सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 19, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 19

ही थे और उनका समय ईसासे ३२१ वर्ष पूर्व था। किन्तु पुरुषोत्तम
देवकृत त्रिकाण्डशेषकोशमे चाणक्यके पांच नाम विष्णुगुप्त कौण्डिन्य
चाणक्य द्रामिल एव अशुल बताये गये हैं। तथा वात्स्यायनके तीन नाम
वात्स्यायन मल्लिनाग और पक्षिलस्वामी बताये गये हैं। जैसे—
विष्णुगुप्तस्तु कौण्डिन्यश्चाणक्यो द्रामिलॊऽशुल ।
वात्स्यायना मल्लिनागपक्षिलस्वामिनावपि॥ ( त्रि० को० ब्रह्मवर्ग )
यह बात इसकी बुधमनोहरा टीकामे स्पष्ट की गयी है।
एव न्यायग्रन्थोंमें नैयायिकके रूपमे वात्स्यायनको छोडकर चाणक्य
या कौटिल्य आदि कोई अन्य नाम नहीं कहा गया है। अत त्रिकाण्ड-
शेषकोशके टीकाकारका कथन ही प्रामाणिक प्रतीत होता है। ऐसी
स्थितिमें हेमचन्द्राचार्यने उक्त आठों नामोंको वात्स्यायनका नाम कैसे
लिख दिया ? इसका कोई मूल नहीं प्रतीत होता है। विशेषरूपसे
म० म० विन्ध्येश्वरीप्रसादद्विवेदीकी न्यायवार्तिकभूमिकामे स्पष्ट है।
यदि हेमचन्द्रके अनुसार चाणक्यका भी 'वात्स्यायन' नाम हो तो
यह वात्स्यायन कोई और ही है, जिन्होंने राजमन्त्री होनेके कारण एक
ही रीतिसे कामशास्त्र और अर्थशास्त्रका निर्माण किया और उसमे लौकिक
विषयोंका सकलन कर दिया। साथ ही चाणक्य नैयायिक नहीं थे, यह
सुनिश्चित है। अत न्यायभाष्यकर्ता वात्स्यायन चाणक्यसे भिन्न थे।
किन्तु वात्स्यायनने नागार्जुनके आक्षेपोंका निराकरण किया, इस
प्रसिद्धिके अनुसार नागार्जुनके बाद वात्स्यायन सिद्ध होते हैं।
वात्स्यायनके तर्कोंका प्रतिवाद वसुबन्धु एवदिङ्नागने किया, जिसके
खण्डनमे आचार्य उद्योतकरने न्यायवार्तिकका प्रणयन किया। उद्योत-
करके तर्कोंका निराकरण ७ वी सदीमें विद्यमान धर्मकीर्तिप्रभृति बौद्ध
पण्डितोंने किया जिनका उत्तर न्यायवार्तिकतात्पर्यटीका लिख कर
वाचस्पतिमिश्रने दिया। तदनन्तर ज्ञानश्री और रत्नकीर्तिने जो
न्यायमतका खण्डन प्रस्तुत किया, उसका निराकरण श्रीउदयनाचार्यने
अत्यन्त प्रौढताके साथ किया। इनके बाद नव्यन्यायकी धारा तत्त्व-
चिन्तामणिके कर्ता गङ्गेशोपाध्यायसे प्रारम्भ होती है।
इनमें यद्यपि वात्स्यायनका भी ठीक ठीक समय निर्धारित कर पाना
सम्भव नहीं है, तथापि इनकी निवासभूमि मिथिला मालूम पड़ती है।