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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 257, कुल 530 में से

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पृष्ठ 257

२०८ आत्मतत्त्वविवेके
विचारेऽप्यनधिकारात् । नापि यथालोकं व्यवस्थितिः,
विचारात् प्रागपि तस्याः पामरादिवदयत्नसिद्धेः ।
नापि परलोकमात्रान्निवृत्तिः, तस्यैहिकतुल्यत्वात् ।
दृश्यते हि तावदयमिति चेन्, यदि ज्ञानवचनो दृशिस्तदा परो-
ऽपि तथा । साक्षात्कारवचनश्चेन्न, इहैवानुमानादेरप्रवृत्ति-
प्रसङ्गः । तदपि प्रत्यक्षमिति चेत्, ❀ आमुष्मिकमपि प्रत्यक्षमेव,
क्योंकि पामरोंकी तरह तुम्हारे लिये भी विचारके पहले ही लौकिक
व्यवस्थायें अनायास सिद्ध हैं ।
यह भी नहीं हो सकता कि—स्वर्ग या नरकरूप परलोकमात्रमें
निवृत्ति विचारका फल है । अर्थात् विचारद्वारा अनात्मताका ज्ञान
होनेसे स्वर्गके लिये यागादिमें प्रवृत्ति तथा नरकसे बचनेके लिये हिंसादि
से निवृत्ति नहीं होगी—क्योंकि पारलौकिक भी ऐहिकके ही तुल्य है ।
इसलिये स्वर्ग और नरकके समान लोगोंकी चन्दन और कण्टकमें भी
प्रवृत्ति और निवृत्ति नहीं होनी चाहिये ।
यदि कहो कि—इस लोकका तथा इसके सुखदुःखका तो दर्शन होता
है, इसलिये ऐहलौकिक वस्तुओंमें प्रवृत्ति निवृत्ति होनेमें कोई बाधा
नहीं है—तो यहाँ दर्शनका अर्थ यदि ज्ञान मानते हो तो परलोकका भी
ज्ञान होता ही है । यदि दर्शनसे साक्षात्कार अर्थ मानो तो इसी लोकमे
अनुमानादिसे प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिये । किन्तु वह्निका अनुमान
करके भी उसके आनयनमे प्रवृत्ति देखी जाती है ।
यदि कहो कि—लौकिक वह्नयादि और उससे होनेवाला सुखदुःख
तो इन्द्रियसन्निकर्षदशामें प्रत्यक्ष ही है, क्योंकि सुखत्वदुःखत्वरूप
लक्षण लौकिकपारलौकिक सभी सुखदुःखोंमें तुल्य है । अर्थात् एक जगह
सुखत्वादि जातिका प्रत्यक्ष होनेपर सामान्यलक्षणाप्रत्यासत्तिद्वारा उस
जातिसे युक्त सभी सुखदुःखोंका प्रत्यक्ष हो जाता है ।
❀ एतच्चिह्नान्तर्गतः पाठः टीकाग्रन्थानुरोधेन संयोजितः, कलिकातामुद्रित-
पाठस्त्वत्रत्यो विशृङ्खल इति मन्तव्यम् ।