आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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इस प्रकार पुराणोंमें वात्स्यायनकी चर्चा होनेसे इनकी भी अति-
प्राचीनता सिद्ध है।
एवं, उनके न्यायभाष्यमें भी कोई ऐसा चिह्न नहीं दिखाई पड़ता है,
जिससे उनके अर्वाचीन होनेकी सम्भावना की जाय। यदि भाष्यमे
आत्मवादी, अनात्मवादी, आस्तिक, नास्तिक, सांख्ययोग, क्षणिकवादी,
भूतचैतनिकवादी तथा दशावयववादियोंके मतोंका उपन्यास होनेसे
वात्स्यायनका अर्वाचीन कहा जाय तो उपनिषदादिकोंमें भी इन मतोंका
उल्लेख होनेसे उपनिषदं भी अर्वाचीन हो जायेंगी।
भाष्यमें आये “दशावयवानेके नैयायिका वाक्ये सञ्चक्षते” इस
वचनसे इनका अर्वाचीनत्व नहीं सिद्ध हो सकता है। क्योंकि आन्वी-
क्षिकीविद्याके एक होनेपर भी नैयायिक अनेक हैं। जैसा कि
महाभारतमें लिखा है—
नैयायिकानां मुख्येन वरुणस्यात्मजेन च।
पराजितो यत्र वादी विवादेन पराजितः ॥
किसीका कहना है कि दशावयववादीके रूपमें बौद्ध ही भाष्यकारके
विवक्षित हैं। किन्तु यदि बौद्ध विवक्षित होता तो भाष्यकार उन्हें
नैयायिकनामसे न कहते, बल्कि बौद्धनामसे ही कहते।
कुछ आधुनिक विद्वान् “महाभूतसंक्षोभकः शब्दोऽनाश्रित उत्पत्ति-
धर्मको निरोधधर्मक इत्यन्ये” इस भाष्यवचन में आये 'अन्ये' पदसे
बौद्धकी कल्पना करते हैं और कहते हैं कि ईसासे ४८७ वर्ष पूर्व
वर्तमान बुद्धदेवके बाद ही वात्स्यायनभाष्यकी रचना हुई थी। किन्तु
यह कथन ठीक नहीं है। क्योंकि वेद-धर्मशास्त्र पुराणोंमें जैसे अनेक
आस्तिक-नास्तिकमतोंका उल्लेख होनेपर वे बुद्धके बाद नहीं माने
जाते हैं, वैसे ही उक्त भाष्यवचनमें 'अन्ये' पदसे किसीका मत कहा
गया होगा। क्योंकि बौद्धनामका वहाँ उल्लेख नहीं है। यह बात
न्यायवार्तिककी भूमिकामें स्पष्ट है।
कुछ आधुनिक तार्किक हेमचन्द्राचार्यकृत अभिधानचिन्तामणिकोश-
में लिखे—
वात्स्यायने मल्लनागः कौटिल्यश्चणकात्मजः।
द्रामिलः पक्षिलस्वामी विष्णुगुप्तोऽङ्गुलश्च सः ॥
इस श्लोकको देख कर कहते हैं कि न्यायभाष्यकर्ता वात्स्यायन चाणक्य