ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित
ॐ
तत्सद्ब्रह्मणे नमः
ऐतरेयोपनिषद्
मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित
मनस्तापतमःशान्त्यै यस्य पादनखच्छटा ।
शरच्चन्द्रनिभा भाति तं वन्दे नीलचिन्मणिम् ॥
शान्तिपाठ
ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरा-
वीर्म एधि । वेदस्य म आणिस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीते-
नाहोरात्रान्सन्दधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु ।
तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
मेरी वागिन्द्रिय मनमें स्थित हो और मन वाणीमें स्थित हो
[ अर्थात् मेरी वागिन्द्रिय और मन एक-दूसरेके अनुकूल रहें ] । हे
स्वप्रकाश परमात्मन् ! तुम मेरे समक्ष आविर्भूत होओ । [ हे वाक् और
मन ! ] तुम मेरे प्रति वेदको लाओ । मेरा श्रवण किया हुआ मेरा
परित्याग न करे । अपने इस अध्ययनके द्वारा मैं रात और दिनको एक
कर दूँ [ अर्थात् मेरा अध्ययन अहर्निश चलता रहे ]। मैं ऋत (वाचिक
सत्य) का भाषण करूँ और सत्य ( मनमें निश्चय किया हुआ सत्य )
बोलूँ । वह ब्रह्म मेरी रक्षा करे; वह वक्ताकी रक्षा करे । वह मेरी रक्षा
करे और वक्ताकी रक्षा करे—वक्ताकी रक्षा करे । त्रिविध तापकी
शान्ति हो ।
प्रथम अध्याय
प्रथम अध्याय
प्रथम खण्ड
सम्बन्धभाष्य
परिसमाप्तं कर्म सहापरब्रह्म- | यहाँतक अपरब्रह्म (हिरण्यगर्भ)
[ग्रन्थस्य] विषयविज्ञानेन । सैषा | विषयक विज्ञान (उपासना) के
[प्रयोजनम्] कर्मणो ज्ञानसहितस्य | सहित कर्मका निरूपण समाप्त
परा गतिरुक्थविज्ञानद्वारेणोप- | हुआ * । उस ज्ञानसहित कर्मकी
संहृता । “एतत्सत्यं ब्रह्म प्राणा- | परा गतिका उक्थविज्ञानके† द्वारा
ख्यम्” “एष एको देवः” | उपसंहार किया गया है। [ उस
“एतस्यैव प्राणस्य सर्वे देवा | उपसंहारका मूलके वाक्योंद्वारा
विभूतयः” “एतस्य प्राणस्या- | प्रदर्शन कराते हैं—] “यह प्राण-
त्मभावं गच्छन्देवत। अप्येति” | संज्ञक सत्यब्रह्म है” “यह एक देव
इत्युक्तम् । सोऽयं देवताप्पय- | है” “सम्पूर्ण देव इस प्राणकी ही
लक्षणः परः पुरुषार्थः, एष | विभूतियाँ हैं।” “इस प्राणके
मोक्षः । स चायं यथोक्तेन | तादात्म्यको प्राप्त होकर उपासक
| देवतामें लीन हो जाता है”—ऐसा
| कहा गया। यह देवतामें लय होना
| ही परम पुरुषार्थ है, यही मोक्ष है
| और वह यह (देवतालयस्वरूप मोक्ष)
- ऐतरेय ब्राह्मणान्तर्गत द्वितीय आरण्यकके अध्याय ४, ५ और ६ का नाम
ऐतरेयोपनिषद् है। इसमें केवल ब्रह्मविद्याका ही निरूपण किया गया है। इससे
पूर्ववर्ती अध्यायोंमें अपर ब्रह्मकी उपासनाके सहित कर्मका वर्णन है। अतः इस
वाक्यसे यहाँ उसका परामर्श किया है।
† उक्थ प्राणको कहते हैं। अतः ‘वह उक्थ यानी प्राण मैं हूँ’ ऐसी
दृढ भावनाके द्वारा उसीमें लय हो जाना ‘उक्थविज्ञान’ है।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३
ज्ञानकर्मसमुच्चयसाधनेन प्राप्तव्यो | इस ज्ञानकर्मसमुच्चयरूप [पूर्वोक्त] साधनसे
नातः परमस्तीत्येके प्रतिपन्नाः । | ही प्राप्त होने योग्य है; इससे परे
तन्निराचिकीर्षुरुत्तरं केवलात्म- | और कुछ नहीं है—ऐसा कुछ
ज्ञानविधानार्थम् 'आत्मा वा | लोग समझते हैं। उन [ समुच्चय-
इदम' इत्याद्याह । | वादियोंके मत ] का निराकरण करने-
| की इच्छासे श्रुति केवल आत्म-
| विज्ञानका विधान करनेके लिये
| 'आत्मा वा इदम्' इत्यादि ग्रन्थका
| उल्लेख करती है।
कथं पुनरकर्मसंबन्धिकेवला- | पूर्व०—परन्तु यह कैसे ज्ञात होता
[प्रतिपाद्य-विचारः] त्मविज्ञानविधानार्थ | है कि आगेका ग्रन्थ कर्मके सम्बन्ध-
उत्तरो ग्रन्थ इति | से रहित केवल आत्मज्ञानका ही
गम्यते ? | विधान करनेके लिये है ?
अन्यार्थानवगमात् । तथा च | सिद्धान्ती—क्योंकि इससे [ ब्रह्म-
पूर्वोक्तानां देवतानामग्न्यादीनां | ज्ञानके सिवा ] किसी और अर्थका
संसारित्वं दर्शयिष्यत्यशनाया- | ज्ञान नहीं होता। इसके सिवा श्रुति
दिदोषवत्त्वेन "तमशनापिपा- | "उसे भूख और पिपासासे युक्त कर
साभ्यामन्ववार्जत्" (१।२।१) | दिया" इत्यादि वाक्योंसे उन अग्नि
इत्यादिना । अशनायादिमत्सर्वं | आदि पूर्वोक्त देवताओंको क्षुधा आदि
संसार एव; परस्य तु ब्रह्मणो- | दोषोंसे युक्त दिखलाते हुए उनका
ऽशनायाद्यत्ययश्रुतेः । | संसारित्व भी प्रदर्शित करेगी । पर-
| ब्रह्म भूख-प्यास आदिसे अतीत है—
| ऐसी श्रुति होनेके कारण क्षुधा
| आदिसे युक्त तो सब-का-सब संसार
| ही है।
भवत्वेवं केवलात्मज्ञानं मोक्ष- | पूर्व०—इस प्रकार केवल आत्मज्ञान
[समुच्चयवादिन आक्षेपः] साधनं न त्वत्रा- | ही मोक्षका साधन भले ही हो, परन्तु
कर्म्येणाधिक्रियते, | उसमें केवल कर्मत्यागी पुरुषका ही
| अधिकार नहीं है, क्योंकि इस
४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
विशेषाश्रवणात्। अकर्मिण आश्र- | विषयमें कोई विशेष श्रुति नहीं है;
| अर्थात् किसी कर्मत्यागी आश्रमान्तर-
म्यन्तरस्येहाश्रवणात् । कर्म च | का यहाँ उल्लेख नहीं है ।
| और बृहतीसहस्र नामक कर्मकी
बृहतीसहस्रलक्षणं प्रस्तुत्यानन्तर- | अवतारणाकर उसके अनन्तर ही
मेवात्मज्ञानं प्रारभ्यते । तस्मात् | आत्मज्ञानका प्रारम्भ कर दिया है ।
| अतः इसमें कर्मठ पुरुषका ही
कर्म्येवाधिक्रियते । | अधिकार है ।
न च कर्मासंबन्ध्यात्मविज्ञानं | इसके सिवा आत्मज्ञान कर्मसे
पूर्ववदन्त उपसंहारात् । यथा | सर्वथा असम्बद्ध भी नहीं है, क्योंकि
| यहाँ भी अन्तमें उसका पहले-
कर्मसंबन्धिनः पुरुषस्य सूर्यात्मनः | हीके समान उपसंहार किया गया
स्थावरजङ्गमादिसर्वप्राण्यात्मत्व- | है । जिस प्रकार ब्राह्मणमन्त्रने
| "सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च¹" इस
मुक्तं ब्राह्मणेन मन्त्रेण च "सूर्य | वाक्यद्वारा सूर्यके आत्मभावको प्राप्त
आत्मा" (ऋ०सं० १।११५।१) | हुए [ सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती ] कर्म-
| सम्बन्धी पुरुषको स्थावरजंगमादि
इत्यादिना, तथैव 'एष ब्रह्मैष | सम्पूर्ण प्राणियोंका आत्मा बतलाया है
इन्द्रः' ( ३।१।३) इत्या- | उसी प्रकार श्रुति 'एष ब्रह्मैष इन्द्रः²'
| इत्यादि मन्त्रसे समस्त प्राणियोंके
द्युपक्रम्य सर्वप्राण्यात्मत्वम् | आत्मस्वरूपत्वका उपक्रम कर उसका
'यच्च स्थावरं सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रम्' | 'यच्च स्थावरं सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रम्³'
(३।१।३) इत्युपसंहरिष्यति । | इत्यादि वाक्यद्वारा उपसंहार करेगी। *
१. सूर्य जङ्गम और स्थावरका आत्मा है । २. यह ब्रह्मा है, यह इन्द्र है ।
३. जो कुछ स्थावर-जङ्गम है सब प्रज्ञा ( चेतन ) द्वारा प्रवृत्त होनेवाला है ।
- इस प्रकार जैसे पूर्व अध्यायमें कर्मसम्बन्धी उपासनाका विषय होनेसे
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५
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तथा च संहितोपनिषदि | इसी प्रकार संहितोपनिषद्में भी
“एतं ह्येव बह्वृचा महत्युक्थे | “इसीको बह्वृच (ऋग्वेदी) बृहती-
मीमांसन्ते” ( ऐ० आ० ३।२। | सहस्र नामक सत्रमें विचारते हैं”
| इत्यादि श्रुतिसे उसका कर्मसम्बन्धित्व
३।१२) इत्यादिना कर्मसंबन्धि- | प्रतिपादन कर “सम्पूर्ण भूतोंमें
त्वमुक्त्वा “सर्वेषु भूतेष्वेवमेव | इसीको ‘ब्रह्म’ ऐसा कहते हैं” इस
ब्रह्मेत्याचक्षते” इत्युपसंहरति । | प्रकार उपसंहार किया है । तथा
| “जो यह अशरीरी चेतन आत्मा
तथा तस्यैव “योऽयमशरीरः | है” इस प्रकार बतलाये हुए उस
| आत्माका ही “जो यह सूर्यके
प्रज्ञात्मा” इत्युक्तस्य “यश्चासा- | अन्तर्गत है वह एक ही है—ऐसा
वादित्य एकमेव तदिति विद्यात्” | जाने” इस वाक्यद्वारा एकत्व प्रति-
इत्येकत्वमुक्तम् । इहापि “कोऽय- | पादन किया है । तथा यहाँ (इस
| उपनिषद्में) भी “यह आत्मा कौन
मात्मा” (३।१।१) इत्युपक्रम्य | है” इस प्रकार उपक्रम कर “प्रज्ञान
प्रज्ञात्मत्वमेव “प्रज्ञानं ब्रह्म” (३। | ब्रह्म है” इस वाक्यसे इसका प्रज्ञा-
| स्वरूपत्व ही प्रदर्शित करेंगे । अतः
१।३) इति दर्शयिष्यति । तस्मा- | आत्मज्ञान कर्मत्यागसे संबन्ध नहीं
न्नाकर्मसंबन्ध्यात्मज्ञानम् । | रखता ।
पुनरुक्त्यानर्थक्यमिति चेत् । | यदि कहो कि पुनरुक्ति होनेके
| कारण तो यह प्रकरण व्यर्थ ही है;*
कथम् ? “प्राणो वा अहमस्म्यृषे” | किस प्रकार [व्यर्थ है सो बतलाते हैं—]
| “हे ऋषे ! मैं निश्चय प्राण ही हूँ”
इत्यादिब्राह्मणेन “सूर्य आत्मा” | इत्यादि ब्राह्मणसे तथा “सूर्य आत्मा है”
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अन्तमें उपास्यका सर्वात्मत्व प्रतिपादन किया है उसी प्रकार इस अध्यायमें
‘एष ब्रह्मा’ इत्यादि वाक्योंसे बतलाया गया है । अतः जिस प्रकार वह देवता
ज्ञानकर्मसम्बन्धी था उसी प्रकार यह आत्मज्ञान भी कर्मसम्बन्धी ही है—ऐसा
अनुमान होता है ।
- क्योंकि कर्मका तो पहले ही निरूपण किया जा चुका है ।
६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
इति मन्त्रेण च निर्धारितस्यात्मन इत्यादि मन्त्रद्वारा निश्चित किये
आत्माका “यह आत्मा कौन है”
"आत्मा वा इदम्" इत्यादि- इस प्रकार प्रश्न करके “[पहले]
ब्राह्मणेन “कोऽयमात्मा" (३।१। यह सब आत्मा ही [था]”
इस प्रकार निश्चय करना पुनरुक्ति
१) इति प्रश्नपूर्वकं पुनर्निर्धारणं और निरर्थक ही है—यदि कोई ऐसा
पुनरुक्तमनर्थकमिति चेत्, न; कहे तो उसका यह कथन ठीक
नहीं, क्योंकि उसीके किसी अन्य
तस्यैव धर्मान्तरविशेषनिर्धार- विशेष धर्मका निश्चय करनेके लिये
णार्थत्वान्न पुनरुक्ततादोषः । होनेसे इसमें पुनरुक्तिका दोष नहीं है।
कथम् ? तस्यैव कर्मसंबन्धिनो वह किस प्रकार दोषयुक्त नहीं है
[सो बतलाते हैं-] उस कर्मसम्बन्धी
जगत्सृष्टिस्थितिसंहारादिधर्मवि- आत्माके ही जगत्की रचना, पालन
और संहार आदि विशेष धर्मोंका
शेषनिर्धारणार्थत्वात् केवलोपा- निर्धारण करनेके लिये किंवा केवल
उसकी उपासनाके [निरूपणके] लिये
[ इस प्रकारकी पुनरुक्ति सदोष
स्त्यर्थत्वाद्वा । अथवा आत्मे- नहीं है ] । अथवा यों समझो कि
त्यादिपरो ग्रन्थसन्दर्भ आत्मनः कर्मका निरूपण करते समय विधान
न करनेके कारण कर्मी आत्माकी
कर्मिणः कर्मणोऽन्यत्रोपासना- उपासना कर्मको छोड़कर प्राप्त
नहीं होती थी; अतः “आत्मा वा
प्राप्तौ कर्मप्रस्तावेऽविहितत्वात्के- इदमग्रे” आदि ग्रन्थसमूह यह
बतलानेके लिये ही है कि केवल
वलोऽप्यात्मोपास्य इत्येवमर्थः । आत्मा भी उपासनीय है । भेद और
अभेदरूपसे उपास्य होनेके कारण
भेदाभेदोपास्यत्वाद्बैक एवात्मा एक ही आत्मा कर्मके विषयमें
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७
कर्मविषये भेददृष्टिभाक्, स एवा- | भेददृष्टिसे युक्त है और वही कर्म-
कर्मकालेऽभेदेनाप्युपास्य इत्येव- | दृष्टिको छोड़ देनेके समय अभेद-
मपुनरुक्तता । | रूपसे भी उपासनीय है—इस प्रकार
| यह अपुनरुक्ति ही है ।
“विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदो- | “जो पुरुष विद्या ( उपासना )
भयꣳ सह। अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा | और अविद्या ( कर्म ) इन दोनोंको
| साथ-साथ जानता है वह अविद्यासे
विद्ययामृतमश्नुते” ( ई० उ० ११) | मृत्युको पार करके विद्यासे अमरत्व
इति, “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजी- | प्राप्त कर लेता है” तथा “इस
| लोकमें कर्म करता हुआ ही सौ
विषेच्छतꣳ समाः” ( ई० उ० २) | वर्षतक जीवित रहनेकी इच्छा करे”
| —ऐसा [ ईशोपनिषद्में ] वाजसनेयी
इति च वाजिनाम् । न च वर्ष- | शाखावालोंका कथन है । मनुष्योंकी
शतात्परमायुर्मर्त्यानाम् । येन | परमायु भी सौ वर्षसे अधिक नहीं
| है, जिससे कि वह कर्मपरित्याग-
कर्मपरित्यागेनात्मानमुपासीत । | द्वारा आत्माकी उपासना कर सके।
दर्शितं च “तावन्ति पुरुषा- | “पुरुषकी आयुके इतने ( छत्तीस )
युषोऽह्नां सहस्राणि भवन्ति” | ही* सहस्र दिन होते हैं” ऐसा
| [ इस ऐतरेयारण्यकमें ही ] दिख-
इति । वर्षशतं चायुः कर्मणैव | लाया भी गया है । और वह सौ
व्याप्तम् । दर्शितश्च मन्त्रः “कुर्व- | वर्षकी आयु कर्मसे ही व्याप्त है;
| इसके लिये “कुर्वन्नेवेह कर्माणि”
न्नेवेह कर्माणि” इत्यादिः । | इत्यादि मन्त्र पहले दिखलाया ही है।†
- ऐतरेय आरण्यकमें छत्तीस-छत्तीस अक्षरके एक सहस्र बृहतीछन्द हैं।
अतः उसमें कुल छत्तीस सहस्र अक्षर हुए। इतने ही दिन मनुष्यकी परमायुमें
होते हैं।
† इससे यह नहीं समझना चाहिये कि दशरथादिके समान जो सौ
वर्षसे भी अधिक जीवित रहनेवाले पुरुष हैं वे तो सौ वर्षसे ऊपर जाने-
पर कर्मत्याग कर ही सकते हैं । उनके लिये भी आगेकी श्रुतियाँ
जीवनपर्यन्त कर्मानुष्ठानकी आवश्यकता बतलाती हैं ।
८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
तथा “यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहो- | ऐसा ही “यावज्जीवन अग्निहोत्र
ति” “यावज्जीवं दर्शपूर्णमासा- | करता है” “जीवनपर्यन्त दर्श-
भ्यां यजेत” इत्याद्याश्च । “तं | पूर्णमाससे यजन करे” इत्यादि
यज्ञपात्रैर्दहन्ति” इति च । | तथा [ वृद्धावस्था में भी कर्मत्यागका
ऋणत्रयश्रुतेश्च । तत्र पारिव्रा- | निषेध सूचित करनेवाली ] “उस-
ज्यादि शास्त्रं “व्युत्थायाथ | को [ मरनेके अनन्तर ] यज्ञपात्रोंके
भिक्षाचर्यं चरन्ति” ( बृ० उ० | सहित जलाते हैं” इत्यादि श्रुतियोंसे
३।५।१, ४।४।२२) इति | और ऋणत्रयकी सूचना देनेवाली
आत्मज्ञानस्तुतिपरोऽर्थवादः । | श्रुतियोंसे सिद्ध होता है । श्रुतिमें
अनधिकृतार्थो वा । | जो “[ यतिजन ] सर्वसंग परित्याग
| करके भिक्षाटन किया करते हैं”
| इत्यादि संन्याससम्बन्धी शास्त्र है
| यह आत्मज्ञानकी स्तुति करनेवाला
| अर्थवाद है । अथवा जिसे कर्मका
| अधिकार नहीं है उसके लिये है ।
न; परमार्थविज्ञाने फलादर्शने | सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक
· आक्षेपनिरासः क्रियानुपपत्तेः। य- | नहीं, क्योंकि उस परमार्थ—आत्म-
दुक्तं कर्मिण आत्म- | तत्त्वका ज्ञान हो जानेपर क्रियाका
ज्ञानं कर्मसंबन्धि च | कोई फल नहीं देखा जाता; इसलिये
इत्यादि, तन्न । परं ह्याप्तकामं | क्रिया नहीं हो सकती । तुमने
सर्वसंसारदोषवर्जितं ब्रह्माहम- | जो कहा कि आत्मज्ञान कर्मीको ही
स्मीत्यात्मत्वेन विज्ञाते, कृतेन | होता है और वह कर्मसे सम्बन्ध
कर्तव्येन वा प्रयोजनमात्मनो- | रखनेवाला है, सो ठीक नहीं ।
| 'सम्पूर्ण सांसारिक दोषोंसे रहित
| पूर्णकाम ब्रह्म मैं हूँ' इस प्रकार ब्रह्मका
| आत्मभावसे ज्ञान हो जानेपर कर्म-
| फलको न देखनेके कारण कृत
| अथवा कर्तव्यसे अपना कोई प्रयोजन
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९
ऽपश्यतः फलादर्शने क्रिया नोप- | न देखनेवाले पुरुषसे कोई क्रिया
पद्यते । | नहीं हो सकती ।
फलादर्शनेऽपि नियुक्तत्वा- | यदि कहो कि फल दिखायी न
आत्मदर्शिनो त्करोतीति चेन्न, | देनेपर भी शास्त्राज्ञा होनेके कारण
नियोगाविषयत्वम् नियोगाविषयात्म- | वह कर्म करता ही है तो ऐसा
दर्शनात् । इष्टयोगमनिष्टवियोगं | कहना उचित नहीं, क्योंकि वह
चात्मनः प्रयोजनं पश्यंस्तदुपा- | शास्त्राज्ञाके अविषयभूत आत्माका
यार्थी यो भवति स नियोगस्य | दर्शन कर लेता है। जो पुरुष अपना
विषयो दृष्टो लोके । न तु त- | इष्टप्राप्ति और अनिष्टपरिहाररूप
द्विपरीतनियोगाविषयब्रह्मात्मत्व- | प्रयोजन देखकर उसके उपायका
दर्शी । | अर्थी होता है, लोकमें वही [ विधि-
ब्रह्मात्मत्वदर्श्यपि संश्चेन्नि- | निषेधरूप ] नियोगका विषय होता
युज्येत नियोगाविषयोऽपि सन्न | देखा गया है; उसके विपरीत
कश्चिन्न नियुक्त इति सर्वं कर्म | नियोगके अविषयभूत ब्रह्ममें आत्मत्व-
सर्वेण सर्वदा कर्तव्यं प्राप्नोति । | का दर्शन करनेवाला पुरुष नियोग-
तच्चानिष्टम् । न च स नियोक्तुं | का विषय होता नहीं देखा जाता ।
शक्यते केनचित् ; आम्ना- | यदि ब्रह्मात्मत्व-दर्शन करनेवाला
यस्यापि तत्प्रभवत्वात् । न हि | पुरुष नियोगका अविषय होनेपर
| भी शास्त्रसे नियुक्त हो तो कोई
| नियुक्त न होनेवाला तो रहा ही
| नहीं । इससे यही प्राप्त होता है कि
| सबको सर्वदा सम्पूर्ण कर्म करते
| रहना चाहिये । किन्तु यह अभीष्ट
| नहीं है । वह ( आत्मदर्शी ) तो
| किसीसे भी नियोजित नहीं हो
| सकता, क्योंकि शास्त्र भी उसीसे
| उत्पन्न हुआ है । अपने विज्ञानसे
१० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
१० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦
स्वविज्ञानोत्थेन वचसा स्वयं | उत्पन्न हुए वचनसे ही कोई स्वयं
नियुज्यते । नापि बहुवित्स्वा- | नियुक्त नहीं हो सकता और न
म्यविवेकिना भृत्येन । | बहुज्ञ स्वामी ही अपने अल्पज्ञ सेवक-
| से नियुक्त हो सकता है ।
आम्नायस्य नित्यत्वे सति | यदि कहो कि नित्य होनेके
स्वातन्त्र्यात्सर्वान्प्रति नियोक्तृत्व- | कारण वेदका नियोक्तृत्व-सामर्थ्य
सामर्थ्यमिति चेन्न उक्तदोषात् । | स्वतन्त्रतापूर्वक सबके प्रति है; तो
तथापि सर्वेण सर्वदा सर्वमविशिष्टं | उपर्युक्त दोषके कारण ऐसा कहना
कर्म कर्तव्यमित्युक्तो दोषोऽप्य- | ठीक नहीं । ऐसी अवस्थामें भी
परिहार्य एव । | 'सबको सब कर्म अविशेषरूपसे
| करने चाहिये'—यह ऊपर बतलाया
| हुआ दोष अपरिहार्य ही रहता है।
तदपि शास्त्रेणैव विधीयत | यदि कहो कि उसका विधान
शास्त्रस्य विरुद्धार्थ- इति चेद् यथा कर्म- | भी शास्त्रने ही किया है अर्थात्
बोधकत्वानुपपत्तिः कर्तव्यता शास्त्रेण | जिस प्रकार शास्त्रने कर्मकी
कृता तथा तदप्यात्मज्ञानं तस्यैव | कर्तव्यता बतलायी है उसी प्रकार
कर्मणः शास्त्रेण विधीयत इति | उस कर्मीके लिये ही उस आत्मज्ञान-
चेत्, न; विरुद्धार्थबोधकत्वा- | का भी शास्त्रने ही विधान किया है
नुपपत्तेः । न ह्येकस्मिन्कृताकृत- | तो ऐसा कहना भी उचित नहीं,
संबन्धित्वं तद्विपरीतत्वं च | क्योंकि उसका विरुद्ध-अर्थ-बोधकत्व
बोधयितुं शक्यम्, शीतोष्ण- | सम्भव नहीं है । अग्निकी शीतलता
तामिवाग्नेः । | और उष्णताके समान एक ही
| शास्त्रमें पाप-पुण्यके सम्बन्धित्व और
| उसके विपरीतत्वका बोध कराना—
| [ये दोनों विरुद्धधर्म] सम्भव
| नहीं हैं।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११
न चेष्टयोगचिकीर्षा आत्म- | इसके सिवा अपनी इष्टवस्तुके
[सिद्धवस्तुनः] नोऽनिष्टवियोगचि- | संयोगकी इच्छा तथा अनिष्ट पदार्थके
[शास्त्रबोध्यत्वम्] कीर्षा च शास्त्रकृता, | परित्यागकी अभिलाषा भी शास्त्र-
सर्वप्राणिनां तद्दर्शनात् । शास्त्र- | जनित नहीं है, क्योंकि यह सभी
कृतं चेत्तदुभयं गोपालादीनां न | प्राणियोंमें [ स्वभावसे ही ] देखी
दृश्येत, अशास्त्रज्ञत्वात्तेषाम् । | जाती है । यदि शास्त्रजनित होतीं
यद्धि स्वतोऽप्राप्तं तच्छास्त्रेण | तो ये दोनों इच्छाएँ ग्वाले आदिमें
बोधयितव्यम् । तच्चेत्कृतकर्तव्य- | दिखायी न देतीं; क्योंकि वे अशास्त्रज्ञ
ताविरोध्यात्मज्ञानं शास्त्रेण | होते हैं । जो वस्तु स्वतः प्राप्त नहीं
कृतम्, कथं तद्विरुद्धां कर्तव्यतां | होती वही शास्त्रद्वारा बोद्धव्य होती
पुनरुत्पादयेच्छीततामिवाग्नौ तम | है । इस प्रकार यदि शास्त्रने कृत
इव च भानौ । | और कर्तव्यताके विरोधी आत्मज्ञान-
| का उपदेश किया है तो फिर वह
| अग्निमें शीतलताके समान तथा
| सूर्यमें अन्धकारके समान उसकी
| विरुद्ध कर्तव्यताको किस प्रकार
| उत्पन्न करेगा ?
न बोधयत्येवेति चेन्न, "स | यदि कहो कि वह ऐसा बोध
म आत्मेति विद्यात्" (कौ० उ० | कराता ही नहीं है तो ऐसा कथन
३।९)"प्रज्ञानं ब्रह्म"(३।१।३) | भी ठीक नहीं, क्योंकि "वह मेरा
इति चोपसंहारात् । "तदात्मा- | आत्मा है-ऐसा जाने" तथा "प्रज्ञान
नमेवावेत्" (बृ० उ० १।४। | ही ब्रह्म है" इस प्रकार उपसंहार
९) "तत्त्वमसि" (छा० उ० | किया गया है, तथा "उस (जीव-
६। ८-१६) इत्येवमादिवा- | रूपसे अवस्थित ब्रह्म) ने अपनेको
क्यानां तत्परत्वात् । उत्पन्नस्य | ही जाना" "वह तू ही है"
| इत्यादि वाक्य भी आत्मज्ञानपरक
| ही हैं । उत्पन्न हुआ ब्रह्मात्मविज्ञान
१२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
च ब्रह्मात्मविज्ञानस्याबाध्यमान- | भी बाधित होने योग्य न होनेके
त्वान्नानुत्पन्नं भ्रान्तं वेति शक्यं | कारण अनुत्पन्न या भ्रान्तिजनित
वक्तुम् । | नहीं कहा जा सकता ।
त्यागेऽपि प्रयोजनाभावस्य | यदि कहो कि “उसे इस लोकमें
[प्रयोजनाभावे] तुल्यत्वमिति चेत् | अकृत ( कर्मत्याग ) से भी कोई
[संन्यासस्य] “नाकृतेनेह कश्चन” | प्रयोजन नहीं है” इस स्मृतिके
[स्वतःसिद्धत्वम्] (गीता ३ । १८) | अनुसार बोधवान्को त्याग करनेमें
| भी प्रयोजनाभावकी समानता ही
इति स्मृतेः, य आहुर्विदित्वा | है; अर्थात् जो लोग कहते हैं कि
ब्रह्म व्युत्थानमेव कुर्यादिति | ब्रह्मको जानकर व्युत्थान ( कर्म-
| त्याग ) ही करना चाहिये उनके
तेषामप्येष समानो दोषः प्रयो- | लिये भी यह प्रयोजनाभावरूप दोष
जनाभाव इति चेन्न; अक्रिया- | समान ही है, तो उनका यह कथन
| ठीक नहीं क्योंकि व्युत्थान तो
मात्रत्वाद् व्युत्थानस्य । अविद्या- | अक्रिया ही है * । प्रयोजनका
निमित्तो हि प्रयोजनस्य भावो न | भाव तो अविद्याके कारण रहता है।
वस्तुधर्मः सर्वप्राणिनां तद्दर्शनात् । | वह वस्तुका धर्म नहीं है क्योंकि
| यह बात सभी प्राणियोंमें देखी
प्रयोजनतृष्णया च प्रेर्यमाणस्य | जाती है; अर्थात् प्रयोजनकी तृष्णा-
वाङ्मनःकायैः प्रवृत्तिदर्शनात् । | से प्रेरित होते हुए प्राणियोंकी वाणी
“सोऽकामयत जाया मे स्यात्” | मन और शरीरद्वारा प्रवृत्ति होतो देखी
(बृ० उ० १ । ४ । १७) | गयी है तथा वाजसनेयी ब्राह्मणमें
| भी “उस ( आदिपुरुष ) ने इच्छा
इत्यादिना पुत्रवित्तादि पाङ्क्त- | की कि मेरे पत्नी हो” इत्यादि कथनके
लक्षणं काम्यमेवेति “उभे ह्येते | द्वारा “ये दोनों (साध्य-साधनरूप)
- प्रयोजन तो क्रियाके लिये अपेक्षित होता है; इसलिये अक्रियारूप
व्युत्थानके लिये किसी प्रयोजनकी अपेक्षा नहीं है ।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३
एषणे एव" (बृ० उ० ३।५।१; | एषणाएँ ही हैं" इस निश्चयके अनुसार
४।४।२२) इति वाजसनेयि- | यही ज्ञात होता है कि पुत्र-वित्तादि
ब्राह्मणेऽवधारणात् । | पाङ्कलक्षण* कर्म काम्य ही है।
अविद्याकामदोषनिमित्ताया | अतः विद्वान्के अविद्या आदि
दोषोंका अभाव हो जानेके कारण
वाङ्मनःकायप्रवृत्तेः पाङ्कलक्ष- | अविद्या एवं कामनारूप दोषसे
णाया विदुषोऽविद्यादिदोषाभा- | होनेवाली मन, वाणी और शरीरकी
पाङ्क्तरूपा प्रवृत्ति उपपन्न नहीं
वादनुपपत्तेः क्रियाभावमात्रं | है; इसलिये व्युत्थान क्रिया-
का अभावमात्र है, वह यागादि-
व्युत्थानम्, न तु यागादिवदनु- | के समान अनुष्ठेयरूप और भावा-
ष्ठेयरूपं भावात्मकम् । तच्च | त्मक नहीं है। वह तो विद्यावान्
पुरुषका धर्म ही है; अतः उसके
विद्यावत्पुरुषधर्म इति न प्रयो- | लिये किसी प्रयोजनका अन्वेषण
करनेकी आवश्यकता नहीं है।
जनमन्वेष्टव्यम् । न हि तमसि | अन्धकारमें प्रवृत्त होनेवाला पुरुष
यदि प्रकाशके उदित होनेपर गड्ढे,
प्रवृत्तस्योदित आलोके यद्गर्त- | कीचड़ और काँटे आदिमें नहीं
पङ्ककण्टकाद्यपतनं तत्किंप्रयो- | गिरता तो 'इस (उसके न गिरने)
का क्या प्रयोजन है?' ऐसा प्रश्न
जनमिति प्रहार्हम् । | नहीं किया जा सकता ।
व्युत्थानं तर्ह्यर्थप्राप्तत्वान्न | तब तो स्वभावतः प्राप्त होनेके
कामाभावे चोदनार्हमिति गा- | कारण व्युत्थान चोदना (विधिवाक्य)
आत्मज्ञस्यापि र्हस्थ्ये चेत्परं ब्रह्म- | का विषय नहीं है। इसपर यदि
गार्हस्यानुपपत्तिः विज्ञानं जातं तन्नै- | कहो कि यदि किसीको गृहस्थाश्रममें
ही परब्रह्मका ज्ञान हो जाय तो उसे
- पंक्ति छन्द पाँच अक्षरका होता है। उससे सदृशता होनेके कारण
जिस कर्ममें पत्नी, पुत्र, दैववित्त, मानुषवित्त और कर्म इन पाँच साधनोंका योग
होता है वह पांक्त कर्म कहलाता है।
१४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
१४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
वास्तवकुर्वत आसनं न ततोऽन्यत्र | उस आश्रममें ही कुछ न करते हुए
| बैठा रहना चाहिये, वहाँसे कहीं
गमनमिति चेन्न, कामप्रयुक्तत्वा- | अन्यत्र नहीं जाना चाहिये, तो
द्गार्हस्थ्यस्य; "एतावान्वै कामः" | ऐसा कहना उचित नहीं, क्योंकि
| "इतनी ही कामना है" "ये दोनों
(बृ० उ० १।४।१७) इति "उभे | एषणाएँ ही हैं" इत्यादि वाक्योंसे
ह्येते एषणे एव" (बृ० उ० ३।५। | निश्चित किया जानेके कारण
| गृहस्थाश्रम तो कामनासे ही प्रयुक्त
१; ४।४। २२) इत्यवधार- | है। कामनाके निमित्तभूत पुत्र-
णात् । कामनिमित्तपुत्रवित्तादि- | वित्तादिके सम्बन्धके नियमका
संबन्धनियमाभावमात्रं न हि | अभावमात्र ही 'व्युत्थान' है;
| उनके पाससे कहीं अन्यत्र चला
ततोऽन्यत्र गमनं व्युत्थान- | जाना 'व्युत्थान' नहीं कहा जाता ।
मुच्यते । अतो न गार्हस्थ्य एवा- | अतः जिसे ज्ञान उत्पन्न हुआ है
| उसके लिये कुछ न करते हुए
कुर्वत आसनमुत्पन्नविद्यस्य । | गृहस्थाश्रममें ही स्थित रहना सम्भव
एतेन गुरुशुश्रूषातपसोरप्यप्रति- | नहीं है । इससे विद्वान्के लिये
| गुरुशुश्रूषा और तपस्याकी भी
पत्तिर्विदुषः सिद्धा । | अनुपपत्ति सिद्ध होती है ।
अत्र केचिद् गृहस्था भिक्षा- | इस विषयमें कोई-कोई गृहस्थ
टनादिभयात्परिभ- | पुरुष भिक्षाटनादिके भय और
.गृहस्थानामाक्षेपः |
वाच्च त्रस्यमानाः | तिरस्कारसे डरनेके कारण अपनी
| सूक्ष्मदर्शिता प्रकट करते हुए उत्तर
सूक्ष्मदृष्टितां दर्शयन्त उत्तरमाहुः। | देते हैं- 'केवल देहधारणमात्रके
भिक्षोरपि भिक्षाटनादिनियम- | इच्छुक भिक्षुके लिये भी भिक्षाटनादि-
दर्शनाद्देहधारणमात्रार्थिनो गृह- | का नियम देखा जाता है; अतः
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५
स्थस्यापि साध्यसाधनैषणोभयवि- | [ पुत्र-वित्तादि ] साध्य और [ कर्म-
निर्मुक्तस्य देहमात्रधारणार्थमश- | उपासना आदि ] साधन दोनोंकी
नाच्छादनमात्रमुपजीवतो गृह | एषणाओंसे मुक्त हुए केवल देह-
एवास्तवासनमिति । | धारणके लिये भोजनाच्छादनमात्रसे निर्वाह करनेवाले गृहस्थको भी घरहीमें रहना चाहिये ।'
न; स्वगृहविशेषपरिग्रहनियमस्य | परन्तु उनका ऐसा कहना ठीक
कामप्रयुक्तत्वादि- [तस्य निरासः] | नहीं । क्योंकि अपने गृहविशेषके
त्युक्तोत्तरमेतत् । स्व- | परिग्रहका नियम कामनाप्रयुक्त ही है—इस प्रकार इसका उत्तर पहले दिया
गृहविशेषपरिग्रहाभावे च शरीर- | ही जा चुका है । और अपने गृह-विशेषके परिग्रहका अभाव होनेपर
धारणमात्रप्रयुक्ताशनाच्छादना- | तो केवल शरीरधारणमात्रके लिये
र्थिनः स्वपरिग्रहविशेषाभावेऽर्था- | भोजनाच्छादनकी इच्छा करनेवाले पुरुषको अपने परिग्रह-विशेषका
द्भिक्षुकत्वमेव । | अभाव होनेके कारण स्वतः भिक्षुत्व ही प्राप्त हो जाता है ।
शरीरधारणार्थायां भिक्षाट- | जिस प्रकार भिक्षुके लिये शरीर-
नादिप्रवृत्तौ यथा [विद्वन्न्यास-विचारः] | रक्षामें उपयोगी भिक्षाटनादिकी प्रवृत्ति एवं शौचादिका नियम है
नियमो भिक्षोः शौ- | उसी प्रकार विद्वान् और निष्काम
चादौ च, तथा गृहिणोऽपि | गृहस्थको भी 'यावज्जीवादि' श्रुति-
विदुषोऽकामिनोऽस्तु नित्यकर्मसु | से नियुक्त होनेके कारण प्रत्यवायकी निवृत्तिके लिये नित्यकर्मोंमें नियमसे
नियमेन प्रवृत्तिर्यावज्जीवादिश्रुति- | प्रवृत्ति हो सकती है [ ऐसा यदि कोई कहे तो ] इस कथन-
नियुक्तत्वात् प्रत्यवायपरिहारा- | का तो पहले ही प्रतिवाद किया
येति । एतन्नियोगाविषयत्वेन | जा चुका है, क्योंकि नियोगका
१६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
१६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
विदुषः प्रत्युक्तमशक्यनियोज्य- | अविषय होनेके कारण विद्वान्
त्वाच्चेति । | नियुक्त नहीं किया जा सकता ।
यावज्जीवादिनित्यचोदनानर्थ- | पूर्व०—तब तो 'यावज्जीवन
| अग्निहोत्र करे' इत्यादि नित्य विधिकी
क्यमिति चेत् ? | व्यर्थता ही सिद्ध होती है ।
न, अविद्वद्विषयत्वेनार्थव- | सिद्धान्ती—नहीं, अविद्वान्-
| विषयक होनेके कारण वह सार्थक
त्त्वात् । यत्तु भिक्षोः शरीरधार- | है । केवल शरीरधारणमात्रके लिये
| भिक्षाटनादिमें प्रवृत्त हुए यतिकी
णमात्रप्रवृत्तस्य प्रवृत्तेर्नियतत्वं | प्रवृत्तिका जो नियतत्व है वह
तत्प्रवृत्तेर्न प्रयोजकम् । आचमन- | प्रवृत्तिका प्रयोजक नहीं है ।
| आचमनमें प्रवृत्त हुए पुरुषकी
प्रवृत्तस्य पिपासापगमवन्नान्यप्र- | पिपासानिवृत्तिके समान उसके
| भिक्षाटनादिका [क्षुधानिवृत्ति आदि-
योजनार्थत्वमवगम्यते । न चा- | के सिवा] कोई अन्य प्रयोजन नहीं
| समझा जाता । परन्तु इसके समान
ग्निहोत्रादीनां तद्वदर्थप्राप्तप्रवृत्ति- | अग्निहोत्रादि कर्मोंका स्वतःप्राप्त
| प्रवृत्तिको नियत करना नहीं माना
नियतत्वोपपत्तिः । | जा सकता ।*
अर्थप्राप्तप्रवृत्तिनियमोऽपि प्र- | पूर्व०—परन्तु प्रयोजनका अभाव
| हो जानेपर तो स्वतःप्राप्त प्रवृत्तिका
योजनाभावेऽनुपपन्न एवेति चेत् ? | नियम भी व्यर्थ ही है ?
न, तन्नियमस्य पूर्वप्रवृत्ति- | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि यह
| [भिक्षाटनादिका] नियम पूर्वप्रवृत्तिसे
सिद्धत्वात्तदतिक्रमे यत्नगौरवात् । | सिद्ध होनेके कारण उसके उल्लङ्घनमें
| अधिक प्रयत्नकी आवश्यकता है ।
- क्योंकि वे तो स्वर्गादिकी कामनासे ही किये जाते हैं, उनकी प्रवृत्ति स्वाभाविक नहीं है ।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७
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[मूल संस्कृत]
अर्थप्राप्तस्य व्युत्थानस्य पुनर्वि-
चनाद्विदुषः कर्तव्यत्वोपपत्तिः ।
अविदुषापि मुमुक्षुणा पारि-
[पार्श्व-टिप्पणी: विविदिषा-संन्यासविधानम्] व्राज्यं कर्तव्यमेव ।
तथा च “शान्तो
दान्तः०” ( बृ० उ० ४ । ४ ।
२३) इत्यादिवचनं प्रमाणम् ।
शमदमादीनां चात्मदर्शनसाध-
नानामन्याश्रमेष्वनुपपत्तेः । “अ-
त्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रं प्रोवाच
सम्यगृषिसङ्घजुष्टम्” ( ६ । २१)
इति च श्वेताश्वतरे विज्ञायते । “न
कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके
अमृतत्वमानशुः” ( कैवल्य० २)
इति च कैवल्यश्रुतिः । “ज्ञात्वा
नैष्कर्म्यमाचरेत्” इति च स्मृतेः।
“ब्रह्माश्रमपदे वसेत्” इति च
[भाष्यार्थ]
और स्वभावतः प्राप्त व्युत्थानका
[“व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति”
आदि वाक्योंसे] पुनः विधान किया
गया है, इसलिये विद्वान् मुमुक्षुके लिये
उसकी कर्तव्यता उचित ही है। जिस
मुमुक्षुको ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है
उसे भी संन्यास करना ही चाहिये।
इस विषयमें “शान्तो दान्त उपरत-
स्तितिक्षुः” आदि वचन प्रमाण हैं ।
तथा आत्मदर्शनके साधन शम-
दमादिका अन्य आश्रमोंमें होना
सम्भव भी नहीं है, जैसा कि “मन्त्रद्रष्टा
ऋषियोंद्वारा भलीप्रकार सेवित उस
परम पवित्र तत्त्वका परमहंसोंको
उपदेश किया” इत्यादि मन्त्रोंसे
श्वेताश्वतरोपनिषद्में बतलाया गया
है, तथा “कर्मसे, प्रजासे अथवा
धनसे नहीं बल्कि त्यागसे ही किन्हीं-
किन्हींने अमरत्व प्राप्त किया है”
ऐसी कैवल्योपनिषद्की श्रुति भी
है । और “ज्ञान प्राप्तकर नैष्कर्म्यका
आचरण करे” इस स्मृतिसे भी यही
सिद्ध होता है । “ब्रह्माश्रमपदे वसेत्”
इस स्मृतिके अनुसार ज्ञानप्राप्तिके
[पाद-टिप्पणी]
१. ब्रह्माश्रम [अर्थात् ब्रह्मज्ञानके साधनभूत संन्यासाश्रम] में निवास करे ।
१८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
१८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
ब्रह्मचर्यादिविद्यासाधनानां च | साधन ब्रह्मचर्यादिकी सिद्धि भी सम्यक्
साकल्येनात्याश्रमिषूपपत्तेर्गाहं- | रीतिसे संन्यासियोंमें ही हो सकती है,
स्थ्येऽसंभवात् । न चासंपन्नं साधनं | क्योंकि गृहस्थाश्रममें उन साधनोंका
कस्यचिदर्थस्य साधनायालम् । | होना असम्भव है; और अपूर्ण साधन
यद्विज्ञानोपयोगीनि च गार्हस्थ्या- | किसी अर्थको सिद्ध करनेमें समर्थ
श्रमकर्माणि तेषां परमफलमुप- | नहीं है । गृहस्थाश्रमके कर्म जिस
संहृतं देवताप्पयलक्षणं संसार- | विज्ञानमें उपयोगी हैं उसके देवतामें
विषयमेव । यदि कर्मिण एव | लय होनारूप संसारविषयक परम
परमात्मविज्ञानमभविष्यत् संसा- | फलका उपसंहार किया जा चुका है।
रविषयस्यैव फलस्योपसंहारो | यदि कर्मीको ही परमात्माका साक्षात्
नोपापत्स्यत् । | ज्ञान हुआ करता तो संसारविषयक
अङ्गफलं तदिति चेन्न । तद्वि- | फलका उपसंहार ( अन्त ) होना
[हाशिया: देवताप्ययस्य ज्ञानाङ्गत्वनिरासः] रोध्यात्मवस्तुविषय- | कभी सम्भव ही न था ।
त्वादात्मविद्यायाः । | यदि कहो कि वह तो अङ्गफल-
निराकृतसर्वनामरूपकर्मपरमार्थ- | मात्र है * तो ऐसा कहना ठीक
त्मवस्तुविषयं ज्ञानममृतत्वसा- | नहीं, क्योंकि आत्मविद्या तो उसके
धनम् । गुणफलसंबन्धे हि नि- | विरोधी आत्मतत्त्वसे सम्बन्ध रखने-
राकृतसर्वविशेषात्मवस्तुविषयत्वं | वाली है । सब प्रकारके नाम, रूप
ज्ञानस्य न प्राप्नोति । तच्चानिष्टम्, | और कर्मसे रहित परमार्थ आत्मतत्त्व-
| से सम्बन्ध रखनेवाला आत्मज्ञान
| तो अमरत्वका साधन है । उससे
| गौण फलका सम्बन्ध माननेपर तो
| ज्ञानका सर्वविशेषशून्य आत्मवस्तुसे
| सम्बन्धित होना ही सिद्ध नहीं
| होता । और यह इष्ट नहीं है,
* अर्थात् देवतादयरूप जो संसारविषयक फल है वह कर्मका अंग—गौण
फल है, मुख्य फल तो परमात्माका साक्षात्कार ही है।
खण्ड १ ] \t\t शाङ्करभाष्यार्थ \t\t १९
खण्ड १ ] \t\t शाङ्करभाष्यार्थ \t\t १९
“यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्” | क्योंकि “जहाँ इसके लिये सब कुछ
(बृ० उ० २।४।१४) इत्य- | आत्मा ही हो गया है” इस प्रकार
धिकृत्य क्रियाकारकफलादि- | आरम्भ करके विद्वान्के लिये क्रिया,
सर्वव्यवहारनिराकरणाद्विदुषः । | कारक और फल आदि सम्पूर्ण
तद्विपरीतस्याविदुषो “यत्र हि | व्यवहारका निराकरण किया है ।
द्वैतमिव” (बृ० उ० २।४। | तथा उसके विपरीत अविद्वान्के
१४) इत्युक्त्वा क्रियाकारक- | लिये वाजसनेयिब्राह्मणमें “जहाँ कि
फलरूपस्यैव संसारस्य दर्शित- | द्वैतके समान होता है” ऐसा कहकर
त्वाच्च वाजसनेयिब्राह्मणे । तथे- | क्रिया, कारक और फलरूप संसार-
हापि देवताख्यं संसारविषयं | विषयको प्रदर्शित किया है । इसी
यत्फलमशनायादिमद्वस्त्वात्मकं | प्रकार यहाँ ( ऐतरेयोपनिषद्में )
तत्फलमुपसंहृत्य केवलं सर्वात्म- | भी जो क्षुधा-पिपासादियुक्त वस्तुरूप
कवस्तुविषयं ज्ञानममृतत्वाय | संसारविषयक देवताख्यसंज्ञक फल
वक्ष्यामीति प्रवर्तते । | है उसका उपसंहार कर अब केवल
ऋणप्रतिबन्धश्चाविदुष एव | सर्वात्मक वस्तुविषयक ज्ञानका ही
[ऋणप्रतिबन्ध-] मनुष्यपितृदेवलोक- | अमरत्व-प्राप्तिके लिये वर्णन करूँगी
[विचारः] प्राप्तिं प्रति, न | —ऐसे अभिप्रायसे श्रुति प्रवृत्त
विदुषः । “सोऽयं मनुष्यलोकः | होती है ।
पुत्रेणैव०” (बृ० उ० १।५। | तथा देवलोक, पितृलोक और
१६ ) इत्यादिलोकत्रयसाधन- | मनुष्यलोककी प्राप्तिमें ऋणोंका प्रति-
नियमश्रुतेः । विदुषश्च ऋणप्रति- | बन्ध तो अज्ञानीके ही लिये है, ज्ञानीके
| लिये नहीं, जैसा कि “उस इस मनुष्य-
| लोकको पुत्रके द्वारा ही [ जीता
| जा सकता है ]” इत्यादि लोकत्रयकी
| प्राप्तिके साधनका नियम करनेवाली
| श्रुतिसे सिद्ध होता है । तथा आत्म-
| लोकके इच्छुक विद्वान्के लिये
२० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
[मूल एवं संस्कृत-टीका]
बन्धाभावो दर्शित आत्मलोका-
र्थिनः “किं प्रजया करिष्यामः”
(बृ० उ० ४ । ४ । २२)
इत्यादिना । तथा “एतद्ध स्म
वै तद्विद्वांस आहुर्ऋषयः काव-
षेयाः” इत्यादि । “एतद्ध स्म वै
तत्पूर्वे विद्वांसोऽग्निहोत्रं न जुह-
वाञ्चक्रुः” (कौषी० २।५)
इति च कौषीतकिनाम् ।
अस्त्विदं तर्हि ऋणानपाकरणे
पारिव्राज्यानुपपत्तिरिति चेत् ?
न; प्राग्गार्हस्थ्यप्रतिपत्तेर्ऋणि-
त्वासंभवात् । अधिकाराना-
रूढोऽप्यृणी चेत्स्यात् सर्वस्य
ऋणित्वमित्यनिष्टं प्रसज्येत। प्रति-
पन्नगार्हस्थ्यस्यापि “गृहाद्वनी
भूत्वा प्रव्रजेद्यदि वेतरथा ब्रह्म-
चर्यादेव प्रव्रजेद्गृहाद्वा वनाद्वा”
(जा० उ० ४) इत्यात्मदर्शनो-
पायसाधनत्वेनेष्यत एव पारिव्रा-
[हिन्दी-अनुवाद]
“हम प्रजासे क्या करेंगे ?” इत्यादि
वाक्योंद्वारा ऋणोंके प्रतिबन्धका
अभाव दिखलाया है । इसी प्रकार
“वे प्रसिद्ध आत्मवेत्ता कावषेय
ऋषि बोले-[ मैं अध्ययन कैसे
करूँ ? होम कैसे करूँ ?]”
इत्यादि श्रुति है तथा ऐसी ही
“उस इस आत्मतत्त्वको जाननेवाले
पूर्ववर्ती विद्वान् अग्निहोत्र नहीं करते
थे” यह कौषीतकी शाखाकी श्रुति है।
पूर्व०-तब विद्वान्के लिये तो
ऋणोंका परिशोध बिना किये
संन्यास करना बन नहीं सकता ?
सिद्धान्ती-यह बात नहीं है,
क्योंकि गृहस्थाश्रमकी प्राप्तिसे पूर्व
तो ऋणित्व ही असम्भव है। यदि
अधिकारासढ न हुआ पुरुष भी ऋणी
हो सकता है तो सभीका ऋणी होना
सिद्ध होगा और इस प्रकार बड़ा
अनिष्ट प्राप्त होगा । जो गृहस्थाश्रम-
को प्राप्त हो गया है उस पुरुषके
लिये भी “गृहस्थाश्रमसे वानप्रस्थ
होकर संन्यास करे अथवा [ इस
क्रमको छोड़कर ] अन्य प्रकारसे
यानी ब्रह्मचर्यसे, गृहस्थाश्रमसे
अथवा वानप्रस्थाश्रमसे ही संन्यास
कर दे” इत्यादि श्रुतियोंद्वारा आत्म-
दर्शनके साधनके उपायरूपसे