१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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उद्यत है। वह तृप्त हो चुकने पर भी विभिन्न फलों की कामना करती
हुई उन्हें तोड़ती है और अधिक समय तक एक स्थान पर नहीं टिकती।
वह क्षण भर में आकाश-भ्रमण करती दिखाई देती है, क्षण भर में ही
पाताल गामिनी होती है और क्षण भर में ही विभिन्न दिशाओं में चक्कर
काटती है। विश्व के समस्त दुःखों में यह तृष्णा ही ऐसी है जो घोर
दुःखदायिनी है तथा महलों में रहने वालों को भी घोर संकट में फँसाती
है। यह तृष्णा एक महामारी है और इसे वही नष्ट कर सकता है जो
चिन्ता को छोड़दे। यदि चिन्ता का क्षण भर को भी त्याग कर दिया
जाय तो अत्यन्त सुख मिलता है। यदि थोड़ी सी भी चिन्ता मन में हो
तो उससे दुःख की प्राप्ति होती है। इस देह के समान तुच्छ, गुण-रहित
एवं शोच करने योग्य अन्य कोई पदार्थ नहीं है। इस देह रूप महान गृह
में अहंकार रूप गृहस्थ निवास करता है। यह देह चाहे चिरजीवित रहे
या शीघ्र नष्ट होजाय, इसकी मुझे चिन्ता नहीं। जिस देह रूप घर में
इन्द्रिय रूपी पशु पंक्तिबद्ध खड़े हैं और जिसके आंगन में तृष्णा रूपी
बंदरिया चलती-फिरती है, जिसमें चित्त-वृत्ति रूप भृत्यों का समावेश है,
ऐसा यह शरीर रूप गृह मुझे अभीष्ट नहीं है। जिह्वा रूपी बंदरिया से
आक्रान्त हुआ यह मुख रूप द्वार इतना भीषण हो रहा है कि प्रारम्भ में
ही दन्तरूप अस्थियाँ दृष्टिगोचर हो रही हैं ॥२२-३०॥
रक्तमांसमयस्यास्य सबाह्याभ्यन्तरे मुने ।
नाशैकधर्मिणो ब्रूहि क्व कायस्य रम्यता ॥३१
तडित्सु शरदभ्रेषु गन्धर्वनगरेषु च ।
स्थैर्यं येन विनिर्णीतं स विश्वसितु विग्रहे ॥३२
शैशवे गुरुतो भीतिर्मातृतः पितृतस्तथा ।
जनतो ज्येष्ठबालाच्च शैशवं भयमन्दिरम् ॥३३
स्वचित्तविलसंस्थेन नानाविभ्रमकारिणा ।
बलात्कामपिशाचेन विवशः परिभूयते ॥३४