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आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 530 में से

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पृष्ठ 16

( ५ )

तन्मूलन्यायनिर्णयवेदप्रामाण्यसंविदे ॥
तेनागमप्रमाणत्वद्वाराऽखिलफलप्रदा ।
इयमान्वीक्षिकी विद्या विद्यास्थानेषु गण्यते ॥
अर्थात् वेदोंका प्रमाणत्वसाधन आन्वीक्षिकीसे ही सम्भव है । एवं
आगममें प्रामाण्यका बोध होनेपर ही इतर विद्यायें वेदोक्त विषयोंमें
प्रवृत्ति करा सकती हैं । अतः विद्याओंमें आन्वीक्षिकी ( न्यायविद्या )
का विशिष्ट महत्त्व है, यह निर्विवाद है । “काणादं पाणिनीयञ्च सर्व-
शास्त्रोपकारकम्” यह उक्ति भी एतन्मूलक ही है । यहाँ काणादपद
न्यायवैशेषिक उभयपरक है ।
न्यायशास्त्रकी परम्परा और उदयनाचार्य
पञ्चाध्यायी न्यायसूत्रोंके प्रणेता महर्षि अक्षपाद गौतम या गोतम
थे । इनका नाम गौतम या गोतम दोनोंही मिलता है । महाकवि
श्रीहर्षने ‘गोतम’ नामका ही उल्लेख अपने नैषधीयचरितमे किया है—
मुक्तये यः शिलात्वाय शास्त्रमूचे सचेतसाम् ।
गोतमं तमवेत्यैव यथा वित्थ तथैव सः॥
(नै० स० १७ श्लो० ७५ )
एवं, नैयायिकप्रवर विश्वनाथन्यायपञ्चाननद्वारा न्यायसूत्रवृत्तिके
अन्तमें उल्लिखित—
“एषा मुनिप्रवरगोतमसूत्रवृत्तिः श्रीविश्वनाथकृतिना सुगमाऽल्पवर्णा ।”
यह पद्य, तथा अपर वाचस्पतिके—
“श्रीवाचस्पतिमिश्रेण मिथिलेश्वरसूरिणा ।
लिख्यते मुनिमूर्धन्यश्रीगोतममतं महत् ॥”
यह श्लोक भी न्यायसूत्रकारका ‘गोतम’ नाम होनेमे प्रमाण हैं । इनके
आधारपर ‘गोतम’ नाम ही प्रतीत होता है । जहाँ कहीं ‘गौतमसूत्र’
इत्यादि लिखा मिलता है, वहाँ “गोतमस्येदं गौतमम्” ऐसा हो सकता
है । जैसे कणादके दर्शनको काणाददर्शन कहा जाता है । न्यायभाष्यके
अन्तमे तथा न्यायवार्तिकके प्रारम्भमें अक्षपाद नामका भी उल्लेख
हुआ है ।
न्यायदर्शनकी प्रवृत्ति मुख्यतया प्रत्यक्ष-अनुमान-उपमान एवं शब्द-