आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः १११
न च निषेधान्तरमेव निषेध्यमितरेतराश्रयप्रसङ्गात्। परान-
पेक्षनिरूपणे तु विधौ नायं दोष इति।
भी नहीं घटा सकती है। इसलिए निषेध्यरूपमें गोत्व-अश्वत्व आदि
स्थिर जातियाँ अपोहवादीको भी माननी ही पड़ेंगी। क्योंकि निषेध्यके
निरूपणके अधीन ही निषेधका निरूपण है। अर्थात् अगोव्यावृत्तिमे दो
निषेध्य और दो निषेध भासित होते हैं। प्रथम निषेध अगो है, जिसमें
गौका निषेध किये जानेसे गौ निषेध्य है। दूसरा निषेध अगोकी
व्यावृत्ति है, जिसमें महिषादिरूप अगोका निषेध किये जानेसे महिषादि
निषेध्य हैं। उक्त दोनों निषेध्योंमें यदि किसी एक गौका और किसी
एक महिषका निषेध कहो तो अगोव्यावृत्तिधर्म गोमात्रका धर्म न
होकर एकदेशी हो जायगा और गौके अतिरिक्त भी रहने लगेगा।
क्योंकि अगोभागमे किसी एक गौसे भिन्न शेष गौओंको ले लेंगे और
उसकी व्यावृत्ति सिर्फ उस एक गौमें परिनिष्ठित होगी, इस प्रकार
अगोव्यावृत्ति गोमात्र व्यापी न होकर एक देशी हो जायगी। तथा
(अगोकी) व्यावृत्तिभागमें भी अगोरूपसे किसी एक महिषको लेकर
उसकी व्यावृत्ति दूसरी महिषमें आजानेसे अगोव्यावृत्तिधर्म गोवृत्ति न
होकर गोसे अतिरिक्त महिषमें भी चला जायगा।
इन दोनों दोषोंसे बचनेके लिये एक-एककर सभी गौओंका और
महिष-अश्व आदि सभी गवेतरोंका निषेध कहो तो असम्भव हैं। क्योंकि
व्यक्तिगत रूपसे प्रत्येकका ज्ञान हजार जन्मोंमें भी नहीं हो सकता
है। अतः गोत्वरूपसे गोजातिमात्रका निषेध मानना होगा और
महिषत्वादिरूपसे गवेतरमात्रका निषेध द्वितीयनिषेध मानना होगा।
इस प्रकार गोत्व-अश्वत्व आदि स्वतन्त्र जाति माने बिना कोई गति
नहीं है।
यदि कहो कि—अगोपदसे विधिरूप महिषत्व-अश्वत्व आदि धर्म
नहीं भासित होता है, किन्तु गोव्यावृत्तिरूप निषेध ही भासित होता है।
और उस निषेधका ही दूसरा निषेध अगोव्यावृत्ति है। तथा अगौमें
भी निषेध्य जो गौ है, यह भी गोत्वरूप नहीं है किन्तु अगोकी व्यावृत्ति-
रूप है। अतः अपोहवादीको उक्त दो निषेध्योंके रूपमें गोत्व अश्व-
त्वादि जातियाँ नहीं माननी पड़ेंगी। क्योंकि उक्त दोनों निषेध्य