सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 572 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 121

महोपनिषत् ११३
दासाः पुत्राः स्त्रियश्चैव बान्धवाः सुहृदस्तथा ।
हसत्युन्मत्तकमिव नरं वार्धककम्पितम् ॥३५
दैन्यदोषमयी दीर्घा वर्धते वार्धके स्पृहा ।
सर्वापदामेकसखी हृदि दाहप्रदायिनी ॥३६
कच्चिद्वा विद्यते यैषा संसारे सुखभावना ।
आखुः स्तम्बमिवासाद्य कालस्तामपि कृन्तति ॥३७
तृणं पांसुं महेन्द्रं च सुवर्णं मेरुसर्षपम् ।
आत्मंभरितया सर्वमात्मसात्कर्तुमुद्यतः ।
कालोऽयं सर्वसंहारी तेनाक्रान्तं जगत्त्रयम् ॥३८
ऐसा य देह रूप गृह मुझे अच्छा नहीं लगता । हे पिताजी !
यह देह बाहर से तथा भीतर से भी मांस और रक्त से ही व्याप्त है
तो इस नाशवान् देह में सुन्दरता कहाँ से आई ? यदि कोई यह
विश्वास करता हो कि विद्युत में चपलता अथवा गंधर्वों की नगरी में
चंचलता नहीं है तो वह इस देह के स्थिर होने में भले ही सन्देह न करे ।
इस देह की तीनों अवस्थायें भय के देने वाली हैं । बालकपन में अपने
से बड़े लड़कों से तथा माता-पिता आदि से भय लगता है । युवावस्था
प्राप्त होने पर अपने ही चित्त के भीतर निवास करने वाले कामरूपी
पिशाश के भ्रम जाल में फँसकर पराजय को प्राप्त करता है । वृद्धावस्था
प्राप्त होने पर मनुष्य कांपता हुआ चलता-फिरता है । उसे देखकर स्त्रियाँ
बन्धु, मित्र, पुत्र, पुत्रियाँ तथा नौकर-चाकर भी हँसी उड़ाते हैं । उस
आयु में सामर्थ्यहीनता के कारण कामनाओं की अधिक वृद्धि होती है ।
यह जरावस्था हृदय को जलाने वाली सब विपत्तियों की सखी है । जिस
सुख की भावना सांसारिक प्राणी करता है, वह सुख है कहाँ ? काल
तो तिनके के समान काटता ही जाता है । वह काल छोटे से तिनके
और रज के कणों को भी महेन्द्र तथा मेरु पर्वत को भी सरसों के समान
कर देने में समर्थं है । यह सभी को नष्ट करने वाला है और अपना पेट