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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 250, कुल 530 में से

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पृष्ठ 250

एतेन द्वितीयः पक्षः प्रत्युक्तः । न हि सजातीयत्वेन
ग्राह्यलक्षणवैधुर्यमुत्सार्यते, अतिप्रसङ्गस्य तादवस्थ्यात् ।
जडत्वे प्रकाशासम्भवेनेति चेत्, न, तुल्यत्वात् । यथा
तथा ज्ञानाभेदको साध्य करनेमे ज्ञानवृत्ति 'यावद्धर्मवत्त्व उपाधि है,
इसलिए सोपाधिक होनेमे व्याप्यत्वासिद्धि हुई । एवं प्रकाशमानत्वादि
हेतुके अलीक भेदमे भी चले जानेके कारण साधारण व्यभिचार हुआ ।
अथवा पूर्वोक्त रीतिसे सपक्ष विपक्ष दोनों ही से प्रकाशमानत्व हेतुके
व्यावृत्त होनेके कारण असाधारण व्यभिचार हुआ । एवं सभी पदार्थको
पक्ष माननेके कारण अनुपसंहारीनामक व्यभिचार दोष हुआ ।
इससे द्वितीयपक्ष भी खण्डित हो जाता है । अर्थात् लक्षणका
अभाव होनेसे नीलादि विषय जैसे ज्ञानसे अभिन्न नहीं सिद्ध होता,
वैसे ही यह ज्ञान से अभिन्नजातीय भी नहीं सिद्ध हो सकता है ।
क्योंकि सजातीय माननेसे भी नीलादिमे ग्राह्यलक्षणका अभाव नहीं
हटता है । कारण, सजातीय ही यदि ग्राह्य हो तो तुम्हारे मतानुसार
घटपट आदि सभी विषय एकसा ज्ञानके सजातीय हैं । इसलिये
जिस ज्ञानमें पट विषय हो रहा है, उसमें घट भी अनिवार्यतः विषय
होने लगेगा । इसप्रकार अतिप्रसङ्ग दोष यथास्थित ही रह जाता है ।
यदि कहो कि--नीलादि-विषयको ज्ञान-सजातीय न मानकर जड़
माना जाय तो उसका प्रकाश ही नहीं हो सकता है । अर्थात् नीलादि
चूँकि प्रकाशमान होता है, इसीलिये यह ज्ञान सजातीय सिद्ध हो
१. जो साध्यका व्यापक हो और साधनका अव्यापक हो, उसे उपाधि
कहते हैं । प्रकृतमे नीलादि-विषयमे ज्ञानाभिन्नत्व साध्य है और प्रकाश-
मानत्व हेतु है । जो जो ज्ञानाभिन्न होता है, उस उसमे ज्ञानवृत्ति-
यावद्धर्मवत्त्व होता है । इसप्रकार ज्ञानवृत्तियावद्धर्मवत्त्व उपाधि साध्य-
व्यापक हुआ । तथा जो जो प्रकाशमान हैं, उस उसमे ज्ञानवृत्तिया-
वद्धर्मवत्त्व नही रहता, जैसे घटादिमे । अतः साधनाव्यापक भी हुआ ।
इसप्रकार प्रकृत अनुमानमे ज्ञानवृत्तियावद्धर्मवत्त्वके उपाधि होनेसे
यहांका हेतु सोपाधिक होकर व्याप्यत्वासिद्ध हुआ ।