आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाह्यार्थभङ्गवादः २०५
सत्त्वे। तदेव लक्षणमिति चेत्, सत्त्वमेव किं न स्यात् ?
अतिप्रसङ्गादिति चेत्, तुल्यम्।
वेदनाधीनव्यवहारगोचरत्वमिति चेत्, अस्तु तावदिदम्,
तस्यैवेति तु नियमः कुतः? सामग्रीतस्तथा वेदनोत्पत्तिरिति
चेत्, तदेतत्, सम्भाव्यते सति, न त्वसतीति विशेषः। यथा
हि सति ज्ञानेनाभिलापः, तेन यत्नः, तेन प्रवृत्तिः, तया
तत्प्राप्तिः क्रियते, न तथाऽलीके, तस्य प्राप्तुमशक्यत्वात्,
शक्यत्वे वाऽनलीकत्वात्।
व्यवहारोऽप्ययमलीक इति चेत्, तर्हि सुतरा लक्षणाभावः,
तद्द्वारस्याप्यभावात्।
ज्ञान होनेपर सत्के नाते अन्य सभी सत्पदार्थोंका भान होने लगेगा,
वैसे ही असत्को ग्राह्यका लक्षण माननेपर भी किसी एक असत्का ज्ञान
होनेपर असत्के नाते भी अन्य सभी असत्पदार्थोंका भी भान होने
लगेगा। इस प्रकार दोनों ही पक्षोंमें समान न्याय है।
यदि कहो कि—ज्ञानजन्यव्यवहारविषयत्व ही ग्राह्यका लक्षण है,
अर्थात् ज्ञानके कारण ही जिसका व्यवहार होता है, उसे ग्राह्य कहते हैं—
तो यह लक्षण भले ही हो, किन्तु घटज्ञानसे घटका ही व्यवहार होगा,
यह नियम कैसे रहेगा ? यदि कहो कि—सामग्रीगत सामर्थ्यका ही ऐसा
प्रभाव है कि उस वस्तुके ज्ञानसे उसी वस्तुका व्यवहार होगा दूसरे
का नहीं—तो यह सामर्थ्य भी सत्पदार्थमे ही सम्भव है न कि असत्मे,
यह विशेषता है।
जैसे कि—सद्वस्तुमें ज्ञान होनेपर इच्छा होती है, इच्छासे प्रयत्न,
प्रयत्नसे प्रवृत्ति तथा प्रवृत्ति होनेपर उस वस्तुकी प्राप्ति हो जाती है, वैसे
अलीक (असन्) वस्तुमे नही होता। क्योंकि उसमे ज्ञान इच्छादिके
होनेपर भी उस मिथ्यावस्तुकी प्राप्ति नहीं की जा सकती है। अर्थात्
प्राप्त हो सकने वाली वस्तु सत् ही होगी।
यदि कहो कि—यह ज्ञान-इच्छा-प्रयत्न-प्रवृत्ति और प्राप्तिरूप