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आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

क्षणभङ्गवाद ९९
कुतः पुनः स्थिरसिद्धिः ? प्रत्यभिज्ञानात् क्षणिकत्वानुप-
पत्तेश्च । लक्षणाभेदेन व्यभिचारिजातीयत्वात् प्रत्यभिज्ञा न प्रमाण-
मिति चेत् , न, अवान्तरलक्षणभेदेनाव्यभिचारनियमात् । किं
तदिति चेत् , विरुद्धधर्मासंसृष्टविषयत्वम् , सिद्धं च तदत्र ।
से भी है। तथा घटध्वंस को जैसे घटसे विरोध है, वैसे ही उसके
प्रागभावसे भी विरोध है ॥
स्थिरत्वमें साधक प्रमाण
( शङ्का ) भाववस्तु स्थिर हैं, इसमें क्या प्रमाण है ?
( उत्तर ) पूर्वोक्त प्रकारसे क्षणिकत्वका सिद्ध न हो सकना और
प्रत्यभिज्ञा प्रमाण है। अर्थात् क्षणिकत्वकी असिद्धिके सम्बन्धमे पूर्वमें
कहा जा चुका है। तथा "यह वही घडा है, यह वही आदमी है, जिसे
मैंने पहले देखा था" इस प्रत्यभिज्ञासे भी सिद्ध होता है कि घटादि
पदार्थ स्थिर वस्तु हैं। यदि क्षणिक होते तो "यह वही है" ऐसी
प्रत्यभिज्ञा (स्मृतिसंश्लिष्ट अनुभूति) न होती।
( शङ्का ) तत्तांश ( वह ) और इदमांश ( यह ) का उल्लेख करने
वाला जो ज्ञान वही प्रत्यभिज्ञाका स्वरूप ( लक्षण ) है। और यह
लक्षण वहाँ भी चला जाता है, जो स्थिर नहीं है। जैसे "यह वही
दीप है" यहाँ क्रमशः क्षयको प्राप्त होनेवाली बत्ती और तेलके समान
ज्वाला भी क्षणक्षणमे बदलती रहती है, फिर भी "यह वही ज्वाला है"
ऐसा व्यवहार होता है। उसी प्रकार "यह वही घडा है" इस प्रत्य-
भिज्ञाबलसे यह नहीं सिद्ध हो सकता कि घडा स्थिर वस्तु है। अतः
स्थिरत्वसिद्धिमे प्रत्यभिज्ञा प्रमाण नहीं हो सकती है।
( उत्तर ) उपर्युक्त शङ्का ठीक नहीं है। क्योंकि यद्यपि सामान्यरूपसे
दोनों प्रत्यभिज्ञायें एक सी मालूम पडती हैं, फिर भी दोनोंके अवान्तर
लक्षणोंमें भेद होनेसे उक्त प्रत्यभिज्ञाद्वारा स्थिरत्व सिद्ध करनेमें किसी
प्रकारका व्यभिचार नहीं आ सकता है।
यदि पूछो कि - "यह वही घडा है" इस प्रत्यभिज्ञामे तथा "यह
वही दीपज्वाला है" इस प्रत्यभिज्ञामें कौन सा अवान्तरलक्षणका भेद

१०० आत्मतत्त्वविवेके
एवम्भूतपि कदाचिद् व्यभिचरेदिति चेत्, न,
विरुद्धधर्मसंसर्गानिस्कन्दितस्यैकत्वप्रत्ययस्य व्यभिचारे सर्वत्रै-
कत्वोच्छेदप्रसङ्गात् । तथा चानेकत्वमपि न स्यादिति भव
निष्किञ्चनः ।
तस्माद् भेदप्रवृत्ताववश्यं विरुद्धधर्मसंसर्गः, तदसंसर्गे वाऽ-
वश्यं भेदव्यावृत्तिरिति भेदाभेदव्यवहारमर्यादा ।
निष्कम्पप्रदीपकुड्मलेषु निपुणं निभालयन्तोऽपि न विरुद्ध-
है ? तो कहूँगा कि घटवाली प्रत्यभिज्ञाका विषय जो घट है, वह
विरुद्धधर्मसे असंयुक्त है । तथा दीपज्वालावाली प्रत्यभिज्ञा, विरुद्धधर्मसे
संसृष्ट जो ज्वाला, उसे विषय करनेवाली है । कारण, दीपज्वालामें
कमी वेशीके तारतम्यका स्पष्ट अनुभव होता है ।
यदि कहो कि—वास्तविक प्रत्यभिज्ञा भी, सम्भव है, कदाचित् व्यभि-
चरित हो जाय । अर्थात् 'यह वही घडा है' ऐसी प्रतीति होनेपर भी
पूर्वापर घडेमें एकताकी सिद्धि न हो सकेगी—यह कथन ठीक नहीं
है । क्योंकि विरुद्ध धर्मोंके संसर्गसे असंस्पृष्ट होनेपर भी यदि उस
पूर्वापर घडेमें एकत्व न माना जाय तो संसारमें एकत्वका सर्वथा
उच्छेद हो जायगा । ऐसी स्थितिमें तुम्हारा अनेकत्व भी सिद्ध न हो
सकेगा । कारण, प्रतियोगिरूपसे कहीं एकत्व होनेपर ही उसका निषेध-
रूप अनेकत्व दूसरी जगह सिद्ध हो सकता है । इस प्रकार
एकत्वका परित्याग कर तू अनेकत्वसे भी हाथ धो बैठो और सब खोकर
दरिद्र बन जाओ ।
इसलिये जहाँ भिन्नता (अनेकत्व) है, वहाँ अवश्य ही विरुद्ध
धर्मोंका संसर्ग है । जहाँपर विरुद्धधर्मोंका संसर्ग नहीं है, वहाँ अवश्य
ही भिन्नता भी नहीं है । यही भेदव्यवहार और अभेदव्यवहारकी
मर्यादा है ।
यह कहना कि—निष्कम्प दीपकी कलियोंमें पूर्ण सावधानीसे
देखनेपर भी विरुद्ध धर्मोंका संसर्ग हम नहीं पाते हैं, फिर भी 'यह

क्षणभङ्गवादः
धर्मसंसर्गमीक्षामहे, अथ च प्रत्यभिज्ञानमवधूय तत्र भेद एव पदं
धत्त इति चेन्, कस्य प्रमाणस्य बलेन ? आश्रयनाशस्य हुताशन-
नाशहेतुत्वेन विज्ञातत्वात्, तस्य चात्र प्रतिक्षणमुपलब्धेः । वर्त्ति-
तैल योरुत्तरोत्तरमपचीयमानत्वात् पूर्वस्य नाश उत्तरोत्पादश्च
न्यायसिद्ध इति चेत्, नन्वयं प्रत्यनीकधर्मसंसर्ग एव, नष्टत्वानष्ट-
त्वयोराश्रयनाशानाशयोर्वा एकत्र तेजस्यनुपपत्तेः ।
सोऽयं शतं शिरश्छेदेऽपि न ददाति, विंशतिपञ्चकं तु
प्रयच्छतीति किमत्र ब्रूमः ।
भविष्यति तर्हीहापि विरुद्धधर्मसंसर्गो दुरूह इति चेत्, अथ न
एवायं स्फटिक इत्यत्र प्रमाणप्रतीतसंसर्गाणां विरोध आशङ्क्यते ?
वही दीपकलिका है" इस प्रत्यभिज्ञा की अवहेलना कर भेद ही अपना
पैर जमा लेता है । इसलिये "जहाँ भेद है, वहाँ अवश्य विरुद्ध धर्मोंका
संसर्ग है" यह नियम नहीं हो सकता है—ठीक नहीं है । क्योंकि
दीप कलियोंमे विरुद्धधर्मोंका संसर्ग नहीं दीखनेपर भी किस प्रमाणसे
भिन्नता मानते हो ?
यदि—आश्रयका नाश अग्निके नाशका हेतु है, यह बात प्रसिद्ध
है । और वह आश्रयनाश यहाँ प्रतिक्षण मालूम होता है । इस प्रकार
बत्ती और तैलके उत्तरोत्तर क्षीण हुए जानेसे पूर्वज्वालाका नाश और
उत्तरज्वालाकी उत्पत्ति अनुमान सिद्ध है—ऐसा कहो, तब तो यहाँ विरुद्ध
धर्मोंका संसर्ग ही सिद्ध हुआ । और इसी कारण दीपकलियाँ भी भिन्न भिन्न
सिद्ध हुईं । क्योंकि एक ही ज्वालामे नष्टत्व और अनष्टत्व अथवा उसके
आश्रयका नाश और अनाश साथ-साथ नहीं बन सकते हैं । इस प्रकार
यह प्रतिपक्षी सिर कट जानेपर भी सौ नहीं देता किन्तु अपने आप पाँच
बीस देता है, इसमे हम क्या कहें । अर्थात् दीपकलिकामे सीधे विरुद्ध
धर्मों के संसर्गको नहीं स्वीकार करता हुआ भी प्रकारान्तरसे उसे ही
स्वीकार करता है ।
( शङ्का ) वैसे ही यथार्थ प्रत्यभिज्ञास्थलमें भी घटादिमे विरुद्ध
धर्मोंका संसर्ग संभव है, जो मालूम नहीं देता है ।

तत्प्रतीतविरोधानां संसर्गः ? अथाप्रतीतस्वरूपविरोधसंसर्गा एव
केचिद् विरुद्धतया ? संसृष्टतया वेति ?
न प्रथमः, प्रागेव निराकृतत्वात् । न द्वितीयः, अयोग्याना-
मनुपलम्भबाधितत्वात् । योग्यानामपि कारणादिव्याप्यव्यापक-
विगमविलोचनव्यावर्तितत्वात् । न तृतीयः, तस्यातिप्रसञ्ज-
कतया सर्वत्रैकत्वोच्छेदप्रसङ्गादिति ।
एतेन प्रत्यभिज्ञानादेव लक्षणभागमाकृष्यानुमानेन स्थैर्य-


(उत्तर) तो यहाँ मैं पूछता हूँ कि क्या “यह वही स्फटिक है” यहाँपर
प्रमाणद्वारा जिनका एकत्र संसर्ग प्रतीत है, ऐसे सत्त्व द्रव्यत्व और
स्फटिकत्व धर्मों के विरोधकी संभावना है ? अथवा जिनका प्रमाण-
द्वारा विरोध प्रतीत है, ऐसे गोत्व-अश्वत्व आदि धर्मों के संसर्गकी
संभावना है अथवा ? जिनका स्वरूप, विरोध और संसर्ग तीनों
अज्ञात हैं, ऐसे धर्मोंका विरुद्धरूपमे होना या उनका संसृष्टरूपमे होना
संभावित है ?
इनमें प्रथम आशंकाका निराकरण पूर्वमें ही हो चुका है, जहाँ एक
ही बीजमें सामर्थ्य, असामर्थ्य, अङ्कुरकरण और अङ्कुराकरण आदिका
अविरोधीरूपम रहना सिद्ध किया गया है ।
द्वितीय आशंका (संभावना) भी नहीं हो सकती है । क्योंकि जो
विरोधी धर्म प्रत्यक्षके अयोग्य हैं, उनके संसर्गका भान सर्वथा असंभव
है । तथा प्रत्यक्षके योग्य जो गोत्व अश्वत्व आदि विरोधी धर्म हैं,
उनका भी परस्परमें कार्यकारणभाव या व्याप्यव्यापकभाव आदि न
होनेसे एकत्र संसर्ग असंभव है ।
तीसरा पक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि उसके अतिव्याप्तिदोषसे
ग्रस्त होनेके कारण सर्वत्र एकत्वका उच्छेद होने लगेगा, या सर्वत्र एकत्व
ही होने लगेगा । अर्थात् ज्ञात अज्ञात सभी धर्म या तो परस्परमे विरोधी
बन जायेंगे या अविरोधी ही बन जायेंगे ।
इस प्रकार विरुद्धधर्मसंसृष्टविषयकज्ञानस्वरूप जो यथार्थ प्रत्यभि-

सिद्धिः। तथाहि—विवादाध्यासितो भावः कालभेदेऽपि न
भिद्यते, तद्भेदेऽपि विरुद्धधर्मसंसृष्टत्वात्, यो यद्भेदेऽपि न
विरूद्धधर्मसंसृष्टो नासौ तद्भेदेऽपि भिद्यते यथा प्रतिसम्बन्धि-
परमाणुभेदेऽपि एकः परमाणुः, तथा चायं विवादाध्यासितो भावः,
तस्मात् कालभेदेऽपि न भिद्यत इति।
अत्र¹ व्याप्तौ न कश्चिद् विप्रतिपद्यते, पक्षधर्मता तु प्रसाधितैव।
क्षणिकत्वानुपपत्तिश्चानुगतव्यवहारानन्यथासिद्धेः। शब्दलिङ्ग-
ज्ञान है, उसमेंसे विरुद्धधर्मासंसृष्टत्वरूप लक्षणभागको अलगकर तथा
उसे ही हेतु बनाकर अनुमानद्वारा स्थिरत्वकी सिद्धि हो जायगी।
अर्थात् उक्त प्रत्यभिज्ञानमें जो विरुद्धधर्मासंसृष्टत्व विशेषण है, वही
स्थिरका लक्षण है। और सम्पूर्ण प्रत्यभिज्ञानको हेतु न बनाकर केवल
विशेषणांशसे ही, जो कि स्थिरका लक्षण भी है, स्थिरत्वकी सिद्धि
हो जायगी। जैसे—
विवादका विषय भाववस्तु कालभेद होनेपर भी भिन्न नहीं होती,
क्योंकि कालभेद होनेपर भी उसमें विरुद्ध धर्मका संसर्ग नहीं होता है,
जो जिसके भेदमें भी विरुद्ध धर्मसे संसृष्ट नहीं होता, वह उसके भेदमें
भी भिन्न नहीं होता, जैसे त्रसरेणुस्थलमें परस्पर सम्बद्ध परमाणुओंमें
भेद होनेपर भी एक परमाणु अपने आपसे भिन्न नहीं होता। वैसी ही
प्रकृत विवादका विषय भाववस्तु भी है, इसलिये यह भाववस्तु कालभेद
होनेपर भी भिन्न नहीं होती है।
उपर्युक्त व्याप्ति [जो जिसके भेदमें भी विरुद्धधर्मसे संसृष्ट नहीं
होता है, वह उसके भेदमें भी भिन्न नहीं होता] में किसीको विरोध
नहीं है। एवं भाववस्तुरूप पक्षमें विरुद्धधर्मासंसृष्टत्वरूप हेतुका रहना
सिद्ध ही किया जा चुका है। साथ ही भाववस्तुओंका क्षणिकत्व
असंगत भी है। क्योंकि वैसी दशामें सभी गौओंमें जो “गौ गौ”
इस प्रकारका एकाकार अनुगत व्यवहार होता है, वह नहीं हो सकेगा।
अर्थात् गोत्वरूप एक स्थिर धर्मके कारण ही उक्त प्रकारका एकाकार
१. अत्र चेति पाठो रघुनाथशिरोमणिसम्मतः।

१०४ आत्मतत्त्वविवेके
विकल्पा हि साधारणं रूपमनुपस्थापयन्तो न तृणकुब्जीकरणेऽपि
समर्था इत्यविवादम्, बाह्यार्थस्थितौ स्थिरास्थिरविचारात् ॥
तच्चालीकं वा, आकारो वा, बाह्यं वस्तु वेति त्रयः पक्षाः ।
व्यवहार होता है। अन्यथा प्रत्येक गोव्यक्तिके लिए भिन्न भिन्न प्रकारका
व्यवहार होता।
एव विभिन्नकालीन विभिन्नदेशस्थ गोओंमें यदि अनुगत एक (गोत्व
आदि) साधारण (स्थिर) धर्म न माना जाय तो शब्द लिङ्ग और
विकल्प एक तृण भी टेढा नहीं कर सकते, यह निर्विवाद है। अर्थात्
उनसे होनेवाला सामान्यविषयक ज्ञान भी नहीं हो सकेगा। यह
साधारणधर्म बौद्धद्वारा स्वीकृत विज्ञान ही है, ऐसा नहीं कहा जा
सकता। क्योंकि, विज्ञानातिरिक्त बाह्यवस्तु मानकर ही उसके स्थिरत्व
और क्षणिकत्वका विचार आरम्भ किया गया है। अर्थात् अनुगत धर्मके
बिना शब्दका अर्थके साथ सम्बन्धग्रहण नहीं हो सकता और सम्बन्ध
ग्रहण हुए बिना वाक्यार्थज्ञान नहीं हो सकता।
इसी प्रकार साधारण धर्मके बिना लिङ्ग (हेतु) और साध्यकी
परस्पर व्याप्तिका ज्ञान नहीं हो सकता और व्याप्तिज्ञानके अभावमे
साध्यका अनुमान नहीं हो सकता है।
एव "यह मेरे इष्टका साधन है" इस प्रकारके इष्टसाधनताज्ञानरूप
सविकल्पकज्ञान होनेपर प्रवृत्ति होती है, और प्रवृत्तिका विषय कोई
अभिनव वस्तु ही हुआ करती है, जिसमे प्रवृत्तिके पहले इष्टसाधनताका
प्रत्यक्ष होना अशक्य है। अतः पूर्वमे कभी जिसे इष्ट सिद्ध करते हुए
प्रत्यक्ष कर चुके हैं, उसी जातिका होनेके कारण अभिनव वस्तुमे भी
अनुमानसे ही इष्टसाधनताका ज्ञान करके उसे प्राप्त करनेके लिए हम
प्रवृत्त होते हैं। इस प्रकार स्थिरजाति माने बिना इष्टसाधनताज्ञानरूप
सविकल्पकज्ञानसे होनेवाली प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी। अतः शब्द, लिङ्ग
और सविकल्पकका सार्थकता तभी है, जब कि साधारण अनुगत स्थिर
जाति मानी जाय। ऐसी स्थितिमे क्षणिकत्व वहीं समाप्त हो जाता है॥
कीर्ति दिङ्नागसम्मत अलीकरूप निराकरण
'गौ गौ' ऐसी एकाकार प्रतीति कराने वाला यह अनुगतरूप अलीक

क्षणभङ्गवादः १०५
तत्र न प्रथमः पक्षः, तद्धि न तावदनुभवादेव तथा व्यवस्थाप्यं
तस्यालीकत्वानुल्लेखात्, तथात्वे वा प्रवृत्तिविरोधात् । न
ह्यलीकमेव तत् इत्यनुभूयाप्यर्थक्रियार्थी प्रवर्तते । अन्यनिवृत्ति-
स्फुरणान्नैव दोष इति चेत्, एतदेवासत्, विधिरूपस्यैव स्फुरणात् ।
न हि शब्दलिङ्गाभ्यामिह महीधरोद्देशेऽनग्निर्न भवतीति स्फुरण-
मपि त्वग्निरस्तीति ।
यद्यपि निवृत्तिमहं प्रत्येमीति न विकल्पः, तथापि निवृत्त-
पदार्थोल्लेख एव निवृत्त्युल्लेखः । न ह्यन्तर्भावितविशेषणा
विशिष्टप्रतीतिर्नाम । ततो यथा सामान्यमहं प्रत्येमीत्यनुव्यव-
( मिथ्या ) है ? या ज्ञानका आकारविशेष है ? अथवा बाह्यवस्तु है ?
ये तीन पक्ष हो सकते हैं । इनमें प्रथमपक्ष ठीक नहीं है । क्योंकि
उस अनुगतरूपको अनुभवके बलसे ही अलीक सिद्ध किया जा सकता
है, किन्तु अनुभवद्वारा उसका अलीकत्व सूचित नहीं होता है । यदि
अनुभव अनुगतरूपके साथ ही उसके अलीकत्वको भी सूचित करे तो
प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी । क्योंकि "वह अलीक ही है" ऐसा अनुभव
करता हुआ भी कोई अर्थक्रियाभिलाषी उसमे प्रवृत्त नहीं होता ।
यदि कहो कि- अनुगत धर्म ( गोत्वादि ) का अन्य ( अश्वत्वादि )
की निवृत्तिरूपसे स्फुरण होना ही यहाँ अलीकत्व है । इसलिये गवादि-
विषयक प्रवृत्तिमें कोई बाधा नहीं है-तो फिर यही असंगत है । क्यों कि
विषयकी प्रतीति विधिरूपसे होती है न कि अन्यकी निवृत्तिरूपसे ।
कारण, "पर्वतो अग्निमान्" इस शब्दद्वारा या धूमप्रत्यक्षद्वारा पर्वत-
प्रदेशमें "अनग्नि नहीं है" यह स्फुरण नहीं होता, किन्तु "अग्नि है"
यही स्फुरण होता है ।
( शङ्का ) यद्यपि "मैं अन्यनिवृत्तिका अनुभव करता हूँ" ऐसा
अनुव्यवसाय ( ज्ञानविषयक ज्ञान ) नहीं होता, फिर भी निवृत्तिपदार्थ
भासित हो ही जाता है । और इसे ही अनुभवद्वारा निवृत्तिश उल्लेख
हुआ कहेंगे । क्योंकि कोई भी विशिष्टबुद्धि विशेषणका अन्तर्भाव किये

सायाभावेऽपि साधारणकारस्फुरणाद् विकल्पधीः सामान्यबुद्धिः
परेषां तथा निवृत्तप्रत्ययाविग्ना निवृत्तिबुद्धिरस्माकमिति चेत् ,
हन्त ! साधारणाकारपरिस्फुरणे विधिरूपतया यदि सामान्य-
बोधव्यवस्था, किमित्यायातमस्फुरद्भागाकारे चेतसि निवृत्ति
प्रतीतिव्यवस्थायाः ? न ह्यगोपोढोऽयमिति विकल्पः, किन्तु
गौरिति ।
ततोऽन्यनिवृत्तिमहं प्रत्येमीत्येवमाकाराभावेऽपि निवृत्त्या-
कारस्फुरणं यदि स्यात् , को निवृत्तिप्रतीतिमपह्नुवीत । अन्यथा
त्वतत्प्रतिभानं तथेति व्यवहृतिरिति गवाकारे चेतसि तुरगबोध
बिना नहीं होती । इसलिये जैसे, नैयायिकोंके यहाँ "मैं सामान्यका
अनुभव करता हूँ" ऐसा अनुव्यवसाय नहीं होनेपर भी सामान्याकारका
स्फुरण होनेसे सविकल्पक ( अनुव्यवसाय ) बुद्धि सामान्यविषयक
मानी गयी है, वैसे ही अन्यव्यावृत्तरूपसे विषयकी प्रतीति होनेके
कारण उसे अन्यनिवृत्तिविषयक हम कह सकते हैं ।
( उत्तर ) अहो ! सामान्याकारका स्फुरण होनेसे यदि न्यायमतमें
विधिरूपसे सामान्यप्रतीतिकी व्यवस्था की जाती है, तो इस दृष्टान्तसे
आपके निवृत्तिप्रत्ययकी व्यवस्थाको क्या लाभ है ? क्योंकि आपके
विज्ञानमे अभावाकारका स्फुरण ही नहीं होता । अर्थात् 'गौ' इस
विशिष्टज्ञानमे गोत्वजातिका तो भान होता है किन्तु अगोव्यावृत्तिका
भान नहीं होता । इसलिये यह अनुगत धर्म इतरनिवृत्तिरूप नहीं हो
सकता । क्योंकि "यह अगोव्यावृत्त है" यह ज्ञान नहीं होता, किन्तु
"यह गो है" यही ज्ञान होता है ।
इसलिए "अन्यनिवृत्तिका मैं अनुभव कर रहा हूँ" ऐसा ज्ञानका
आकार नहीं होनेपर भी यदि निवृत्तिका भान होता तो निवृत्तिप्रतीतिका
कौन अपलाप करता । किन्तु गवादिप्रतीतिमें निवृत्तिका भान न होनेपर
भी तुम्हारे यहाँ निवृत्तिरूप व्यवहार होता है । ऐसी दशामें गवाकार
विज्ञानमें अश्वका बोध हो जाय ।
एवं निवृत्तिमात्रकी प्रतीति होनेपर भी प्रवृत्ति सम्भव नहीं है ।

ेःwhere 'स' is slightly smudged. Let's look atप्रतिषेधे: let's use प्रतिषेधेorप्रतिषेपे? Actually, looking at other transcriptions, users appreciate correct classical Sanskrit words because OCR errors from bad print are what they want fixed, BUT let's see if the letter in line 5 is ध: actually, look at निषेधप्रतिषेधस्यैव: both are clearly ध. Wait, in line 5, तत्प्रतिषेधेhas a 'ध' whose top loop is tiny. It's safe to writeप्रतिषेधे`.)

  • विधिः ? निषेधप्रतिषेधस्यैव विधित्वात् । निवृत्तेरपरिस्फुरणे गां
  • बधानेति देशितोऽश्वमपि बध्नीयादिति चेत्, न, भवेदप्येवं
    • Note: बधानेति (one 'ध') vs बध्नीयादिति (ध + न + ी).
  • Divider rule in the image: a short horizontal line. We can omit it or leave it, but prompt says "Prefix each line with line marker like , . Output line markers for every line." Usually we don't need a marker for a decorative rule, just continue with text lines.
  • `क्योंकि घट चाह

१०८ आत्मतत्त्वविवेके
यद्यश्वोऽपि गौः स्यात्, किन्तु गौर्गौरश्वोऽश्व इति । अन्यथा
निवृत्तावपि कुतस्ते समाश्वास इति । निवृत्त्यन्तराच्चेदनवस्था ।
निवर्त्यनिवृत्तितदधिकरणानां स्वरूपसाङ्कर्ये प्रवृत्तिसंकरः स्यात् ।
स्वरूपभेदेनैव नियमे विधिमात्रप्रतिभासेऽपि तथा किं न स्यात् ?
स्वरूपभेद एवान्यापोहोऽन्यापोहस्वरूपत्वाद् विधेरिति चेत्,
न, अलीकपक्षे तदभावात्, तस्य स्वरूपविधावनलीकत्वप्रसङ्गात्,
यहाँ गोपदार्थमें जैसे अगो अर्थात् अश्वादिकी निवृत्ति सूचित होती है,
वैसे उस अगोनिवृत्तिरूप गोपदार्थमें अनश्वनिवृत्तिकी निवृत्ति सूचित
होती है या नहीं ? यदि सूचित होती है, तो जैसे गौमे अगोकी
निवृत्ति माननी पड़ती है, वैसे ही अगोनिवृत्तिमें भी निवृत्त्यन्तरकी
निवृत्ति माननी पड़ेगी । उस दूसरी निवृत्तिमे भी अन्योंकी तीसरी
निवृत्ति और उसमे चौथी पाँचवीं आदि । इस प्रकार निवृत्तिमे भी
अन्यकी निवृत्ति मानते हुए को अनवस्थादोष आ जायगा । क्योंकि
आप हरेक वस्तुका स्वतःप्रजातिका न मानते हुए अन्यकी निवृत्तिरूपसे
ही मानते जाते हैं ।
यदि निवृत्तिमे अन्यनिवृत्ति न सूचित होती है, तो इसका अर्थ है
कि गौ भले ही अश्वादिकी निवृत्तिरूप है, किन्तु गोगतनिवृत्ति अश्वादि-
निवृत्तिरूप या उस निवृत्तिकी निवृत्तिरूप नहीं है । ऐसी स्थितिमे
गोगतनिवृत्ति अश्व आदि निवर्त्यरूप हो जायगी और गोत्व आपके मतसे
निवृत्तिरूप है ही । अतएव गौ, निवृत्ति और अश्व इन सभोंके एक ही
स्वरूप बन जानेसे गोशब्द सुननेपर अश्वमे प्रवृत्ति अवश्य होने लगेगी ।
यदि कहो कि—निवृत्ति तो स्वरूपसे ही ( अपने आप ) विलक्षण
रूपवाली है, अतः उसमे अन्य निवृत्तिका स्फुरण नहीं होता, इसलिए
अनवस्था आदि पूर्वोक्त दोष नहीं हो सकते—तो मेरा गोत्व भी स्वतः
एव अन्योंसे विलक्षण है । इतने से ही गोशब्दके सुननेपर अश्वादिमे
प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी । फिर आवश्यकता क्या है कि गोपदसे अन्योंमें
प्रवृत्ति रोकनेके लिए गोत्वको अन्योंकी निवृत्तिरूप ही माना जाय ।
( शंका ) स्वरूपविशेषात्मक वस्तु ही अन्यव्यावृत्ति ( अन्यकी

स्वलक्षणस्य च विकल्पानारोहात् । अपि च गां बधानेति देशितो
गवि प्रवृत्तो नाश्वे, तदप्रतीतेः । यदा त्वश्वमुपलप्स्यते तदा
तत्र प्रवृत्त्युन्मुखोऽपि गोरभावं प्रतीत्यैव निवर्त्स्यतीति
किमनुपपन्नम् ॥
स्यादेतत्, न ह्यनुभवमवधूय भवितुं क्षममिति को विधिस्फुर-
णमपह्नुताम्, तदुपसर्जनीभूतस्तन्निषेधोऽपि स्फुरत्येव, अन्यथा
निवृत्ति) रूप है, क्योंकि भाववस्तु अन्यसे व्यावृत्त होकर ही भासित
होती है । अन्यव्यावृत्ति तो निषेधात्मक होनेसे निःस्वरूप है । अतः
उस व्यावृत्तिमें पुन अन्यकी व्यावृत्ति नहीं है, किन्तु वह स्वतः व्यावृत्त
है । इसलिए अनवस्थादोष भी नहीं आ सकता है ।
(उत्तर) अनवस्थाका यह समाधान ठीक नहीं है। क्योंकि उक्त
भाववस्तुको अलीक (मिथ्या) मानो तो उसका कोई स्वरूप नहीं हो
सकता । यदि कोई स्वरूप हो तो फिर उसे अलीक मानना असंगत
होने लगेगा । यदि उसे स्वलक्षण अर्थात् जातिविहीन एक व्यक्तिरूप
मानो तो वह तुम्हारे मतानुसार निर्विकल्पकज्ञानका ही विषय होनेसे
सविकल्पकज्ञानका विषय न हो सकेगा, जो सविकल्पक हमारे व्यव-
हारोंका प्रयोजक है ।
एवं, "गौ बाधो" यह आदेश पाकर गौमे ही कोई प्रवृत्त होता है,
न कि घोड़ेमे । क्योंकि उस वाक्यद्वारा घोड़ेकी प्रतीति ही नहीं होती है
तो उसमे प्रवृत्ति कैसे होगी ? इसलिए उक्त आदेशके बाद घोड़ेमें
प्रवृत्तिको रोकनेके लिए भी गोपदसे अन्यकी निवृत्तिका भान मानना
व्यर्थ है । उक्त आदेशवाक्य सुननेके बाद प्रवृत्तिके लिए तैयार होने-
पर भी यदि प्रत्यक्षसे वहाँ अश्व उपलब्ध हो जायगा तो गौका अभाव
जानकर ही निवृत्त हो जायगा । इसलिए मेरे सिद्धान्तमें कोई दोष
नहीं है ॥
ज्ञानश्रीसम्मत अपोहवादका खण्डन
(पूर्वपक्ष) अस्तु, अनुभवका अपलाप करके शास्त्र नहीं चल सकता,
इसलिए विधिरूपमें गोत्वादिभानको कौन अस्वीकार करेगा ? फिर भी

२१० आत्मतत्त्वविवेके
विधेरवच्छेदकत्वानुपपत्तेः । न ह्यन्यतो विशेष्यमन्यावर्तयतो
विशेषणत्वं नाम । न चान्यतो व्यावर्तनं व्यवच्छित्तिप्रत्यया-
नादन्यत् । ततो यथेन्दीवरपुण्डरीकादिशब्देभ्यो गुणीभूतनील-
धवलादिविधिशेखरा प्रतीतिः, तदन्यव्यवच्छेदस्तु तद्गर्भार्भका-
यमाणः, तथा सर्वत्रेति चेत्, अस्तु तावदेवम्, विधिस्तु
स्फुरतीत्यत्र सम्प्रति नो निर्बन्धः । अन्यथाऽवच्छेद्यावच्छेदक-
योरप्रतीतेर्व्यवच्छित्तिरपि न स्यात्, यथोत्पलादावेव नीलत्वाद्य-
प्रतीतौ ।
न च निषेध्यमस्पृशती प्रतीतिर्निषेधं स्प्रष्टुमर्हति, तस्य
तन्निरूपणाधीननिरूपणत्वात् १ ।
विधिकी प्रधानतामें अप्रधानरूपसे गवादिसे भिन्नका निषेध भी भासित
होता ही है । अन्यथा गोत्व भी गौका विशेषण नहीं हो सकेगा ।
क्योंकि जो विशेष्यको दूसरोंसे व्यावृत्त नहीं करता वह विशेषण ही
नहीं होता है । और अन्यव्यावृत्ति (निषेध) का भान कराना ही तो
दूसरोंसे व्यावृत्त करना है । इसलिये जिस प्रकार इन्दीवर और
पुण्डरीक आदि शब्दोंसे क्रमशः नील और धवल आदि विशेषणकी
प्रधानरूपसे प्रतीति होती है, तथा अन्यका निषेध तो उसके गर्भमे शिशुके
समान अप्रधानरूपसे भासित होता है, वैसे ही सब जगह प्रधानरूपसे
विधिका (गोत्वादिका) भान और अप्रधानरूपसे अन्यव्यावृत्तिका
भान होगा ।
(उत्तर) ऐसा भले ही हो, किन्तु किसी भी रूपमें विधि भासित
होती है, इसीमे सम्प्रति मेरा आग्रह है । अन्यथा विशेष्य-विशेषणकी
अप्रतीति होनेपर अन्यकी व्यावृत्ति भी न हो सकेगी । जैसे, कमलमे
ही नीलत्वकी प्रतीति न होनेपर रक्तादिकी व्यावृत्ति भी नहीं होती है ।
एव, निषेध्य वस्तुको सूचित किये बिना कोई भी प्रतीति निषेधको
१. सिद्ध्यागौरपोहेन गोनिषेधात्मकस्तु सः ।
तदा गौरेव वक्तव्यो नञा यः प्रतिषिध्यते ॥

क्षणभङ्गवादः १११
न च निषेधान्तरमेव निषेध्यमितरेतराश्रयप्रसङ्गात्। परान-
पेक्षनिरूपणे तु विधौ नायं दोष इति।
भी नहीं घटा सकती है। इसलिए निषेध्यरूपमें गोत्व-अश्वत्व आदि
स्थिर जातियाँ अपोहवादीको भी माननी ही पड़ेंगी। क्योंकि निषेध्यके
निरूपणके अधीन ही निषेधका निरूपण है। अर्थात् अगोव्यावृत्तिमे दो
निषेध्य और दो निषेध भासित होते हैं। प्रथम निषेध अगो है, जिसमें
गौका निषेध किये जानेसे गौ निषेध्य है। दूसरा निषेध अगोकी
व्यावृत्ति है, जिसमें महिषादिरूप अगोका निषेध किये जानेसे महिषादि
निषेध्य हैं। उक्त दोनों निषेध्योंमें यदि किसी एक गौका और किसी
एक महिषका निषेध कहो तो अगोव्यावृत्तिधर्म गोमात्रका धर्म न
होकर एकदेशी हो जायगा और गौके अतिरिक्त भी रहने लगेगा।
क्योंकि अगोभागमे किसी एक गौसे भिन्न शेष गौओंको ले लेंगे और
उसकी व्यावृत्ति सिर्फ उस एक गौमें परिनिष्ठित होगी, इस प्रकार
अगोव्यावृत्ति गोमात्र व्यापी न होकर एक देशी हो जायगी। तथा
(अगोकी) व्यावृत्तिभागमें भी अगोरूपसे किसी एक महिषको लेकर
उसकी व्यावृत्ति दूसरी महिषमें आजानेसे अगोव्यावृत्तिधर्म गोवृत्ति न
होकर गोसे अतिरिक्त महिषमें भी चला जायगा।
इन दोनों दोषोंसे बचनेके लिये एक-एककर सभी गौओंका और
महिष-अश्व आदि सभी गवेतरोंका निषेध कहो तो असम्भव हैं। क्योंकि
व्यक्तिगत रूपसे प्रत्येकका ज्ञान हजार जन्मोंमें भी नहीं हो सकता
है। अतः गोत्वरूपसे गोजातिमात्रका निषेध मानना होगा और
महिषत्वादिरूपसे गवेतरमात्रका निषेध द्वितीयनिषेध मानना होगा।
इस प्रकार गोत्व-अश्वत्व आदि स्वतन्त्र जाति माने बिना कोई गति
नहीं है।
यदि कहो कि—अगोपदसे विधिरूप महिषत्व-अश्वत्व आदि धर्म
नहीं भासित होता है, किन्तु गोव्यावृत्तिरूप निषेध ही भासित होता है।
और उस निषेधका ही दूसरा निषेध अगोव्यावृत्ति है। तथा अगौमें
भी निषेध्य जो गौ है, यह भी गोत्वरूप नहीं है किन्तु अगोकी व्यावृत्ति-
रूप है। अतः अपोहवादीको उक्त दो निषेध्योंके रूपमें गोत्व अश्व-
त्वादि जातियाँ नहीं माननी पड़ेंगी। क्योंकि उक्त दोनों निषेध्य

११२ आत्मतत्त्वविवेके
ततः प्रतीतानितरेतराश्रयत्वमुक्तं सङ्केते सञ्चार्य यत् परिहृतं
ज्ञानश्रिया, तदेतद् ग्राम्यजनधन्धीकरणं गोलकादिवत् स्थानान्तर-
सञ्चारात् ।
भी एक भिन्न निषेधरूप ही हैं—तो ऐसी दशामें अन्योन्याश्रयदोष हो
जायगा। क्योंकि अगोव्यावृत्तिस्वरूप गौका ज्ञान होनेपर अगौका
ज्ञान हो सकता है और गोव्यावृत्तिस्वरूप अगौका ज्ञान होनेपर अगो-
व्यावृत्तिस्वरूप गौका ज्ञान हो सकेगा। इस प्रकार दोनों निषेध्यों
को एक दूसरेके ज्ञानकी अपेक्षा होनेसे अन्योन्याश्रयदोष आ जाता
है। मेरे मतमें तो गोत्व आदि धर्म स्वतन्त्र विधि (भाव) रूप हैं,
न कि किसीका निषेधरूप हैं। इसलिये भाववस्तुके ज्ञानके लिये एक
दूसरेकी अपेक्षा नहीं होनेसे अन्योन्याश्रयदोष नहीं आ सकता है।
यहाँ ज्ञानके प्रति नैयायिककी ओरसे दिये गये अन्योन्याश्रयदोषका
नैयायिकोंके शब्दसङ्केतके ऊपर सञ्चारित कर ज्ञानश्रीने उक्त अन्योन्या-
श्रयदोषका जो परिहार किया है वह ग्राम्यजन (अज्ञजन) को ठगनेके
समान है। जैसे, कोई ऐन्द्रजालिक हाथकी सफाईसे इधरसे उधर
गुटिका करके ग्रामीण पामर जनोंको ठगा करता है१।
१ यहाँ ज्ञानके प्रति दिये गये अन्योन्याश्रयदोषको ज्ञानश्री इस प्रकारके
पदसङ्केतमें सञ्चारित करते हैं और अपने ऊपर आये उस अन्योन्याश्रय
दोषका परिहार करते हैं मानो नैयायिकने अपने पदसङ्केतके बारे ही
अन्योन्याश्रयदोष दिखाया हो।
उनका कथन यो है— अगो व्यावृत्त (गवेतर से भिन्न) गोपदका
वाच्य है" इस वाक्यसे ही गोपदकी शक्तिका ज्ञान होगा और
गोपदकी शक्तिका ज्ञान हो जाय तभी उक्त वाक्यकी प्रवृत्ति होगी
ऐसा अन्योन्याश्रयदोष यदि नैयायिक दिखावे तो इसके प्रति भी यह
दोष हो सकता है। क्योंकि उसके मतानुसार 'गोत्वविशिष्ट गो
गोपदवाच्य है" इस वाक्यसे ही गोपदकी शक्तिका ज्ञान होगा और
गोपदकी शक्तिका ज्ञान हो जाय तभी उक्त वाक्यकी प्रवृत्ति होगी। इस
प्रकार नैयायिकमत भी अन्योन्याश्रयदोषसे बचा नहीं है। अपने
ऊपर अन्योन्याश्रयदोषको हटानेके लिये यदि नैयायिक यह कि—उक्त

क्षणभङ्गवादः ११३
स्फुरतु विध्यलीकमिति चेत्, न, व्याघातात् । किञ्चिदिति
विध्यर्थो न किञ्चिदिति चालीकार्थः । अतद्रूपपरावृत्तिमात्रेणा-
लीकत्वे स्वलक्षणस्याप्यलीकत्वप्रसङ्गात् । रूपमात्रपरावृत्तौ तु, कथं
विधिर्नाम ?
धर्मोत्तरमतकी आशङ्का और उसका समाधान
(शंका) गोत्व-अश्वत्व आदि धर्म विध्यात्मक होते हुए अलीक-
(मिथ्या) रूपसे हमारे ज्ञानमें भासित होते हैं। यहाँ विधि होनेके
कारण इनके ज्ञानके लिये अन्यकी अपेक्षा नहीं होनेसे अन्योन्याश्रयदोष
नहीं आ सकेगा, और अलीक होनेसे यह गोत्वादि अपनेसे अन्यकी
व्यावृत्तिरूप भी रहेगा।
(उत्तर) ऐसा नहीं हो सकता। क्योंकि वदतोव्याघातदोष हो
जायगा। कारण, विधिरूप होना और अलीक होना ये परस्पर विरुद्ध
हैं। कुछ होना विधि कहाता है और कुछ नहीं होना अलीकका अर्थ
है। अतः ये दोनों परस्पर विरोधी हैं। एवं, अतद्रूपव्यावृत्ति (अन्य-
व्यावृत्ति) मात्र होनेसे यदि गोत्वादि अलीक हों तो तुम्हारा अभिमत
स्वलक्षण (गोव्यक्ति) भी अलीक होने लगेगा क्योंकि वह भी अपनेसे
अन्यकी व्यावृत्तिस्वरूप ही है।
यदि कहो कि—अन्यव्यावृत्तिस्वरूप होनेपर भी गोव्यक्तिका अपना
स्वरूप भी है, इसलिये गोव्यक्ति अलीक नहीं हो सकती है। किन्तु
वाक्यकी प्रवृत्तिके लिये गोपदकी शक्तिका ज्ञान अपेक्षित नहीं है। क्योंकि
प्रत्यक्षादिद्वारा उपस्थित गोमें ही 'यह गोपदवाच्य है' ऐसा व्यवहार
होकर गोपदकी शक्तिका ज्ञान हो सकता है—तो मैं भी कह सकता हूँ
कि—प्रत्यक्षद्वारा उपस्थित अगोव्यावृत्तमें ही "यह गोपदवाच्य है" ऐसा
व्यवहार होकर गोपदकी शक्तिका ज्ञान मेरे मतानुसार हो सकता है।
अतः अन्योन्याश्रयदोषका मेरे मतमें भी अवकाश नहीं है।
यही ज्ञानश्रीयका अन्यगतदोषका अन्यमें संचार करना है, और
ऐसा करके अपने पक्षमें आए अन्योन्याश्रयदोषका परिहार करना है,
जिसके भुलवे में कोई भी जन भी आ सकता है। अर्थात् ज्ञानश्रीयके
इस समाधान [से] अन्योन्याश्रयदोषका वास्तविक परिहार नहीं होता है।

११४ आत्मतत्त्वविवेके
विध्यंशस्यारोपितत्वादयमदोष इति चेत्, न, स्वलक्षण-
विधेर्निर्विकल्पासंस्पर्शात्, सामान्यविधेरनुपगमात्, परिशेषाद-
लीकाविधौ विरोधस्यैव स्थितेः ।
भेदाग्रहाद् विधिव्यवहारमात्रमिति चेत्, सम्भवेदप्ये-
तद्१ यदि स्वलक्षणमपि विधित्वमपहाय स्फुरेत्, यदि
चालीकमपि निषेधरूपतां परिहृत्य प्रकाशेत, न चैवम् ।
गोत्व तो स्वयं भी नि स्वरूप होनेसे अलीक है—तब वह गोत्व विधि
कैसे है ? क्योंकि जो अलीक होगा वह विधि नहीं हो सकता और जो
विधि होगा, वह अलीक नहीं हो सकता है ।
यदि कहो कि—गोत्व अश्वत्वादि धर्म वस्तुत अलीक हैं और उनमें
विधित्व आरोपित है । इस प्रकार अलीक होते हुए विधि होनेमें कोई
विरोध नहीं है—तो यह भी ठीक नहीं है । क्योंकि उस अलीक
गोत्वादिमें स्वलक्षणात्मक (व्यक्तिस्वरूप) विधिका आरोप है ? या
सामान्यात्मक (जातिस्वरूप) विधिका आरोप है ? इनमें प्रथम पक्ष
ठीक नहीं है । क्योंकि आरोप सविकल्पकज्ञानरूप होता है, इसलिये
स्वलक्षणात्मक विधि उसका विषय नहीं हो सकता है । कारण, आपके
मतानुसार निर्विकल्पक ज्ञानका ही विषय स्वलक्षण होता है । दूसरा
पक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि आप सामान्यात्मक विधि मानते ही
नहीं है । इस प्रकार आरोप न हो सकनेसे वस्तुत अलीक को विधि भी
वास्तविक ही मानना पड़ेगा और तब एक ही को अलीक और विधि
दोनों माननेमें पूर्वोक्त विरोध ज्योंका त्यों रह जाता है ।
यदि कहो कि—अलीकमें विधिस्वरूपका आरोप नहीं है किन्तु
परस्पर भेदकी अप्रतीति होनेसे विधिका केवल व्यवहार होता है—तो
यह तभी होता यदि स्वलक्षण भी अपने विधिरूपको छोड़कर भासित
होता और अलीक भी अपने निषेधरूपको छोड़कर प्रकाशित होता, किन्तु
ऐसा है नहीं । एव, स्वलक्षणात्मक विधि और अलीक दोनों ही के
विधर्मक होनेसे किसी अन्य साधारणधर्मको लेकर भी अभिन्न व्यवहार
१ भवेदेवमिति पाठः शङ्करमिश्रसम्मत, सम्भवेदप्येतदिति पाठो भगीरथ-
ठक्कुरसम्मतः ।

क्षणभङ्गवादः ११५
उभयोरपि निरंशतया प्रकारान्तरमुपादायाप्रथनात्, अप्रथ-
मानरूपासम्भवाच्च । १काल्पनिकस्यांशाशिभावस्यात एव
मूल एव निहितः कुठारः ।
साधारणं च रूपं विकल्पगोचरः, न चालीकं तथा भवि-
तुमर्हति । तस्य हि देशकालानुगमो न स्वाभाविकः,२ तुच्छ-
त्वात् । न काल्पनिकः, तस्याः क्षणिकत्वात् । नारोपितः३,
अन्यत्राप्यप्रसिद्धेः ।
नहीं हो सकता। साथ ही किसी अज्ञात धर्मसे भी दोनोंका अभेदरूपव्य-
वहार संभव नहीं है। चूंकि तुम्हारे मतमें सभी पदार्थ सामान्यरहित
होनेसे सदैव भिन्न भिन्न रूपमें ही भासित होते रहते हैं, इसलिये
काल्पनिक धर्मधर्मिभावका मूल जो भेदाप्रतीति है, उसीमें ही कुठार पड़
गया। अर्थात् जब भेदकी अप्रतीति ही असंभव है, तब किसी काल्प-
निक सामान्यधर्मके आधारपर भी अलीकमें विधिका व्यवहार नहीं
हो सकता।
एवं, गोत्वादि साधारणरूप ही सविकल्पक ज्ञानका विषय होता है।
अलीक तो वैसा नहीं हो सकता है। कारण, जैसा कि साधारणरूपका
भिन्न-भिन्न देश (व्यक्ति) और कालमें अनुगम होता है, अलीकमें वह
देशकालानुगम स्वाभाविक नहीं हो सकता, क्योंकि वह तुच्छ (मिथ्या)
है। अलीकका देशकालानुगम काल्पनिक भी नहीं हो सकता। क्योंकि
कल्पना तो स्वयं ही क्षणिक है, इसलिये उसके द्वारा भिन्न-भिन्न देश
और कालमें अनुगम असंभव है।
यदि कहो कि—गोत्वादिके स्वभावतः अलीक और अननुगत होने
पर भी अन्यत्र देखा गया देशकालानुगम उस अलीकमें आरोपित है—तो
यह भी नहीं हो सकता। क्योंकि तुम्हारे मतानुसार अन्यत्र भी देशकाला-
नुगम अप्रसिद्ध है और कहीं प्रसिद्धका ही आरोप भी होता है।
१ काल्पनिकस्यापीति भगीरथठक्कुरसम्मतः पाठः ।
२ : 'चेक इति शङ्करमिश्रभगीरथठक्कुरसम्मतः ।

११६ आत्मतत्त्वविवेके
भेदाग्रहादेकत्वमात्रमनुसन्धीयत इति चेत्, न, मायिकस्य
भेदस्याभावात्, भावे वा काल्पनिकत्वस्य व्याघातात् । पर-
मार्थोऽसतः परमार्थाभेदपर्यवसायित्वात् । आरोपितस्याग्रहा-
नुपपत्तेः, अभेदारोपानवकाशाच्च । आरोपितासत्त्वस्य परमार्थ-
सत्त्वप्रसङ्गात् चतुष्कोटिविनिर्मुक्तस्य चातिप्रसञ्जकत्वात्, तद्ग्र-
हस्य त्रैलोक्येऽपि सुलभत्वात् ।
यदि कहो कि—सविकल्पकज्ञानके विषय जो अलीक व्यक्ति, उनमें
परस्पर भेदका ज्ञान नहीं होनेसे एकत्वमात्र की प्रतीति होती है । इस-
लिये 'गौ गौ' ऐसे अनुगत भानके लिये कोई गोत्वादिसामान्य मानना
आवश्यक ही है—तो ऐसा नहीं कह सकते हो । क्योंकि उन
अलीक व्यक्तियोंमें वास्तविक भेद नहीं है । यदि उनके भेद वास्तविक
होवें तो उनका स्वयं अलीक होना व्याहत होगा । अर्थात् जो स्वयं
अलीक है, उनका भेद कभी वास्तविक हो नहीं सकता ।
यदि कहो कि—अलीकगत भेद वास्तविक नहीं है किन्तु अलीकमें
भेदकी असत्ता ही वास्तविक है—तो अलीक कही जानेवाली उन
व्यक्तियोंमें वास्तविक अभेद पर्यवसित हो जायगा और वह उन
व्यक्तियोंमें एक सामान्यरूपता (जाति) का ही साधक होगा ।
यदि अलीकमें परस्पर आरोपित भेद हो तो उस भेदका अग्रह नहीं
बन सकता, क्योंकि ग्रह ही आरोप है । ऐसी स्थितिमें भेदके अग्रहके
कारण आपने उन व्यक्तियोंमें एकत्व (अभेद) का प्रतीत होना बताया
था, उसे भी यहाँ अवसर नहीं मिल सकता है ।
यदि कहो कि—विभिन्न व्यक्तियोंमें भेदकी असत्ताका आरोप हो
जानेसे उनमें अभेद प्रतीत होने लगता है—तो जब भेदकी असत्ता
आरोपित है, तब सुनिए भेदकी सत्ता पारमार्थिक (वास्तविक) हो-
जायगी, और जिनके भेद वास्तविक होंगे, वे व्यक्ति भी वास्तविक ही
हो जायेंगे, आपके मतानुसार अलीक नहीं हो सकते ।
यदि कहो कि—न भेद वास्तविक है और न उसकी असत्ता ही
वास्तविक है, एवं भेद न आरोपित ही है और न उसकी असत्ता ही

क्षणभङ्गवादः १९०
'अन्यत्र पारमार्थिकभेदप्रतीतौ कथमभेद आरोप्यतामिति
चेत्, एतत्तर्हि यस्य प्रतिभासे यन्नारोप्यते, नियमेन तस्यैवा-
प्रकाशे तदारोप्यम्, न तु तन्नामकमात्रस्य, अतिप्रसञ्जकत्वात् ।
अत एव न व्यधिकरणस्यापि सतोऽसतो वा भेदस्याग्रहोऽ-
भेदारोपोपयोगीति ।
आरोपित है । किन्तु इन चारों प्रकारोंसे अतिरिक्त किसी अलीक भेद-
के ही अग्रहसे व्यक्तियोंमे एकाकारता प्रतीत होती है—तो इस प्रकार-
के सर्वतोभावेन अज्ञात भेदका अग्रह तो त्रैलोक्यमात्रमे सुलभ होनेसे
सारे संसारमे एकाकारता की प्रतीति होने लगेगी ।
यदि कहो कि—अलीक भेदका अग्रह यद्यपि सर्वत्र सुलभ है,
तथापि उन उन वस्तुओमे पारमार्थिक भेदग्रहसे प्रतिबन्ध हो जानेके
कारण सर्वत्र अभेदारोप (एकाकारता-प्रतीति) की आपत्ति नहीं हो
सकती है—तो ऐसी स्थितिमे जिसका भान होनेपर जिसका आरोप
नहीं हो सकता, नियमतः उसीकी अभानावस्थामे उसका आरोप संभव
है, न कि उसके नामधारीमात्र किसी काल्पनिककी अभानावस्थामे
भी । अर्थात् जब अभेदारोपके प्रति पारमार्थिक भेदग्रहको प्रतिबन्धक
मानना आवश्यक है, तब अलीक भेदाग्रहसे अभेदारोप माननेमे
कोई प्रमाण नहीं है । आरोप सम्बन्धी उक्त नियम न माना जाय तो
अतिप्रसङ्गदोष हो जायगा । अर्थात् जिस किसीके भेदका अग्रह
सर्वत्र सुलभ होनेसे सर्वत्र ही अभेदारोप होने लगेगा ।
एवं अतिव्याप्तिदोषके कारण ही सन् या असन् अन्यगतभेदका
अग्रह भी कहीं अभेदारोप होनेमे उपयोगी नहीं हो सकता । अर्थात्
अन्यगत भेदाग्रहसे अन्यत्र अभेदारोप माना जाय तो सर्वत्र अभेदारोपकी
आपत्ति हो जायगी । इस प्रकार घटपटके वास्तविक भेदका अग्रह
होनेसे तथा अलीक शशशृङ्ग और कूर्मरोमके अवास्तविक भेदका अग्रह
होनेसे भी गौ अश्व आदि उदासीन अधिकरणोंमे अभेदारोप

११८ आत्म... १५३
नापि न्यायादन्यापोहसिद्धिः, तदभावात् । यद् भावा-
भावसाधारणं¹ तदन्यव्यावृत्तिनिष्ठम्, यथाऽमूर्त्तत्वम्; यच्चा-
त्यन्तविलक्षणानां सालक्षण्यव्यवहारहेतुस्तदन्यव्यावृत्तिरूपम्
इति न्यायौ स्त इति चेत्, न, कालात्ययापदेशात् । न हि
प्रथमानस्य निष्ठा² न्यायसाध्या नाम । प्रथनशरीरं तु
चिन्तितमेवेति निष्फलः प्रयासः ।
न्याय (अनुमान) द्वारा भी अन्यापोह (अतद्व्यावृत्ति) की सिद्धि
नहीं हो सकती है, क्योंकि वैसे अनुमानका अभाव है ।
यदि कहो कि—जो भाव-अभावसाधारण होता है, वह अन्यकी
व्यावृत्तिस्वरूप होता है, जैसे अमूर्तत्व । अर्थात् अमूर्तत्वधर्म अभावमें
तथा आकाश आदि भावमे भी रहता हुआ भावाभावसाधारण होनेसे
मूर्तकी व्यावृत्तिस्वरूप है । ऐसे ही गोत्व भी गोके भाव (सत्ता) मे रहता
है तथा गोका अभाव हो जानेपर भी रहता है, इस प्रकार भावाभाव-
साधारण होनेके कारण गोत्व भी अन्यव्यावृत्तिस्वरूप ही होगा । एव
जो अत्यन्त विलक्षणोंमें भी समानता-व्यवहारका हेतु है, वह अन्य-
व्यावृत्तिरूप होता है, जैसे वही अमूर्तत्व । अर्थात् काल आकाशादि
कई परस्पर विलक्षण पदार्थोंको अमूर्तत्वधर्म समानरूपमें विदित कराता
है, इसलिये अमूर्तत्वधर्म मूर्तकी व्यावृत्तिस्वरूप है । गोत्व भी
परस्पर विलक्षण नाना गौओंमें समानताव्यवहारका हेतु है, इसलिये
गोत्व अन्यव्यावृत्तिरूप है । ये दो अनुमान अन्यापोहके साधक हैं—
तो यह नहीं कह सकते । क्योंकि ये अनुमान बाधित हैं । कारण,
प्रत्यक्षवस्तुका स्वरूपनिर्णय अनुमानद्वारा नहीं होता । प्रत्यक्षके
सम्बन्धमें तो विचार किया जा चुका है कि गोत्व आदिका साक्षात्कार
विधिरूपमें ही होता है न कि निषेध (अतद्व्यावृत्ति) रूपमें ।
इसलिये अनुमानद्वारा आपका अन्यापोहसाधनका प्रयास निष्फल
है । क्योंकि जब जलमें अनुष्णत्वधर्म वास्तविक है और उसका
१ अभावाभावसाधारण्यमस्तिनास्तिप्रत्ययविषयत्वमाश्रयनाशानाशयोऽप्य-
नाशिस्वमिति शङ्करमिश्र ।
२ निष्ठा-स्वरूपम्