सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 15, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 15

( ४ )

महाभारतके मोक्षधर्मप्रकरणमे कहा गया है—
तत्रोपनिषदं तात ! परिशेषं तु पार्थिव ।
मध्नामि मनसा तात ! दृष्ट्वा चान्वीक्षिकीं पराम् ॥
अर्थात् उपनिषदों का रहस्यार्थबोध भी उत्कृष्ट आन्वीक्षिकीके आधारपर
ही सम्भव है ।
आचार्य कामन्दकने भी लोकसंस्थितिके हेतुभूत चार विद्याओंमें
आन्वीक्षिकीको प्रथम स्थान दिया है । जैसे—
आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिश्च शाश्वती ।
विद्याश्चतस्र एवेता लोकसंस्थितिहेतव ॥
अर्थात् आन्वीक्षिकीविद्या लोकसंस्थितिका मुख्य हेतु है ।
इसी आन्वीक्षिकीको अध्यात्मविद्याके रूपमे दत्तात्रेयने अलर्क एव
प्रह्लाद आदिको बताया था ।
(द्रष्टव्य—श्रीमद्भा० पु० स्क० १ अ० ३ श्लो० १०, ११)
एव, सभी धर्मोंका आश्रयभूत भी आन्वीक्षिकी है । क्योंकि विहित
कर्ममें प्रवर्त्तना तथा निषिद्ध कर्मों से निवर्त्तना विद्याओंका धर्म है ।
यज्ञ आदि कर्ममे साध्य साधन और इतिकर्त्तव्यता इन तीनोंका विधान
होता है । इनमे किस अंशमे प्रवृत्ति करनी चाहिये, इसके परिज्ञानमे
आन्वीक्षिकी -न्यायविद्या या तर्कविद्या सहकारी होकर उपकार करती है ।
जैसे, 'श्येनेनाभिचरन् यजेत" यहापर साध्याश हिसांमे श्रुतिका
तात्पर्य है ? या साधन या इतिकर्त्तव्यताशमें ? ऐसा सशय होनेपर
निर्णय किया जाता है कि साध्याश (हिंसा) मे श्रुतिका तात्पर्य नहीं हो
सक्ता है । क्योंकि वैसा होनेपर “मा हिंस्यात् सर्वा भूतानि' इस श्रुतिके
साथ विरोध हो जायगा । अत साधनेतिकर्त्तव्यताशमें ही उक्त श्रुतिका
तात्पर्य है, यह निर्णय आन्वीक्षिकीके द्वारा ही होता है । इससे स्पष्ट है
कि न्यायविद्या सभी धर्म-कर्मोंका आश्रय भी है ।
इसी बातको जयन्तभट्टने भी न्यायमञ्जरीमें प्रकारान्तरसे उपपादित
किया है । जैसे—
दुःशिक्षितकुतर्काशलेशवाचालितानना ।
शक्या किमन्यथा जेतु वितण्डाटोपपण्डिताः ॥
तदेवमुपदेष्टव्या पदार्था सशयादय ।