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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 9, कुल 530 में से

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पृष्ठ 9

प्राक्कथनम्
सम्पूर्णानन्द-संस्कृत-विश्वविद्यालयस्य न्यायवैशेषिक-विभागा-
ध्यक्षपदं पुनस्तत्रैव कुलपतिपदं चालङ्कृतवतां नैयायिक-
शिरोमणीनां पण्डितराज श्रीबदरीनाथशुक्ल-
महाभागानाम्—
भारतवर्ष दार्शनिकज्ञानके प्रादुर्भावकी प्रथम भूमि है। भारतीय
ज्ञान मानव-जीवनके उन्नयन और संस्कार-परिष्कारका एकमात्र
अनिवार्य साधन है। दार्शनिकज्ञान ही वह परम औषध है, जिससे
मनुष्यके सब प्रकारके तापोंकी निवृत्ति हो सकती है। यह वह प्रकाश
है, जिससे मनुष्यके घोर आन्तर तमका निरास होकर उसके वास्तव
स्वरूपकी अभिव्यक्ति होती है। जिसके फलस्वरूप मनुष्य अनादिकालसे
सञ्चित संकीर्णताओंसे मुक्ति पाता है। और अपने आपके सम्बन्धमें
उसकी चिरप्ररूढ बहुविध भ्रान्तियोंका उन्मूलन होता है।
भारतका दार्शनिकज्ञान अनुसन्धाता विद्वानोंद्वारा कई शाखाओंमें
विभाजित हुआ है। इस विभाजनको आस्तिक और नास्तिक दो
श्रेणियोंमें प्रधानरूपसे समझा जाता है। आस्तिक, दार्शनिकज्ञानकी
वह शाखा है, जिसमें आत्माके अभयत्त्वकी पूरी प्रतिष्ठा की गयी है।
इस शाखामें आत्माको नितान्त नित्य बताकर उसको सभी प्रकारकी
भीतियोंसे मुक्त किया गया है। जैसे, न्याय और वैशेषिक दर्शनमें
आत्मा नितान्त नित्य माना गया है। इसे कर्त्ता और भोक्ता माननेपर
भी उसके नित्यत्वकी रक्षा इस मान्यताके आधारपर की गयी है कि
कार्य और कारण, धर्म और धर्मीमें अत्यन्त भेद है। इसीलिये आत्मा
सुख-दुःख आदिका कारण और आधार होनेपर भी सुख-दुःख आदिके
अनित्य होनेसे अनित्य नहीं हो पाता है।
सांख्य और योगदर्शनमें कार्य-कारणमें तथा धर्म-धर्मीमें अभेद
माना गया है। अतः उस मान्यताके अनुसार आत्मामे कार्य और
अनित्य-धर्मके सम्बन्धसे अनित्यत्वकी आपत्तिका भय था। किन्तु
॰ परिहारके लिए उन दर्शनोंने प्रकृतिको ही सभी कार्योंका कारण