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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 14, कुल 530 में से

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पृष्ठ 14

( ३ )
प्रारम्भमें "अथ जगदेव दुःखपङ्कनिमग्नमुद्दिधीषुरष्टादशविद्यास्थाने-
ष्त्वभ्यर्हिततमामान्वीक्षिकीं परमकारुणिको मुनिः प्रणिनाय" ऐसा कह
कर न्यायविद्याकी महत्ता बताई है। इससे स्पष्ट है कि आदिकालसे
यह आन्वीक्षिकीविद्या वेदकी तरह अभ्यर्हित होती आ रही है।
यद्यपि न्यायसूत्रकारने इस शास्त्रका प्रयोजन आत्यन्तिक दुःखो-
परमरूप निःश्रेयस बताया है—जैसे, "प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त-
सिद्धान्तावयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभासच्छल जाति-
निग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः" (न्या० द० १।१।१)।
किन्तु भाष्यकार वात्स्यायनने तो यहाँ तक कह दिया है कि बुद्धि-
मानोंका ऐसा कोई भी प्रयोजन नहीं है, जिसे प्राप्त करानेमें आन्वी-
क्षिकीविद्या उपयोगी न हो। उन्होंने स्पष्ट कहा है—"सेयमान्वी-
क्षिकी विद्या—
प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम् ।
आश्रयः सर्वधर्माणां विद्योद्देशे प्रकीर्तिता ॥
अर्थात् यह न्यायविद्या सभी विद्याओंका प्रदीप है। जैसे प्रदीप-
द्वारा प्रकाशित वस्तुसे हम अपना व्यवहार सम्पादित करते हैं, वैसे ही
न्यायविद्याद्वारा प्रतिपादित प्रमाणकी सहायतासे ही इतर विद्यायें
अपने अर्थतत्त्वोंके निरूपणमें प्रवृत्त होती हैं। इस प्रकार न्यायविद्या-
का यह महत्त्वपूर्ण योगदान है कि मीमांसा-वेदान्तादि विद्याओंके लिए
यह विद्या प्रमाणरूप साधन प्रस्तुत करती है। इसीलिये इसे प्रमाण-
शास्त्र भी कहा जाता है।
एवं समस्त विद्याओंद्वारा प्रतिपाद्य अग्निहोत्रसे लेकर कृषि-
पर्यन्त सभी कर्मों मे आन्वीक्षिकी उपायभूत है। क्योंकि विद्याओंमे
आये पदोंसे जिसरूपमे अर्थकी अवगति होती है, उतनेमात्रसे
बुद्धिमानोंको परितोष नहीं होता है। कारण, "आदित्यो वै यूपः"
इस श्रुतिवाक्यमे कही गयी यूपकी आदित्यरूपताको बुद्धिमान् व्यक्ति
स्वीकार नहीं कर सकता। इसलिये संशय परीक्षा और प्रमाणोंके
विनिवेशद्वारा वास्तविक अर्थको समझ कर ही अनुष्ठान या परिहारहेतु
उसमें श्रुतिका विनियोग होता है। इसी तरह दण्डनीति और वार्ता-
शास्त्रमें भी प्रमाणोंके विनियोगद्वारा आन्वीक्षिकीकी उपयोगिता समझनी
चाहिये। अतः "उपायः सर्वकर्मणाम्" यह कथन भी यथार्थ है।