आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
लक्षणायोगेऽपि ग्राह्यभाव इति चित्रमेतत् । तथा च चित्रा-
द्वैताद्वरं चित्रद्वैतमस्तु प्रतिभासानुरोधादिति ।
स्यादेतत्, बहिरन्तरुभयथापि ग्राह्यलक्षणक्षतिरस्तु ।
प्रकाशमानत्वं तु नीलादीनामशक्यापह्नवम् । तावन्मात्रं
चास्माकमभिमतमिति चेत्, तदेतद् विक्रीतगवीरक्षणम् ।
किमिद(हि) प्रकाशमानत्वं यत् सर्वथा ग्राह्यलक्षणक्षतावपि न
क्षीणम् । न प्रकाशसम्बन्धः, नियमानुपपत्तेरित्युक्तम् । न
प्रकाशतादात्म्यम्, चित्रत्वानुपपत्तेरित्युक्तम् ।
दो चित्र मानने होंगे। एक यह कि अभेदरूप ग्राह्यलक्षणके अभावमें
भी चतुष्कोटियों को ग्राह्य माना। दूसरा चित्र यह हुआ कि वह ग्रहण
भी पूर्ववत् विषयके भेद और अभेद दोनोंसे रहित होगा।
(शङ्का) अस्तु, ज्ञानसे भिन्न या अभिन्न दोनों ही रूपोंमे नील
पीतादि विषय ग्राह्यलक्षणसे रहित भले ही हो, फिरभी नीलादिकी प्रकाश-
मानता तो नहीं छिपायी जा सकती है, और उतना ही हमारा अभीष्ट भी
है। अर्थात् "नीलादि विषय प्रकाश ( ज्ञान ) स्वरूप है" यह बात उसके
प्रकाशमान होनेमात्रसे ही सिद्ध हो जाती है।
(उत्तर) इसप्रकारका कथन बेंच दी गयी गौको पुन रखनेके
समान है। अर्थात् नीलादिकमे ग्राह्यलक्षणका अभाव स्वीकार करते
हुए तुम ही उसमें प्रकाशमानत्वको समाप्त कर चुके हो और पुन
नीलादिको ज्ञानाभिन्न सिद्ध करनेके लिये तुम ही नीलादिमे प्रकाश-
मानत्वको हेतु बना रहे हो। अतः तुम्हारी यह प्रक्रिया विक्रीत-
गवीरक्षणके समान हुई। एव, यह कैसा प्रकाशमानत्व है, जो ग्राह्य-
लक्षणके अभावमे भी नीलादिमें कायम रहा। यदि कहो कि प्रकाशसे
सम्बन्ध होना ही प्रकाशमानत्व है, तो तुम ही कह चुके हो कि
"नीलादिका ही प्रकाशसे सम्बन्ध होगा पीतादिका नहीं" यह नियम
नहीं हो सकता। अतः नीलकालमे पीतकी प्रतीति और पीतकालमें
नीलकी प्रतीति होने लगेगी।
यदि कहो कि—प्रकाशके साथ तादात्म्य होना ही नीलादिका प्रकाश-
मान होना है—तो इसके सम्बन्धमें मैं कह चुका हूँ कि चित्रज्ञानकी
२०० आत्मतत्त्वविवेके
तस्मान्नीलादीनां प्रकाशमानत्वं परिपालयता ग्राह्यलक्षणे
यत्नः कर्तव्यः परिहर्तव्यं वा प्रकाशमानत्वम् । अन्यथा तप-
नीयमपनीय वाससि ग्रन्थिकर्त्तारमुपहससि, स्वयं च गगना-
ञ्चले ग्रन्थि करोषीति । सेयं सर्वप्रकारमसिद्धिः सर्वप्रकारश्चा-
नैकान्तिकत्वमिति ।
एकता भग्न हो जायगी । अर्थात् चित्रात्मक ज्ञान यद्यपि एक होता है
किन्तु नील पीत, हरित, श्वेत आदि विभिन्न विषयोंसे तादात्म्य होनेके
कारण वह चित्रज्ञान एक न होकर विषयभेदसे भिन्न भिन्न अनेक ज्ञान
हो जायगा, जो अनुभव विरुद्ध है ।
अतः नीलादिमे यदि प्रकाशमानत्व की रक्षा चाहते हो तो उसमे
ग्राह्यलक्षणके लिये यत्न करना पडेगा । अर्थात् भेदमे भी विषय-
विषयिभाव मानना होगा नहीं तो नीलादिमे प्रकाशमानत्वका परि-
त्याग कर देना पडेगा । यदि ऐसा नहीं करते हो तो यही कहा
जायगा कि सुवर्ण फेंककर खाली वस्त्रमे गठरी बाँधनेवालेको तुम
हँस रहे हो और स्वय कनक लेकर भी आकाशमें गाँठ बाँधते हो ।
अर्थात् ज्ञानश्रीके मतानुसार नीलादिका ज्ञानाकार होना ही स्वर्ण है,
जिसे नैयायिक छोड देता है । तथा बाह्य वस्तुका स्वीकार करना ही
वस्त्रमे गाँठ देना है, जिसे नैयायिक अपनाता है । यही ज्ञानश्रीके
उपहासका अभिप्राय है । जिसका उत्तर नैयायिक भी उपहासके द्वारा
ही देता है कि अपने स्वर्ण को लेकर भी ज्ञानश्री वस्त्रमे गाँठ न बाँधकर
आकाशमे ही गाँठ बाँधता है । क्योंकि जैसे भेदमे ग्राह्यलक्षणका
अभाव है, वैसे ही अभेदमे भी ग्राह्यलक्षणका अभाव है, इसप्रकार
सर्वथा ग्राह्यलक्षणाभावमे भी नीलादिमे प्रकाशमानत्व मानना ही
आकाशमें गाँठ देनेके समान है, जिसे ज्ञानश्री अपनाये हुए है ।
इसप्रकार यहाँ बौद्धके अनुमानमे सभी प्रकारसे असिद्धि एव सभी
प्रकारसे व्यभिचार दोष आ जाता है अर्थात् “नील ज्ञानाभिन्न, प्रकाश-
मानत्वात्, सहोपलम्भाद् वा” इस अनुमानमें नीलादि-बाह्यको नहीं
माननेके कारण नीलस्वरूप पक्षके असिद्ध होनेसे आश्रयासिद्धि हुई ।
भेद और अभेद दोनों ही स्थितियोंमें ग्राह्य-लक्षणका अभाव होनेसे
प्रकाशमानत्व आदि हेतु असिद्ध हैं । अतः स्वरूपासिद्धि हुई ।
एतेन द्वितीयः पक्षः प्रत्युक्तः । न हि सजातीयत्वेन
ग्राह्यलक्षणवैधुर्यमुत्सार्यते, अतिप्रसङ्गस्य तादवस्थ्यात् ।
जडत्वे प्रकाशासम्भवेनेति चेत्, न, तुल्यत्वात् । यथा
तथा ज्ञानाभेदको साध्य करनेमे ज्ञानवृत्ति 'यावद्धर्मवत्त्व उपाधि है,
इसलिए सोपाधिक होनेमे व्याप्यत्वासिद्धि हुई । एवं प्रकाशमानत्वादि
हेतुके अलीक भेदमे भी चले जानेके कारण साधारण व्यभिचार हुआ ।
अथवा पूर्वोक्त रीतिसे सपक्ष विपक्ष दोनों ही से प्रकाशमानत्व हेतुके
व्यावृत्त होनेके कारण असाधारण व्यभिचार हुआ । एवं सभी पदार्थको
पक्ष माननेके कारण अनुपसंहारीनामक व्यभिचार दोष हुआ ।
इससे द्वितीयपक्ष भी खण्डित हो जाता है । अर्थात् लक्षणका
अभाव होनेसे नीलादि विषय जैसे ज्ञानसे अभिन्न नहीं सिद्ध होता,
वैसे ही यह ज्ञान से अभिन्नजातीय भी नहीं सिद्ध हो सकता है ।
क्योंकि सजातीय माननेसे भी नीलादिमे ग्राह्यलक्षणका अभाव नहीं
हटता है । कारण, सजातीय ही यदि ग्राह्य हो तो तुम्हारे मतानुसार
घटपट आदि सभी विषय एकसा ज्ञानके सजातीय हैं । इसलिये
जिस ज्ञानमें पट विषय हो रहा है, उसमें घट भी अनिवार्यतः विषय
होने लगेगा । इसप्रकार अतिप्रसङ्ग दोष यथास्थित ही रह जाता है ।
यदि कहो कि--नीलादि-विषयको ज्ञान-सजातीय न मानकर जड़
माना जाय तो उसका प्रकाश ही नहीं हो सकता है । अर्थात् नीलादि
चूँकि प्रकाशमान होता है, इसीलिये यह ज्ञान सजातीय सिद्ध हो
१. जो साध्यका व्यापक हो और साधनका अव्यापक हो, उसे उपाधि
कहते हैं । प्रकृतमे नीलादि-विषयमे ज्ञानाभिन्नत्व साध्य है और प्रकाश-
मानत्व हेतु है । जो जो ज्ञानाभिन्न होता है, उस उसमे ज्ञानवृत्ति-
यावद्धर्मवत्त्व होता है । इसप्रकार ज्ञानवृत्तियावद्धर्मवत्त्व उपाधि साध्य-
व्यापक हुआ । तथा जो जो प्रकाशमान हैं, उस उसमे ज्ञानवृत्तिया-
वद्धर्मवत्त्व नही रहता, जैसे घटादिमे । अतः साधनाव्यापक भी हुआ ।
इसप्रकार प्रकृत अनुमानमे ज्ञानवृत्तियावद्धर्मवत्त्वके उपाधि होनेसे
यहांका हेतु सोपाधिक होकर व्याप्यत्वासिद्ध हुआ ।
२०२ आत्मतत्त्वविवेके
ह्यस्वसंवेदनवादिनः परं प्रति प्रकाशमपि ज्ञानमात्मनि जड-
मेव, तथा स्वसंवेदनवादिनोऽपि स्वात्मनि प्रकाशमपि ज्ञानं
परं प्रति जडमेव । कथञ्चिद् बुद्ध्यन्तरेऽप्यजड चेत् , बाह्येऽपि
तथा किं न स्यादिति सन्दिग्धविपक्षवृत्तित्वम् ।
ननु बाह्ये सर्वथैव ग्राह्यलक्षणक्षतिः, इह तु समानोपादान-
तानियमेन चित्राकाराणां परमार्थभिन्नानामेव व्यतिवेदन-
सिद्धि; न, मिथः प्रथानियमे ह्युपादानमुखेन सामान्यतो वा
जायगा-तो यह नहीं कह सकते हो । क्योंकि वह बात ज्ञानके सम्बन्धमें
भी समान ही है । क्योंकि जैसे ज्ञानको अस्वप्रकाश माननेवाले
नैयायिकोंके यहाँ विषयोंके प्रति प्रकाशात्मक भी ज्ञान अपने प्रति जड़ ही
होता है, वैसे ही ज्ञानको स्वप्रकाश माननेवाले बौद्धोंके यहाँ भी अपने
लिये प्रकाशात्मक भी ज्ञान अपनेसे भिन्न ज्ञानके प्रति जड ही होता है ।
अर्थात् स्वप्रकाश होनेके कारण ज्ञान अपनेको तो भासित कर देता है
किन्तु अन्य ज्ञानको भासित करनेमें तो वह भी जड ही है । अतः
जैसे जड होते हुए भी ज्ञानका प्रकाश (भान) असम्भव नहीं
है, वैसे ही जड होते हुए भी नीलादि-विषयका भी भान असम्भव
नहीं होगा ।
यदि कथञ्चित् अन्य ज्ञानके प्रति भी वह ज्ञान अजड ही हो तो
नीलादि बाह्यविषयोंके प्रति भी वह अजड़ क्यों न होगा ? अर्थात्
अपनेसे भिन्न होते हुए भी नीलादि विषयको ज्ञान प्रकाशित कर
दे सकता है । इस प्रकार "नीलादिकं ज्ञानसजातीयं प्रकाशमान
त्वात्" इस अनुमानमे प्रकाशमानत्व हेतुमे विपक्षवृत्तित्वका सन्देह हो
जाता है ।
"बाह्यपक्षमें अर्थात् ग्राह्य ग्राहकके भेदपक्षमें अतिप्रसङ्ग दोषसे
सर्वथा ही ग्राह्यत्वका अभाव हो जाता है । चित्रप्रत्ययके अनुरोधसे
अभेदपक्ष भी असम्भव है। अतः ग्राह्य ग्राहकभावका नियामक यही
मानना चाहिये कि—जो परस्पर समानोपादानक हो अर्थात् जिनका
उपादानकारण समान हो, वे परस्पर ग्राह्य ग्राहक होते हैं-इससे परस्पर
बाह्यार्थभङ्गवाद [२०३]
सामग्रीसामर्थ्यमेव वक्तव्यम्, अन्यथा तथाविधकार्यानुत्पत्तेः ।
तथा च बाह्यग्राह्यनियतस्वभावज्ञानोत्पत्तावपि सुलभमेतदिति
पूर्वक्त एव दोषः ।
अस्तु तर्हि तृतीयः, सर्वथा ग्राह्यलक्षणानुपपत्तेः । तद-
भावे सामग्रीसामर्थ्यस्याप्याश्रयितुमशक्यत्वात् । विचारसिद्धे
हि वस्तुनि कारणचिन्तनावसरो न त्वविवेचित इति चेत्, कि
भिन्न भी नीलपीतादि चित्राकारोंका पारस्परिक ज्ञान हो जायगा ।
कारण, नीलपीतादि आकारोंका उपादान कारण एक ही ज्ञान है" ।
किन्तु यह कथन भी ठीक नहीं है । क्योंकि परमार्थत भिन्नोंका
भी पारस्परिक ज्ञान होनेका नियामक सामग्रीगत अपनी सामर्थ्य ही
माननी पड़ेगी । वह सामर्थ्य चाहे विशेष रूपसे उपादानकारणकी हो
अथवा सामान्यरूपसे कारणमात्रकी हो । अर्थात् चित्रस्थलमे भेदमे
भी ग्राह्य ग्राहकभाव तुमने भी मान ही लिया । अन्तर इतना ही है
कि तुम उसका नियामक समानोपादान मानते हो और मैं कारणगत
सामर्थ्यविशेषको ही उसका नियामक मानता हूँ । एसा माने बिना
नियतकार्य की उत्पत्ति नहीं हो सकती है ।
इसप्रकार बाह्यवस्तुको ग्राह्य माननेमें भी उसका नियमित ज्ञान
होनेमे उक्त सामग्रीसामर्थ्य नियामक हो सकता है । अतः पूर्वोक्त
प्रकारसे यहाँ भी संदिग्धविपक्षवृत्तित्वरूप सन्दिग्धव्यभिचार दोष आ
ही जाता है । इसतरह सजातीयत्वरूप द्वितीयपक्ष भी खण्डित हो
जाता है ।
यदि कहो कि—पूर्वोक्त दोनों पक्षोंके असंभव होनेसे तीसरा पक्ष
ही मानने योग्य है । इस पक्षम ग्राह्य अंश अलीक है और ग्राहकांश
(ज्ञान) ही वास्तविक है । क्योंकि बाह्यवस्तुमे किसी भी प्रकारसे
ग्राह्य का कोई लक्षण नहीं बन सकता है । अर्थात् नीलादि ग्राह्यपदार्थको
पूर्वपद्धतिके अनुसार ज्ञानसे भिन्न या अभिन्न कुछ नहीं कह सकते ।
और ग्राह्यलक्षणके नही होनेसे ग्राह्यरूप लक्ष्य असंभव होगा । एसी
परिस्थितिमें नियतवस्तुके ग्रहणके लिये सामग्रीगत सामर्थ्यका सहारा
लेना भी अशक्य है । क्योंकि विचारद्वारा जो वस्तु सिद्ध है, उसी
ग्राह्यलक्षणानिर्वक्तव्यतया प्रकाशमानत्वमपीषां निवर्तते ?
सत्त्वं वा ?
न प्रथम, न हि लक्षणापरिज्ञानमात्रेण स्पष्टदृष्टमपि
लक्ष्यमपह्नोतुं शक्यते, अपरिज्ञानस्य दुरूहतयाप्युपपत्तेः ।
तेषामप्रतिभासे तन्निषेधस्यानुपपत्तेः ।
न द्वितीय, तदा हि तल्लक्षणानुपपत्तिः सत्त्वं निवर्तयेत्
यद्यसत्त्वे लक्षणमुपपद्येत । उभयथाप्यनुपपत्तौ कोऽनुरागोऽ
के सम्बन्धमे करण ( सामग्री ) चिंताका अवसर आता है, न कि
उसके सम्बन्धम, जो वस्तु ही असिद्ध है-तो यहाँ मैं पूछता हूँ कि
ग्राह्यलक्षणका निर्वचन नहीं हो सकनेसे क्या बाह्य पदार्थोकी प्रकाश-
मानता ( प्रतीति ) खण्डित हो जाती है ? अथवा उनकी सत्ता
( अस्तित्व ) का खण्डन हो न ता है ?
यहाँ प्रथमपक्ष नहीं हो सकता है । क्योकि केवल लक्षणका ज्ञान
नहीं हो सकनेके कारणमात्रसे स्पष्टरूपसे दीख पडने वाले भी लक्ष्यका
अपलाप नहीं किया जा सकता है । कारण वस्तुका अज्ञान तो उसकी
दुर्ज्ञेयताके कारण भी हो सकता है । साथ ही यदि बाह्यवस्तुकी प्रतीति
न हो तो उसमें ग्राह्यलक्षणका निषेध भी नहीं किया जा सकता है ।
इसलिये ग्राह्य लक्षणका निषेध करनेके लिये भी अनुयोगके रूपमें
बाह्यवस्तुकी प्रतीति मानना पडेगी ।
दूसरा पक्ष भी नहीं हो सकता है । क्योंकि लक्षणकी अनुपपत्तिसे
वस्तुसत्ताकी निवृत्ति तभी होती यदि उसकी असत्त होनेसे लक्षण बन
जाता । यदि सत्ता या असत्ता दोनों दशाओंमें लक्षण न बन सकता हो
तो असत्ताके प्रति ही क्या अनुराग है ?
यदि कहो कि—असत्त्व ही ग्राह्यका लक्षण है—तो सत्त्व ही लक्षण
क्यों न होगा ?
यदि कहो कि—सत्त्वको ग्राह्यका लक्षण माननेमें भी तो वही दोष
है । अर्थात् जैसे, सत्त्वको ग्राह्य का लक्षण माननेपर किसी एक सद्वस्तुके
बाह्यार्थभङ्गवादः २०५
सत्त्वे। तदेव लक्षणमिति चेत्, सत्त्वमेव किं न स्यात् ?
अतिप्रसङ्गादिति चेत्, तुल्यम्।
वेदनाधीनव्यवहारगोचरत्वमिति चेत्, अस्तु तावदिदम्,
तस्यैवेति तु नियमः कुतः? सामग्रीतस्तथा वेदनोत्पत्तिरिति
चेत्, तदेतत्, सम्भाव्यते सति, न त्वसतीति विशेषः। यथा
हि सति ज्ञानेनाभिलापः, तेन यत्नः, तेन प्रवृत्तिः, तया
तत्प्राप्तिः क्रियते, न तथाऽलीके, तस्य प्राप्तुमशक्यत्वात्,
शक्यत्वे वाऽनलीकत्वात्।
व्यवहारोऽप्ययमलीक इति चेत्, तर्हि सुतरा लक्षणाभावः,
तद्द्वारस्याप्यभावात्।
ज्ञान होनेपर सत्के नाते अन्य सभी सत्पदार्थोंका भान होने लगेगा,
वैसे ही असत्को ग्राह्यका लक्षण माननेपर भी किसी एक असत्का ज्ञान
होनेपर असत्के नाते भी अन्य सभी असत्पदार्थोंका भी भान होने
लगेगा। इस प्रकार दोनों ही पक्षोंमें समान न्याय है।
यदि कहो कि—ज्ञानजन्यव्यवहारविषयत्व ही ग्राह्यका लक्षण है,
अर्थात् ज्ञानके कारण ही जिसका व्यवहार होता है, उसे ग्राह्य कहते हैं—
तो यह लक्षण भले ही हो, किन्तु घटज्ञानसे घटका ही व्यवहार होगा,
यह नियम कैसे रहेगा ? यदि कहो कि—सामग्रीगत सामर्थ्यका ही ऐसा
प्रभाव है कि उस वस्तुके ज्ञानसे उसी वस्तुका व्यवहार होगा दूसरे
का नहीं—तो यह सामर्थ्य भी सत्पदार्थमे ही सम्भव है न कि असत्मे,
यह विशेषता है।
जैसे कि—सद्वस्तुमें ज्ञान होनेपर इच्छा होती है, इच्छासे प्रयत्न,
प्रयत्नसे प्रवृत्ति तथा प्रवृत्ति होनेपर उस वस्तुकी प्राप्ति हो जाती है, वैसे
अलीक (असन्) वस्तुमे नही होता। क्योंकि उसमे ज्ञान इच्छादिके
होनेपर भी उस मिथ्यावस्तुकी प्राप्ति नहीं की जा सकती है। अर्थात्
प्राप्त हो सकने वाली वस्तु सत् ही होगी।
यदि कहो कि—यह ज्ञान-इच्छा-प्रयत्न-प्रवृत्ति और प्राप्तिरूप
२०६ | आत्मतत्त्वविवेके
अस्तु तर्हि सर्वथा विचारासहत्वमेव विश्वस्येति चेत्,
तत् किमिदानीं तत्त्वोपप्लव एव ? काष्ठाशून्यता¹ वा ? न
प्रथम', इयतीं भूमिमारूढस्यापि विचारस्य निष्फलताया
प्रमाणाभावात् । भावे वा कथं तत्त्वोपप्लवः ? अस्यैव विचार-
स्यानुपप्लवात्, तत्समानन्यायस्यान्यस्यापि तथाभावप्राप्तेः,
व्यवहार भी अलीक ही है, इसलिय अलीकमें अलीकव्यवहार होनेमे
कोई बाधा नहीं है—तब तो बड़ी आसानीसे ग्राह्य लक्षणका अभाव हो
गया। क्योंकि लक्षणघटकीभूत व्यवहार ही असिद्ध है। अर्थात्
ज्ञानजन्यव्यवहारविषयत्वरूप ग्राह्यलक्षणमे व्यवहार घटकीभूत (द्वारी
भूत) है, अत व्यवहारके असिद्ध होनेसे तद्घटित सम्पूर्ण लक्षण
असिद्ध हो गया।
यदि कहो कि—सत्त्व, भिन्नत्व या अभिन्नत्व किसी भी रूपमें ग्राह्य
का लक्षण नहीं हो सकनेके कारण विश्वको विचारायोग्य ही क्यों न मान
लिया जाय—तो क्या, इसप्रकार सम्पूर्ण विश्वको विचारके लिये अयोग्य
माननेकी दशामें जगत्की तात्त्विकता ही लुप्त हो जाती है ? अथवा
तात्त्विकता नष्ट होनेसे जगत्का शून्यतामें पर्यवसान हो जाता है ?
अर्थात् जगत् शून्यरूप सिद्ध हो जाता है ? यहाँ प्रथमपक्ष ठीक नहीं
है। क्योंकि यदि सबकुछ अतात्त्विक है तो अबतक इतनी सीढ़ी तक
पहुँचे हुए इस विचारकी भी, जो सर्वान्तर्गत है, तात्त्विकतामे कोई
प्रमाण नहीं है। यदि इस विचारको तात्त्विकताका साधक कोई प्रमाण
हो तो सब अतात्त्विक कैसे हुआ ? क्योंकि यह एक विचार ही तात्त्विक
सिद्ध हो गया। और जिस न्यायसे यह विचार तात्त्विक सिद्ध हुआ,
उसी न्यायसे विचारका विषय आत्मा तथा उसका ज्ञानसे भिन्न और
नित्य विभु आदि होना भी सिद्ध ही हो गया।
साथ ही आपका यह विचारारम्भ भी निष्फल है। क्योंकि अनियत
रूपसे सर्वत्र प्रवृत्ति कराना इस विचारारम्भका फल नहीं हो सकता।
कारण, अनियत प्रवृत्ति होनेमे गगनास्वादनमें भी प्रवृत्ति होने लगेगी।
कि तु उससे तृप्तिरूप फल होता नहीं। ऐसे ही अनियत प्रवृत्तिपक्षमें
१ माध्यमिकपक्षोऽयम् ।
ऽनिष्फलत्वाच्च । न ह्यस्यातिप्रवृत्तिः फलम्, गगनास्वादने-
नातृप्तेः, ज्वाला (अलीक) कलापालिङ्गनेन तापानपनोदनात् ।
नाप्यतिनिवृत्तिः, जडीभावमात्रेऽप्युपनिपातिदुःखानिवृत्तेः ।
न च दुःखमपि विचारासहमित्यहेयमेव, तथाविधस्य-
तापनिवृत्तिके उद्देश्यसे ज्वालासमूहके आलिङ्गनमे भी प्रवृत्ति होने
लगेगी । किन्तु उससे तापकी निवृत्ति हो नहीं सकती । यहाँ पूर्वपक्ष
का अभिप्राय यह है कि जब तात्त्विकदृष्टिसे सब अलीक है तो समानरूप
से अर्थात् अलीकत्वाविशेषात् किसी भी उद्देश्यकी प्राप्तिके लिये कहीं
भी प्रवृत्ति हो सकती है । ऐसा नहीं कि तृप्ति चाहनेवाला व्यक्ति नियत-
रूपसे भोजनादिमे ही तथा दुःखकी निवृत्ति चाहनेवाला मोक्षार्थी किसी
खास साधनमें ही प्रवृत्त होवे । यही अतिप्रवृत्ति इस विचारारम्भका
फल हुआ । यहाँ उत्तरपक्षका आशय तो स्पष्ट है । अतिनिवृत्ति भी
विचारारम्भका फल नहीं हो सकता है । अर्थात् यह भी नहीं हो
सकता कि इस विचारद्वारा सबको अतात्त्विक समझता हुआ मुमुक्षु
सबसे निवृत्त होकर दुःखसे छुटकारा पा जायगा । क्योंकि सबसे
निवृत्त होकर जडवत् बन जानेपर भी दैवात् आनेवाले दुःखोंसे पिण्ड
नहीं छूट सकता है ।
यह भी नहीं कह सकते कि—दुःख भी अतात्त्विक है, अतः वह
अहेय (अत्याज्य) ही है । अर्थात् अतिनिवृत्ति ही विचारका फल
है । तथा जडीभूतको दुःख तब अनिष्ट होता, यदि वह तात्त्विक होनेसे
हेय होता । किन्तु वह तो अतात्त्विक होनेसे हेय भी नहीं है—क्योंकि
हेयोपादेयरहितव्यक्तिका विचारमें भी अधिकार नहीं है । अर्थात्
सबकी प्रवृत्ति दुःखहानिके लिये या सुखप्राप्तिके लिये होती है, और
वह उसके लिये ही विचारमें प्रवृत्त होता है । जिसके लिये न
कोई हेय है और न कोई उपादेय है, उसके लिये तो विचार भी
निष्प्रयोजन ही है ।
यह भी नहीं कह सकते कि—लोकानुसार व्यवस्था ही विचारका
फल है । अर्थात् लोकसिद्ध पदार्थोंके अलावे कोई तात्त्विक नहीं है—
२०८ आत्मतत्त्वविवेके
विचारेऽप्यनधिकारात् । नापि यथालोकं व्यवस्थितिः,
विचारात् प्रागपि तस्याः पामरादिवदयत्नसिद्धेः ।
नापि परलोकमात्रान्निवृत्तिः, तस्यैहिकतुल्यत्वात् ।
दृश्यते हि तावदयमिति चेन्, यदि ज्ञानवचनो दृशिस्तदा परो-
ऽपि तथा । साक्षात्कारवचनश्चेन्न, इहैवानुमानादेरप्रवृत्ति-
प्रसङ्गः । तदपि प्रत्यक्षमिति चेत्, ❀ आमुष्मिकमपि प्रत्यक्षमेव,
क्योंकि पामरोंकी तरह तुम्हारे लिये भी विचारके पहले ही लौकिक
व्यवस्थायें अनायास सिद्ध हैं ।
यह भी नहीं हो सकता कि—स्वर्ग या नरकरूप परलोकमात्रमें
निवृत्ति विचारका फल है । अर्थात् विचारद्वारा अनात्मताका ज्ञान
होनेसे स्वर्गके लिये यागादिमें प्रवृत्ति तथा नरकसे बचनेके लिये हिंसादि
से निवृत्ति नहीं होगी—क्योंकि पारलौकिक भी ऐहिकके ही तुल्य है ।
इसलिये स्वर्ग और नरकके समान लोगोंकी चन्दन और कण्टकमें भी
प्रवृत्ति और निवृत्ति नहीं होनी चाहिये ।
यदि कहो कि—इस लोकका तथा इसके सुखदुःखका तो दर्शन होता
है, इसलिये ऐहलौकिक वस्तुओंमें प्रवृत्ति निवृत्ति होनेमें कोई बाधा
नहीं है—तो यहाँ दर्शनका अर्थ यदि ज्ञान मानते हो तो परलोकका भी
ज्ञान होता ही है । यदि दर्शनसे साक्षात्कार अर्थ मानो तो इसी लोकमे
अनुमानादिसे प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिये । किन्तु वह्निका अनुमान
करके भी उसके आनयनमे प्रवृत्ति देखी जाती है ।
यदि कहो कि—लौकिक वह्नयादि और उससे होनेवाला सुखदुःख
तो इन्द्रियसन्निकर्षदशामें प्रत्यक्ष ही है, क्योंकि सुखत्वदुःखत्वरूप
लक्षण लौकिकपारलौकिक सभी सुखदुःखोंमें तुल्य है । अर्थात् एक जगह
सुखत्वादि जातिका प्रत्यक्ष होनेपर सामान्यलक्षणाप्रत्यासत्तिद्वारा उस
जातिसे युक्त सभी सुखदुःखोंका प्रत्यक्ष हो जाता है ।
❀ एतच्चिह्नान्तर्गतः पाठः टीकाग्रन्थानुरोधेन संयोजितः, कलिकातामुद्रित-
पाठस्त्वत्रत्यो विशृङ्खल इति मन्तव्यम् ।
तुल्यलक्षणत्वात् । अरुचेरेव तत्र न प्रवृत्तिरिति चेत्, तथापि
किं विचारेण ? तमन्तरेणापि तस्याः सुलभत्वात् । तामेवायं
पुष्णातीति चेत्, अविशेषादिहापि पुष्णीयादिति ॐ
सोऽयं पवनतनयवार्तामुपश्रुत्य तत्स्पर्द्धया बालवानरः
कियदपि दूरमुत्प्लुत्य महार्णवे पतितः प्राह—अपार एवायम-
कूपारो मिथ्या रामायणमिति¹ ।
तत् किमनेन ? एवं ज्ञातुं निर्वक्तुं वा न शक्यते कीदृशं
जगदित्येतावन्मात्रमपि पामरदशावन्निष्फलमेव । न हि
निष्फलत्वेऽपि श्रद्धेयमिदम्, तावत्परामर्शपाटवाभावेनाप्युप-
यदि कहो कि—स्वाभाविक अरुचिसे ही परलोकमें प्रवृत्ति नहीं
होती है—तो फिर विचारकी क्या आवश्यकता है ? क्योंकि विचार-
के बिना भी वह अरुचि अनायास सिद्ध है ।
यदि कहो कि—परलोकके प्रति स्वतःसिद्ध उस अरुचिको ही विचार
पुष्ट करता है—तो विचारद्वारा समानरूपसे इहलोकमे भी अतात्त्विकता
का ज्ञान होनेसे ऐहिक सुखसाधनोंके प्रति भी अरुचिको क्यों न पुष्ट
करे ? । इसप्रकार यह बाल-वानर महाबली हनुमान्का महासागर
लङ्घनवृत्तान्त सुनकर स्पर्धावश कुछ दूरतक उछलकर महासागरमे गिरा
हुआ बोलता है कि यह समुद्र तो अपार है और रामायणकी कथा
मिथ्या ही है, इसलिये यह महार्णव-लङ्घन निरर्थक है । अर्थात्
विचाराशक्त होनेके कारण यह बौद्ध प्रतिवादी उस बालवानरके समान
है । इस प्रकार यह न जाना जा सकता है और न दूसरेके प्रति
इसका निर्वचन ही किया जा सकता है कि कैसा यह जगत् है !
इतना विचार भी पामरदशाके समान निष्फल ही है । यह भी नहीं
कह सकते कि—निष्फल होनेपर भी इतना विचार तो श्रद्धेय ही है—
कारण, ज्ञान या निर्वचन न कर सकना तो विचारमें अपटुताके कारण
१ रामायणी कथा—इति ३ पु० पा०
१४
२१० आत्मतत्त्वविवेके
पत्तेः । न हि जात्यन्धो नीलं ज्ञातुं निर्वक्तुं वा न शक्त इत्य-
ज्ञेयानिर्वच्य एव तल्लोक इति ।
माध्यमिकपक्षखण्डनम्
अस्तु तर्हि शून्यतैव परमं निर्वाणमिति चेत्, न, सा हि
यद्यसिद्धा, कथं तद्विशेषमपि¹ विश्वमभिधीयते ? वाङ्मात्रस्य
सर्वत्र सुलभत्वात् । परतश्चेत् सिद्धा, परोऽप्यभ्युपगन्तव्यो
ग्राह्यलक्षणं चावर्जनीयमिति ।
भी हो सकता है । क्योंकि जन्मसे अन्धा व्यक्ति नीलरूपका ज्ञान
और निर्वचन करनेमें यदि अशक्त है तो संसारमे सबके लिये नीलरूप
अज्ञेय और अनिर्वचनीय ही नही है ।
शून्यवाद ( माध्यमिकमत ) निराकरण ।
यहा शून्यवादी माध्यमिक शङ्का करता है कि—शून्यतामें ही परम-
शान्ति क्यों न मानी जाय ? अर्थात् हेयोपादेयरूप बाह्य जगत् और
ज्ञानका भी अभाव होनेसे द्वेष, भय और रागादिसे छुटकारा मिल
जायगा और परम शान्तिकी प्राप्ति हो जायगी—किन्तु ऐसी शङ्का नहीं
हो सकती है । क्योंकि सर्वशून्यतापक्षमें शून्यताग्राहक प्रमाणके भी
शून्य हो जानेसे शून्यताकी सिद्धि नहीं हो सकती है । यदि प्रमाणद्वारा
शून्यताकी सिद्धि न मानो, अर्थात् प्रमाणके बिना भी वाङ्मात्रसे शून्यता
की सिद्धि मानो तो समानन्यायसे शून्यताके बदले विश्व ( पूर्णता )
का ही स्वीकार क्यों न किया जाय ? क्योंकि वाङ्मात्र तो सर्वत्र
सुलभ है ।
शून्यताको यदि परत अर्थात् प्रमाणान्तरसे सिद्ध कहो तो वह पर भी
तुम्हें स्वीकार करना पडा। ऐसी परिस्थितिमे सर्वशून्यता कहो सिद्ध
हुई ? साथ ही ग्राह्यस्वरूप भी अनिवार्यरूपसे स्वीकृत करना पड़ा ।
कारण, शून्यता और प्रमाणमे तुमने विषयविषयिभावको अङ्गीकार कर
लिया। प्रमाणभूत पर भी यदि तात्त्विक न होकर संवृति अर्थात्
१ तदवशेष इति कलिकातामुद्रितपाठ ।
बाह्यार्थभङ्गवादः २११
स च परो यदि संवृतिरेव, विश्वशून्यतयोर्न कश्चिद् विशेषः,
कथं तदप्यवशिष्येत ? असंवृतिरूपश्चेत् परः, परत एव तस्य
सिद्धावनवस्था । स्वयमसिद्धश्चेत्, कथं शून्यत्वमपि साधयेत् ?
स्वतः सिद्धश्चेत्, आयातोऽसि मार्गेण१ ।
तथाहि—स्वतः सिद्धतया तदनुभवरूपम् । शून्यत्वादेव
च न तस्य कालावच्छेद इति नित्यम् । अत एव च न
देशावच्छेद इति व्यापकम् । अत एव तन्निर्धर्मकमिति
विचारास्पृष्टम्, तस्य२ धर्मधर्मिभावमुपादाय प्रवृत्तेः । अत
कल्पनामात्र हो तो विश्व और शून्यतामें कोई विशेषता नहीं रही ।
ऐसी स्थितिमें शून्यता भी कैसे बच पायेगी ?
यदि प्रमाणभूत वह पर असंवृतिरूप अर्थात् तात्त्विक हो तो उस
प्रमाणकी सिद्धि किसी अन्य प्रमाणसे माननेपर उसकी भी किसी अन्यसे
और उसकी भी किसी अन्यसे सिद्धि होगी, इस प्रकार अनवस्थादोष
हो जायगा । यदि वह शून्यताका साधक प्रमाण स्वयं ही असिद्ध हो तो
वह शून्यताको भी कैसे सिद्ध कर सकेगा ? यदि उस प्रमाणकी
सिद्धिको अनवस्थाभयसे परतः न मानकर स्वतः मानो तो अब तुम
रास्ते पर आगये । अर्थात् इस पद्धतिसे वेदान्तका स्वयप्रकाश ब्रह्मा-
द्वैत पक्ष ही निर्दोष है ।
कारण, स्वतःसिद्ध (स्वप्रकाश) होनेसे वह (ब्रह्म) ज्ञानस्वरूप
है । सम्पूर्ण प्रपञ्चके शून्यरूप होनेके कारण काल और कालोपाधियोंके
भी असत् होनेसे वह कालविशेषसे अवच्छिन्न (सीमित) नहीं है, इसी-
लिये वह नित्य है। और प्रपञ्चशून्यताके कारण ही देशकृत परिच्छेद
भी नहीं हो सकता है, इसीलिये वह व्यापक है । शून्यताके कारण ही
वह निर्धर्मक (धर्मशून्य) होनेसे विचारका भी विषय नहीं है ।
क्योंकि जहाँ धर्मधर्मिभाव होता है, वहीं विचारकी प्रवृत्ति होती है ।
निर्धमक होनेके कारण ही वैधर्म्यरूप विशेषका अभाव होनेसे कहीं
१ वेदान्तनयेन इत्यर्थः ।
२ तस्य = विचारस्य ।
२१२ आत्मतत्त्वविवेके
एव विशेषाभाव इत्यद्वैतम्, प्रपञ्चस्यापारमार्थिकत्वाच्च ।
निष्प्रतियोगिकमिति विधिरूपम् । अविचारितप्रपञ्चापेक्षया
तु शून्यमिति व्यवहारः ।
तथापि प्रपञ्चशून्यस्यानुभवमात्रस्य प्रपञ्चेन सह कः
सम्बन्धः ? न च नायं प्रकाशत इति चेत्, वस्तुगत्या न
कश्चित् । संवृत्या तु गगनगन्धर्वनगरयोराधाराधेयभाव इव
विषयविषयिभावः । स च यथा नैयायिकैः समर्थयिष्यते तथैव ।
वेद्यनिष्ठस्त्वसावस्मिन् दर्शन इति विशेषः । अविद्यैव हि
उसका अन्योन्याभाव नहीं है तथा वह अद्वैत ब्रह्मरूप है । जगत्प्रपञ्च
के अवास्तविक होनेके कारण ही उसका कोई प्रतियोगी नहीं है । इसी
लिये उसमे किसीका भेदरूप निषेध नहीं प्राप्त होनेसे वह अद्वैततत्त्व
निषेधात्मक न होकर विधिरूप है । "शून्यम्" यह व्यवहार तो सत्
या असतरूपसे अनिर्वचनीय घटपटादि प्रपञ्चकी दृष्टिसे है न कि
अद्वैतब्रह्मकी दृष्टिसे । अर्थात् अनुभवात्मक अद्वैततत्त्वके अतिरिक्त
कुछ नहीं है, यही शून्यताका अर्थ है ।
( प्रश्न ) फिर भी जब प्रपञ्च कोई वस्तु ही नहीं है, तो प्रपञ्चसे
शून्य केवल अनुभवमात्रका प्रपञ्चसे क्या सम्बन्ध है ? यह बताना
होगा । क्योंकि यह प्रपञ्च नहीं भासित होता है, ऐसी बात नहीं है ।
( समाधान ) ऐसे प्रश्नका यही उत्तर होगा कि प्रपञ्चके मिथ्यारूप
होनेके कारण उसके साथ अनुभवका वस्तुत कोई सम्बन्ध नहीं है ।
काल्पनिक दृष्टिसे तो जैसे गगन और गन्धर्वनगरका परस्पर आधाराधेय-
भाव सम्बन्ध होता है, वैसे ही प्रपञ्च और अनुभवका विषयिविषयभाव
सम्बन्ध है । विषयविषयिभाव क्या है ? यह तो जैसा नैयायिकोंने
माना है, वैसाही है । किन्तु वह सम्बन्ध न्यायमतमे विषय और ज्ञान
उभयनिष्ठ होता है, किन्तु इस ( वेदान्त ) दर्शनमें तो वह सम्बन्ध केवल
वेद्य ( विषय ) निष्ठा है और वेद्य प्रपञ्चके साथ ही निवृत्त हो जाता
है । यही विशेषता है । अविद्या ही जैसे जैसे परिणत होती रहती
है, जैसे जैसे घटपटादि विषयोंका अनुभाव्यरूपमें व्यवहार होता रहता
बाह्यार्थभङ्गवादः २१३
तथा तथा विवर्तते यथा यथाऽनुभाव्यतया¹ व्यवह्रियते ।
तत्तन्मायोपनीतोपाधिभेदाच्चानुभूतिरपि भिन्नेव व्यवहारपथ-
वतरति गगनमिव स्वप्नदृष्टघटकटाहकोटरकुटीकोटिभिः ।
तदास्तां तावत्, किमार्द्रकवणिजो वहित्रचिन्तया ?
है । अर्थात् अनादि अविद्यावश घटपटादिकोंमें तथा घटज्ञान पटज्ञान
आदिमें भेदकी प्रतीति होती है । एवं मायाद्वारा उपस्थापित उस उस
उपाधिके भेदसे ही एक भी अनुभव भिन्न-भिन्नरूपमें व्यवहृत होता है ।
जैसे एक ही आकाश स्वप्नमें देखे गये घट कटाह कोटर कुटी आदि
अनेक रूपोंमें भासित होता है ।
अब वेदान्तकी चर्चा स्थगित रहे । क्योंकि आदीके बनियाको
जहाजकी चिन्तासे क्या लाभ ? अर्थात् शून्यवादके खण्डनके लिये
न्यायदर्शन ही पर्याप्त होगा । अतः यहाँ वेदान्तके उपयोगकी आवश्यकता
नहीं है ।²
१ अनुभवनीयतया इति ३ पु० पा० ।
२ जिन युक्तियोंसे वेदान्त शून्यवादका खण्डन करेगा, उन्हीं युक्तियोंसे न्याय
भी खण्डन कर सकता है । क्योंकि सर्वथा असिद्ध भी शून्यता यदि
मान्य हो तो व्यवहारद्वारा सिद्ध पूर्णताने क्या अपराध किया है कि
वह न मानी जाय । यदि शून्यताको अनुभवबलसे मानो तो अनुभव
उसके विपरीत ही बताता है । क्योंकि स्वप्नमे भी शून्यताका अनुभव
किसीको नहीं होता है । एवं शून्यता क्या वस्तु है ? यह बताओ । यदि
कहो कि अभाव ही शून्यता है, तो सामान्यतः भावके साथ उसका कोई
विरोध नहीं है ।
यदि सार्वकालिक अभावको शून्यता कहो तो भी विरोध नहीं है ।
क्योंकि हमेशा किसी न किसीका कहीं न कहीं अभाव न्याय भी मानता
है । यदि कहो कि सर्वत्र अभाव शून्यता है, तो भी कोई विरोध
नहीं है, क्योंकि एक सम्बन्धसे सत्ता होनेपर भी अन्य सम्बन्धसे उसकी
असत्ता मानी ही जाती है । यदि कहो कि सभी सम्बन्धोंसे सर्वदा
सर्वत्र अभाव शून्यता है, तो किसका अभाव है, यह बताओ । यदि
सबका सर्वदा सर्वत्र अभाव शून्यता मानो तो सब काल, देश, सम्बन्ध
२१४ आत्मतत्त्वविवेके
तस्मादनुभवव्यवस्थितौ अनात्माऽपि स्फुरतीत्यवर्जनीय-
मेतत् । तत्सिद्धौ तल्लक्षणमपि किञ्चिदस्त्येव । तच्च बाह्या-
विरोधे ज्ञानानित्यतायां तन्निष्ठमुभयनिष्ठं वा, बाह्यविरोधे ज्ञान-
निष्ठमेव । तन्नित्यतायां तु ग्राह्यनिष्ठमेवेति ।
तथाहि, लक्ष्यस्तावदत्र विषयविषयिभावः । स च प्रका-
इसलिये अनुभवबलसे यह अनिवार्य है कि ज्ञानभिन्न भी भासित
होता है । अर्थात् कोई अनुभव "इदं नीलम्" ऐसा होता है और कोई
अनुभव तो "इमे नीलपीते परस्परं भिन्ने" ऐसा होता है । इस प्रकारकी
विभिन्न अनुभवकी व्यवस्था केवल विज्ञानवादसे नहीं हो सकती है ।
अतः ज्ञानसे भिन्न विषयका भी भान मानना आवश्यक है ।
एव बाह्यार्थकी ग्राह्यता सिद्ध होनेपर उसका नियामक भी कुछ
(विषयविषयिभाव सम्बन्ध ) होगा ही । और वह नियामक बाह्यवस्तु
की पारमार्थिकताकी दशामे तथा ज्ञानकी अनित्यतापक्षमे ज्ञाननिष्ठ
अथवा ज्ञान-अर्थ उभयनिष्ठ होगा । बाह्यार्थके निषेधकी दशामे योगा-
चारमतानुसार ज्ञाननिष्ठ ही होगा तथा वेदान्तमतानुसार ज्ञाननित्यत्व-
पक्षमे तो बाह्यवस्तुनिष्ठ ही होगा । क्योंकि उस नियामकके आविद्यक
होनेसे वह परमार्थभूत ज्ञानात्मक ब्रह्ममें स्थित नहीं हो सकता । साथ
ही ज्ञानके नित्य होनेके कारण सदैव “अहं घटं जानामि” ऐसा
अनुव्यवसाय होने लगेगा ।
इस न्यायमे विषयविषयिभाव ही वह नियामक है । और वह एक
प्रकारका स्वभावविशेष है, जो सद्भूत प्रकाश (ज्ञान) में विषय-
सम्बन्धित्वमात्ररूप है । अभिप्राय यह हुआ कि ज्ञानके निराकार
होनेसे विषयके द्वारा ही ज्ञानका निरूपण सम्भव है । अतः विषयनिरूप-
णीयता ही ज्ञानगत तदीयता अर्थात् विषयसम्बन्धिता है, और वही
न्यायानुसार विषयविषयिभाव है, जो ज्ञाननिष्ठ माना गया है ।
तथा प्रतियोगियोंको मानते हुए भी शून्यता बताना यह बहुत बडा
आश्चर्य है । ज्ञानगत विषयसम्बन्धित्ताके स्वाभाविक होनेके कारण ही
उसके लिये भी स्वभाव ही नियामक है, किसी अन्यकारणकी अपेक्षा
नहीं है ।
शस्य सतस्तदीयतामात्ररूपः स्वभावविशेषः । स्वभावत्वादेव
च नोपकारान्तरमपेक्षते, तन्मात्रीयत्वादेव च नान्यदीयः ।
किमस्य फलमिति प्रश्नप्रसङ्गेऽपि बहिस्तद्गोचरव्यवहार-
प्रवृत्तिरान्तरमपि तेन ज्ञाननिरूपणम् । कुतोऽयमीदृगित्त्यनु-
योगेऽपि सामग्रीशक्तिरेवोत्तरं कार्यकारणवत् । अन्यथा
तत्राप्युपकारान्तरापेक्षायामनवस्था, तदनपेक्षायां (वा) साधा-
एवं तज्ज्ञानमे तन्मात्रका सम्बन्ध होनेसे ही उस ज्ञानमे विषया-
न्तरके सम्बन्धका आपादन भी नहीं किया जा सकता है । अर्थात्
“प्रकाशस्य सत तदीयतामात्ररूप स्वभावविशेषो विषयविषयिभाव”
इस निर्वचनमे प्रकाश ( ज्ञान ) को सत् कहनेसे उसकी शून्यताका
निराकरण होकर भावरूपता सिद्ध होती है । तदीयतापदसे छप्रत्यय-
द्वारा घटज्ञान पटज्ञान यहाँपर ज्ञानमे घटपटादिका विषयितारूप सम्बन्ध
सूचित होता है । तदीयतामात्र यहाँ मात्रपदसे घटज्ञानमे पटविषयिता
तथा पटज्ञानमें घटविषयिताके प्रसङ्गका निवारण होता है । एवं “स्वभा-
वविशेषः” यहाँ स्वभावपदसे सूचित होता है कि ज्ञानगत विषयकी
विषयिता किसी कारणके अधीन नहीं है किन्तु स्वाभाविक है । इसी
प्रकार विशेषपदसे “ज्ञानाभाव तथा ज्ञानसमवाय” यहाँ पर अभावके
साथ तथा समवायके साथ ज्ञानका स्वरूपसम्बन्ध होनेपर भी विषय-
विषयिभावका वारण किया जाता है ।
इस विषयविषयिभाव सम्बन्धका फल क्या है ? ऐसे प्रश्नके प्रसङ्गमें
भी यही उत्तर होगा कि बाहरमें उस विषयसे सम्बद्ध ग्रहण-परित्यागादि
व्यवहारोंमे प्रवृत्त कराना और देहके अन्दर उसके द्वारा ज्ञानका निरूपण
कराना । अर्थात् ज्ञानके निराकार होनेके कारण विषयके सम्बन्धसे ही
उसके स्वरूपका निरूपण संभव है ।
ज्ञानका नियतविषयसम्बन्धितारूप यह स्वभाव भी कैसे होता
है ? ऐसा प्रश्न होनेपर भी सामग्रीकी स्वाभाविक शक्ति ही उत्तर होगा ।
जैसे कि कार्यकारणभावस्थलमें होता है । अन्यथा नियत कार्य पैदा
करनेमें कारणगत स्वाभाविक शक्ति न मानकर किसी अन्य नियामककी
अपेक्षा करनेपर उसका भी कोई अन्य नियामक तथा उसका भी कोई
२१६ आत्मतत्त्वविवेके
रण्यं केन वार्यम् १ । तेन तदेव क्रियते, अनेनाप्येतदेव विषयी-
क्रियत इति विवेचनीयम् ।
विषयीक्रियत इति कोऽर्थः ? क्रियत इत्यपि कोऽर्थः ?
इति विचारणीयम् । कार्योत्पादनमेव करणम्, तदीयतोत्प-
त्तिरेव विषयीकरणमिति विवेचनीयम् । उपकारस्तु यथाऽत्र
विज्ञानस्वरूपातिरिक्तो नास्ति, तथाऽत्रापि कार्यस्वरूपाति-
रिक्तो नास्तीति प्रतिसन्धेयमिति ।
अतएव कार्यकारणभावोऽप्युपेक्षितव्य इति तु महत् साह-
अन्य नियामक मानना पड़ेगा । इस प्रकारकी परम्परामे अनवस्थादोष
आ जायगा । एवं यदि स्वभाविक शक्ति भी न मानो तो और कोई
नियामक भी न मानो तो अन्य कारणोंसे अन्यकार्योंकी उत्पत्ति कैसे
रोकी जा सकती है ?
यदि कहो कि—उस कारणद्वारा वही कार्य किया जाता है, अत
साधारण्यदोष नहीं आ सकता—तो इस ज्ञानद्वारा भी यही अपना विषय
बनाया जाता है, यह भी समझना चाहिये । अर्थात् ज्ञानविशेषके द्वारा
विषयविशेषका ही विषयीकरण होता है, अत एकविषयके ज्ञानमें
विषयान्तरसम्बन्धिताका प्रसङ्ग नहीं आ सकता । यदि पूछो कि—
विषयीकरणका क्या अर्थ है ? तो करणका भी क्या अर्थ है ? यह
विचारणीय है । यदि कहो कि—कार्यका उत्पादन ही करण है—तो
ज्ञानमे तदीयताकी उत्पत्ति ही विषयीकरण, यह समझना चाहिये ।
साथ ही विषयकृत ज्ञानगतविषयितारूप उपकार भी जैसे यहाँपर ज्ञान-
स्वरूपसे अतिरिक्त वस्तु नहीं है, वैसे वहाँ भी कारणकृत कार्यगत करण
रूप (उत्पादनरूप) उपकार भी कार्यस्वरूपसे अतिरिक्त वस्तु नहीं है,
यह ध्यान देने की चीज है ।
इसीलिये विषयविषयिभावके समान कार्यकारणभाव भी उपेक्षणीय
है—यह कथन भी बहुत बड़ा साहस है । अर्थात् "नियतकार्यके उत्पादन
१ वार्येत इति ३ पु० पा० ।
तृतीय परिच्छेद: गुण-गुणी-भेद विचार एवं प्रत्यक्ष-स्मृति उपपत्ति
बाह्यार्थभङ्गवादः २१७
सम् । तथा सति हि स्यादेव न स्यादेवेत्याद्यापद्येत । तथा
च प्रकाशतमसोरन्यतरस्य कौटस्थ्यप्रसङ्गः । संवृतोऽस्त्विति¹
चेत्, विषयविषयिभावोऽप्येवमस्तु । यदि विषयकार्ययोर्बलवती
बाधेति संवृतः, नो चेदेव²मिति द्वयी गतिः ।
तदत्र तत्त्वम्—न तावदुभयनिष्ठं लक्षणम्, सतोऽसतो वा
स्थिरस्यापि स्फुरणात् । न च ज्ञाननित्यतायां पारमार्थिक-
के लिये कारणप्रगत उपकारान्तर ( प्रयोजकान्तर ) की अपेक्षा होनेपर
अनवस्था और उसकी अनपेक्षा माननेपर साधारण्यदोषके कारण ही
कार्यकारणभाव भी नहीं मानना चाहिए" इस प्रकारका कथन तो
दुःसाहस है । क्योंकि कार्यकारणभावका बहिष्कार देनेपर तो कार्य या
तो नित्य ही होता रहे अथवा बिल्कुल न होवे । अर्थात् संसारके सभी
पदार्थ नित्य होंगे या मिथ्या होने चाहिये । ऐसे ही विषयविषयिभावका
बहिष्कार करनेपर प्रकाश और अन्धकारमें कोई एक कूटस्थ नित्य होने
लगेगा । अर्थात् ज्ञानको यदि विषयनिरपेक्ष होनेसे अनादि मानो तो
ज्ञानमे कूटस्थत्व ( सदातनत्व ) आजायगा तथा यदि मिथ्या मानो तो
ज्ञानका अभाव ही कूटस्थ हो जायगा । इस प्रकार क्षणिकविज्ञानवाद
उभयथा ध्वस्त हो जाता है ।
यदि कहो कि—कार्यकारणभावका सर्वथा अपलाप नहीं किया जा
रहा है किन्तु वह संवृत ( व्यावहारिक ) मात्र है—तो विषयविषयिभाव
भी वैसे ही व्यावहारिक होवे । इसलिये विषयविषयिभावमें और
कार्यकारणभावमे यदि बलवान् बाधक होगा तो दोनो ही सांवृतिक होंगे,
अन्यथा दोनों ही वास्तविक होंगे ।
यहाँ यह निष्कर्ष है कि विषयविषयिभावरूप नियामक बौद्धमता-
नुसार विषय और ज्ञान उभयनिष्ठ नहीं हो सकता है । क्योंकि भाव या
अभावभूत स्थिर पदार्थका भी भान होनेसे उभयनिष्ठताकी दशामें विषय
के स्थिर होनेसे तत्सद्भूत ज्ञान भी स्थिर होने लगेगा । "ज्ञानके नित्य
होनेके कारण विषयविषयिभावको ज्ञाननिष्ठ माननेपर सदा व्यवहारका
१ सांवृतोऽस्तु कार्यकारणभाव इत्यर्थः ।
२ वास्तवमित्यर्थः ।
२१८ आत्मतत्त्वविवेक
बाह्यनिष्ठम् सत्कार्यवादव्यावृत्तेः सांख्यप्रक्रियाविध्वंसात् ।
न खलु पूर्वापर ( पूर्व ) तिरोभावाविर्भावान्तरेण विचारस्या-
प्यवसरः । नाप्यलोकग्राह्यतया क्षणिकज्ञाननिष्ठमिति, तुच्छस्य
विशेषाभावात्, ज्ञानस्य च निराकारत्वात्, अन्यत्राप्य ( प्र )
सिद्धेरारोपयितुमशक्यत्वात् ।
असन्त एव विशेषावभासकास्सन्तीति चेन्न, असन्त इति
ह्यतत्काला अतद्देशा इति वा ? अकिञ्चिद्रूपा इति वा ?
प्रसङ्ग होने लगेगा । अत आविर्भाव और तिरोभाव स्वभाववाले विषय
में ही स्थित विषयविषयिभाव होगा" यह सांख्यमत भी ठीक नहीं है ।
क्योंकि सत्कार्यवादक निराकरण हो जानेसे सांख्यकी यह प्रक्रिया भी
ध्वस्त है । क्योंकि पूर्वके विनाश और उत्तरकी उत्पत्तिके बिना प्रस्तुत
विचारका भी अवसर नहीं आ सकता है । अर्थात् ज्ञानके नित्य मानने
पर उसका उत्पाद और विनाश नहीं हो सकेगा । अत विपरीत पूर्व
ज्ञानकी निवृत्ति और यथार्थ उत्तरज्ञान की उत्पत्तिके लिये किया जाने
वाला यह विचार भी निष्फल हो जायगा ।
ग्राह्यविषयोंक अलीक होनेसे क्षणिकविज्ञाननिष्ठ भी विषयविषयि-
भाव नहीं हो सकता । क्योंकि विषयके तुच्छ होनेसे विषयकृत तथा
ज्ञानके निराकार होनेसे आकारकृत विशेषता ज्ञानोंमे नहीं आ सकती ।
अत नीलज्ञान और पीतज्ञानमे परस्पर विशेषताकी प्रतीति नहीं हो
सकेगी । साथ ही जो अन्यत्र कहीं प्रसिद्ध नहीं हैं, उसका आरोप भी
नहीं हो सकता । अत आरोपित नीलपीतादिके द्वारा भी ज्ञानोंमे
विशेषता नहीं आ सकती है ।
यदि कहो कि—असत्ख्यातिवादके अनुसार नीलपीतादि असत होते
हुए भी ज्ञानोंमे विशेषाधायक होंगे । जैसे, अतीत और अनागत वस्तु
वर्तमानमें असत् होती हुई ही ज्ञानकी विशेषिका होती है—तो ऐसा
नहीं कह सकते हो । क्योंकि असत्का क्या अर्थ है ? क्या जो तत्का-
लीन और तद्देशीयसे भिन्नरूप है, उसे असत् कहते हो ? या जो
अकिञ्चिद्रूप हैं, वह असत् है ? अथवा कोई नियत व्यावृत्तिमात्रस्वरूप