ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
तथा “यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहो- | ऐसा ही “यावज्जीवन अग्निहोत्र
ति” “यावज्जीवं दर्शपूर्णमासा- | करता है” “जीवनपर्यन्त दर्श-
भ्यां यजेत” इत्याद्याश्च । “तं | पूर्णमाससे यजन करे” इत्यादि
यज्ञपात्रैर्दहन्ति” इति च । | तथा [ वृद्धावस्था में भी कर्मत्यागका
ऋणत्रयश्रुतेश्च । तत्र पारिव्रा- | निषेध सूचित करनेवाली ] “उस-
ज्यादि शास्त्रं “व्युत्थायाथ | को [ मरनेके अनन्तर ] यज्ञपात्रोंके
भिक्षाचर्यं चरन्ति” ( बृ० उ० | सहित जलाते हैं” इत्यादि श्रुतियोंसे
३।५।१, ४।४।२२) इति | और ऋणत्रयकी सूचना देनेवाली
आत्मज्ञानस्तुतिपरोऽर्थवादः । | श्रुतियोंसे सिद्ध होता है । श्रुतिमें
अनधिकृतार्थो वा । | जो “[ यतिजन ] सर्वसंग परित्याग
| करके भिक्षाटन किया करते हैं”
| इत्यादि संन्याससम्बन्धी शास्त्र है
| यह आत्मज्ञानकी स्तुति करनेवाला
| अर्थवाद है । अथवा जिसे कर्मका
| अधिकार नहीं है उसके लिये है ।
न; परमार्थविज्ञाने फलादर्शने | सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक
· आक्षेपनिरासः क्रियानुपपत्तेः। य- | नहीं, क्योंकि उस परमार्थ—आत्म-
दुक्तं कर्मिण आत्म- | तत्त्वका ज्ञान हो जानेपर क्रियाका
ज्ञानं कर्मसंबन्धि च | कोई फल नहीं देखा जाता; इसलिये
इत्यादि, तन्न । परं ह्याप्तकामं | क्रिया नहीं हो सकती । तुमने
सर्वसंसारदोषवर्जितं ब्रह्माहम- | जो कहा कि आत्मज्ञान कर्मीको ही
स्मीत्यात्मत्वेन विज्ञाते, कृतेन | होता है और वह कर्मसे सम्बन्ध
कर्तव्येन वा प्रयोजनमात्मनो- | रखनेवाला है, सो ठीक नहीं ।
| 'सम्पूर्ण सांसारिक दोषोंसे रहित
| पूर्णकाम ब्रह्म मैं हूँ' इस प्रकार ब्रह्मका
| आत्मभावसे ज्ञान हो जानेपर कर्म-
| फलको न देखनेके कारण कृत
| अथवा कर्तव्यसे अपना कोई प्रयोजन