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आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 530 में से

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पृष्ठ 20

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क्योंकि वाक्छलका उदाहरण देते हुए इन्होंने "नवकम्बलोऽयं माणवको
नेपालादागतः" लिखा है। (न्याय भा० अ० १ आ० २ सू० १२)। एव
अपार्थकके विचारमे "दश दाडिमानि षडपूपाः कुण्डमजाजिनं पलल-
पिण्डः" इत्यादि लिखा है। (न्या० भा० अ० ५ आ० २ सू० १०)।
इसके अतिरिक्त २।१।२७ सू० के भाष्यमे "नदी पूर्णा गृह्येत" कथन
किया है, तथा २।१।३८ सू० के भाष्यमे "पूर्वोदकावशिष्टं खलु
वर्षोदकं शीघ्रतरत्व स्रोतसो बहुतरफेनफलपर्णकाष्ठादिवहनम्' इत्यादि
लिखा है। इन कथनोंके आधारपर इनकी निवासभूमि मिथिलाका
समर्थन होता है।
वात्स्यायनके बाद उद्योतकराचार्य आते हैं। ये किस देशमे या
किस कालमे हुए थे, इस विचारके अन्तर्गत कोई इन्हें काश्मीरनिवासी
मानते हैं। क्योंकि किसी वार्त्तिकग्रन्थकी पुष्पिकामे "पाशुपताचार्यो-
द्योतकरविरचितं न्यायसूत्रवार्त्तिकम्" ऐसा उल्लेख है। कोई तो न्याय-
वार्त्तिककी पृष्ठसंख्या ११० मे उल्लिखित "गोपालकेन मार्गेऽपदिष्टे एष
पन्थाः सुघ्नं गच्छति" इस उदाहरणसे ये मालवप्रदेशान्तर्गत पद्मावतीमे
जन्म लिये थे और थानेश्वर निवासी थे, ऐसा मानते हैं। क्योंकि
पद्मावतीमे न्यायविद्याका बहुत प्रचार था। किन्तु महामहोपाध्याय
विन्ध्येश्वरीप्रसादद्विवेदीने इसका खण्डन कर सिद्ध किया है कि
वार्तिककार भी मिथिलाके ही निवासी थे। उनका कथन है कि
न्यायसूत्रके रचयिता गौतममुनि, भाष्यकार वात्स्यायन, वाचस्पतिमिश्र,
उदयनाचार्य, प्रकाशकार वर्धमानोपाध्याय प्रभृति जब मिथिलानिवासी
थे, तो उद्योतकराचार्य भी वहींके थे, काश्मीर या मालवके नहीं
हो सकते।
इनका काल वाचस्पतिमिश्रसे बहुत पूर्वका है। क्योंकि वाचस्पति-
मिश्रने न्यायवार्तिकतात्पर्य्यटीकाके प्रारम्भमे—
"इच्छामि किमपि पुण्यं दुस्तरकुनिबन्धपङ्कमग्नानाम् ।
उद्योतकरगवीनामतिमजरतीनां समुद्धरणात् ॥
ऐसा लिखा है। वासवदत्ताख्यायिकामे भी "न्यायस्थितिमिवोद्योतकर-
स्वरूपाम्" ऐसा आया है। इन प्रमाणोंसे ईसाकी छठी सदी (४९०
से ५६० ई० के मध्य) इनका समय हो सकता है। ऐसा द्विवेदीजी