आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाह्यार्थभङ्गवाद [२०३]
सामग्रीसामर्थ्यमेव वक्तव्यम्, अन्यथा तथाविधकार्यानुत्पत्तेः ।
तथा च बाह्यग्राह्यनियतस्वभावज्ञानोत्पत्तावपि सुलभमेतदिति
पूर्वक्त एव दोषः ।
अस्तु तर्हि तृतीयः, सर्वथा ग्राह्यलक्षणानुपपत्तेः । तद-
भावे सामग्रीसामर्थ्यस्याप्याश्रयितुमशक्यत्वात् । विचारसिद्धे
हि वस्तुनि कारणचिन्तनावसरो न त्वविवेचित इति चेत्, कि
भिन्न भी नीलपीतादि चित्राकारोंका पारस्परिक ज्ञान हो जायगा ।
कारण, नीलपीतादि आकारोंका उपादान कारण एक ही ज्ञान है" ।
किन्तु यह कथन भी ठीक नहीं है । क्योंकि परमार्थत भिन्नोंका
भी पारस्परिक ज्ञान होनेका नियामक सामग्रीगत अपनी सामर्थ्य ही
माननी पड़ेगी । वह सामर्थ्य चाहे विशेष रूपसे उपादानकारणकी हो
अथवा सामान्यरूपसे कारणमात्रकी हो । अर्थात् चित्रस्थलमे भेदमे
भी ग्राह्य ग्राहकभाव तुमने भी मान ही लिया । अन्तर इतना ही है
कि तुम उसका नियामक समानोपादान मानते हो और मैं कारणगत
सामर्थ्यविशेषको ही उसका नियामक मानता हूँ । एसा माने बिना
नियतकार्य की उत्पत्ति नहीं हो सकती है ।
इसप्रकार बाह्यवस्तुको ग्राह्य माननेमें भी उसका नियमित ज्ञान
होनेमे उक्त सामग्रीसामर्थ्य नियामक हो सकता है । अतः पूर्वोक्त
प्रकारसे यहाँ भी संदिग्धविपक्षवृत्तित्वरूप सन्दिग्धव्यभिचार दोष आ
ही जाता है । इसतरह सजातीयत्वरूप द्वितीयपक्ष भी खण्डित हो
जाता है ।
यदि कहो कि—पूर्वोक्त दोनों पक्षोंके असंभव होनेसे तीसरा पक्ष
ही मानने योग्य है । इस पक्षम ग्राह्य अंश अलीक है और ग्राहकांश
(ज्ञान) ही वास्तविक है । क्योंकि बाह्यवस्तुमे किसी भी प्रकारसे
ग्राह्य का कोई लक्षण नहीं बन सकता है । अर्थात् नीलादि ग्राह्यपदार्थको
पूर्वपद्धतिके अनुसार ज्ञानसे भिन्न या अभिन्न कुछ नहीं कह सकते ।
और ग्राह्यलक्षणके नही होनेसे ग्राह्यरूप लक्ष्य असंभव होगा । एसी
परिस्थितिमें नियतवस्तुके ग्रहणके लिये सामग्रीगत सामर्थ्यका सहारा
लेना भी अशक्य है । क्योंकि विचारद्वारा जो वस्तु सिद्ध है, उसी