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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 530 में से

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पृष्ठ 158

स्वलक्षणस्य च विकल्पानारोहात् । अपि च गां बधानेति देशितो
गवि प्रवृत्तो नाश्वे, तदप्रतीतेः । यदा त्वश्वमुपलप्स्यते तदा
तत्र प्रवृत्त्युन्मुखोऽपि गोरभावं प्रतीत्यैव निवर्त्स्यतीति
किमनुपपन्नम् ॥
स्यादेतत्, न ह्यनुभवमवधूय भवितुं क्षममिति को विधिस्फुर-
णमपह्नुताम्, तदुपसर्जनीभूतस्तन्निषेधोऽपि स्फुरत्येव, अन्यथा
निवृत्ति) रूप है, क्योंकि भाववस्तु अन्यसे व्यावृत्त होकर ही भासित
होती है । अन्यव्यावृत्ति तो निषेधात्मक होनेसे निःस्वरूप है । अतः
उस व्यावृत्तिमें पुन अन्यकी व्यावृत्ति नहीं है, किन्तु वह स्वतः व्यावृत्त
है । इसलिए अनवस्थादोष भी नहीं आ सकता है ।
(उत्तर) अनवस्थाका यह समाधान ठीक नहीं है। क्योंकि उक्त
भाववस्तुको अलीक (मिथ्या) मानो तो उसका कोई स्वरूप नहीं हो
सकता । यदि कोई स्वरूप हो तो फिर उसे अलीक मानना असंगत
होने लगेगा । यदि उसे स्वलक्षण अर्थात् जातिविहीन एक व्यक्तिरूप
मानो तो वह तुम्हारे मतानुसार निर्विकल्पकज्ञानका ही विषय होनेसे
सविकल्पकज्ञानका विषय न हो सकेगा, जो सविकल्पक हमारे व्यव-
हारोंका प्रयोजक है ।
एवं, "गौ बाधो" यह आदेश पाकर गौमे ही कोई प्रवृत्त होता है,
न कि घोड़ेमे । क्योंकि उस वाक्यद्वारा घोड़ेकी प्रतीति ही नहीं होती है
तो उसमे प्रवृत्ति कैसे होगी ? इसलिए उक्त आदेशके बाद घोड़ेमें
प्रवृत्तिको रोकनेके लिए भी गोपदसे अन्यकी निवृत्तिका भान मानना
व्यर्थ है । उक्त आदेशवाक्य सुननेके बाद प्रवृत्तिके लिए तैयार होने-
पर भी यदि प्रत्यक्षसे वहाँ अश्व उपलब्ध हो जायगा तो गौका अभाव
जानकर ही निवृत्त हो जायगा । इसलिए मेरे सिद्धान्तमें कोई दोष
नहीं है ॥
ज्ञानश्रीसम्मत अपोहवादका खण्डन
(पूर्वपक्ष) अस्तु, अनुभवका अपलाप करके शास्त्र नहीं चल सकता,
इसलिए विधिरूपमें गोत्वादिभानको कौन अस्वीकार करेगा ? फिर भी