आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 164, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः ११५
उभयोरपि निरंशतया प्रकारान्तरमुपादायाप्रथनात्, अप्रथ-
मानरूपासम्भवाच्च । १काल्पनिकस्यांशाशिभावस्यात एव
मूल एव निहितः कुठारः ।
साधारणं च रूपं विकल्पगोचरः, न चालीकं तथा भवि-
तुमर्हति । तस्य हि देशकालानुगमो न स्वाभाविकः,२ तुच्छ-
त्वात् । न काल्पनिकः, तस्याः क्षणिकत्वात् । नारोपितः३,
अन्यत्राप्यप्रसिद्धेः ।
नहीं हो सकता। साथ ही किसी अज्ञात धर्मसे भी दोनोंका अभेदरूपव्य-
वहार संभव नहीं है। चूंकि तुम्हारे मतमें सभी पदार्थ सामान्यरहित
होनेसे सदैव भिन्न भिन्न रूपमें ही भासित होते रहते हैं, इसलिये
काल्पनिक धर्मधर्मिभावका मूल जो भेदाप्रतीति है, उसीमें ही कुठार पड़
गया। अर्थात् जब भेदकी अप्रतीति ही असंभव है, तब किसी काल्प-
निक सामान्यधर्मके आधारपर भी अलीकमें विधिका व्यवहार नहीं
हो सकता।
एवं, गोत्वादि साधारणरूप ही सविकल्पक ज्ञानका विषय होता है।
अलीक तो वैसा नहीं हो सकता है। कारण, जैसा कि साधारणरूपका
भिन्न-भिन्न देश (व्यक्ति) और कालमें अनुगम होता है, अलीकमें वह
देशकालानुगम स्वाभाविक नहीं हो सकता, क्योंकि वह तुच्छ (मिथ्या)
है। अलीकका देशकालानुगम काल्पनिक भी नहीं हो सकता। क्योंकि
कल्पना तो स्वयं ही क्षणिक है, इसलिये उसके द्वारा भिन्न-भिन्न देश
और कालमें अनुगम असंभव है।
यदि कहो कि—गोत्वादिके स्वभावतः अलीक और अननुगत होने
पर भी अन्यत्र देखा गया देशकालानुगम उस अलीकमें आरोपित है—तो
यह भी नहीं हो सकता। क्योंकि तुम्हारे मतानुसार अन्यत्र भी देशकाला-
नुगम अप्रसिद्ध है और कहीं प्रसिद्धका ही आरोप भी होता है।
१ काल्पनिकस्यापीति भगीरथठक्कुरसम्मतः पाठः ।
२ : 'चेक इति शङ्करमिश्रभगीरथठक्कुरसम्मतः ।