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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 530 में से

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पृष्ठ 13

( २ )
याज्ञवल्क्यका भी वचन है—
पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिता ।
वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥
( या० स्मृ० अ० १ श्लोक ३ )
विष्णुपुराणमे भी उल्लिखित है—
अङ्गानि चतुरो वेदा मीमांसा न्यायविस्तरः ।
पुराणं धर्मशास्त्रं च विद्या ह्येताश्चतुर्दश ॥
( वि० पु० अं० ३ अ० ६ )
यहाँ 'न्यायविस्तर' शब्दसे न्यायको प्रधान बनाकर वैशेषिक,
सांख्य और योगशास्त्रका ग्रहण किया गया है ।
आर्षं धर्मोपदेशं च वेदशास्त्राविरोधिना ।
यस्तर्केणानुसन्धत्ते स धर्मं वेद नेतरः ॥
( म० स्मृ० अ० १२ श्लो० १०६ )
इस 'मनुवचनमें तर्कशब्दको तर्कनिरूपक न्यायशास्त्रका ग्रहण है । मनुने
आन्वीक्षिकीको आत्मविद्याशब्दसे भी कहा है, जैसे—
त्रैविद्येभ्यस्त्रयीं विद्यां दण्डनीतिं च शाश्वतीम् ।
आन्वीक्षिकीं चात्मविद्यां वार्तारम्भांश्च लोकतः ॥
( म० स्मृ० अ० ७ श्लो० ४३ )
तर्कका ही दूसरा नाम आन्वीक्षिकी है । अमरकोशमे कहा है—
"आन्वीक्षिकी दण्डनीतिस्तर्कविद्याऽर्थशास्त्रयोः" ।
एव "आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिश्च शाश्वती"
इस वचनद्वारा प्रतिपादित चतुर्विध विद्याओंमें भी आन्वीक्षिकी न्याय-
विद्या ही है, ऐसा जयन्तभट्टने न्यायमञ्जरीमें कहा है । "प्रत्यक्षा-
गमाभ्यामीक्षितस्यान्वीक्षणमन्वीक्षा अनुमानमित्यर्थः, तद्व्युत्पादकं
शास्त्रमान्वीक्षिकम् न्यायशास्त्रमित्यर्थः ।
( न्यायमञ्जरी प्रथमसूत्रावतरणिका )
इस प्रकार विद्याओंके चार भेद हों, या चतुर्दश भेद हों, या
अष्टादश भेद हों, सर्वथा न्यायका सन्निवेश होनेसे इसकी महत्ता प्रकट
होती है । इसीलिये गङ्गेशोपाध्यायने भी तत्त्वचिन्तामणिग्रन्थके