आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतुल्यलक्षणत्वात् । अरुचेरेव तत्र न प्रवृत्तिरिति चेत्, तथापि
किं विचारेण ? तमन्तरेणापि तस्याः सुलभत्वात् । तामेवायं
पुष्णातीति चेत्, अविशेषादिहापि पुष्णीयादिति ॐ
सोऽयं पवनतनयवार्तामुपश्रुत्य तत्स्पर्द्धया बालवानरः
कियदपि दूरमुत्प्लुत्य महार्णवे पतितः प्राह—अपार एवायम-
कूपारो मिथ्या रामायणमिति¹ ।
तत् किमनेन ? एवं ज्ञातुं निर्वक्तुं वा न शक्यते कीदृशं
जगदित्येतावन्मात्रमपि पामरदशावन्निष्फलमेव । न हि
निष्फलत्वेऽपि श्रद्धेयमिदम्, तावत्परामर्शपाटवाभावेनाप्युप-
यदि कहो कि—स्वाभाविक अरुचिसे ही परलोकमें प्रवृत्ति नहीं
होती है—तो फिर विचारकी क्या आवश्यकता है ? क्योंकि विचार-
के बिना भी वह अरुचि अनायास सिद्ध है ।
यदि कहो कि—परलोकके प्रति स्वतःसिद्ध उस अरुचिको ही विचार
पुष्ट करता है—तो विचारद्वारा समानरूपसे इहलोकमे भी अतात्त्विकता
का ज्ञान होनेसे ऐहिक सुखसाधनोंके प्रति भी अरुचिको क्यों न पुष्ट
करे ? । इसप्रकार यह बाल-वानर महाबली हनुमान्का महासागर
लङ्घनवृत्तान्त सुनकर स्पर्धावश कुछ दूरतक उछलकर महासागरमे गिरा
हुआ बोलता है कि यह समुद्र तो अपार है और रामायणकी कथा
मिथ्या ही है, इसलिये यह महार्णव-लङ्घन निरर्थक है । अर्थात्
विचाराशक्त होनेके कारण यह बौद्ध प्रतिवादी उस बालवानरके समान
है । इस प्रकार यह न जाना जा सकता है और न दूसरेके प्रति
इसका निर्वचन ही किया जा सकता है कि कैसा यह जगत् है !
इतना विचार भी पामरदशाके समान निष्फल ही है । यह भी नहीं
कह सकते कि—निष्फल होनेपर भी इतना विचार तो श्रद्धेय ही है—
कारण, ज्ञान या निर्वचन न कर सकना तो विचारमें अपटुताके कारण
१ रामायणी कथा—इति ३ पु० पा०
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