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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 11, कुल 530 में से

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पृष्ठ 11

( घ )
संगत् अभयसे कैसे सम्पन्न बनाया जाय । इस आवश्यकताकी पूर्तिके
लिये ही भारतवर्षके महान् नैयायिक उदयनाचार्यने अनेक महनीय
ग्रन्थोंकी रचना की । जिनमें आत्मतत्त्वविवेकका प्रमुख स्थान है।
इस ग्रन्थमें न्याय वैशेषिकदर्शनद्वारा अनुमोदित वैदिक आत्मसिद्धान्त-
के ऊपर बौद्धदार्शनिकोंके मुख्य आक्षेपोंका निष्पक्षरूपसे उपपादन करते
हुए उनका युक्तिपूर्ण निराकरण किया गया है ।
किन्तु यह ग्रन्थ आचार्यकी संक्षिप्त और गूढ तथा पुरातन शैली एवं
भाषामे निबद्ध होनेके कारण दुरूह है । जिस तत्त्वका ज्ञान मानवमात्र-
के लिये उपयोगी हो, उसका सर्वजनसंवेद्य भाषाके माध्यमसे प्रतिपादन
होना आवश्यक है । इसी दृष्टिसे काशीहिन्दूविश्वविद्यालयके भू० पू०,
दर्शनविभागके अध्यक्ष, पण्डितप्रवर श्रीकेदारनाथत्रिपाठीजीने इस
कठिन ग्रन्थको हिन्दीभाषाके माध्यमसे सुलभ बनानेका संकल्प लिया
और इस कार्यको बड़ी कुशलतासे सम्पन्न किया ।
आत्माकी नित्यता, वाह्यवस्तुके रूपमें मान्यता, ज्ञानादिगुणोंकी
आश्रयता तथा प्रत्यक्षगम्यताके बाधकरूपमें बौद्धदार्शनिकोंने जिन तर्कों-
को बड़े आडम्बरसे प्रस्तुत किया था, उन सबोंके, श्रीत्रिपाठीजीने, मूल-
ग्रन्थोक्त उत्तरोंको अत्यन्त विशदरूपसे निरूपित किया है। त्रिपाठीजी
की व्याख्यामे पूरे मूलग्रन्थका पंक्तिशः स्पष्टीकरण हुआ है और व्याख्या
में ऐसी सरणी एवं भाषाका उपयोग किया गया है, जिससे त्रिपाठीजी
की यह कृति एक नूतन रचनाका स्पष्ट आभास देती है। मैंने व्याख्याके
अनेक भागोंको पूरी सावधानीसे देखा है, और त्रिपाठीजीको सर्वत्र
सफल एवं मूलग्रन्थका मर्मज्ञ पाया है। इस व्याख्याकी रचनाके लिये
श्रीत्रिपाठीजीको मेरा हार्दिक धन्यवाद है और उनसे निवेदन भी है कि
वे अभी और ऐसी रचनाओंद्वारा दर्शनके अध्येताओंको उपकृत करनेके
प्रयासमें अनवरत लगे रहें ।
बदरीनाथ शुक्ल
१७।१२।८३ १८, विवेकानन्दनगर,
वाराणसी