आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः ८३
वाक्यस्य¹ सोपाख्येति शेषः । नन्वयमपि क्षणभङ्गस्योद्गारः²,
स च कफोणिगुडायितो वर्तते । भवतु वा निवृत्तिरसमर्था, तथाप्य-
हेतुकत्वे तस्याः किमायातम् ? तुच्छस्य कीदृशं जन्मेति चेत् ?
यादृशः कालदेशनियमः । सोऽपि तस्य कीदृश इति चेदेवं तर्हि न
घटनिवृत्तिः क्वापि कदापि, सर्वत्रैव सदैवेति स्यात् ।
निवृत्तिर्नास्ति” ऐसा परिष्कारकर तदनुसार वस्तुकी निवृत्ति ( विनाश )
भावस्वरूपसे अतिरिक्त निरुपाख्य ( अनिर्वचनीय ) है । अतएव
वैसी निवृत्ति ( विनाश ) के लिए किसी हेतुकी अपेक्षा नहीं होनेसे
उत्पन्न होते ही वस्तुका विनाश स्वतः होता रहेगा और क्षणिकवाद
अनायास सिद्ध हो जायगा ।
( उत्तर ) निश्चित ही यह कथन भी क्षणभंगका उद्गार ( डँकार )
मात्र है । और वह कण्ठके भीतर पहुंचे हुए गुड़के समान है ।
अर्थात् भीतर गये हुए गुड़का जैसे कोई स्वाद नहीं आता, वैसे ही
उक्त परिष्कारसे भी क्षणभङ्गसिद्धिमें कोई लाभ नहीं है । क्योंकि
अनेक प्रकारसे क्षणभङ्गवादको खण्डित किया जा चुका है ।
अथवा वस्तुकी निवृत्ति अनिर्वचनीय भले ही हो, फिर भी “वह
बिना किसी हेतुकी अपेक्षा किये ही होती रहती है” यह तो सिद्ध
नहीं ही हुआ ।
यदि कहो कि-अभाव ( निवृत्ति ) तो मिथ्या है, अतः उसका
हेतुसे जन्म कैसा ? तो ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि जैसे अलीक भी
किसी नियत काल और देशमे ही होता है, वैसे वह किसी नियत
हेतुसे ही होगा ।
यदि कहो कि-अलीकमें देश और कालका सम्बन्ध भी कैसा ?
अर्थात् अलीकमे देशकालका सम्बन्ध भी नहीं होता है-तब तो घटकी
निवृत्ति कहीं भी और कभी भी न हो सकेगी या देशकालका नियम
न होनेसे सब जगह और हमेशा ही होने लगेगी ।
१, नास्तीत्यस्य-२ पु० पा० । निरुपाख्यैव निवृत्तिरस्तीत्याशयः ।
२. स्योद्धार -१ पु० पा०