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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

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पृष्ठ 157

१०८ आत्मतत्त्वविवेके
यद्यश्वोऽपि गौः स्यात्, किन्तु गौर्गौरश्वोऽश्व इति । अन्यथा
निवृत्तावपि कुतस्ते समाश्वास इति । निवृत्त्यन्तराच्चेदनवस्था ।
निवर्त्यनिवृत्तितदधिकरणानां स्वरूपसाङ्कर्ये प्रवृत्तिसंकरः स्यात् ।
स्वरूपभेदेनैव नियमे विधिमात्रप्रतिभासेऽपि तथा किं न स्यात् ?
स्वरूपभेद एवान्यापोहोऽन्यापोहस्वरूपत्वाद् विधेरिति चेत्,
न, अलीकपक्षे तदभावात्, तस्य स्वरूपविधावनलीकत्वप्रसङ्गात्,
यहाँ गोपदार्थमें जैसे अगो अर्थात् अश्वादिकी निवृत्ति सूचित होती है,
वैसे उस अगोनिवृत्तिरूप गोपदार्थमें अनश्वनिवृत्तिकी निवृत्ति सूचित
होती है या नहीं ? यदि सूचित होती है, तो जैसे गौमे अगोकी
निवृत्ति माननी पड़ती है, वैसे ही अगोनिवृत्तिमें भी निवृत्त्यन्तरकी
निवृत्ति माननी पड़ेगी । उस दूसरी निवृत्तिमे भी अन्योंकी तीसरी
निवृत्ति और उसमे चौथी पाँचवीं आदि । इस प्रकार निवृत्तिमे भी
अन्यकी निवृत्ति मानते हुए को अनवस्थादोष आ जायगा । क्योंकि
आप हरेक वस्तुका स्वतःप्रजातिका न मानते हुए अन्यकी निवृत्तिरूपसे
ही मानते जाते हैं ।
यदि निवृत्तिमे अन्यनिवृत्ति न सूचित होती है, तो इसका अर्थ है
कि गौ भले ही अश्वादिकी निवृत्तिरूप है, किन्तु गोगतनिवृत्ति अश्वादि-
निवृत्तिरूप या उस निवृत्तिकी निवृत्तिरूप नहीं है । ऐसी स्थितिमे
गोगतनिवृत्ति अश्व आदि निवर्त्यरूप हो जायगी और गोत्व आपके मतसे
निवृत्तिरूप है ही । अतएव गौ, निवृत्ति और अश्व इन सभोंके एक ही
स्वरूप बन जानेसे गोशब्द सुननेपर अश्वमे प्रवृत्ति अवश्य होने लगेगी ।
यदि कहो कि—निवृत्ति तो स्वरूपसे ही ( अपने आप ) विलक्षण
रूपवाली है, अतः उसमे अन्य निवृत्तिका स्फुरण नहीं होता, इसलिए
अनवस्था आदि पूर्वोक्त दोष नहीं हो सकते—तो मेरा गोत्व भी स्वतः
एव अन्योंसे विलक्षण है । इतने से ही गोशब्दके सुननेपर अश्वादिमे
प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी । फिर आवश्यकता क्या है कि गोपदसे अन्योंमें
प्रवृत्ति रोकनेके लिए गोत्वको अन्योंकी निवृत्तिरूप ही माना जाय ।
( शंका ) स्वरूपविशेषात्मक वस्तु ही अन्यव्यावृत्ति ( अन्यकी