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सर्वकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 108 में से

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पृष्ठ 20

१० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
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स्वविज्ञानोत्थेन वचसा स्वयं | उत्पन्न हुए वचनसे ही कोई स्वयं
नियुज्यते । नापि बहुवित्स्वा- | नियुक्त नहीं हो सकता और न
म्यविवेकिना भृत्येन । | बहुज्ञ स्वामी ही अपने अल्पज्ञ सेवक-
| से नियुक्त हो सकता है ।
आम्नायस्य नित्यत्वे सति | यदि कहो कि नित्य होनेके
स्वातन्त्र्यात्सर्वान्प्रति नियोक्तृत्व- | कारण वेदका नियोक्तृत्व-सामर्थ्य
सामर्थ्यमिति चेन्न उक्तदोषात् । | स्वतन्त्रतापूर्वक सबके प्रति है; तो
तथापि सर्वेण सर्वदा सर्वमविशिष्टं | उपर्युक्त दोषके कारण ऐसा कहना
कर्म कर्तव्यमित्युक्तो दोषोऽप्य- | ठीक नहीं । ऐसी अवस्थामें भी
परिहार्य एव । | 'सबको सब कर्म अविशेषरूपसे
| करने चाहिये'—यह ऊपर बतलाया
| हुआ दोष अपरिहार्य ही रहता है।
तदपि शास्त्रेणैव विधीयत | यदि कहो कि उसका विधान
शास्त्रस्य विरुद्धार्थ- इति चेद् यथा कर्म- | भी शास्त्रने ही किया है अर्थात्
बोधकत्वानुपपत्तिः कर्तव्यता शास्त्रेण | जिस प्रकार शास्त्रने कर्मकी
कृता तथा तदप्यात्मज्ञानं तस्यैव | कर्तव्यता बतलायी है उसी प्रकार
कर्मणः शास्त्रेण विधीयत इति | उस कर्मीके लिये ही उस आत्मज्ञान-
चेत्, न; विरुद्धार्थबोधकत्वा- | का भी शास्त्रने ही विधान किया है
नुपपत्तेः । न ह्येकस्मिन्कृताकृत- | तो ऐसा कहना भी उचित नहीं,
संबन्धित्वं तद्विपरीतत्वं च | क्योंकि उसका विरुद्ध-अर्थ-बोधकत्व
बोधयितुं शक्यम्, शीतोष्ण- | सम्भव नहीं है । अग्निकी शीतलता
तामिवाग्नेः । | और उष्णताके समान एक ही
| शास्त्रमें पाप-पुण्यके सम्बन्धित्व और
| उसके विपरीतत्वका बोध कराना—
| [ये दोनों विरुद्धधर्म] सम्भव
| नहीं हैं।