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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

१०४ ] [ द्वितीय अध्याय

१०४ ] [ द्वितीय अध्याय
फल की कामना किये कर्म में लगा रहता है. वह पुरुष जीवन्मुक्त ही
है। जिसने धर्माधर्म और सभी कामनाओं तथा सांसारिक विषयों के
चिन्तन का त्याग कर दिया है, उसे जीवन्मुक्त कहते हैं । जिसने इस
दिखाई पड़ने वाले विश्वरूप प्रपंच का भले प्रकार त्याग कर दिया है, वह
जीवन्मुक्त कहा जाता है। जो पुरुष, खट्टे, चरपरे, कडुवे, मीठे, नमकीन
आदि पदार्थों को स्वाद की चिन्ता किये बिना अर्थात् स्वादिष्ट और
स्वाद रहित तथा खराब स्वाद वाले पदार्थों को एक समान मानकर
भोजन करता है, वह जीवन्मुक्त है । जो वृद्धावस्था, मृत्यु विपत्ति,
ऐश्वर्य-भोग एवं दारिद्रय में समभाव रखता हुआ सब स्थितियों में संतुष्ट
रहता है, वह जीवन्मुक्त है। धर्माधर्म, सुख-दुःख एवं जन्म मरण में हर्ष
विषाद न करने वाला पुरुष जीवन्मुक्त है। जो उद्वेग और आनन्द से
रहित, शोक अथवा हर्षोत्साह से ममत्व एवं स्वच्छ बुद्धि वाला है,
वह जीवन्मुक्त है। सभी इच्छाओं, शंकाओं, कामनाओं और निश्चयों को
जिसने पूर्णतः त्याग दिया है, वह जीवन्मुक्त है । उत्पत्ति, स्थिति और
विलीनावस्था में तथा उन्नति-अवनति में जो समान मन वाला है. वह
जीवन्मुक्त है। जो केवल प्राप्त भोगों का उपभोग करने वाला आकां-
क्षाओं में रहित तथा किसी के प्रति द्वेष-ईर्ष्या नहीं करता. वह जीवन्मुक्त
है। जो कलायुक्त होते हुये भी कला-रहित रहता है, चित्त के रहते हुये
भी जो चित्त रहित बना हुआ है तथा जिसने सांसारिक विषयों का
चिन्तन छोड़ दिया है, वह जीवन्मुक्त है । विश्व के सभी अर्थ-जालों के
मध्य स्थिर होकर भी उसने पराये धन से निस्पृह रहने वाले धर्मात्मा
के समान जो पुरुष निस्पृह रहता है, वह आत्मा में ही पूर्णता का अनु-
भव करने वाला महात्मा जीवन्मुक्त हैं ॥४२-६२॥
जीवन्मुक्तपदं त्यक्त्वा स्वदेहे कालसात्कृते ।
विशत्यदेहमुक्तत्वं पवनोऽस्पन्दतामिव ॥६३॥
विदेहमुक्तो नोदेति नास्तमेति न शाम्यति ।

महोपनिषत् ] [ १०५
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न सन्नासन्न दूरस्थो न चाहं न च नेतरः ॥६४॥
ततः रितमितगम्भीरं न तेजो न तमस्ततम् ।
अनाख्यमनभिव्यक्तं सत् किंचिदवशिष्यते ॥६५॥
न शून्यं नापि चाकारि न दृश्यं नापि दर्शनम् ।
न च भूतपदार्थौघसदनन्ततया स्थितम् ॥६६॥
किमप्यव्यप देशात्मा पूर्णात् पूर्णतराकृतिः ।
न सन्नासन्न सदसन्न भावो भावनं न च ॥६७॥
चिन्मात्रं चैत्यरहितमनन्तमजरं शिवम् ।
अनादिमध्यपर्यन्तं यदनाधि निरामयम् ॥६८
द्रष्टृ दर्शनदृश्यानां मध्ये यद्दर्शनं स्मृतम् ।
नातः परतरं किंचिन्निश्श्वयोऽस्त्यपरो मुने ॥६६
स्वयमेव त्वया ज्ञातं गुरुतश्च पुनः श्रुतम् ।
स्वसंकल्पवशाद्बद्धो निसंकल्पाद्विमुच्यते ॥७०-
तेन स्वयं त्वया ज्ञातं ज्ञेयं यस्य महात्मनः ।
भोगेभ्यो ह्यरतिर्जाता दृश्याद्वा सकलादिह ॥७१
प्राप्तं प्राप्तव्यमखिलं भवता पूर्णचेतसा ।
स्वरूपे तपसि ब्रह्मन् मुक्तास्त्वं भ्रान्तिमुत्सृज ॥७२
अतिबाह्यं तथा बाह्यमन्तराभ्यन्तरं धियः ।
शुक पश्यन्न पश्येस्त्वं साक्षी संपूर्णकेवलः ॥७३
वह पुरुष काल के द्वारा शरीर के कलवित कर लिये जाने
पर जीवन्मुक्ता अवस्था को त्यागकर उसी प्रकार विदेह मुक्तावस्था को
प्राप्त होता है जिस प्रकार गतिहीन पवन हो जाता है । विदेहमुक्त
अवस्था में उन्नति, अवनति से दूर रहता है, उस समय उसका लय भी
नहीं होता । उसकी वह अवस्था सत्, असत् से परे होती है और वह
दूरस्थ भी नहीं होती । उसमें अहम्भाव अथवा परभाव भी नहीं होता ।
विदेहमुक्त अवस्था में गंभीरता और स्तब्धता होती है तथा उसमें तेज
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

१०६ ] [ द्वितीय अध्याय

१०६ ] [ द्वितीय अध्याय
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एवं अन्धकार का भी अस्तित्व नहीं होता। उसमें अभिव्यक्त न होने
वाला तथा अनिर्वचनीय सत् शेष रहता है। उसका न कोई आकार
है और न शून्य ही है, वह न अदृश्य है और न दिखाई ही देता है।
वह भूत आदि के समूहों से रहित तथा सत् रूप अनन्त में स्थित होता
है। उस विचित्र तत्व के स्वरूप का वर्णन नहीं किया जा सकता।
उसकी आकृति पूर्ण से भी अत्यन्त पूर्ण है। वह सत्, दोनों में से
कुछ भी नहीं होता और सत् असत् दोनों के योग से भी परे है। उसमें
भावना का भी अभाव होता है। वह चित्त रहित और अनन्त होता है।
तथा चेतनामात्र है। वह शिवस्वरूप, जरारहित और कल्याणकारी
है। आदि, मध्य और अन्त से भी परे है। वह दोषों से मुक्त तथा
अनादि है। द्रष्टा, दृश्य और दर्शन में उसे केवल दर्शन रूप कहा गया
है। हे शुकदेव जी ! इस सम्बन्ध में इतना ही कहा जाता है। तुम इस
तत्त्व के स्वयं जानने वाले हुए हो और तुमने अपने पिता से भी सुना है
कि संकल्प से ही जीव बंधन में पड़ता और संकल्पों का त्याग करने पर
मुक्ति को प्राप्त होता है। जिस तत्व का बोध होने पर सज्जनों को
सांसारिक दृश्य प्रपंचों में विरक्ति हो जाती है, उस तत्त्व को तुमने स्वयं
ही जान लिया है। तुम पूर्ण चेतना को उपलब्ध कर पाने योग्य वस्तु
को प्राप्त कर चुके हो। तुम अपने भ्रम का त्याग करो, तुम तप स्वरूप में
स्वयं स्थित हो इसीलिये मुक्त भी हो। हे शुकदेव जी ! तुम बाह्य तथा
आन्तरिक और अत्यन्त आंतरिक दृश्य को देखते हुए भी उसे नहीं
देखते, क्योंकि तुम कैवल्य स्थिति में साक्षिमात्र रूप से ही अवस्थित
हो ॥ ६३—७३ ॥
विशश्राम शुकस्तूष्णीं स्वस्थे परमवस्तुनि ।
वीतशोकभयायासो निरीहश्छिन्नसंशयः ॥७४
जगाम शिखरं मेरोः समाध्यर्थमखण्डितम् ॥७५
तत्र वर्षसहस्राणि निर्विकल्पसमाधिना ।
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

महोपनिषत् । [१०७
देशे स्थित्वा शशामासावात्मन्यस्नेहदीपवत् ॥७६
व्यपगतकलनाकलंकशुद्धः स्वयममलात्मनि पावने पदेऽसौ ।
सलिलकण इवाम्बुधौ महात्मा विगलितवासनमेकतां जगाम ॥
इति महोपनिषत् ॥७७
यह सुनकर शुकदेव जी शोक, भय, संशय और श्रमादि से रहित
होकर कामना-हीन होगये और परतत्व रूप आत्मा में स्थित होकर मेरु
पर्वत पर चले । वहाँ वे आत्म-देश में हजारों वर्षों तक स्थित रहे और
उस निर्विकल्प समाधि के द्वारा उन्हें परम शान्ति प्राप्त हुई । जैसे समुद्र
में जल-कण विलीन होकर समुद्र रूप हो जाते हैं, जैसे ही शुकदेव जी
संकल्प रूप दोषों से मुक्त शुद्ध स्वरूप होकर वासना विहीन होते हुए
पवित्र और निर्मल आत्मपद में एकीभाव को प्राप्त होगए ॥७४-७७॥
॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥
तृतीयोऽध्यायः
निदाघो नाम मुनिराट् प्राप्तविद्यश्च बालकः ।
विहृतस्तीर्थ यात्रार्थं पित्राऽनुज्ञातवान् स्वयम् ॥१
सार्धत्रिकोटितीर्थे स्नात्वा गृसमुपागतः ।
स्वोदन्तं कथयामास ऋभुं नत्वा महायशाः ॥२
सार्धत्रकोटीतीर्थेषु स्नानपुण्यप्रभावतः ।
प्रादुर्भूतो मनसि मे विचारः सोऽयमीदृशः ॥३
जायते मृतये लोको म्रियते जननाय च ।
अस्थिराः सर्वं एवेमे सचराचरचेष्टिताः ॥४
सर्वापदां पदं पोपा भावा विभवभूमयः ।
अयः शलाकासदृशाः परस्परमसङ्गिनः ।
श्लिष्यन्ते केवला भावा मनः कल्पनयाऽनया ॥५
भावेष्वरतिरायाता पथिकस्य मरुष्विव ।

१०८ ] [ तृतीय अध्याय

१०८ ] [ तृतीय अध्याय
शाम्यतीदं कथं दुःखमिति तप्तोऽस्मि चेतसा ॥६
चिन्तानिचयचक्राणि नानन्दाय धनानि मे ।
सप्रसूतकलत्राणि गृहाण्युग्रापदामिव ॥७
इयमस्मिन् स्थितोदारा संसारे परिपेलवा ।
श्रीर्मुने परिमोहाय साऽपि नूनं न शर्मदा ॥८
आयुः पल्लवकाणाग्रलम्बाम्बुकणभंगुरम् ।
उन्मत्त इव संत्यज्य यात्यकाण्डे शरीरकम् ॥६
विषयाशीविषासंगपरिजर्जरचेतसाम् ।
अप्रौढात्मविवेकानामायुरायासकारणम् ॥१०
बाल्यावस्था से ही तपकांक्षी निदाघ अपने पिता से आज्ञा लेकर
तीर्थयात्रा के उद्देश्य से चल पड़े। अपनी इस यात्रा में उन्होंने साढ़े तीन
करोड़ तीर्थों में स्नान किया। फिर घर लौटकर अपने पिता महर्षि ऋभु
को अपनी बात सुनाते हुए कहा—'पिता जी, मैंने जिन साढ़े तीन करोड़
तीर्थों में स्नान किया है, उनके पुण्य स्वरूप मेरे मन में यह विचार उत्पन्न
हुए हैं कि यह विश्व उत्पन्न होता और नष्ट हो जाता है और फिर उत्पन्न
होने के लिये ही नष्ट होता है। तभी चराचर जीवों की चेष्टा वाला यह
प्रपंच अस्थिर है, इसका जीवन क्षण-मात्र है। यह ऐश्वर्ययुक्त सम्पूर्ण
पदार्थ विपत्तियों के कारण हैं। यह सभी लोहे की कील के समान
परस्पर पृथक रहते हुए मानसिक कल्पना रूप चुम्बक के द्वारा ही एकत्र
किये जाते हैं। जैसे मार्ग चलने वाला व्यक्ति मरुभूमि में चलते-चलते
विरक्त हो जाता है, वैसे ही मैं इन सब सांसारिक पदार्थों से विरक्त हो
रहा हूँ। क्योंकि यह मुझे दुःखदायी जान पड़ते हैं। इस दुःख से मुक्ति
किस प्रकार मिलेगी, यह विचार मेरे हृदय को सन्तप्त कर रहा है।
जिन धन रूप ऐश्वर्यों के कारण चिन्ताएँ चक्कर काटती रहती हैं, वे
धन मेरे लिये सुख देने वाले नहीं हैं। स्त्री, पुत्र आदि सब घोर विपत्तियों
के घर हैं। विश्व में उदारता की मूर्ति, अत्यन्त कोमलांगी वह लक्ष्मी जी

महोपनिषत् [ १०६
भी अत्यन्त मोह उत्पन्न करने वाली हैं। निश्चय ही उनके द्वारा जीव
को सुख प्राप्त नहीं हो सकता। जैसे प०त्ते के अग्रभाग में जो जल की बूँद
लटकती हैं वह क्षणभंगुर है, वैसे ही मनुष्य की आयु भी क्षणभंगुर है।
इसलिये असमय ही इस देह को त्याग कर मुझे उन्मत्त के समान प्रस्थान
करना पड़ेगा। जिनका मन विषयरूपी सर्प के सङ्ग से जीर्ण होगया है
और जिनको आत्म विवेक की प्राप्ति नहीं हुई, उनका जीवन कष्ट का
ही कारण बना है ॥९—१०॥
युज्यते वेष्टनं वायोराकाशस्यः च खण्डनम्।
ग्रथनं च तरंगाणामास्था नायुषि युज्यते ॥११
प्राप्यं संप्राप्यते येन भूयो येन न शोच्यते।
पराया निर्वृतेः स्थानं यत्तज्जीवितमुच्यते ॥१२
तरवोऽपि हि जीवन्ति जीवन्ति मृगपक्षिणः।
स जीवति मनो यस्य मननेनोपजीवति ॥१३
जातास्त एव जगति जन्तवः साधुजीविताः।
ये पुनर्नैह जायन्ते शेषा जरठगर्दभाः ॥१४
भारो विवेकिनः शास्त्रं भारो ज्ञानं च रागिणः।
अशान्तस्य मनो भारं भारोऽनात्मविदो वपुः ॥१५
अहंकारवशादापदहंकाराद्दुराधयः।
अहंकारवशादीहा नाहंकारात् परो रिपुः ॥१६
अहङ्कारवशाद्यच्चन्मया भुक्तं चराचरम्।
तत्तत् सर्वंभवस्त्वेव वस्त्वहंकाररिक्तता ॥१७
इतश्चेतश्च सुव्यग्रं व्यर्थमेवाभिधावति।
मनो दूरतरं याति ग्रामे कौलेयको यथा ॥१८
क्रूरेण जनतां याता (तः) तृष्णाभार्याऽनुगामिना।
वशां कौलेयकेनैव ब्रह्मन् भुक्तोऽस्मि चेतसा ॥१९
अध्यंष्ठिपमात्म्हतः सुमेरूमूलनादपि

११० ] [तृतीय अध्याय

११० ] [तृतीय अध्याय
अपि वह्न्यशनाद्ब्रह्मन् विषमश्चित्तनिग्रहः ॥२०
चित्तं कारणमर्थानां तस्मिन् सति जगत्त्रयम् ।
तस्मिन् क्षीणे जगत् क्षीणं तच्चिकित्स्यं प्रयत्नतः ॥२१
वायु का लपेटना, आकाश के टुकड़े-टुकड़े करना और लहरों का
गूंथना भले ही सम्भव हो जाय, परन्तु जीवन में आस्था रखना मेरे लिए
सम्भव नहीं है। जिसके द्वारा पाने योग्य वस्तु को भले प्रकार पा लिया
जाय, जिसके कारण फिर शोक न करना पड़े और जिसमें परम शान्ति
की उपलब्धि हो, वही तो जीवन है। वैसे तो वृक्ष और पक्षी भी
जीवित रहते हैं, परन्तु यथार्थ में वही जीवित है जो आत्म चिन्तन में
लीन है। इस विश्व में जो उत्पन्न हुये हैं, उनमें उन्हीं जीवों का जीवन
श्रेष्ठ है जिन्हें आवागमन के चक्कर में नहीं पड़ना पड़ता। इनसे भिन्न
तो जरावस्था प्राप्त गधे के समान है जो असक्त होते हुये भी बोझा ढोने के
लिए विवश हैं। ज्ञानी जन के लिये शास्त्र बोझा के समान हैं, राग-द्वेष
से युक्त पुरुष के लिये ज्ञान बोझ रूप है। जो अशान्त है, उसका मन ही
बोझ रूप है और जो आत्मज्ञान से हीन हैं, उनके लिए यह देह भी बोझ
ही है। अहंकार सब दुःखों का कारण है। उससे विपत्ति प्राप्त होती
है, दुष्ट मनोविकारों की उत्पत्ति होती है और विभिन्न कामनाओं का
प्रादुर्भाव होता है, इसलिये मनुष्य का इससे अधिक कोई शत्रु नहीं है।
अहङ्कार के वशीभूत हो मैंने जिन-जिन भोगों का उपभोग किया, वे
सभी मिथ्या थे। अहंकार-शून्यता ही जीवन की यथार्थता है। व्यग्रता
के वश पड़कर यह मन व्यर्थ ही इधर-उधर भ्रमता है। यह विभिन्न
ग्रामों में घूमते-फिरने वाले कुत्ते के समान दूर-दूर तक भ्रमण करता
है। मैं भी तृष्णा रूप कुतिया के पीछे कुत्ते के समान भटकता हुआ
जड़वत् होगया था। परन्तु अब मैं उनके प्रभाव से मुक्त होगया हूँ।
चित्त को नियन्त्रित करना सुमेरु पर्वत को समूल उखाड़ने अथवा समुद्र
के सम्पूर्ण जल का पान कर लेने से भी अधिक दुष्कर है। अग्नि का भक्षण

महोपनिषत् [ १११ ]

करना भले ही सरल कार्य हो, परन्तु चित्त-निग्रह अत्यन्त ही विषम
कार्य है। यह चित्त तथा बाह्य तथा अभ्यान्तर के विषयों का ग्रहण करने
वाला है, जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति रूप तीन अवस्था वाले विश्व की
स्थिति चित्तवृत्ति पर ही निर्भर है। चित्त की क्षीणता ही संसार को
क्षीण करने वाली है। इसलिये आवश्यक है कि चित्त का ही प्रयत्न
पूर्वक उपाय किया जाय ॥११--२१॥
यां यामहं मुनिश्रेष्ठ संश्रयामि गुणश्रियम् ।
तां तां कृन्तति मे तृष्णा तन्त्रीमिव कुमूषिका ॥२२
पदं करोत्यलङ्घ्येऽपि तृप्तऽपि भलमोहते ।
चिरं तिष्ठति नैकत्र तृष्णा चपलमर्कटी ॥२३
क्षणमायाति पातालं क्षणं याति नभस्स्थलम् ।
क्षणं भ्रमति दिक्कुञ्जे तृष्णा हृत्पद्मषट्पदी ॥२४
सर्वसंसारदुःखानां तृष्णैका दीर्घदुःखदा ।
अन्तःपुरस्थमपि या योजयत्यतिसंकटे ॥२५
तृष्णाविषूचिकामन्त्रश्चिन्तात्यागो हि स द्विज ॥२६
स्तोकेनानन्दमायाति स्तोकेनायाति खेदताम् ।
नास्ति देहसमः शोच्यो नीचो गुणविवर्जितः ॥२७
कलेबरमहंकारगृहस्थस्य महागृहम् ।
लुठत्वभ्येतु वा स्थैर्यं किमनेन गुरो मम ॥२८
षङ् क्तिबद्धेन्द्रियपशुं वलगत्तृष्णागृहाङ्गणम् ।
चित्तभृत्यजनाकीर्णं नेष्टं देहगृहं मम ॥२९
जिह्वामर्कटिकाक्रान्तवदनद्वारभीषणम् ।
दृष्टदन्तास्थिशकलं नेष्टं देहगृहं मम ॥३०
हे मुने ! दुष्ट मूषकी जैसे वीणा के तार को काट डालती है, वैसे
ही मेरी तृष्णा मेरे श्रेष्ठ गुणों को काट डालती है। यह तृष्णा चञ्चल
बंदरिया के समान न साधने योग्य स्थान में भी अपना पांव टिकाने को

११२ ] [तृतीय अध्याय

११२ ] [तृतीय अध्याय
उद्यत है। वह तृप्त हो चुकने पर भी विभिन्न फलों की कामना करती
हुई उन्हें तोड़ती है और अधिक समय तक एक स्थान पर नहीं टिकती।
वह क्षण भर में आकाश-भ्रमण करती दिखाई देती है, क्षण भर में ही
पाताल गामिनी होती है और क्षण भर में ही विभिन्न दिशाओं में चक्कर
काटती है। विश्व के समस्त दुःखों में यह तृष्णा ही ऐसी है जो घोर
दुःखदायिनी है तथा महलों में रहने वालों को भी घोर संकट में फँसाती
है। यह तृष्णा एक महामारी है और इसे वही नष्ट कर सकता है जो
चिन्ता को छोड़दे। यदि चिन्ता का क्षण भर को भी त्याग कर दिया
जाय तो अत्यन्त सुख मिलता है। यदि थोड़ी सी भी चिन्ता मन में हो
तो उससे दुःख की प्राप्ति होती है। इस देह के समान तुच्छ, गुण-रहित
एवं शोच करने योग्य अन्य कोई पदार्थ नहीं है। इस देह रूप महान गृह
में अहंकार रूप गृहस्थ निवास करता है। यह देह चाहे चिरजीवित रहे
या शीघ्र नष्ट होजाय, इसकी मुझे चिन्ता नहीं। जिस देह रूप घर में
इन्द्रिय रूपी पशु पंक्तिबद्ध खड़े हैं और जिसके आंगन में तृष्णा रूपी
बंदरिया चलती-फिरती है, जिसमें चित्त-वृत्ति रूप भृत्यों का समावेश है,
ऐसा यह शरीर रूप गृह मुझे अभीष्ट नहीं है। जिह्वा रूपी बंदरिया से
आक्रान्त हुआ यह मुख रूप द्वार इतना भीषण हो रहा है कि प्रारम्भ में
ही दन्तरूप अस्थियाँ दृष्टिगोचर हो रही हैं ॥२२-३०॥
रक्तमांसमयस्यास्य सबाह्याभ्यन्तरे मुने ।
नाशैकधर्मिणो ब्रूहि क्व कायस्य रम्यता ॥३१
तडित्सु शरदभ्रेषु गन्धर्वनगरेषु च ।
स्थैर्यं येन विनिर्णीतं स विश्वसितु विग्रहे ॥३२
शैशवे गुरुतो भीतिर्मातृतः पितृतस्तथा ।
जनतो ज्येष्ठबालाच्च शैशवं भयमन्दिरम् ॥३३
स्वचित्तविलसंस्थेन नानाविभ्रमकारिणा ।
बलात्कामपिशाचेन विवशः परिभूयते ॥३४

महोपनिषत् ११३
दासाः पुत्राः स्त्रियश्चैव बान्धवाः सुहृदस्तथा ।
हसत्युन्मत्तकमिव नरं वार्धककम्पितम् ॥३५
दैन्यदोषमयी दीर्घा वर्धते वार्धके स्पृहा ।
सर्वापदामेकसखी हृदि दाहप्रदायिनी ॥३६
कच्चिद्वा विद्यते यैषा संसारे सुखभावना ।
आखुः स्तम्बमिवासाद्य कालस्तामपि कृन्तति ॥३७
तृणं पांसुं महेन्द्रं च सुवर्णं मेरुसर्षपम् ।
आत्मंभरितया सर्वमात्मसात्कर्तुमुद्यतः ।
कालोऽयं सर्वसंहारी तेनाक्रान्तं जगत्त्रयम् ॥३८
ऐसा य देह रूप गृह मुझे अच्छा नहीं लगता । हे पिताजी !
यह देह बाहर से तथा भीतर से भी मांस और रक्त से ही व्याप्त है
तो इस नाशवान् देह में सुन्दरता कहाँ से आई ? यदि कोई यह
विश्वास करता हो कि विद्युत में चपलता अथवा गंधर्वों की नगरी में
चंचलता नहीं है तो वह इस देह के स्थिर होने में भले ही सन्देह न करे ।
इस देह की तीनों अवस्थायें भय के देने वाली हैं । बालकपन में अपने
से बड़े लड़कों से तथा माता-पिता आदि से भय लगता है । युवावस्था
प्राप्त होने पर अपने ही चित्त के भीतर निवास करने वाले कामरूपी
पिशाश के भ्रम जाल में फँसकर पराजय को प्राप्त करता है । वृद्धावस्था
प्राप्त होने पर मनुष्य कांपता हुआ चलता-फिरता है । उसे देखकर स्त्रियाँ
बन्धु, मित्र, पुत्र, पुत्रियाँ तथा नौकर-चाकर भी हँसी उड़ाते हैं । उस
आयु में सामर्थ्यहीनता के कारण कामनाओं की अधिक वृद्धि होती है ।
यह जरावस्था हृदय को जलाने वाली सब विपत्तियों की सखी है । जिस
सुख की भावना सांसारिक प्राणी करता है, वह सुख है कहाँ ? काल
तो तिनके के समान काटता ही जाता है । वह काल छोटे से तिनके
और रज के कणों को भी महेन्द्र तथा मेरु पर्वत को भी सरसों के समान
कर देने में समर्थं है । यह सभी को नष्ट करने वाला है और अपना पेट

११४ ] [ तृतीय अध्याय

११४ ] [ तृतीय अध्याय
भरने के लिये सब को निगलता रहता है । इस काल के द्वारा तीनों लोक
व्याप्त किये हुये हैं ॥३१-३८॥
मांसपाञ्चालिकायास्तु यन्त्रलोलेऽङ्गपञ्जरे ।
स्तनवस्थिग्रन्थि शालिन्याः स्त्रियः किमिव शोभनम् ॥३६
त्वङ् मांसरक्तबाष्पाम्बु पृथक्कृत्वा विलोच [क] नै ।
समालोक [च]य रम्यं चेत् किं सुधा परिमुह्यसि ॥४०
मेरुशृंगतटोल्लासिगंगाजलरयोपमा ।
दृष्टा यस्मिन् मुने मक्ताहारस्योल्लासशालिता ॥४१
श्मशानेषु दिगन्तेषु स एव ललनास्तनः ।
श्वभिरास्वाद्यते काले लघुपिण्डमिवान्धसः ॥४२
केशकज्जलधारिण्यो दुःस्पर्शा लोचनप्रियाः ।
दुष्कृताग्निशिखा नार्यो दहन्ति तृणवन्नरम् ॥४३
ज्वलतामतिदूरेऽपि सरसा अपि नीरसाः ।
स्त्रियो हि नरकाग्नीनामिन्धनं चारु दारुणम् ॥४४
कामनाम्ना किरातेन विकीर्णा मुग्धचेतसः ।
नार्यो नरविहं गानां गबन्धनवागुराः ॥४५
जन्म पल्वलमत्स्यानां चित्तकर्दमचारिणाम् ।
पुंसां दुर्वासनारज्जुर्नारी बडिशपिण्डका ॥४६
सर्वेषा दोषरत्नानां सुसमुद्गिकयाऽनया ।
दुःखशृङ्खलया नित्यमलमस्तु मम स्त्रिया ॥४७
यस्य स्त्री तस्य भोगेच्छा निःस्त्रीकस्य क्व भोगभूः ।
स्त्रियं त्यक्त्वा जगत् त्यक्तं जगत् त्यक्त्वा सुखी भवेत् ॥४८
देह के अंग यंत्र के समान चंचल हैं और अस्थिपंजर में मांस
युक्त पुतली के समान स्त्री-देह में ऐसी कौन-सी वस्तु है जो सुन्दर कही
जा सकती है ? नेत्र के भीतर की त्वचा, मांस, रक्त तथा अश्रु इन सब
में ऐसी कौन-सी वस्तु है जो आकर्षक प्रतीत होती हो ? यदि कोई वस्तु

महोपनिषत् [ ११५

नहीं है तो मोह करने से क्या लाभ है ? जो नारी सुमेरु शिखरों के
किनारे उल्लसित होकर प्रवाहित होने वाली गंगा की गति के समान
चंचल है और जो मुक्ताहार से सुशोभित देखी जाती है, वह स्त्री जब
काल के चक्र में फँसती है, तब उसके मांस पिंड रूप स्तन को श्मशान
में कुत्ते चाटते हैं। यह नारियाँ केश विन्यास और अञ्जनादि से सुसज्जित
होकर प्रिय लगने पर भी दुःखदायक स्पर्श वाली होती है। वे अग्नि-
ज्वाल के समान दग्ध कर देने वाली ललनाएं विधाता की दुष्कृति रूप
हैं। यह दूरस्थ प्रज्ज्वलित नरक रूप अग्नियों को ईंघन के समान हैं।
इनकी सरसता में भी नीरसता भरी है। काम नामक शिकारी ने पुरुष
रूपी मृगों को बाँध लेने के लिये नारी रूपी पाश को विस्तृत किया है।
नारी दुर्वासना रूपी रस्सी में बँधे हुये उस पिंड के समान है जो चित्त
रूपी कीचड़ में भ्रमण करने वाले पुरुष रूपी मत्स्यों को इस जीवन रूपी
जाल में फँसा लेती है। समुद्र इन समस्त दोषयुक्त रत्नों का उत्पादक
है। जिसके पास स्त्री है वह विलास की कामना में लीन रहता है, जिसके
पास स्त्री नहीं है, उसके लिये भोग का कोई कारण नहीं। जो स्त्री का
त्याग कर सका, उसने ही संसार का त्याग कर दिया और जो संसार
को त्याग देता है, वही सुखी हो सकता है। इसलिये दुःखों की यह
शृङ्खला हम से दूर ही रहे ॥ २६—४८ ॥

दिशोऽपि न हि दृश्यन्ते देशोऽप्यन्योपदेशकॄत् ।
शैला अपि विशीर्यन्ते शीर्यन्ते तारका अपि ॥४९
शुष्यत्यपि समुद्राश्च ध्रुवोऽप्य ध्रुवजीवनः ।
सिद्धा अपि विनश्यन्ति जीर्यन्ते दानवायः ॥५०
परमेष्ठ्यपि निष्ठवान् हीयते हरिरप्यजः ।
भवोऽप्यभावमायाति जीर्यं ते वे दिगीश्वराः ॥५१
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च सर्वा वा भूतजातयः ।
नाशमेवानुधावन्ति सलिलानीव बाडवम् ॥५२

११६ ] [ तृतीय अध्याय

११६ ] [ तृतीय अध्याय
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri
आपदः क्षणमायान्ति क्षणमायान्तिः संपदः ।
क्षणं जन्मथ मरणं सर्वं नश्वरमेव तत् ॥५३
अशूरेण हताः शूरा एकेनापि शतं हतम् ।
विषं विषयषवैम्यं न विषं विषमुच्यते ॥५४
जन्मान्तरघ्ना विषया एकजन्महरं विषम् ।
इति मे दोषदावाग्निदग्धे संप्रति चेतसि ॥५५
स्फुरन्ति हि नभोगाशा मृगतृष्णासरःस्वति ।
अतो मां बोधयाशु त्वं तत्वज्ञानेन वै गुरो ॥५६
नो चेन्मौनं समास्थाय निर्मानो गतमत्सरः ।
भावयान् मनसा विष्णुं लिपिकर्म्मार्पितोपमः ॥५७
यह जगत् नाशवान् है । जब यह अदृश्य होता है तब दिशायें
भी दिखाई नहीं देतीं, देश भी काल के गाल में समा जाते हैं, पर्वत
खण्ड-खण्ड होते और तारे भी टूट-टूट कर गिर जाते हैं, समुद्रों में जल
नहीं रहता और ध्रुवतारा भी लुप्त हो जाता है। दानवों का अन्त
समय आता है और सिद्ध पुरुष भी मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं । अजन्मा
विष्णु और चिरस्थायी ब्रह्मा भी अन्तर्ध्यान हो जाते हैं । जैसे जल बड़वा-
नल की ओर दौड़ता है वैसे ही देवता मनुष्य तथा अन्य सभी प्राणी
विनाश की ओर दौड़ते हैं । उस समय सभी भाव अभाव बन जाते हैं ।
आपत्तियां क्षण-भर में विपत्तिग्रस्त करती हैं तो क्षण-भर में सम्पूर्ण
वैभव की प्राप्ति हो जाती है। क्षण-भर में जन्म और क्षण-भर में मृत्यु
होती है । यह सभी प्रपंच नाशवान् हैं । यहाँ कायरों द्वारा शूरवीरों का
संहार होता है । कभी-कभी एक ही संकड़ों को मार गिराता है । इस
प्रकार सर्वत्र विषमता छाई हुई है । विषय वासनाओं से चित्त में जो
विषमता आ जाती है, वही विष रूप है। परन्तु, विष इतना भीषण
नहीं है, क्योंकि वह जन्म को ही नष्ट करता है और विषय रूपी विष
तो जन्म-जन्मान्तरों का विनाश कर देने वाला है । मेरा चित्त दोष रूप
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॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥

महोपनिषत् ] [ ११७
दावानल में जल गया है, परन्तु मृग-मरीचिका के तड़ाग में खड़ा रहकर
भी मैं भोग-लिप्सा से परे हूँ । हे पिता, हे गुरो ! आप मुझे तत्व-
ज्ञानात्मक बोध प्रदान करो अन्यथा मैं मान-मत्सर का त्याग कर मौन
धारण पूर्वक मैं अपने मन में भगवान् का स्मरण करूँगा ॥४६—५७॥
॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥
चतुर्थोऽध्यायः
निदाघ तव नास्त्यन्यज्ज्ञेयं ज्ञानवतां वर ।
प्रज्ञया त्वं विजानासि ईश्वरानुगृहीतया ।
चित्तमालिन्यसंजातं मार्जयामि भ्रमं मुने ॥१
मोक्षद्वारे द्वारपालाश्चत्वारः परिकीर्तिताः ।
शमो विचारः संतोषश्चतुर्थः साधुसंगमः ॥२
एकं वा सर्वयत्नेन सर्वमृत्सृज्य संश्रयेत् ।
एकस्मिन् वशगे यान्ति चत्वारोऽपि वशं गताः ॥३
शास्त्रैः सज्जनसंपर्कपूर्वकैश्च तपोदमैः ।
आदौ संसारमुक्त्यर्थं प्रज्ञामेवाभिवर्धयेत् ॥४
स्वानुभूतेश्च शास्त्रस्य गुरोश्चैवैक वाच्यता ।
यस्याभ्यासेन तेनात्मा सततं चावलोक्यते ॥५
संकल्पाशाऽनुसंधानवर्जनं चेत् प्रतिक्षणम् ।
करोषि तदचित्तत्त्वं प्राप्त एवासि पावनम् ॥६
चेतसो यदकर्तृत्वं तत् समाधानमीरितम् ।
तदेव केवलीभावं सा शुभा निर्वृतिः परा ॥७
चेतसा संपरित्यज्य सर्वभावात्मभावनाम् ।
यथा तिष्ठसि तिष्ठ त्वं मूकान्धवधिरोपमः ॥८
सर्वं प्रशान्तमजमेकमनादिमध्यमाभास्वरं
स्वप्नमात्रम् चैत्यचिह्नम् ।

११८ ] [ चतुर्थ अध्याय

११८ ] [ चतुर्थ अध्याय
सर्वं प्रशान्तमिति शब्दमयी च दृष्टिर्बोधार्थमेव
हि मुधैव तदोमितीदम् ॥१६
सर्वं किंचिदिदं दृश्यं दृश्यते चेज्जगद्गतम् ।
चिन्निष्पन्दांशमात्रं तन्नान्यदस्तीति भावय ॥२०
नित्यप्रबुद्धचित्तस्त्वं कुर्वन् वाऽपि जगत्क्रियाम् ।
आत्मकत्वं विदित्वा त्वं तिष्ठाक्षुब्धमाब्धिवत् ॥२१
निदाघ की यह बात सुनकर उनके पिता ऋषिवर ऋभु कहने
लगे—"पुत्र ! तुम ज्ञानियों में श्रेष्ठ हो । अब तुम्हारे लिये जानने योग्य
कुछ भी नहीं है । तुम पर भगवान की ऐसी कृपा हुई है कि तुम स्वयं
अपनी बुद्धि के द्वारा ही सब विषयों के ज्ञाता हो गये हो । फिर भी
चित्त की मलीनता से जो भ्रम शेष रह गया है, उसे मैं दूर कर डालूँगा ।
शम, विचार, सन्तोष और सत्संग यह चारों मोक्ष द्वार के द्वारपाल कहे
गये हैं। यदि उनमें से एक का भी आश्रय ग्रहण कर ले तो शेष तीनों
स्वयं ही वश में हो जाते हैं । जगत के पाश से मुक्त होने की कामना
हो तो शास्त्रों के अध्ययन, तप, दम तथा सत्संग के द्वारा अपनी प्रज्ञा-
वृद्धि करे । अपने अनुभव से शास्त्र-प्रमाण एवं गुरु के उपदेश से निरन्तर
अभ्यास द्वारा आत्मचिन्तन की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है । यदि तुमने
संकल्प और आशा का अनुसंधान त्याग दिया है तो कैवल्य की प्राप्ति
स्वयं ही हो गई होगी । चित्त अकर्तृत्व ही चित्त-वृत्तियों का निरोध
कहा गया है । इसे ही कैवल्य अवस्था अथवा पराशान्ति कहते हैं । विश्व
के सब पदार्थों में आत्म-भावना का भले प्रकार त्याग कर गूँगे, अंधे और
बहिरों के समान रहने से ही यह सम्भव है । शब्दमयी वैभिन्नता युक्त
दृष्टि नितान्त व्यर्थ है । एक है, अजन्मा है, आदि मध्य रहित तथा
तेजोमय है इत्यादि शब्द रूप चिन्तन आत्मबोध में बाधा स्वरूप हैं ।
यह दिखलाई पड़ने वाला सम्पूर्ण प्रपंच तत्व रूप में प्रणव ही है । यहाँ
जो कुछ दिखाई पड़ता है, वह चित्तविशेष में दिखाई पड़ता है । अतः

महोपनिषत् [ ११६
यह चित् के स्पन्दन का एक अंश रूप ही है। इसलिए चित्त ही सब
कुछ है। तुम सांसारिक कार्यों को करते हुये भी नित्य प्रबुद्ध चित्त से
आत्मा के एकीभाव का ज्ञान प्राप्त कर प्रशान्त रहने वाले महान् सागर
के समान निश्चल एवं दृढ़चित्त रहो। ऐसा करने से ही कल्याण सम्भव
है ॥ १—११ ॥
तत्त्वावबोध एवासौ वासनातृणपावकः ।
प्रोक्तः समाधिशब्देन न तु तूष्णीमवस्थितिः ॥१२
निरिच्छे संस्थिते रत्ने यथा लोकः प्रवर्तते ।
सत्तामात्रे परे तत्त्वे तथैवायं जगद्गणः ॥१३
अतश्चात्मनि कर्तृत्वमकर्तृत्वं च वै मुने ।
निरिच्छत्वादकर्त्ताऽसौ कर्ता संनिधिमात्रतः ॥१४
ते द्वे ब्रह्मणि विन्देते कर्तृ ताकर्तृ ते ।
यन्नैवैष चमत्कारस्तमाश्रित्य स्थिरो भव ॥१५
तस्मान्नित्यमकर्ताऽहमिति भावनयेद्धया ।
परमामृतनाम्नी सा समतैवावशिष्यते ॥१६
निदाघ शृणु सत्त्वस्था जाता भुवि महागुणाः ।
ते नित्यमेवाभ्युदिताः मुदिताः ख इवेन्दवः ॥१७
यह आत्मज्ञान वासना रूप तिनके को जलाने वाले अग्नि के
समान है। इसी को समाधि कहा गया है। केवल मौन रहना ही समाधि
नहीं है। जैसे रत्न बिना किसी कामना के यों ही पड़ा रहता है तो
भी उसे देखने वाले व्यक्ति उसकी ओर आकर्षित होते ही हैं, वैसे ही
सत्तामात्र जो परतत्व है उसकी ओर सम्पूर्ण विश्व आकर्षित होता है।
इसी आत्मा में कर्तृत्व और अकर्तृत्व दोनों ही विद्यमान हैं। कामना
रहित रहने पर आत्मा 'अकर्ता है और सन्निधिमात्र से कर्ता बन जाता
है। ब्रह्म में कर्तृत्व ओर अकृतृत्व दोनों की ही उपलब्धि है, तुम्हें
जिसमें ऐसा चमत्कार दिखाई दे, उसी का आश्रय पकड़ लो। 'मैं सदा
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१२० ] [ चतुर्थ अध्याय

१२० ] [ चतुर्थ अध्याय
अकर्त्ता हूँ, ऐसी भावना करने पर परम अमृता नाम वाली समता ही
शेष रहती है । जो प्राणी सत्व में विद्यमान रहकर इस लोक में उत्पन्न
हुये हैं, वही गुणवान हैं । वे आकाशस्थ चन्द्र के समान सदा हर्षित रहते
हैं और वे ही उन्नतिशील हैं ॥ १२—१७ ॥
नापदि ग्लानिमायान्ति निशि हेमाम्बुजं यथा ।
नेहन्ते प्रकृतादन्यद्रमन्ते शिष्टवर्त्मनि ॥१८
आकृत्यैव विराजन्ते मैत्र्यादिगुणवृत्तिभिः ।
समाः समरसाः सौम्याः सततं साधुवृत्तयः ॥१९॥
अब्धिवद्गतमर्यादा भवन्ति विशदाशयाः ।
नियतिं न विमुञ्चन्ति महान्तो भास्करा इव ॥२०
कोऽहं कथमिदं चेति संसारमलमाततम् ।
प्रविचार्यं प्रयत्नेन प्राज्ञेन सह साधुना ॥२१
नाकर्मसु नियोक्तव्यं नानार्येण सहावसेत् ।
द्रष्टव्यः सर्वसंहर्त्ता न मृत्युरवहेलया ॥२२
शरीरमस्थि मांसं च त्यक्त्वा रक्ताद्यशोभनम् ।
भृतमुक्तावली तन्तुं चिन्मात्रमवलोकयेत् ॥२३
उपादेयानुपतनं हेयैकान्त विसर्जनम् ।
यदेतन्मनसो रूपं तद्बाह्यं विद्धि नेतरत् ॥२४
गुरुशास्त्रोक्तमार्गेण स्वानुभूत्या च चिद्घने ।
ब्रह्मैवाहमिति ज्ञात्वा वीतशोको भवेन्मुनिः ॥२५
यत्र निशितासिशतपातनमुत्पलताडनवत्सोढव्यं, अग्नि-
दाहो हिमसेचनमिव, अङ्गारार्वटनं चन्दनचर्चैव, निरवधिनाराच
विकिरपातो निदाघविनोदनधारागृहशीकरवर्ष णमिव, स्व-
शिरश्छेदः सुखनिद्रेव, मूकीकरणमाननमुद्रंक, बाधियं महानुप-
चय, इव, इदं नावहेलनया भक्षितव्यं, एवं दृडवैराग्याद्बोधो
भवति ॥ २५—१ ॥

महोपनिषत् [ १२१
गुरुवाक्यसमुद्भूतस्वानुभूत्याऽतिशुद्धया ।
यस्याभ्यासेन तेनात्मा सततं चावलोक्यते ॥२६
विनष्टदिग्भ्रमस्यापि यथापूर्वं विभाति दिक् ।
तथा विज्ञानविध्वस्तं जगन्नास्तीति भावय ॥२७
न धनान्युपकुर्वन्ति न मित्राणि न बान्धवाः ।
न कायक्लेशवैधुर्यं न तीर्थायतनाश्रयः ।
केवलं तन्मनोमात्रजये नासाद्यते पदम् ॥२८
सत्व में स्थित पुरुष स्वर्णिम कमल के समान रात्रि रूप विपत्ति
में कुण्ठित नहीं होते । जो भोग सहज उपलब्ध हो जांय उनके सिवा
अन्य वस्तु की इच्छा नहीं करते और शास्त्र के अनुकूल चलते हैं, वे
सहज ही मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा आदि गुणों से विभूषित
रहते हैं । वे सदा समान भाव में स्थित रहकर लगातार साधुवृत्ति में
ही रहे आते हैं । वे लोक मर्यादा से परे रहकर समुद्र के समान
विशाल हृदय वाले होकर सूर्य के समान नियत मार्ग पर ही गमन
करते हैं । विचार करना हो तो स्वयं क्या है, विश्व प्रपंच कैसे उत्पन्न
हुआ है, इस पर बुद्धिपूर्वक विचार करे । वह कभी निरर्थक कार्य को
न करे और दुष्ट के संग से बचता रहे । मृत्यु सब को खा जाती है,
उसके प्रति उपेक्षा-भाव न रखे । यदि उपेक्षा करनी है तो देह, अस्थि,
मांस, रक्त आदि नश्वर पदार्थों के प्रति उपेक्षा करे । जैसे मोती की
लड़ियों में सूत्र पिरोया जाता है, वैसे प्राणियों में पिरोये हुये चिदात्मा
को देखे । देय वस्तु को त्यागे और उपादेय को ग्रहण करे । यह जान लो
कि मन का स्वरूप बाहरी है, भीतरी नहीं । गुरु और शास्त्र के वचन
तथा अपने अनुभव से "मैं ब्रह्म हूँ" ऐसा जान ले और शोकादि का त्याग
करे । ऐसी अवस्था में तीक्ष्ण तलवार के सैकड़ों आघात कमल की
कोमल मार के समान सहन करने योग्य हो जाते हैं । अग्नि के द्वारा
जलाये जाने का प्रभाव शीतल जल में स्नान करने के समान सहनीय हो

जाता है। आग के अङ्गारों पर लेटना भी ऐसा लगता है जैसे चन्दन का
लेप कर लिया हो। देह पर निरन्तर होने वाली घातक वाण वर्षा भी
गर्मी को शान्त करने वाली शीतल जल के फुब्बारे के समान मन प्रसन्न
करने वाली हो जाती है। सिर का कट जाना सुखदायिनी निद्रा के
समान होता है। गूँगा हो जाना मौनावलम्बन के समान और बहिरा हों
जाना उन्नति के समान सुखप्रद होता है। परन्तु ऐसी अवस्था उपेक्षा से
नहीं मिल सकती। इसकी प्राप्ति वैराग्य से उत्पन्न हुये आत्मज्ञान द्वारा
ही सम्भव है। गुरुशास्त्र के वचनों और अपने अनुभव के आधार पर जो
मानसिक पवित्रता प्राप्त होती है, उसी के द्वारा निरन्तर आत्म साक्षात्कार
होते रहना सम्भव है। जैसे भभूड़े के नष्ट होने पर दिशा का ज्ञान पुनः
होने लगता है, वैसे ही विज्ञान द्वारा ध्वस्त हुये विश्व की स्थिति नहीं
रहती। धन, मित्र, बन्धु, पुत्र-परिजन आदि मनुष्य का उपकार नहीं
कर सकते। शारीरिक क्लेश के नष्ट होने से अथवा तीर्थस्थान में वास
कर लेने मात्र से ही मनुष्य लाभान्वित नहीं हो सकता, वह तो चिन्मात्र
में लय होकर ही परमपद पा सकता है ॥ १८—२८ ॥

यानि दुःखानि या तृष्णा दुःसहा ये दुराधय ।
शान्तचेतःसु तत् सर्वं तमोऽर्केष्विव नश्यति ॥२९
मातरीव परं यान्ति विषमाणि मृदूनि च ।
विश्वासमिह भूतानि सर्वाणि शमशालिनि ॥३०
न रसायनपानेन न लक्ष्म्यालिङ्गितेन च ।
न तथा सुखमाप्नोति शमेनान्तर्यथा जनः ॥३१
श्रुत्वा स्पृष्ट्वा भुक्त्वा च दृष्ट्वा ज्ञात्वा शुभाशुभम् ।
न हृष्यति ग्लायति यः स शान्त इति कथ्यते ॥३२
तुषारकरबिम्बाच्छं मनो यस्य निराकुलम् ।
मरणोत्सवयुद्धेषु स शान्त इति कथ्यते ॥३३
तपस्विषु बहुज्ञेषु याज्ञकेषु नृपेषु च ।

महोपनिषद् [ १२३ ]
बलवत्सु गुणाढ्येषु शमवानेव राजते ॥३४॥
संतोशामृतपानेन ये शान्तास्तृप्तिमागताः ।
आत्माराम महात्मानस्ते महापदमागताः ॥३५॥
अप्राप्तं हि परित्यज्य संप्राप्ते समतां गतः ।
अदृष्टखेदाखेदो यः संतुष्ट इति कथ्यते ॥३६
नाभिनन्दत्यसंप्राप्तं भुङ्क्ते यथेप्सितम् ।
यः स सौम्यसमाचारः सन्तुष्ट इति कथ्यते ॥३७
रमते धीर्ययाप्राप्ते साध्वीवान्तः पुराजिरे ।
सा जीवन्मुक्ततोदेति स्वरूपानन्दायिनी ॥३८
यथाक्षणं यथाशास्त्रं यथादेशं यथासुखम् ।
यथासंभवसत्सङ्गममं मोक्षपथक्रमम् ।
तावद्विचारयेत् प्राज्ञो यावद्विश्रान्तमात्मनि ॥३९
तुर्यविश्रान्तियुक्तस्य निवृत्तस्य भवार्णवात् ।
जीवतोऽजीवताश्चैव गृहस्थस्याथवा यतेः ॥४०
नाकृतेन कृतेनार्थो न श्रुतिस्मृतिविभ्रमैः ।
निर्मन्थर इवाम्भोधिः तिष्ठति यथास्थितः ॥४१
संसार में जितने दुःख, जितनी तृष्णायें और दुश्चिन्ताएं हैं, वे
सब शान्त मन वाले पुरुष में, सूर्य की किरणों से अन्धकार दूर होने के
समान ही नष्ट हो जाती हैं, जैसे माता का पुत्र विश्वास करते हैं, वैसे
ही शम वाले पुरुष का सभी मृदु एवं कठोर प्राणी पूर्ण विश्वास करते
हैं । जो सुख मनुष्य को शांति से प्राप्त होता है, वैसा सुख लक्ष्मी के
आलिंगन द्वारा अथवा अमृत का पान करने पर भी नहीं मिल सकता ।
शांत मनुष्य वही है जो शुभ-अशुभ को सुनकर भी हर्ष विषाद नहीं
करता और भूखा रहने पर या भोजन कर लेने पर दुःख-सुख को नहीं
मानता । जिसका मन चन्द्रमा के समान अत्यन्त निर्मल है और जो
उत्सव, युद्ध अथवा मृत्यु में भी हर्ष-शोक द्वारा अधीर नहीं होता वहीं