आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसायाभावेऽपि साधारणकारस्फुरणाद् विकल्पधीः सामान्यबुद्धिः
परेषां तथा निवृत्तप्रत्ययाविग्ना निवृत्तिबुद्धिरस्माकमिति चेत् ,
हन्त ! साधारणाकारपरिस्फुरणे विधिरूपतया यदि सामान्य-
बोधव्यवस्था, किमित्यायातमस्फुरद्भागाकारे चेतसि निवृत्ति
प्रतीतिव्यवस्थायाः ? न ह्यगोपोढोऽयमिति विकल्पः, किन्तु
गौरिति ।
ततोऽन्यनिवृत्तिमहं प्रत्येमीत्येवमाकाराभावेऽपि निवृत्त्या-
कारस्फुरणं यदि स्यात् , को निवृत्तिप्रतीतिमपह्नुवीत । अन्यथा
त्वतत्प्रतिभानं तथेति व्यवहृतिरिति गवाकारे चेतसि तुरगबोध
बिना नहीं होती । इसलिये जैसे, नैयायिकोंके यहाँ "मैं सामान्यका
अनुभव करता हूँ" ऐसा अनुव्यवसाय नहीं होनेपर भी सामान्याकारका
स्फुरण होनेसे सविकल्पक ( अनुव्यवसाय ) बुद्धि सामान्यविषयक
मानी गयी है, वैसे ही अन्यव्यावृत्तरूपसे विषयकी प्रतीति होनेके
कारण उसे अन्यनिवृत्तिविषयक हम कह सकते हैं ।
( उत्तर ) अहो ! सामान्याकारका स्फुरण होनेसे यदि न्यायमतमें
विधिरूपसे सामान्यप्रतीतिकी व्यवस्था की जाती है, तो इस दृष्टान्तसे
आपके निवृत्तिप्रत्ययकी व्यवस्थाको क्या लाभ है ? क्योंकि आपके
विज्ञानमे अभावाकारका स्फुरण ही नहीं होता । अर्थात् 'गौ' इस
विशिष्टज्ञानमे गोत्वजातिका तो भान होता है किन्तु अगोव्यावृत्तिका
भान नहीं होता । इसलिये यह अनुगत धर्म इतरनिवृत्तिरूप नहीं हो
सकता । क्योंकि "यह अगोव्यावृत्त है" यह ज्ञान नहीं होता, किन्तु
"यह गो है" यही ज्ञान होता है ।
इसलिए "अन्यनिवृत्तिका मैं अनुभव कर रहा हूँ" ऐसा ज्ञानका
आकार नहीं होनेपर भी यदि निवृत्तिका भान होता तो निवृत्तिप्रतीतिका
कौन अपलाप करता । किन्तु गवादिप्रतीतिमें निवृत्तिका भान न होनेपर
भी तुम्हारे यहाँ निवृत्तिरूप व्यवहार होता है । ऐसी दशामें गवाकार
विज्ञानमें अश्वका बोध हो जाय ।
एवं निवृत्तिमात्रकी प्रतीति होनेपर भी प्रवृत्ति सम्भव नहीं है ।