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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 12, कुल 530 में से

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पृष्ठ 12

श्रीगणेशाय नमः
प्रस्तावना
दिव्यद्वालेन्दुभालं गरलगलमलङ्कारिगाङ्गाम्बुमालम् ,
व्यालालिक्षिप्तवक्षःस्थलममलवपुर्लग्नभस्मावलेपम् ।
गौरीवामार्धरूपं त्रिनयनममरैरन्तराराध्यमानम् ,
तूर्णामिष्टप्रदं तं दुरितभरहरं शङ्करं सस्मरामः ॥
न्यायशास्त्रकी प्रशस्ति एवं इसकी परम्परा
श्रुतिसे लेकर स्मृति-पुराणपर्यन्तने न्यायविद्याकी अन्यतम विद्याके
रूपमें प्रशंसा की है। मुण्डकोपनिषद्के प्रथम मुण्डकमे आया है—
"द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद् ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च।
तत्र परा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेद शिक्षा कल्पो व्याकरण
निरुक्त छन्दो ज्योतिषमिति । इतिहासपुराण न्यायो मीमांसा धर्मशास्त्रा-
णीत्यपरा" इति । अर्थात् शिक्षा कल्प आदि अङ्गसहित उपनिषद्गर्भ
चारो वेद परविद्या हैं । तथा न्यायादि-उपाङ्गसहित वेदोपबृंहणस्वरूप
इतिहास-पुराण अपरविद्या हैं। उक्त श्रुतिमें न्यायशब्दका उपादान
न्यायशास्त्रके लिये है। मीमांसा और धर्मशास्त्रके भी न्यायशब्दवाच्य
होनेपर भी उन दोनोंका साक्षात् उल्लेख होनेसे उक्त श्रुतिमें न्यायशब्द-
वाच्य न्यायशास्त्र ही है।
पद्मपुराणके उत्तरखण्डमे उल्लिखित है—
"कणादेन तु सम्प्रोक्तं शास्त्रं वैशेषिकं महत्।
गोतमेन तथा न्याय सांख्यं तु कपिलेन वै॥"
(प० पु० उ० ख० अ० २६३)
मनुने कहा है—
"अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविस्तर ।
पुराणं धर्मशास्त्रं च विद्या ह्येताश्चतुर्दश॥"