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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 572 में से

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पृष्ठ 123

महोपनिषत् [ ११५

नहीं है तो मोह करने से क्या लाभ है ? जो नारी सुमेरु शिखरों के
किनारे उल्लसित होकर प्रवाहित होने वाली गंगा की गति के समान
चंचल है और जो मुक्ताहार से सुशोभित देखी जाती है, वह स्त्री जब
काल के चक्र में फँसती है, तब उसके मांस पिंड रूप स्तन को श्मशान
में कुत्ते चाटते हैं। यह नारियाँ केश विन्यास और अञ्जनादि से सुसज्जित
होकर प्रिय लगने पर भी दुःखदायक स्पर्श वाली होती है। वे अग्नि-
ज्वाल के समान दग्ध कर देने वाली ललनाएं विधाता की दुष्कृति रूप
हैं। यह दूरस्थ प्रज्ज्वलित नरक रूप अग्नियों को ईंघन के समान हैं।
इनकी सरसता में भी नीरसता भरी है। काम नामक शिकारी ने पुरुष
रूपी मृगों को बाँध लेने के लिये नारी रूपी पाश को विस्तृत किया है।
नारी दुर्वासना रूपी रस्सी में बँधे हुये उस पिंड के समान है जो चित्त
रूपी कीचड़ में भ्रमण करने वाले पुरुष रूपी मत्स्यों को इस जीवन रूपी
जाल में फँसा लेती है। समुद्र इन समस्त दोषयुक्त रत्नों का उत्पादक
है। जिसके पास स्त्री है वह विलास की कामना में लीन रहता है, जिसके
पास स्त्री नहीं है, उसके लिये भोग का कोई कारण नहीं। जो स्त्री का
त्याग कर सका, उसने ही संसार का त्याग कर दिया और जो संसार
को त्याग देता है, वही सुखी हो सकता है। इसलिये दुःखों की यह
शृङ्खला हम से दूर ही रहे ॥ २६—४८ ॥

दिशोऽपि न हि दृश्यन्ते देशोऽप्यन्योपदेशकॄत् ।
शैला अपि विशीर्यन्ते शीर्यन्ते तारका अपि ॥४९
शुष्यत्यपि समुद्राश्च ध्रुवोऽप्य ध्रुवजीवनः ।
सिद्धा अपि विनश्यन्ति जीर्यन्ते दानवायः ॥५०
परमेष्ठ्यपि निष्ठवान् हीयते हरिरप्यजः ।
भवोऽप्यभावमायाति जीर्यं ते वे दिगीश्वराः ॥५१
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च सर्वा वा भूतजातयः ।
नाशमेवानुधावन्ति सलिलानीव बाडवम् ॥५२