोतमेन तथा न्याय सांख्यं तु कपिलेन वै॥"
(प० पु० उ० ख० अ० २६३)
मनुने कहा है—
"अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविस्तर ।
पुराणं धर्मशास्त्रं च विद्या ह्येताश्चतुर्दश॥"

( २ )
याज्ञवल्क्यका भी वचन है—
पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिता ।
वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥
( या० स्मृ० अ० १ श्लोक ३ )
विष्णुपुराणमे भी उल्लिखित है—
अङ्गानि चतुरो वेदा मीमांसा न्यायविस्तरः ।
पुराणं धर्मशास्त्रं च विद्या ह्येताश्चतुर्दश ॥
( वि० पु० अं० ३ अ० ६ )
यहाँ 'न्यायविस्तर' शब्दसे न्यायको प्रधान बनाकर वैशेषिक,
सांख्य और योगशास्त्रका ग्रहण किया गया है ।
आर्षं धर्मोपदेशं च वेदशास्त्राविरोधिना ।
यस्तर्केणानुसन्धत्ते स धर्मं वेद नेतरः ॥
( म० स्मृ० अ० १२ श्लो० १०६ )
इस 'मनुवचनमें तर्कशब्दको तर्कनिरूपक न्यायशास्त्रका ग्रहण है । मनुने
आन्वीक्षिकीको आत्मविद्याशब्दसे भी कहा है, जैसे—
त्रैविद्येभ्यस्त्रयीं विद्यां दण्डनीतिं च शाश्वतीम् ।
आन्वीक्षिकीं चात्मविद्यां वार्तारम्भांश्च लोकतः ॥
( म० स्मृ० अ० ७ श्लो० ४३ )
तर्कका ही दूसरा नाम आन्वीक्षिकी है । अमरकोशमे कहा है—
"आन्वीक्षिकी दण्डनीतिस्तर्कविद्याऽर्थशास्त्रयोः" ।
एव "आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिश्च शाश्वती"
इस वचनद्वारा प्रतिपादित चतुर्विध विद्याओंमें भी आन्वीक्षिकी न्याय-
विद्या ही है, ऐसा जयन्तभट्टने न्यायमञ्जरीमें कहा है । "प्रत्यक्षा-
गमाभ्यामीक्षितस्यान्वीक्षणमन्वीक्षा अनुमानमित्यर्थः, तद्व्युत्पादकं
शास्त्रमान्वीक्षिकम् न्यायशास्त्रमित्यर्थः ।
( न्यायमञ्जरी प्रथमसूत्रावतरणिका )
इस प्रकार विद्याओंके चार भेद हों, या चतुर्दश भेद हों, या
अष्टादश भेद हों, सर्वथा न्यायका सन्निवेश होनेसे इसकी महत्ता प्रकट
होती है । इसीलिये गङ्गेशोपाध्यायने भी तत्त्वचिन्तामणिग्रन्थके

( ३ )
प्रारम्भमें "अथ जगदेव दुःखपङ्कनिमग्नमुद्दिधीषुरष्टादशविद्यास्थाने-
ष्त्वभ्यर्हिततमामान्वीक्षिकीं परमकारुणिको मुनिः प्रणिनाय" ऐसा कह
कर न्यायविद्याकी महत्ता बताई है। इससे स्पष्ट है कि आदिकालसे
यह आन्वीक्षिकीविद्या वेदकी तरह अभ्यर्हित होती आ रही है।
यद्यपि न्यायसूत्रकारने इस शास्त्रका प्रयोजन आत्यन्तिक दुःखो-
परमरूप निःश्रेयस बताया है—जैसे, "प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त-
सिद्धान्तावयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभासच्छल जाति-
निग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः" (न्या० द० १।१।१)।
किन्तु भाष्यकार वात्स्यायनने तो यहाँ तक कह दिया है कि बुद्धि-
मानोंका ऐसा कोई भी प्रयोजन नहीं है, जिसे प्राप्त करानेमें आन्वी-
क्षिकीविद्या उपयोगी न हो। उन्होंने स्पष्ट कहा है—"सेयमान्वी-
क्षिकी विद्या—
प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम् ।
आश्रयः सर्वधर्माणां विद्योद्देशे प्रकीर्तिता ॥
अर्थात् यह न्यायविद्या सभी विद्याओंका प्रदीप है। जैसे प्रदीप-
द्वारा प्रकाशित वस्तुसे हम अपना व्यवहार सम्पादित करते हैं, वैसे ही
न्यायविद्याद्वारा प्रतिपादित प्रमाणकी सहायतासे ही इतर विद्यायें
अपने अर्थतत्त्वोंके निरूपणमें प्रवृत्त होती हैं। इस प्रकार न्यायविद्या-
का यह महत्त्वपूर्ण योगदान है कि मीमांसा-वेदान्तादि विद्याओंके लिए
यह विद्या प्रमाणरूप साधन प्रस्तुत करती है। इसीलिये इसे प्रमाण-
शास्त्र भी कहा जाता है।
एवं समस्त विद्याओंद्वारा प्रतिपाद्य अग्निहोत्रसे लेकर कृषि-
पर्यन्त सभी कर्मों मे आन्वीक्षिकी उपायभूत है। क्योंकि विद्याओंमे
आये पदोंसे जिसरूपमे अर्थकी अवगति होती है, उतनेमात्रसे
बुद्धिमानोंको परितोष नहीं होता है। कारण, "आदित्यो वै यूपः"
इस श्रुतिवाक्यमे कही गयी यूपकी आदित्यरूपताको बुद्धिमान् व्यक्ति
स्वीकार नहीं कर सकता। इसलिये संशय परीक्षा और प्रमाणोंके
विनिवेशद्वारा वास्तविक अर्थको समझ कर ही अनुष्ठान या परिहारहेतु
उसमें श्रुतिका विनियोग होता है। इसी तरह दण्डनीति और वार्ता-
शास्त्रमें भी प्रमाणोंके विनियोगद्वारा आन्वीक्षिकीकी उपयोगिता समझनी
चाहिये। अतः "उपायः सर्वकर्मणाम्" यह कथन भी यथार्थ है।

( ४ )

महाभारतके मोक्षधर्मप्रकरणमे कहा गया है—
तत्रोपनिषदं तात ! परिशेषं तु पार्थिव ।
मध्नामि मनसा तात ! दृष्ट्वा चान्वीक्षिकीं पराम् ॥
अर्थात् उपनिषदों का रहस्यार्थबोध भी उत्कृष्ट आन्वीक्षिकीके आधारपर
ही सम्भव है ।
आचार्य कामन्दकने भी लोकसंस्थितिके हेतुभूत चार विद्याओंमें
आन्वीक्षिकीको प्रथम स्थान दिया है । जैसे—
आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिश्च शाश्वती ।
विद्याश्चतस्र एवेता लोकसंस्थितिहेतव ॥
अर्थात् आन्वीक्षिकीविद्या लोकसंस्थितिका मुख्य हेतु है ।
इसी आन्वीक्षिकीको अध्यात्मविद्याके रूपमे दत्तात्रेयने अलर्क एव
प्रह्लाद आदिको बताया था ।
(द्रष्टव्य—श्रीमद्भा० पु० स्क० १ अ० ३ श्लो० १०, ११)
एव, सभी धर्मोंका आश्रयभूत भी आन्वीक्षिकी है । क्योंकि विहित
कर्ममें प्रवर्त्तना तथा निषिद्ध कर्मों से निवर्त्तना विद्याओंका धर्म है ।
यज्ञ आदि कर्ममे साध्य साधन और इतिकर्त्तव्यता इन तीनोंका विधान
होता है । इनमे किस अंशमे प्रवृत्ति करनी चाहिये, इसके परिज्ञानमे
आन्वीक्षिकी -न्यायविद्या या तर्कविद्या सहकारी होकर उपकार करती है ।
जैसे, 'श्येनेनाभिचरन् यजेत" यहापर साध्याश हिसांमे श्रुतिका
तात्पर्य है ? या साधन या इतिकर्त्तव्यताशमें ? ऐसा सशय होनेपर
निर्णय किया जाता है कि साध्याश (हिंसा) मे श्रुतिका तात्पर्य नहीं हो
सक्ता है । क्योंकि वैसा होनेपर “मा हिंस्यात् सर्वा भूतानि' इस श्रुतिके
साथ विरोध हो जायगा । अत साधनेतिकर्त्तव्यताशमें ही उक्त श्रुतिका
तात्पर्य है, यह निर्णय आन्वीक्षिकीके द्वारा ही होता है । इससे स्पष्ट है
कि न्यायविद्या सभी धर्म-कर्मोंका आश्रय भी है ।
इसी बातको जयन्तभट्टने भी न्यायमञ्जरीमें प्रकारान्तरसे उपपादित
किया है । जैसे—
दुःशिक्षितकुतर्काशलेशवाचालितानना ।
शक्या किमन्यथा जेतु वितण्डाटोपपण्डिताः ॥
तदेवमुपदेष्टव्या पदार्था सशयादय ।

( ५ )

तन्मूलन्यायनिर्णयवेदप्रामाण्यसंविदे ॥
तेनागमप्रमाणत्वद्वाराऽखिलफलप्रदा ।
इयमान्वीक्षिकी विद्या विद्यास्थानेषु गण्यते ॥
अर्थात् वेदोंका प्रमाणत्वसाधन आन्वीक्षिकीसे ही सम्भव है । एवं
आगममें प्रामाण्यका बोध होनेपर ही इतर विद्यायें वेदोक्त विषयोंमें
प्रवृत्ति करा सकती हैं । अतः विद्याओंमें आन्वीक्षिकी ( न्यायविद्या )
का विशिष्ट महत्त्व है, यह निर्विवाद है । “काणादं पाणिनीयञ्च सर्व-
शास्त्रोपकारकम्” यह उक्ति भी एतन्मूलक ही है । यहाँ काणादपद
न्यायवैशेषिक उभयपरक है ।
न्यायशास्त्रकी परम्परा और उदयनाचार्य
पञ्चाध्यायी न्यायसूत्रोंके प्रणेता महर्षि अक्षपाद गौतम या गोतम
थे । इनका नाम गौतम या गोतम दोनोंही मिलता है । महाकवि
श्रीहर्षने ‘गोतम’ नामका ही उल्लेख अपने नैषधीयचरितमे किया है—
मुक्तये यः शिलात्वाय शास्त्रमूचे सचेतसाम् ।
गोतमं तमवेत्यैव यथा वित्थ तथैव सः॥
(नै० स० १७ श्लो० ७५ )
एवं, नैयायिकप्रवर विश्वनाथन्यायपञ्चाननद्वारा न्यायसूत्रवृत्तिके
अन्तमें उल्लिखित—
“एषा मुनिप्रवरगोतमसूत्रवृत्तिः श्रीविश्वनाथकृतिना सुगमाऽल्पवर्णा ।”
यह पद्य, तथा अपर वाचस्पतिके—
“श्रीवाचस्पतिमिश्रेण मिथिलेश्वरसूरिणा ।
लिख्यते मुनिमूर्धन्यश्रीगोतममतं महत् ॥”
यह श्लोक भी न्यायसूत्रकारका ‘गोतम’ नाम होनेमे प्रमाण हैं । इनके
आधारपर ‘गोतम’ नाम ही प्रतीत होता है । जहाँ कहीं ‘गौतमसूत्र’
इत्यादि लिखा मिलता है, वहाँ “गोतमस्येदं गौतमम्” ऐसा हो सकता
है । जैसे कणादके दर्शनको काणाददर्शन कहा जाता है । न्यायभाष्यके
अन्तमे तथा न्यायवार्तिकके प्रारम्भमें अक्षपाद नामका भी उल्लेख
हुआ है ।
न्यायदर्शनकी प्रवृत्ति मुख्यतया प्रत्यक्ष-अनुमान-उपमान एवं शब्द-

( ६ )
प्रमाणोंके विवेचनद्वारा आत्मा आदि प्रमेयोंका तत्त्वज्ञान करा कर
निःश्रेयसकी प्राप्ति करानेके लिये हुई है ।
महर्षि गोतमका समय अतिप्राचीन है। इसमे श्रुति स्मृति आदि
प्रमाण हैं । मुण्डक उपनिषद्के प्रथममुण्डकमे द्विविध विद्याओंके
प्रसङ्गमे "न्यायो मीमांसा धर्मशास्त्राणि" इस वचनद्वारा न्यायशास्त्रका
उल्लेख होनेसे उसके कर्त्ता गोतमका भी अतिचिरकालीन होना निर्विवाद
है । यद्यपि मीमांसा और धर्मशास्त्र भी न्यायशब्दवाच्य होता हैं,
तथापि उन दोनोंका पृथक् उल्लेख होनेसे यहाँ न्यायशब्द गोतमकृत
न्यायशास्त्रका ही वाच्य है ।
पद्मपुराणमें लिखा है—
कणादेन तु सम्प्रोक्तं शास्त्रं वैशेषिकं महत् ।
गोतमेन तथा न्यायं सांख्यं तु कपिलेन वै ॥
( पद्मपु० उ० ख० २६३ अ० )
स्कन्दपुराणके कालिकाखण्डमे आया है—
गोतमः स्वेन तर्केण खण्डयन् तत्र तत्र हि ।
( स्क० पु० का० ख० अ० १७ )
उपर्युक्त प्रमाणोंसे निर्विवाद सिद्ध है कि महर्षि गोतमका समय
अतिप्राचीन है ।
न्यायदर्शनके भाष्यकार वात्स्यायनका कालनिर्णय भी इद्दमित्थ
रूपमें करना कठिन है । न्यायवार्त्तिककारने उन्हें अक्षपादके तुल्य
बताया है—
यदक्षपादप्रतिमो भाष्यं वात्स्यायनो जगौ ।
अकारि महतस्तस्य भारद्वाजेन वार्त्तिकम् ॥
न्यायवार्त्तिकतात्पर्य्यटीकाके प्रारम्भमे वाचस्पतिमिश्रने उन्हें "भगवता
पक्षिलस्वामिना' ऐसा ससम्मान उल्लिखित किया है । जिससे
वात्स्यायनका दूसरा नाम पक्षिलस्वामी भी था, यह प्रमाणित होता है ।
वात्स्यायन मुनिकी चर्चा पद्मपुराणके रामाश्वमेध प्रकरणमें हुई है,
जैसे—
ततः परं धराधारं पृष्टवान् भुजगेश्वरम् ।
वात्स्यायनो मुनिवरः कथामेतां सुनिर्मलाम् ॥
( प० पु० रा० अ० १ )

( ७ )
इस प्रकार पुराणोंमें वात्स्यायनकी चर्चा होनेसे इनकी भी अति-
प्राचीनता सिद्ध है।
एवं, उनके न्यायभाष्यमें भी कोई ऐसा चिह्न नहीं दिखाई पड़ता है,
जिससे उनके अर्वाचीन होनेकी सम्भावना की जाय। यदि भाष्यमे
आत्मवादी, अनात्मवादी, आस्तिक, नास्तिक, सांख्ययोग, क्षणिकवादी,
भूतचैतनिकवादी तथा दशावयववादियोंके मतोंका उपन्यास होनेसे
वात्स्यायनका अर्वाचीन कहा जाय तो उपनिषदादिकोंमें भी इन मतोंका
उल्लेख होनेसे उपनिषदं भी अर्वाचीन हो जायेंगी।
भाष्यमें आये “दशावयवानेके नैयायिका वाक्ये सञ्चक्षते” इस
वचनसे इनका अर्वाचीनत्व नहीं सिद्ध हो सकता है। क्योंकि आन्वी-
क्षिकीविद्याके एक होनेपर भी नैयायिक अनेक हैं। जैसा कि
महाभारतमें लिखा है—
नैयायिकानां मुख्येन वरुणस्यात्मजेन च।
पराजितो यत्र वादी विवादेन पराजितः ॥
किसीका कहना है कि दशावयववादीके रूपमें बौद्ध ही भाष्यकारके
विवक्षित हैं। किन्तु यदि बौद्ध विवक्षित होता तो भाष्यकार उन्हें
नैयायिकनामसे न कहते, बल्कि बौद्धनामसे ही कहते।
कुछ आधुनिक विद्वान् “महाभूतसंक्षोभकः शब्दोऽनाश्रित उत्पत्ति-
धर्मको निरोधधर्मक इत्यन्ये” इस भाष्यवचन में आये 'अन्ये' पदसे
बौद्धकी कल्पना करते हैं और कहते हैं कि ईसासे ४८७ वर्ष पूर्व
वर्तमान बुद्धदेवके बाद ही वात्स्यायनभाष्यकी रचना हुई थी। किन्तु
यह कथन ठीक नहीं है। क्योंकि वेद-धर्मशास्त्र पुराणोंमें जैसे अनेक
आस्तिक-नास्तिकमतोंका उल्लेख होनेपर वे बुद्धके बाद नहीं माने
जाते हैं, वैसे ही उक्त भाष्यवचनमें 'अन्ये' पदसे किसीका मत कहा
गया होगा। क्योंकि बौद्धनामका वहाँ उल्लेख नहीं है। यह बात
न्यायवार्तिककी भूमिकामें स्पष्ट है।
कुछ आधुनिक तार्किक हेमचन्द्राचार्यकृत अभिधानचिन्तामणिकोश-
में लिखे—
वात्स्यायने मल्लनागः कौटिल्यश्चणकात्मजः।
द्रामिलः पक्षिलस्वामी विष्णुगुप्तोऽङ्गुलश्च सः ॥
इस श्लोकको देख कर कहते हैं कि न्यायभाष्यकर्ता वात्स्यायन चाणक्य

ही थे और उनका समय ईसासे ३२१ वर्ष पूर्व था। किन्तु पुरुषोत्तम
देवकृत त्रिकाण्डशेषकोशमे चाणक्यके पांच नाम विष्णुगुप्त कौण्डिन्य
चाणक्य द्रामिल एव अशुल बताये गये हैं। तथा वात्स्यायनके तीन नाम
वात्स्यायन मल्लिनाग और पक्षिलस्वामी बताये गये हैं। जैसे—
विष्णुगुप्तस्तु कौण्डिन्यश्चाणक्यो द्रामिलॊऽशुल ।
वात्स्यायना मल्लिनागपक्षिलस्वामिनावपि॥ ( त्रि० को० ब्रह्मवर्ग )
यह बात इसकी बुधमनोहरा टीकामे स्पष्ट की गयी है।
एव न्यायग्रन्थोंमें नैयायिकके रूपमे वात्स्यायनको छोडकर चाणक्य
या कौटिल्य आदि कोई अन्य नाम नहीं कहा गया है। अत त्रिकाण्ड-
शेषकोशके टीकाकारका कथन ही प्रामाणिक प्रतीत होता है। ऐसी
स्थितिमें हेमचन्द्राचार्यने उक्त आठों नामोंको वात्स्यायनका नाम कैसे
लिख दिया ? इसका कोई मूल नहीं प्रतीत होता है। विशेषरूपसे
म० म० विन्ध्येश्वरीप्रसादद्विवेदीकी न्यायवार्तिकभूमिकामे स्पष्ट है।
यदि हेमचन्द्रके अनुसार चाणक्यका भी 'वात्स्यायन' नाम हो तो
यह वात्स्यायन कोई और ही है, जिन्होंने राजमन्त्री होनेके कारण एक
ही रीतिसे कामशास्त्र और अर्थशास्त्रका निर्माण किया और उसमे लौकिक
विषयोंका सकलन कर दिया। साथ ही चाणक्य नैयायिक नहीं थे, यह
सुनिश्चित है। अत न्यायभाष्यकर्ता वात्स्यायन चाणक्यसे भिन्न थे।
किन्तु वात्स्यायनने नागार्जुनके आक्षेपोंका निराकरण किया, इस
प्रसिद्धिके अनुसार नागार्जुनके बाद वात्स्यायन सिद्ध होते हैं।
वात्स्यायनके तर्कोंका प्रतिवाद वसुबन्धु एवदिङ्नागने किया, जिसके
खण्डनमे आचार्य उद्योतकरने न्यायवार्तिकका प्रणयन किया। उद्योत-
करके तर्कोंका निराकरण ७ वी सदीमें विद्यमान धर्मकीर्तिप्रभृति बौद्ध
पण्डितोंने किया जिनका उत्तर न्यायवार्तिकतात्पर्यटीका लिख कर
वाचस्पतिमिश्रने दिया। तदनन्तर ज्ञानश्री और रत्नकीर्तिने जो
न्यायमतका खण्डन प्रस्तुत किया, उसका निराकरण श्रीउदयनाचार्यने
अत्यन्त प्रौढताके साथ किया। इनके बाद नव्यन्यायकी धारा तत्त्व-
चिन्तामणिके कर्ता गङ्गेशोपाध्यायसे प्रारम्भ होती है।
इनमें यद्यपि वात्स्यायनका भी ठीक ठीक समय निर्धारित कर पाना
सम्भव नहीं है, तथापि इनकी निवासभूमि मिथिला मालूम पड़ती है।

( ९ )
क्योंकि वाक्छलका उदाहरण देते हुए इन्होंने "नवकम्बलोऽयं माणवको
नेपालादागतः" लिखा है। (न्याय भा० अ० १ आ० २ सू० १२)। एव
अपार्थकके विचारमे "दश दाडिमानि षडपूपाः कुण्डमजाजिनं पलल-
पिण्डः" इत्यादि लिखा है। (न्या० भा० अ० ५ आ० २ सू० १०)।
इसके अतिरिक्त २।१।२७ सू० के भाष्यमे "नदी पूर्णा गृह्येत" कथन
किया है, तथा २।१।३८ सू० के भाष्यमे "पूर्वोदकावशिष्टं खलु
वर्षोदकं शीघ्रतरत्व स्रोतसो बहुतरफेनफलपर्णकाष्ठादिवहनम्' इत्यादि
लिखा है। इन कथनोंके आधारपर इनकी निवासभूमि मिथिलाका
समर्थन होता है।
वात्स्यायनके बाद उद्योतकराचार्य आते हैं। ये किस देशमे या
किस कालमे हुए थे, इस विचारके अन्तर्गत कोई इन्हें काश्मीरनिवासी
मानते हैं। क्योंकि किसी वार्त्तिकग्रन्थकी पुष्पिकामे "पाशुपताचार्यो-
द्योतकरविरचितं न्यायसूत्रवार्त्तिकम्" ऐसा उल्लेख है। कोई तो न्याय-
वार्त्तिककी पृष्ठसंख्या ११० मे उल्लिखित "गोपालकेन मार्गेऽपदिष्टे एष
पन्थाः सुघ्नं गच्छति" इस उदाहरणसे ये मालवप्रदेशान्तर्गत पद्मावतीमे
जन्म लिये थे और थानेश्वर निवासी थे, ऐसा मानते हैं। क्योंकि
पद्मावतीमे न्यायविद्याका बहुत प्रचार था। किन्तु महामहोपाध्याय
विन्ध्येश्वरीप्रसादद्विवेदीने इसका खण्डन कर सिद्ध किया है कि
वार्तिककार भी मिथिलाके ही निवासी थे। उनका कथन है कि
न्यायसूत्रके रचयिता गौतममुनि, भाष्यकार वात्स्यायन, वाचस्पतिमिश्र,
उदयनाचार्य, प्रकाशकार वर्धमानोपाध्याय प्रभृति जब मिथिलानिवासी
थे, तो उद्योतकराचार्य भी वहींके थे, काश्मीर या मालवके नहीं
हो सकते।
इनका काल वाचस्पतिमिश्रसे बहुत पूर्वका है। क्योंकि वाचस्पति-
मिश्रने न्यायवार्तिकतात्पर्य्यटीकाके प्रारम्भमे—
"इच्छामि किमपि पुण्यं दुस्तरकुनिबन्धपङ्कमग्नानाम् ।
उद्योतकरगवीनामतिमजरतीनां समुद्धरणात् ॥
ऐसा लिखा है। वासवदत्ताख्यायिकामे भी "न्यायस्थितिमिवोद्योतकर-
स्वरूपाम्" ऐसा आया है। इन प्रमाणोंसे ईसाकी छठी सदी (४९०
से ५६० ई० के मध्य) इनका समय हो सकता है। ऐसा द्विवेदीजी

( १० )
का निर्णय है । काशीस्थ गर्नमेन्टसंस्कृतकालेजमें न्यायशास्त्रके
प्रधानाध्यापक सर्वतन्त्रस्वतन्त्र मेरे गुरुदेव श्रीसूर्यनारायणशुक्लजीने भी
उद्योतकराचार्यका यही समय अपनी न्यायमञ्जरीभूमिकामे निर्धारित
किया है ।
वाचस्पतिमिश्र—
संस्कृतवाङ्मयमें अनेक वाचस्पति हुए हैं। उनमें दो दार्शनिक
वाचस्पति थे । उनमें एकको आचार्यमिश्र वाचस्पतिनामसे तथा
दूसरेको षड्दर्शनटीकाकृत् आचार्यवाचस्पतिमिश्रनामसे प्रसिद्धि प्राप्त
है । इनम द्वितीय षड्दर्शनारण्यानोपञ्चानन आचार्य वाचस्पतिमिश्र
ही न्यायविद्याकी महत्त्वपूर्ण परम्परामें ऋषिकल्प चतुर्थ महापुरुष
थे । इन्होंने •न्यायवार्तिकतात्पर्यटीकाके अतिरिक्त न्यायसूचीनिबन्ध
•न्यायकलिका या •न्यायकणिका-तत्त्वविन्दु-ब्रह्मतत्त्वसमीक्षा तत्त्ववैशारदी
और ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यपर भामतीटीकाकी रचना की थी। इसीलिये
‘षड्दर्शनटीकाकृत्’ इस सम्मानोपाधिसे ये

( ११ )
७८ = ९७६ ई० वर्ष न्यायसूचीनिबन्धका रचनाकाल होता है । अर्थात्
ईसाकी दशम शताब्दीके अन्तमें वाचस्पतिमिश्र थे । एवं ११०० शक-
वर्षमें वर्तमान हम्मीरराजाके सभापण्डित श्रीदामोदरके पुत्र श्रीशार्ङ्गधर-
ने नृगनृपतिका निर्देश शार्ङ्गधरसंहितामें किया है । इससे ११००
शकवर्षसे २०० वर्ष पूर्व ८९८ शकवर्षसे नृगराजाका और वाचस्पति-
मिश्रका समय सिद्ध होता है । इसके अनुसार ७८ वर्ष जोड़नेपर
९७६ ई० वर्ष तथा १३५ वर्ष जोड़नेपर १०३३ वि० संवत् वाचस्पतिमिश्र-
का समय आता है ।
किन्तु उपर्युक्त द्विवेदी प्रभृतिके मतका विरोध करते हुए डा० गङ्गा-
नाथझा प्रभृति अन्य विद्वान् न्यायसूचीनिबन्धके उपसंहारमें लिखे उक्त
श्लोकमें वत्सरपदसे विक्रमवत्सर मानकर वाचस्पतिमिश्रका समय
( ८९८-५७ = ) ८४१ ई० वर्ष निश्चित करते हैं । डा० कीथ एवं
डा० वुडश महाशय भी डा० झा के मतका ही समर्थन करते हैं । उभय-
पक्षका सम्यक् विचारकर श्रीउदयवीरशास्त्री भी झामतका ही समर्थन
करते हैं । तथा श्रीद्विवेदी एवं महामहोपाध्याय हरप्रसादशास्त्रीके
मतका खण्डन करते हैं ।
मेरे विचारसे भी डा० झाका ही मत ठीक प्रतीत होता है । क्योंकि
उक्त निबन्धमें वर्षका नामोल्लेख न होनेसे सामान्यत प्रसिद्ध वि०
संवत् ही मानना उचित है । आज भी ईसाका नाम लिये बिना केवल
वर्षसंख्या १८४७, १९४२, १९४७ आदि लिख दिया जाता है, किन्तु
प्रसिद्धिवशात् ई० वर्ष समझा जाता है । वैसे ही वहाँ प्रसिद्धिवश
विक्रमसंवत् ही मानना चाहिये ।
यह इसलिये भी उचित है कि यदि ८९८ शकवर्ष होता तो ९०६
शकवर्षमे वर्तमान उदयनाचार्य वाचस्पतिमिश्रके अत्यन्त समानकालिक
हो जानेसे उनकी न्यायवार्तिकतात्पर्यटीकापर तात्पर्यपरिशुद्धि कैसे
लिखते ? वाचस्पतिमिश्रलिखित ८९८ को विक्रमवर्ष माननेपर उदयना-
चार्यका समय ( ९०६ शकवर्ष + १३५ = ) १०४१ विक्रमसंवत् होनेसे
वाचस्पतिमिश्रसे लगभग डेढ़ सौ वर्ष बाद उदयनाचार्यद्वारा तात्पर्य-
परिशुद्धिका लिखना सर्वथा संगत होगा । मेरे गुरुदेव श्रीसूर्यनारायण-
शुक्लजीने भी न्यायमञ्जरीकी भूमिकामें ९४१ ई० वर्ष ही वाचस्पति-
मिश्रका समय निर्धारित किया है ।