आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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प्रमाणोंके विवेचनद्वारा आत्मा आदि प्रमेयोंका तत्त्वज्ञान करा कर
निःश्रेयसकी प्राप्ति करानेके लिये हुई है ।
महर्षि गोतमका समय अतिप्राचीन है। इसमे श्रुति स्मृति आदि
प्रमाण हैं । मुण्डक उपनिषद्के प्रथममुण्डकमे द्विविध विद्याओंके
प्रसङ्गमे "न्यायो मीमांसा धर्मशास्त्राणि" इस वचनद्वारा न्यायशास्त्रका
उल्लेख होनेसे उसके कर्त्ता गोतमका भी अतिचिरकालीन होना निर्विवाद
है । यद्यपि मीमांसा और धर्मशास्त्र भी न्यायशब्दवाच्य होता हैं,
तथापि उन दोनोंका पृथक् उल्लेख होनेसे यहाँ न्यायशब्द गोतमकृत
न्यायशास्त्रका ही वाच्य है ।
पद्मपुराणमें लिखा है—
कणादेन तु सम्प्रोक्तं शास्त्रं वैशेषिकं महत् ।
गोतमेन तथा न्यायं सांख्यं तु कपिलेन वै ॥
( पद्मपु० उ० ख० २६३ अ० )
स्कन्दपुराणके कालिकाखण्डमे आया है—
गोतमः स्वेन तर्केण खण्डयन् तत्र तत्र हि ।
( स्क० पु० का० ख० अ० १७ )
उपर्युक्त प्रमाणोंसे निर्विवाद सिद्ध है कि महर्षि गोतमका समय
अतिप्राचीन है ।
न्यायदर्शनके भाष्यकार वात्स्यायनका कालनिर्णय भी इद्दमित्थ
रूपमें करना कठिन है । न्यायवार्त्तिककारने उन्हें अक्षपादके तुल्य
बताया है—
यदक्षपादप्रतिमो भाष्यं वात्स्यायनो जगौ ।
अकारि महतस्तस्य भारद्वाजेन वार्त्तिकम् ॥
न्यायवार्त्तिकतात्पर्य्यटीकाके प्रारम्भमे वाचस्पतिमिश्रने उन्हें "भगवता
पक्षिलस्वामिना' ऐसा ससम्मान उल्लिखित किया है । जिससे
वात्स्यायनका दूसरा नाम पक्षिलस्वामी भी था, यह प्रमाणित होता है ।
वात्स्यायन मुनिकी चर्चा पद्मपुराणके रामाश्वमेध प्रकरणमें हुई है,
जैसे—
ततः परं धराधारं पृष्टवान् भुजगेश्वरम् ।
वात्स्यायनो मुनिवरः कथामेतां सुनिर्मलाम् ॥
( प० पु० रा० अ० १ )