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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 530 में से

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पृष्ठ 162

क्षणभङ्गवादः ११३
स्फुरतु विध्यलीकमिति चेत्, न, व्याघातात् । किञ्चिदिति
विध्यर्थो न किञ्चिदिति चालीकार्थः । अतद्रूपपरावृत्तिमात्रेणा-
लीकत्वे स्वलक्षणस्याप्यलीकत्वप्रसङ्गात् । रूपमात्रपरावृत्तौ तु, कथं
विधिर्नाम ?
धर्मोत्तरमतकी आशङ्का और उसका समाधान
(शंका) गोत्व-अश्वत्व आदि धर्म विध्यात्मक होते हुए अलीक-
(मिथ्या) रूपसे हमारे ज्ञानमें भासित होते हैं। यहाँ विधि होनेके
कारण इनके ज्ञानके लिये अन्यकी अपेक्षा नहीं होनेसे अन्योन्याश्रयदोष
नहीं आ सकेगा, और अलीक होनेसे यह गोत्वादि अपनेसे अन्यकी
व्यावृत्तिरूप भी रहेगा।
(उत्तर) ऐसा नहीं हो सकता। क्योंकि वदतोव्याघातदोष हो
जायगा। कारण, विधिरूप होना और अलीक होना ये परस्पर विरुद्ध
हैं। कुछ होना विधि कहाता है और कुछ नहीं होना अलीकका अर्थ
है। अतः ये दोनों परस्पर विरोधी हैं। एवं, अतद्रूपव्यावृत्ति (अन्य-
व्यावृत्ति) मात्र होनेसे यदि गोत्वादि अलीक हों तो तुम्हारा अभिमत
स्वलक्षण (गोव्यक्ति) भी अलीक होने लगेगा क्योंकि वह भी अपनेसे
अन्यकी व्यावृत्तिस्वरूप ही है।
यदि कहो कि—अन्यव्यावृत्तिस्वरूप होनेपर भी गोव्यक्तिका अपना
स्वरूप भी है, इसलिये गोव्यक्ति अलीक नहीं हो सकती है। किन्तु
वाक्यकी प्रवृत्तिके लिये गोपदकी शक्तिका ज्ञान अपेक्षित नहीं है। क्योंकि
प्रत्यक्षादिद्वारा उपस्थित गोमें ही 'यह गोपदवाच्य है' ऐसा व्यवहार
होकर गोपदकी शक्तिका ज्ञान हो सकता है—तो मैं भी कह सकता हूँ
कि—प्रत्यक्षद्वारा उपस्थित अगोव्यावृत्तमें ही "यह गोपदवाच्य है" ऐसा
व्यवहार होकर गोपदकी शक्तिका ज्ञान मेरे मतानुसार हो सकता है।
अतः अन्योन्याश्रयदोषका मेरे मतमें भी अवकाश नहीं है।
यही ज्ञानश्रीयका अन्यगतदोषका अन्यमें संचार करना है, और
ऐसा करके अपने पक्षमें आए अन्योन्याश्रयदोषका परिहार करना है,
जिसके भुलवे में कोई भी जन भी आ सकता है। अर्थात् ज्ञानश्रीयके
इस समाधान [से] अन्योन्याश्रयदोषका वास्तविक परिहार नहीं होता है।