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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 530 में से

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पृष्ठ 256

ऽनिष्फलत्वाच्च । न ह्यस्यातिप्रवृत्तिः फलम्, गगनास्वादने-
नातृप्तेः, ज्वाला (अलीक) कलापालिङ्गनेन तापानपनोदनात् ।
नाप्यतिनिवृत्तिः, जडीभावमात्रेऽप्युपनिपातिदुःखानिवृत्तेः ।
न च दुःखमपि विचारासहमित्यहेयमेव, तथाविधस्य-
तापनिवृत्तिके उद्देश्यसे ज्वालासमूहके आलिङ्गनमे भी प्रवृत्ति होने
लगेगी । किन्तु उससे तापकी निवृत्ति हो नहीं सकती । यहाँ पूर्वपक्ष
का अभिप्राय यह है कि जब तात्त्विकदृष्टिसे सब अलीक है तो समानरूप
से अर्थात् अलीकत्वाविशेषात् किसी भी उद्देश्यकी प्राप्तिके लिये कहीं
भी प्रवृत्ति हो सकती है । ऐसा नहीं कि तृप्ति चाहनेवाला व्यक्ति नियत-
रूपसे भोजनादिमे ही तथा दुःखकी निवृत्ति चाहनेवाला मोक्षार्थी किसी
खास साधनमें ही प्रवृत्त होवे । यही अतिप्रवृत्ति इस विचारारम्भका
फल हुआ । यहाँ उत्तरपक्षका आशय तो स्पष्ट है । अतिनिवृत्ति भी
विचारारम्भका फल नहीं हो सकता है । अर्थात् यह भी नहीं हो
सकता कि इस विचारद्वारा सबको अतात्त्विक समझता हुआ मुमुक्षु
सबसे निवृत्त होकर दुःखसे छुटकारा पा जायगा । क्योंकि सबसे
निवृत्त होकर जडवत् बन जानेपर भी दैवात् आनेवाले दुःखोंसे पिण्ड
नहीं छूट सकता है ।
यह भी नहीं कह सकते कि—दुःख भी अतात्त्विक है, अतः वह
अहेय (अत्याज्य) ही है । अर्थात् अतिनिवृत्ति ही विचारका फल
है । तथा जडीभूतको दुःख तब अनिष्ट होता, यदि वह तात्त्विक होनेसे
हेय होता । किन्तु वह तो अतात्त्विक होनेसे हेय भी नहीं है—क्योंकि
हेयोपादेयरहितव्यक्तिका विचारमें भी अधिकार नहीं है । अर्थात्
सबकी प्रवृत्ति दुःखहानिके लिये या सुखप्राप्तिके लिये होती है, और
वह उसके लिये ही विचारमें प्रवृत्त होता है । जिसके लिये न
कोई हेय है और न कोई उपादेय है, उसके लिये तो विचार भी
निष्प्रयोजन ही है ।
यह भी नहीं कह सकते कि—लोकानुसार व्यवस्था ही विचारका
फल है । अर्थात् लोकसिद्ध पदार्थोंके अलावे कोई तात्त्विक नहीं है—