१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
॥ त्रयोविंशः खण्डः ॥
सभी स्वर घोषपूर्वक और बलपूर्वक उच्चारण किये जाने चाहिए। उनका उच्चारण करते समय कहे-
हम इन्द्रदेव में पराक्रम की स्थापना करते हैं। सभी ऊष्मवर्ण बिना ग्रहण किये और बिना निकाले ही
प्रयत्नपूर्वक उच्चारण किये जाते हैं। उनके उच्चारण के समय कहे - हम प्रजापति को अपनी आत्मा देते हैं।
सभी स्पर्शाक्षर एक दूसरे में मिलाये बिना ही उच्चारण करते हुए कहे-'हम मृत्युदेव से अपने को छुड़ाते हैं'॥
॥ त्रयोविंशः खण्डः ॥
त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्य-
कुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन्सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति
ब्रह्मस१स्थोऽमृतत्वमेति ॥ १ ॥
धर्म के तीन स्कन्धों (आधार स्तम्भों) के विषय में वर्णन करते हैं। धर्म के तीन स्कन्ध हैं; यज्ञ,
अध्ययन और दान-यह पहला स्कन्ध है। तप दूसरा स्कन्ध है। आचार्य कुल में साधनारत ब्रह्मचारी आचार्य
कुल में अपने शरीर को तितिक्षा द्वारा क्षीण कर देता है, यह तीसरा स्कन्ध है। ये सभी पुण्य लोकों के
अधिकारी होते हैं और ब्रह्म में स्थित अमृतत्व को प्राप्त करते हैं ॥ १ ॥
प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या संप्रास्रवत्तामभ्यतपत्तस्या
अभितप्ताया एतान्यक्षराणि संप्रास्रवन्त भूर्भुवः स्वरिति ॥ २ ॥
प्रजापति देव लोकों का सार ग्रहण करने के उद्देश्य से तप करने लगे। तप के प्रभाव से लोकों से त्रयी
विद्या-ऋक्, यजु एवं साम की उत्पत्ति हुई। पुनः तप के प्रभाव से उस त्रयी विद्या से भूः, भुवः एवं स्वः-
ये अक्षर प्रस्रवित हुए ॥ २ ॥
तान्यभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्य ॐकारः संप्रास्रवत्तद्यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि
संतृष्णान्येवमोंकारेण सर्वा वाक् संतृण्णोंकार एवेद१ सर्वमोंकार एवेद१ सर्वम् ॥ ३ ॥
पुनः तप के प्रभाव से उन्होंने तीनों अक्षरों का सार ॐकार प्राप्त किया। जिस प्रकार शङ्कुओं (नसों)
द्वारा सभी पत्ते व्याप्त रहते हैं, उसी प्रकार ॐकार द्वारा सम्पूर्ण वाणियाँ व्याप्त हैं। ॐ कार ही यह सम्पूर्ण
(जगत्) है। ॐ ही यह सम्पूर्ण (आकाश) है ॥ ३ ॥
॥ चतुर्विंशः खण्डः ॥
इस खण्ड में यज्ञ के तीन (प्रातः, मध्याह्न और सायं) सवनों के माध्यम से जीवन के तीन कालों में किए
जाने वाले साधना पुरुषार्थ का उल्लेख ऋषि ने किया है। ब्रह्मचर्य आश्रम में अध्ययन आदि पूर्ण होने पर जीवन का
प्रारंभ सद्गृहस्थ से किया जाता है। इसीलिए प्रथम सवन में गार्हपत्याग्नि से साधना प्रारंभ की जाती है-
ब्रह्मवादिनो वदन्ति यद्वसूनां प्रातःसवन१ रुद्राणां माध्यन्दिन१ सवनमादित्यानां च
विश्वेषां च देवानां तृतीयसवनम् ॥ १ ॥
(अब यज्ञ के सम्बंध में कहते हैं।) ब्रह्मवादी कहते हैं कि प्रातःकाल का सवन वसुगणों का है,
मध्याह्न सवन रुद्रगणों का है और तृतीय सवन आदित्य गणों तथा विश्वेदेवों का है ॥ १ ॥
क्व तर्हि यजमानस्य लोक इति स यस्तं न विद्यात्कथं कुर्यादथ विद्वान्कुर्यात् ॥ २ ॥
फिर यजमान का लोक कहाँ है ? जो यजमान अपने पुण्यलोक को नहीं जानता, वह यज्ञ क्यों
करेगा ? अतः यज्ञ के फलस्वरूप पुण्यलोक को जानकर ही यज्ञ करना चाहिए ॥ २ ॥
अध्याय २ खण्ड २४ मन्त्र ९ १११
अध्याय २ खण्ड २४ मन्त्र ९ १११
पुरा प्रातरनुवाकस्योपाकरणाज्जघनेन गार्हपत्यस्योदङ्मुख उपविश्य स वासवं
सामाभिगायति ॥ ३॥
प्रातःकाल अनुवाक (ऋचा) का पाठ करने से पूर्व वह यजमान गार्हपत्याग्नि के पीछे उत्तराभिमुख
बैठकर वसुदेवों के साम का भली प्रकार गान करता है ॥ ३॥
लो ३ कद्वारमपावा ३ र्णू ३३ पश्येम त्वा वयँरा ३ ३ ३ ३ ३ हुं ३ आ ३३ ज्या ३
यो ३ आ ३२१११ इति ॥ ४॥
हे अग्निदेव ! आप इस लोक (लौकिक सम्पदा) का द्वार खोल दें, जिससे हम राज्य प्राप्ति के निमित्त
आपका दर्शन करें ॥ ४॥
अथ जुहोति नमोऽग्नये पृथिवीक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै
यजमानस्य लोक एतास्मि ॥ ५॥
यजमान हवन करते हुए पृथ्वी लोक निवासी इस अग्निदेव को नमन करते हुए कहते हैं-हे अग्निदेव !
आपको हमारा नमन है। आप हमें इस लोक की प्राप्ति कराएँ, निश्चय ही यही यजमान का लोक है। हम
इसे प्राप्त करें ॥ ५॥
अत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै वसवः
प्रातःसवनं संप्रयच्छन्ति ॥ ६॥
यजमान हवन करते हुए कहते हैं- हम आयु समाप्त होने पर पुण्य लोक को प्राप्त हों, इस निमित्त
आहुति समर्पित है। बाधाओं (सीमाओं) को दूर करें, ऐसा कहकर वे उठते हैं। वसुगण उन्हें प्रातः सवन
प्रदान करते हैं ॥ ६॥
['वसुगण' आवास देने वाले देवता हैं। इस लोक में दैवी अनुशासन में सुखी-सम्पन्न जीवन की प्राप्ति के
लिए उनसे प्रार्थना की जाती है।]
पुरा माध्यन्दिनस्य सवनस्योपाकरणाज्जघनेनाग्नीध्रीयस्योदङ्मुख उपविश्य स रौद्रं
सामाभिगायति ॥ ७॥
मध्याह्न सवन के पूर्व यजमान दक्षिणाग्नि के पीछे उत्तराभिमुख होकर बैठकर रुद्रदेव सम्बन्धी साम
का गायन करता है ॥ ७ ॥
लो३कद्वारमपावा ३ र्णू ३३ पश्येम त्वा वयं वैरा ३३३३३ हुं ३ आ ३३ ज्या ३ यो
३ आ ३२१११ इति ॥ ८॥
. हे वायो ! आप अन्तरिक्ष लोक का द्वार खोलें, जिससे हम वैराज्य पद की प्राप्ति हेतु आपका दर्शन करें॥
अथ जुहोति नमो वायवेऽन्तरिक्षक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै
यजमानस्य लोक एतास्मि ॥ ९॥
अब यजमान हवन करते हुए कहते हैं- अन्तरिक्ष लोक के निवासी हे वायुदेव ! आपको नमस्कार है।
हमें अन्तरिक्ष लोक (विभूतियाँ) प्राप्त कराएँ। यह निश्चय ही यजमान का लोक है, इसे हम प्राप्त करें ॥ ९॥
[सद्गृहस्थ के दायित्व पूरे करके जीवन के दूसरे सवन में साधक को वानप्रस्थ जीवन जीना चाहिए। रुद्र
विकार नाशक देवता हैं। उनकी साधना करके व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन से विकारों के निवारण का
सुधारात्मक पुरुषार्थ करना चाहिए।]
११२ छान्दोग्योपनिषद्
अत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै रुद्रा
माध्यन्दिनँ सवनँ संप्रयच्छन्ति ॥ १०॥
अब यजमान हवन करते हुए कहते हैं- हम आयु समाप्त होने पर अन्तरिक्ष लोक प्राप्त करें, इस
निमित्त यह आहुति समर्पित है। वह यजमान जब इस लोक की प्राप्ति के निमित्त समस्त बाधाएँ दूर करने
के लिए तैयार हो जाते हैं, तब उन्हें रुद्रगण मध्याह्न सवन प्रदान करते हैं॥ १०॥
पुरा तृतीयसवनस्योपाकरणाज्जघनेनाहवनीयस्योदङ्मुख उपविश्य स आदित्यँ स
वैश्वदेवँ सामाभिगायति ॥ ११ ॥
तृतीय सवन के पूर्व यजमान आहवनीय अग्नि के पीछे उत्तराभिमुख बैठकर विश्वेदेवा सम्बन्धी साम
का गायन करते हैं॥ ११॥
लो ३ कद्वारमपावा ३ र्णू ३३ पश्येम त्वा वयँस्वारा ३३३३३ हुं ३ आ ३३ ज्या ३
यो ३ आ ३२१११ इति ॥ १२ ॥
हे आदित्य देव ! आप स्वर्गलोक का द्वार खोल दें, जिससे हम स्वाराज्य प्राप्ति के निमित्त
आपका दर्शन कर सकें ॥ १२ ॥
आदित्यमथ वैश्वदेवं लो ३ कद्वारमपावा ३ र्णू ३३ पश्येम त्वा वयँ साम्ना ३३३३३
हुं ३ आ ३३ज्या ३ यो ३ आ ३२१११ इति ॥ १३ ॥
यह आदित्य सम्बन्धी साम है, अब विश्वेदेवा सम्बन्धी साम का गायन करते हैं-हे देवगणो! आप
स्वर्गलोक का द्वार खोल दें, जिससे हम साम्राज्य प्राप्ति के निमित्त आपका दर्शन कर सकें॥ १३॥
अथ जुहोति नम आदित्येभ्यश्च विश्वेभ्यश्च देवेभ्यो दिविक्षिद्भ्यो लोकक्षिद्भ्यो
लोकं मे यजमानाय विन्दत ॥ १४ ॥
तदनन्तर यजमान यज्ञ करते हुए कहते हैं- स्वर्ग लोक निवासी आदित्यगण और विश्वेदेवा इस लोक
में रहने वाले इस यजमान का नमन स्वीकार करें। इस यजमान को पुण्यलोक की प्राप्ति कराएँ॥ १४॥
एष वै यजमानस्य लोक एतास्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः
स्वाहाऽपहतपरिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति ॥ १५ ॥
यह निश्चय ही यजमान का लोक है, इसे हम प्राप्त करें। यहाँ यजमान यज्ञ करते हुए कहते हैं- आयु
समाप्त होने पर हम स्वर्गलोक प्राप्त करें, इस निमित्त यह आहुति समर्पित है। 'हम स्वर्ग लोक प्राप्ति हेतु
आगे आयी सीमाएँ पार करेंगे' ऐसा कहकर यजमान तैयार हो जाते हैं॥ १५ ॥
तस्मा आदित्याश्च विश्वे च देवास्तृतीयँ सवनँ संप्रयच्छन्त्येष ह वै यज्ञस्य मात्रां वेद
य एवं वेद य एवं वेद ॥ १६ ॥
उस यजमान को आदित्यगण और विश्वेदेवा तृतीय सवन प्रदान करते हैं। जो इस प्रकार इन तथ्यों को
जानते हैं, वे यज्ञ के सार तत्त्व को जानते हैं॥ १६॥
[आदित्य एवं विश्वेदेवा की साधना द्वारा जीवन के अन्तिम चरण में साधक को 'वसुधैव कुटुम्बकम्' के
अनुरूप ज्ञान एवं प्रेरणा का संचार करना चाहिए।]
अध्याय ३ खण्ड ३ मन्त्र १ १९३
अध्याय ३ खण्ड ३ मन्त्र १ १९३
॥ अथ तृतीयोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमः खण्डः ॥
असौ वा आदित्यो देवमधु तस्य द्यौरेव तिरश्चीनवश्रोऽन्तरिक्षमपूपो मरीचयः पुत्राः ॥ १ ॥
(ॐकार रूप) यह आदित्य ही देवों का मधु है । द्युलोक वह तिरछा बाँस है, जिससे छत्ता लटकता
है । अन्तरिक्ष छाता है और किरणें मधु-मक्खियों के बच्चों की तरह हैं ॥ १ ॥
तस्य ये प्राञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्राच्यो मधुनाड्यः । ऋच एव मधुकृत ऋग्वेद एव
पुष्पं ता अमृता आपस्ता वा एता ऋचः ॥ २ ॥
इस आदित्य की पूर्व दिशा की जो किरणें हैं, वे छत्तों के पूर्वीय छिद्र हैं। ऋचाएँ ही मधुमक्खियाँ हैं,
ऋग्वेद ही पुष्प हैं, सोम आदि अमृत रूप जल तत्त्व हैं ॥ २ ॥
एतमृग्वेदम्अभ्यतपँस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यँ रसोऽजायत ॥ ३ ॥
उन ऋचाओं ने ही ऋग्वेद को अभितप्त किया, उस अभितपन से यश, तेजस्, इन्द्रिय-शक्ति, पराक्रम
अन्नादि रस उत्पन्न हुआ ॥ ३ ॥
तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य रोहितँ रूपम् ॥ ४ ॥
वह रस विशेष रूप से क्रियाशील हुआ। उसने आदित्य के पूर्व भाग में आश्रय ले लिया। यह जो
आदित्य का लाल रंग दिख रहा है, वही वह रस है ॥ ४ ॥
॥ द्वितीयः खण्डः ॥
अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मयस्ता एवास्य दक्षिणा मधुनाड्यो यजूंष्येव मधुकृतो
यजुर्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥
अब आदित्य की जो दक्षिण दिशा की ओर किरणें हैं, वे इस छत्ते की दक्षिणवर्ती मधु नाड़ियाँ हैं।
यजुर्वेद की कण्डिकाएँ ही मधुमक्खियाँ हैं, यजुर्वेद ही पुष्प है और (सोमादि) अमृत ही जल है ॥ १ ॥
तानि वा एतानि यजूंष्येतं यजुर्वेदम्अभ्यतपँस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं
वीर्यमन्नाद्यँरसोऽजायत ॥ २ ॥
यजुर्वेद की कण्डिकाओं ने यजुर्वेद को अभितप्त किया। उस अभितपन से यश, तेजस्विता, इन्द्रिय
शक्ति, पराक्रम और अन्नादि रस उत्पन्न हुए ॥ २ ॥
तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य शुक्लँ रूपम् ॥ ३ ॥
वह रस विशेष रूप से क्रियाशील हुआ। उसने आदित्य के दक्षिण भाग का आश्रय लिया। यह जो
आदित्य का श्वेत रूप दृष्टिगोचर हो रहा है, यह वही है ॥ ३ ॥
॥ तृतीयः खण्डः ॥
अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्रतीच्यो मधुनाड्यः सामान्येव मधुकृतः
सामवेद एव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥
अब जो आदित्य के पश्चिमी छोर की किरणें हैं, वे ही पश्चिम ओर की मधु नाड़ियाँ हैं। साम मन्त्र ही
मधुमक्खियों के रूप में हैं, सामवेद ही पुष्प हैं और (सोमादिरूप) अमृत ही जल है ॥ १ ॥
१९४ छान्दोग्योपनिषद्
तानि वा एतानि सामान्येतः सामवेदमभ्यतपंस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं
वीर्यमन्नाद्यः रसोजायत ॥ २ ॥
उन साम मंत्रों ने सामवेद को अभितप्त किया। उस अभितपन से यश, तेजस्, इन्द्रिय शक्ति, पराक्रम
और अन्नादि रूप रस उत्पन्न हुए ॥ २ ॥
तद्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य परं कृष्णःरूपम् ॥ ३ ॥
वह रस विशेष रूप से क्रियाशील हुआ और आदित्य के पश्चिमी भाग में आश्रित हुआ। यह जो
आदित्य का कृष्ण रूप है, यह वही है ॥ ३ ॥
॥ चतुर्थः खण्डः ॥
अथ येऽस्योदञ्चो रश्मयस्ता एवास्योदीच्यो मधुनाड्योऽथर्वाङ्गिरस एव मधुकृत
इतिहासपुराणं पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥
इस आदित्य की जो उत्तरी भाग की किरणें हैं, वे ही इसकी उत्तर दिशा की मधु नाड़ियाँ हैं,
अथर्व-मन्त्र ही मधु मक्खियाँ हैं। इतिहास-पुराण ही पुष्प हैं। (सोमादि रूप) अमृत ही जल है ॥१ ॥
ते वा एतेऽथर्वाङ्गिरस एतदितिहासपुराणमभ्यतपंस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं
वीर्यमन्नाद्यःरसोजायत ॥ २ ॥
उन अथर्व मन्त्रों ने इतिहास-पुराण आदि को अभितप्त किया। उस अभितपन से यश, तेजस्, इन्द्रिय
शक्ति, पराक्रम और अन्नादि रूप रस उत्पन्न हुए ॥ २ ॥
तद्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य परं कृष्णः रूपम् ॥ ३ ॥
वह रस विशेष रूप से क्रियाशील हुआ और आदित्य के उत्तर भाग में आश्रित हुआ। यह जो आदित्य
का अत्यन्त कृष्ण रूप है, यह वही है ॥ ३ ॥
॥ पञ्चमः खण्डः ॥
अथ येऽस्योर्ध्वा रश्मयस्ता एवास्योर्ध्वा मधुनाड्यो गुह्या एवादेशा मधुकृतो ब्रह्मैव
पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥
इस आदित्य की जो ऊपर की ओर की रश्मियाँ हैं, यही ऊपर की मधु नाड़ियाँ हैं। गुह्य (अदृश्य)
आदेश ही मधुकर हैं, ब्रह्म ही पुष्प है तथा (सोमादि रूप) अमृत ही जल है ॥ १ ॥
ते वा एते गुह्या आदेशा एतद्ब्रह्माभ्यतपंस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं
वीर्यमन्नाद्यः रसोजायत ॥ २ ॥
उन गुह्य आदेशों ने ही ब्रह्म को अभितप्त किया। उस अभितपन से यश, तेजस्, इन्द्रिय शक्ति, पराक्रम
और अन्नादिरूप रस उत्पन्न हुए ॥ २ ॥
[ पदार्थ विज्ञान आदित्यादि की सक्रियता के पीछे पदार्थ कणों की सक्रियता को कारण मानता है। ऋषि
कहते हैं कि आदित्यादि की जो दृश्य प्रक्रिया चल रही है, उसके पीछे चेतन का संकल्प या आदेश कार्य कर रहा
है। कम्प्यूटर सारे कार्य करता दिखता है, किन्तु कम्प्यूटर वैज्ञानिक जानता है कि उस सारी प्रक्रिया के मूल में
कम्प्यूटर को दिया गया निर्देश (कमाण्ड) ही उसकी सक्रियता का कारण है। उसी प्रकार ऋषि इस विश्व ब्रह्माण्ड
के पीछे कोई गुप्त निर्देश होना मानते हैं। उसे ही उन्होंने दृश्य रसों का भी रस कहा है।]
अध्याय ३ खण्ड ६ मन्त्र ४ १९५
अध्याय ३ खण्ड ६ मन्त्र ४ १९५
तद्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य मध्ये क्षोभत इव ॥ ३ ॥
वह रस विशेष रूप से क्रियाशील हुआ और वह आदित्य के ऊर्ध्व भाग में आश्रित हुआ। आदित्य
के मध्य भाग में जो उद्वेलित होता हुआ संचरित हो रहा है, यह वही है ॥ ३ ॥
ते वा एते रसानाँ रसा वेदा हि रसास्तेषामेते रसास्तानि वा एतान्यमृतानाममृतानि
वेदा ह्यमृतास्तेषामेतान्यमृतानि ॥ ४ ॥
वे श्वेत, कृष्ण, रोहित आदि रूप ही रसों के रस हैं, वेद ही रस हैं और वे उनके भी रस हैं। वे ही
अमृतों के अमृत हैं- वेद ही अमृत हैं और वे उनके भी अमृत हैं ॥ ४ ॥
[ प्रथम से पाँचवें खण्ड तक आदित्य के पूर्व, दक्षिण, पश्चिम एवं उत्तर भागों तथा ऊर्ध्व भाग में स्थित रसों
का वर्णन किया गया है। सूर्य के दृश्य स्थूल रंगों के साथ कुछ सूक्ष्म चेतन प्रवाह भी जुड़े हुए हैं, ऐसा ऋषि ने कहा
है। सूर्य के रोहित, श्वेत रंग विभाग तो सहज ही समझ में आ जाते हैं। कृष्ण और अतिकृष्ण क्या है ? यह सूर्य के
वे विभाग ही सकते हैं, जिन्हें पदार्थ विज्ञानी सौर कलंक कहते हैं। इन पाँच खण्डों में सूर्य के पूर्वादि विभागों में
विशेष प्रवाहों की स्थापना का वर्णन किया गया है। आगे के ५ खण्डों में ( ६ से १० तक) सूर्य के उन्हीं भागों
से उसी प्रकार अमृत प्रवाहों के प्रकट होने तथा उसके प्रभाव आदि का वर्णन किया गया है। ]
॥ षष्ठः खण्डः ॥
तद्यत्प्रथमममृतं तद्वसव उपजीवन्त्यग्निना मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं
दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥
इनमें जो (रोहित वर्ण का) प्रथम अमृत है, वसुगण अग्नि देव के मुख से संयुक्त होकर उसमें
जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं, न पीते हैं, वे केवल इस अमृत को देखकर ही तृप्ति
को प्राप्त कर लेते हैं ॥ १ ॥
त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥ २ ॥
वे वसुगण इस रूप से ही विश्रान्ति पाते हैं और उसी से उत्साहित भी होते हैं ॥ २ ॥
स य एतदेवममृतं वेद वसूनामेवैको भूत्वाग्निनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स य
एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३ ॥
जो इस प्रकार इस अमृत रूप को जानता है, वह वसुगणों में ही कोई एक होता है। वह अग्नि (यज्ञ)
के साथ संयुक्त होकर इस अमृत रूप को देखकर ही तृप्त हो जाता है। इसी रूप से वह ध्यानस्थ (अक्रिय)
होता है और इसी से उत्साहित भी होता है ॥ ३ ॥
[ ऋषि कहते हैं कि वसुओं द्वारा प्रवाहित अमृत तत्त्व को साधकों में स्थित वसु ही जान पाते हैं। आगे के
खण्डों में इसी प्रकार रुद्र आदि के बारे में कहा गया है। उपनिषदों का यह मत है ही कि विराट् में स्थित देवों के
अंश मनुष्य के अन्दर में स्थित हैं। अस्तु, वे अपने समानधर्मी प्रवाहों से सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं। सुदूर अन्तरिक्ष
यानों में स्थित विभिन्न उपकरणों को उनके अनुरूप विशेष फ्रीकैन्सी सिगनल भेजकर सक्रिय या निष्क्रिय कर
दिया जाता है, उसी प्रकार मनुष्य के अन्दर स्थापित विशिष्ट सर्किट (चक्र) देव प्रवाह अन्तरिक्षीय तत्सम प्रवाहों
से जागृत् या सुप्त अवस्था को प्राप्त होते हैं।]
स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता वसूनामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥
जब तक सूर्य अपने पूर्व पक्ष से उदित होता है और उसका पश्चिम भाग अस्त होता है, तब तक
वसुगणों के अधिकार और स्वाराज्य के भागों का उपभोग करता है ॥ ४ ॥
११६ छान्दोग्योपनिषद्
[ छठवें से दसवें खण्ड तक सूर्य के उदय एवं अस्त की प्रक्रिया में विभिन्न दिशाओं का उल्लेख किया गया
है। अधिकांश आचार्यों ने उन दिशाओं को पृथ्वी की दिशाएँ मानकर अर्थ करने के प्रयास किए हैं, जो विवेक को
संतुष्ट नहीं कर पाते। ये दिशाएँ पृथ्वी की दिशाएँ नहीं हैं। जैसा कि पूर्व खण्डों में स्पष्ट लिखा है कि विशिष्ट दिव्य
प्रवाहों की स्थापना सूर्य के विशिष्ट ( पूर्वादि नामक ) भागों में हुई है। यहाँ सूर्य के उन्हीं भागों से विशिष्ट अमृत
प्रवाहों के प्रकट होने की बात कही गयी है। आदित्य के पूर्व से उदय का भाव यह लिया जाना चाहिए कि जब
आदित्य का पूर्व वाला भाग दृश्य होता है और पश्चिम वाला अदृश्य ( अस्त ) होता है, उस समय तक वसुगणों का
तथा उनसे सम्बद्ध अमृत प्रवाह का प्रभाव वातावरण एवं साधक पर रहता है। आगे के खण्डों में भी इसी प्रकार
सूर्य के अन्य दक्षिण, पश्चिम आदि भागों के उदय-अस्त का भाव लिया जाना उचित है।]
।। सप्तमः खण्डः ।।
अथ यद्द्वितीयममृतं तद्रुद्रा उपजीवन्तीन्द्रेण मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न
पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥
यह जो शुक्लरूप द्वितीय अमृत है, रुद्रगण इन्द्रदेव के नेतृत्व में संयुक्त होकर उसमें जीवन धारण
करते हैं। वे देवगण न तो खाते हैं और न पीते हैं, वे इस अमृतरूप को देखकर ही तृप्त हो जाते हैं ॥ १ ॥
त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥ २ ॥
वे इस रूप को देखकर ही अक्रिय ( ध्यानस्थ ) हो जाते हैं और इसी को देखकर उत्साहित भी होते हैं॥ २ ॥
स य एतदेवममृतं वेद रुद्राणामेवैको भूत्वेन्द्रेणैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स
एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३ ॥
जो साधक इस प्रकार इस अमृत को जानता है, वह रुद्रगणों में से कोई एक होकर इन्द्रदेव के नेतृत्व
में इस अमृत को देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूप को देखकर ही अक्रिय हो जाता है और इसी को
देखकर उत्साहित होता है ॥ ३ ॥
स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता द्विस्तावद्दक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता
रुद्राणामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥
जब तक आदित्य अपने पूर्व भाग से उदित होता और पश्चिम से अस्त होता है, उससे दुगुने समय तक
उसका दक्षिण भाग उदित होता है और उत्तर भाग अस्त होता है। उतने समय तक वह ( साधक) रुद्रगणों
के ही अधिकार एवं स्वाराज्य को प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
।। अष्टमः खण्डः ।।
अथ यत्तृतीयममृतं तदादित्या उपजीवन्ति वरुणेन मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न
पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥
अब यह जो कृष्ण रूप तृतीय अमृत है, आदित्यगण वरुणदेव के नेतृत्व में उसमें जीवन धारण करते
हैं। वे देवगण न तो खाते हैं, न पीते हैं, वे इस अमृत को देखकर ही तृप्ति का अनुभव करते हैं ॥ १ ॥
त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥ २ ॥
वे इसी रूप से विश्रान्ति पाते हैं और इसी से उत्साहित हो जाते हैं ॥ २ ॥
स य एतदेवममृतं वेदादित्यानामेवैको भूत्वा वरुणेनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति
स एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३ ॥
अध्याय ३ खण्ड १० मन्त्र २ ११७
अध्याय ३ खण्ड १० मन्त्र २ ११७
जो इस प्रकार इस अमृत को जानता है, वह साधक आदित्यगणों में से एक होकर वरुण देव के नेतृत्व
में अमृत को देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूप से ही अक्रिय होता है और इसी से उद्यमशील होता है॥
स यावदादित्यो दक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता द्विस्तावत्पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेता-
ऽऽदित्यानामेव तावदाधिपत्यꣳस्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥
वह सूर्य जब तक दक्षिण भाग से उदित होता और उत्तर भाग से अस्त होता है, उससे दुगुने समय
तक पश्चिम भाग से उदित होता और पूर्व भाग से अस्त होता है। उतने समय तक वह (साधक)
आदित्यगणों के ही अधिकार एवं स्वाराज्य को प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
॥ नवमः खण्डः ॥
अथ यच्चतुर्थममृतं तन्मरुत उपजीवन्ति सोमेन मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न
पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥
यह जो अत्यन्त कृष्ण रूप चतुर्थ अमृत है, मरुद्गण सोमदेव के नेतृत्व में उसमें जीवन धारण करते
हैं। वे देवगण न तो खाते हैं, न पीते हैं, वे इस अमृत को देखकर ही तृप्त हो जाते हैं ॥१॥
त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥ २ ॥
वे इस रूप को ध्यान में केन्द्रित कर अक्रिय (ध्यानस्थ) होते हैं और इसी से सक्रिय अथवा
उद्यमशील भी होते हैं ॥ २ ॥
स य एतदेवममृतं वेद मरुतामेवैको भूत्वा सोमेनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स
एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३ ॥
जो इस प्रकार इस अमृत रूप को जानता है, वह मरुद्गणों में से कोई एक होकर सोमदेव के नेतृत्व
में इस अमृत रूप को देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूप को ध्यान में केन्द्रित कर अक्रिय हो जाता है
तथा इसी से सक्रिय भी होता है ॥ ३ ॥
स यावदादित्यः पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेता द्विस्तावदुत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता
मरुतामेव तावदाधिपत्यꣳ स्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥
वह आदित्य जब तक अपने पश्चिम भाग से उदित होता और पूर्व से अस्त होता है, उससे दुगुने समय
तक वह उत्तरभाग से उदित होता और दक्षिण से अस्त होता है। उतने समय तक वह (साधक) मरुद्गण
के ही अधिकार और स्वाराज्य को प्राप्त करता है ॥ ४ ॥
॥ दशमः खण्डः ॥
अथ यत्पञ्चमममृतं तत्साध्या उपजीवन्ति ब्रह्मणा मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न
पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥
आदित्य के मध्य संचरित - स्पन्दित होता हुआ जो पंचम अमृत है, साध्यगण देव ब्रह्मा के नेतृत्व में उसमें
जीवन धारण करते हैं, वे देवगण न तो खाते हैं, न पीते हैं, वे इस अमृत रूप को देखकर ही तृप्त हो जाते हैं ॥ २ ॥
त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥ २ ॥
वे इस रूप को ध्यान में केन्द्रित कर ही अक्रिय (ध्यानस्थ) हो जाते हैं और इसीसे सक्रिय भी हो जाते हैं ॥
१९८ छान्दोग्योपनिषद्
स य एतदेवममृतं वेद साध्यानामेवैको भूत्वा ब्रह्मणैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति
स एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३ ॥
जो साधक इस प्रकार इस अमृत को जानता है, वह साध्यगणों में से एक होकर देव ब्रह्मा के नेतृत्व
में इस अमृत को देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूप को ध्यान में केन्द्रित कर अक्रिय हो जाता है और
इसी से वह सक्रिय भी हो जाता है ॥ ३ ॥
स यावदादित्य उत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता द्विस्तावदूर्ध्वमुदेतार्वागस्तमेता
साध्यानामेव तावदाधिपत्यꣳस्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥
वह आदित्य जब तक अपने उत्तर भाग से उदित होकर दक्षिण से अस्त होता है, उससे दुगुने समय
तक अपने ऊर्ध्व भाग से उदित होता और नीचे के भाग से अस्त होता है, उतने समय तक वह साधक साध्य
गणों के अधिकार और स्वाराज्य को प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
॥ एकादशः खण्डः ॥
अथ तत ऊर्ध्व उदेत्य नैवोदेता नास्तमेतैकल एव मध्ये स्थाता तदेष श्लोकः ॥ १ ॥
इसके पश्चात् उस उच्च स्थिति में वह (आदित्य या ज्ञान) न तो उदित होता है, न अस्त होता है,
बल्कि वह अकेला ही मध्य में स्थित रहता है। उस विषय में यह श्लोक है ॥ १ ॥
न वै तत्र न निम्लोच नोदियाय कदाचन। देवास्तेनाहꣳ सत्येन मा विराधिषि ब्रह्मणेति ॥ २ ॥
यह सुनिश्चित है कि उस (ब्राह्मी) स्थिति में (सूर्य या ज्ञान का) न कभी अस्त होता है और न उदित
होता है। हे देवगण! हम इस सत्य के द्वारा उस ब्रह्म (सृष्टि व्यवस्था) के विपरीत न हों ॥ २ ॥
[यहाँ जिस आदित्य का वर्णन हो रहा है, वह दृश्यमान सूर्य से भिन्न सर्वत्र संव्याप्त, स्वप्रकाशित तत्त्व है।
इसका स्पष्टीकरण छान्दो० के ८.६.१-२ में विशेष रूप से हुआ है।]
न ह वा अस्मा उदेति न निम्लोचति सकृद्दिवा हैवास्मै भवति य एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद ॥
इस प्रकार जो (साधक) इस ब्रह्मोपनिषद् (ब्रह्म के निकटवर्ती ज्ञान) को जानता है, उसके लिए
(सूर्य या ब्रह्म) न तो उदित होता है, न अस्त होता है। वह सर्वदा दिन में (प्रकाश में) ही रहता है ॥३ ॥
तद्वैतद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्यस्तद्वैतदुद्दालकायारुणये
ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रोवाच ॥ ४ ॥
यह ब्रह्मज्ञान ब्रह्माजी ने प्रजापति से कहा था, देव प्रजापति ने मनु से कहा और मनु ने प्रजा के लिए
अभिव्यक्त किया था। उद्दालक ऋषि को उनके पिता ने अपने ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण इस ब्रह्मज्ञान का
उपदेश दिया था ॥ ४ ॥
इदं वाव तज्ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रब्रूयात्प्रणाय्याय वान्तेवासिने ॥ ५ ॥
इस ब्रह्मज्ञान का उपदेश पिता अपने ज्येष्ठ पुत्र को अथवा आचार्य अपने सुयोग्य शिष्य को करे ॥ ५ ॥
नान्यस्मै कस्मैचन यद्यप्यस्मा इमामद्भिः परिगृहीतां धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो
भूय इत्येतदेव ततो भूय इति ॥ ६ ॥
आचार्य अन्य किसी से इसका उपदेश न करे। भले ही उन्हें समुद्र से परिवेष्टित, धन से परिपूर्ण
सम्पूर्ण पृथ्वी ही क्यों न प्राप्त हो जाय, क्योंकि यह ब्रह्मज्ञान उस धनैश्वर्य से अधिक बढ़कर है ॥ ६ ॥
अध्याय ३ खण्ड १२ मन्त्र ९ १११
अध्याय ३ खण्ड १२ मन्त्र ९ १११
॥ द्वादशः खण्डः ॥
गायत्री वा इदꣳ सर्वं भूतं यदिदं किंच वाग्वै गायत्री वाग्वा इदꣳ सर्वं भूतं गायति च
त्रायते च ॥ १ ॥
गायत्री ही यह सब भूत ( दृश्यमान ) है। जो कुछ भी जगत् में प्रत्यक्ष दृश्यमान है, वह गायत्री ही है।
वाणी ही गायत्री है और वाणी ही सम्पूर्ण भूत रूप है। गायत्री ही सब भूतों का गान करती है और उनकी
रक्षा करती है ॥ १ ॥
या वै सा गायत्रियं वाव सा येयं पृथिव्यस्याꣳ हीदꣳ सर्वं भूतं प्रतिष्ठितमेतामेव
नातिशीयते ॥ २ ॥
जो वह गायत्री है, वह सर्वभूत रूप है, वही पृथ्वी है, क्योंकि इसी में सर्वभूत अवस्थित हैं और
इसका वे कभी उल्लंघन नहीं करते हैं ॥ २ ॥
या वै सा पृथिवीयं वाव सा यदिदमस्मिन्पुरुषे शरीरमस्मिन्हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता
एतदेव नातिशीयन्ते ॥ ३ ॥
जो भी यह पृथ्वी है, वह प्राण रूप गायत्री ही है, जो पुरुष के शरीर में समाहित है, क्योंकि इसी में
वे प्राण अवस्थित हैं और इस शरीर का वे उल्लंघन नहीं करते ॥ ३ ॥
यद्वै तत्पुरुषे शरीरमिदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तःपुरुषे हृदयमस्मिन्हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता
एतदेव नातिशीयन्ते ॥ ४ ॥
जो भी पुरुष के शरीर में अवस्थित है, वही अन्तःहृदय में स्थित है, क्योंकि इसी में (अन्तः हृदय
में) वे प्राण प्रतिष्ठित रहते हैं और इस हृदय का वे उल्लंघन नहीं करते ॥ ४ ॥
सैषा चतुष्पदा षड्विधा गायत्री तदेतदृचाभ्यनूक्तम् ॥ ५ ॥
वह गायत्री चार पदों वाली तथा छः प्रकार की है। वह वैदिक ऋचाओं ( मन्त्रों) में अभिव्यक्त हुई है ॥ ५ ॥
[ अधिकांश आचार्यों ने इस मन्त्र के अर्थ की संगति गायत्री महामंत्र के साथ बिठाने का प्रयास किया है।
ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि यहाँ उसका स्वरूप एक मन्त्र में नहीं, मंत्रों में प्रकट होने की बात कही गयी है।
इसलिए अर्थ की संगति गायत्री मंत्र के स्थान पर गायत्री प्राण विद्या से बिठानी चाहिए। वही वेद मंत्रों में प्रकट
हुई है। चार वेद उसके चार चरण हैं। वह छः प्रकार की षट् सम्पत्तियुक्त अथवा छः दिशा ( पूर्व, पश्चिम, दक्षिण,
उत्तर, ऊपर तथा नीचे ) से प्रवाहित होने वाली है। ]
तावानस्य महिमा ततो ज्यायाꣳश्च पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवीति ॥
गायत्री रूप में व्यक्त परब्रह्म की यह (वेद मंत्रों में वर्णित) महिमा है, परन्तु वह विराट् पुरुष उससे
भी बड़ा है। यह समस्त भूतों से विनिर्मित प्रत्यक्ष जगत् उसका ही एक पाद है, उसके शेष तीन पाद अमृत
स्वरूप प्रकाशमय आत्मा में अवस्थित हैं ॥ ६ ॥
यद्वै तद्ब्रह्मेतीदं वाव तद्योऽयं बहिर्धा पुरुषादाकाशो यो वै स बहिर्धा
पुरुषादाकाशः ॥ ७ ॥ अयं वाव स योऽयमन्तःपुरुष आकाशो यो वै सोऽन्तःपुरुष
आकाशः ॥ ८ ॥ अयं वाव स योऽयमन्तर्हृदय आकाशस्तदेतत्पूर्णमप्रवर्ति
पूर्णामप्रवर्तिनीꣳ श्रियं लभते य एवं वेद ॥ ९ ॥
१२० छान्दोग्योपनिषद्
वह जो विराट् ब्रह्म है, वह पुरुष के बहिरंग आकाश रूप में है और जो भी वह पुरुष के बहिरंग
आकाश रूप में है, वही पुरुष के अन्तरङ्ग आकाश रूप में है। जो भी पुरुष के अन्तरङ्ग आकाश रूप में है,
वही पुरुष के अन्तःहृदय के अन्तरङ्ग आकाश रूप में है। वह अन्तरङ्ग आकाश सर्वदा पूर्ण और
अपरिवर्तनीय (नित्य) है। जो साधक इस प्रकार उस ब्रह्म स्वरूप को जानता है, वह सर्वदा पूर्ण और
अपरिवर्तनीय (नित्य) सम्पदाएँ (विभूतियाँ) प्राप्त करता है॥ ७-९॥
॥ त्रयोदशः खण्डः ॥
तस्य ह वा एतस्य हृदयस्य पञ्च देवसुषयः स योऽस्य प्राङ्सुषिः स प्राणस्तच्चक्षुः स
आदित्यस्तदेतत्तेजोऽन्नाद्यमित्युपासीत तेजस्व्यन्नादो भवति य एवं वेद ॥ १ ॥
उस अन्तःहृदय के पाँच देवों से सम्बन्धित पाँच विभाग हैं। जो इसका पूर्ववर्ती विभाग है, वह प्राण
है, वह चक्षु है, वह आदित्य है, वह तेजस् है और वह अन्नादि है। इनकी उपासना करने योग्य है। जो
साधक इस प्रकार जानकर इनकी उपासना करता है, वह तेजस्वी और अन्न की शक्ति से युक्त होता है॥ १॥
अथ योऽस्य दक्षिणः सुषिः स व्यानस्तच्छ्रोत्रं स चन्द्रमास्तदेतच्छ्रीश्च यशश्चेत्युपासीत
श्रीमान्यशस्वी भवति य एवं वेद ॥ २ ॥
जो इसका दक्षिणवर्ती विभाग है, वह व्यान है, श्रोत्र है, चन्द्रमा है, श्री-सम्पदा है एवं यश है। इनकी उपासना
करने योग्य है। जो साधक इस प्रकार जानकर इनकी उपासना करता है, वह विभूतिवान् और यशस्वी होता है॥ २॥
अथ योऽस्य प्रत्यङ् सुषिः सोऽपानः सा वाक् सोऽग्निस्तदेतद्ब्रह्मवर्चसमन्ना-
द्यमित्युपासीत ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भवति य एवं वेद ॥ ३ ॥
जो इसका पश्चिमी विभाग है, वह अपान है। वह वाणी है, वह अग्नि है, वह ब्रह्मतेज है एवं वह
अन्नादि है। इनकी उपासना करने योग्य है। जो साधक इस प्रकार जानकर इनकी उपासना करता है, वह
ब्रह्मतेज एवं अन्न की शक्ति से युक्त होता है॥ ३॥
अथ योऽस्योदङ्सुषिः स समानस्तन्मनः स पर्जन्यस्तदेतत्कीर्तिश्च व्युष्टिश्चेत्युपासीत
कीर्तिमान्व्युष्टिमान्भवति य एवं वेद ॥ ४॥
जो इसका उत्तरी विभाग है, वह समान है। वह मन है, वह पर्जन्य है, वह कीर्ति और वही व्युष्टि
(शारीरिक आकर्षण) है। इनकी उपासना करने योग्य है। जो साधक इस प्रकार जानकर इनकी उपासना
करता है, वह कीर्तिमान् और व्युष्टिमान् (कान्तियुक्त काया वाला) होता है॥ ४॥
अथ योऽस्योर्ध्वः सुषिः स उदानः स वायुः स आकाशस्तदेतदोजश्च महश्चेत्यु-
पासीतौजस्वी महस्वान्भवति य एवं वेद ॥ ५॥
इसका जो ऊर्ध्व विभाग है, वह उदान है। वह वायु है, वह आकाश है, वह ओज है और वही महः
है। इनकी उपासना करने योग्य है। जो साधक इस प्रकार जानकर इनकी उपासना करता है, वह ओजस्वी
और महस्वान् (महानतायुक्त) होता है॥ ५॥
ते वा एते पञ्च ब्रह्मपुरुषाः स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपाः स य एतानेवं पञ्च
ब्रह्मपुरुषान्स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान्वेदास्य कुले वीरो जायते प्रतिपद्यते स्वर्गं लोकं य
एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान्स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान्वेद ॥ ६ ॥
अध्याय ३ खण्ड १४ मन्त्र ४ १२१
अध्याय ३ खण्ड १४ मन्त्र ४ १२१
वे पाँच ब्रह्मपुरुष स्वर्गलोक के द्वारपाल हैं। जो पुरुष स्वर्गलोक के द्वारपालों इन पञ्च ब्रह्मपुरुषों को
जानता है, उसके कुल में वीर बालक उत्पन्न होता है और वह स्वर्गलोक को प्राप्त करने वाला होता है।
अतः स्वर्गलोक के द्वारपालों इन पाँच ब्रह्मपुरुषों को जानकर इनकी उपासना करने योग्य है ॥ ६ ॥
अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु सर्वतः पृष्ठेष्वनुत्तमेषूत्तमेषु
लोकेष्विदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे ज्योतिस्तस्यैषा दृष्टिः ॥ ७॥
जो इस स्वर्गलोक से ऊपर यह परम ज्योति प्रकाशित होती है, जो इस सम्पूर्ण विश्व के पृष्ठ पर सबके
ऊपर प्रकाशित होती है, वही ज्योति पुरुष की अन्तः ज्योति के सदृश है ॥ ७ ॥
यत्रैतदस्मिञ्छरीरे संस्पर्शेनोष्णिमानं विजानाति तस्यैषा श्रुतिर्यत्रैतत्कर्णावपिगृह्य
निनदमिव नदथुरिवाग्नेरिव ज्वलत उपशृणोति तदेतद्दृष्टं च श्रुतं चेत्युपासीत चक्षुष्यः
श्रुतो भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ ८ ॥
उस ज्योति के दर्शन का उपाय यह है कि स्पर्श द्वारा शरीर में उष्णता का ज्ञान होता है और उसके
श्रवण का उपाय यह है कि कानों के मूँदने से रथ ध्वनि, बैल का डकारना और प्रदीप्त अग्नि के शब्द के
सदृश निनाद होता है, वह ज्योति दर्शनीय और श्रवणीय है। उसकी इस प्रकार उपासना करने योग्य है। जो
साधक इस प्रकार जानकर उसकी उपासना करता है, वह शोभावान् और कीर्तिवान् होता है ॥ ८ ॥
॥ चतुर्दशः खण्डः ॥
सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत। अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथा
क्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत ॥ १ ॥
यह सम्पूर्ण जगत् निश्चय ब्रह्मस्वरूप है, यह उसी से उत्पन्न होता, उसी में लय होता, उसी से
संचालित होता है। राग-द्वेष से दूर शान्त भाव से उसी की उपासना करनी चाहिए। निश्चय ही पुरुष
संकल्पमय है। इस लोक में पुरुष जैसे संकल्प धारण करता है, वैसा ही मरने के बाद होता है, अतः पुरुष
को सत्संकल्प करने चाहिए ॥ १ ॥
मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः
सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः ॥ २ ॥
वह परमात्मा प्राणस्वरूप, मनोमय शरीर वाला, देदीप्यमान, सत्संकल्पवान् , आकाश सदृश विराट्
स्वरूप वाला, सम्पूर्ण जगत् का रचयिता, सम्पूर्ण कामनाओं वाला, सम्पूर्ण गन्ध एवं रस सम्पन्न, सर्वत्र
संव्याप्त, वाणी रहित तथा भ्रमशून्य है ॥ २ ॥
एष म आत्मान्तर्हृदयेऽणीयान्व्रीहेर्वा यवाद्वा सर्षपाद्वा श्यामाकाद्वा श्यामाकतण्डुलाद्वा
एष म आत्मान्तर्हृदये ज्यायान्पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षाज्ज्यायान्दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ॥ ३ ॥
हृदय गुहा में अवस्थित यह आत्मा धान से, जौ से, सरसों से, श्यामाक (साँवाँ) से या श्यामाकतण्डुल से भी
सूक्ष्म है तथा हृदय गुहा में स्थित यह आत्मा पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक या इन सब लोकों से भी विराट् है ॥ ३ ॥
सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादर एष म
आत्मान्तर्हृदय एतद् ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसंभवितास्मीति यस्य स्यादद्धा न विचिकि-
त्सास्तीति ह स्माह शाण्डिल्यः शाण्डिल्यः ॥ ४ ॥
॥ पञ्चदशः खण्डः ॥
१२२ छान्दोग्योपनिषद्
जो सम्पूर्ण जगत् के रचयिता, सम्पूर्ण कामनाओं वाला, सम्पूर्ण गन्ध एवं रस से सम्पन्न, सर्वत्र
संव्याप्त, वाणी रहित तथा भ्रमशून्य है, वह आत्मा हृदय गुहा में अवस्थित है, यही ब्रह्म है। शरीर छोड़कर
जाने में हम इसी को प्राप्त होंगे, ऐसा जिसका निश्चय है और इसमें वह संशय नहीं करता, तो वह निश्चय
ही ब्रह्मतत्त्व को प्राप्त कर लेता है, ऐसा शाण्डिल्य का कथन है॥ ४ ॥
॥ पञ्चदशः खण्डः ॥
अन्तरिक्षोदरः कोशो भूमिर्बुध्नो न जीर्यति दिशो ह्यस्य स्रक्तयो द्यौरस्योत्तरं बिलः
स एष कोशो वसुधानस्तस्मिन्विश्वमिदं श्रितम् ॥ १ ॥
वह कोश जिसका उदर अन्तरिक्ष है, जिसका मूल पृथ्वी है, जो कभी जीर्ण नहीं होता। दिशाएँ इसके
कोणों के रूप में हैं, आकाश इसका ऊपर का छिद्र है। वह कोश वसुधान (वसु=प्राणों की स्थापना का
स्थल) है। उसी में यह सम्पूर्ण विश्व अवस्थित है॥ १ ॥
तस्य प्राची दिक् जुहूनाम सहमाना नाम दक्षिणा राज्ञी नाम प्रतीची सुभूता नामोदीची
तासां वायुर्वत्सः स य एतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद न पुत्ररोदं रोदिति सोऽहमेतमेवं वायुं
दिशां वत्सं वेद मा पुत्ररोदं रुदम् ॥ २ ॥
उस कोश की पूर्व दिशा 'जुहू' नाम की है, दक्षिण दिशा 'राज्ञी' नाम की है तथा उत्तर दिशा 'सुभूता'
नाम की है। उन दिशाओं के पुत्र रूप वायु हैं। इस प्रकार जो पुरुष वायु को दिशापुत्र के रूप में जानता है,
वह पुत्र प्राप्ति के निमित्त रोदन नहीं करता। चूँकि हम दिशाओं के पुत्ररूप में वायु को जानते हैं, अतः हम
पुत्र प्राप्ति के निमित्त न रोएँ॥ २ ॥
अरिष्टं कोशं प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना प्राणं प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना भूः प्रपद्येऽमुना-
ऽमुनाऽमुना भुवः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना स्वः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना ॥ ३ ॥
मैं पुत्र तथा परिवार के साथ अक्षय (अन्नमय) कोश के आश्रय में जाता हूँ। मैं पुत्र तथा परिवार
के साथ प्राणमय कोश के आश्रय में जाता हूँ। मैं पुत्र तथा परिवार के साथ भूः अर्थात् मनोमय कोश के
आश्रय में जाता हूँ। मैं पुत्र तथा परिवार के साथ भुवः अर्थात् विज्ञानमय कोश के आश्रय में जाता हूँ। मैं
पुत्र तथा परिवार के साथ स्वः अर्थात् आनन्दमय कोश के आश्रय में जाता हूँ ॥ ३ ॥
स यदवोचं प्राणं प्रपद्य इति प्राणो वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किंच तमेव तत्प्रापत्सि ॥ ४ ॥
जब हमने कहा कि हम प्राण के आश्रय में हैं, तो इसका आशय यह है कि ये समस्त भूत
(तत्त्व) प्राण ही हैं, हम उसी के आश्रय में हैं ॥ ४ ॥
अथ यदवोचं भूः प्रपद्य इति पृथिवीं प्रपद्येऽन्तरिक्षं प्रपद्ये दिवं प्रपद्ये इत्येव तदवोचम् ॥ ५ ॥
जब हमने कहा कि हम भूः के आश्रय में हैं, तो इसका आशय यह है कि हम पृथ्वी के आश्रय में
हैं, हम अन्तरिक्ष के आश्रय में हैं, हम द्युलोक के आश्रय में हैं ॥ ५ ॥
अथ यदवोचं भुवः प्रपद्य इत्यग्निं प्रपद्ये वायुं प्रपद्य आदित्यं प्रपद्य इत्येव तदवोचम् ॥ ६ ॥
तदनन्तर जब हमने कहा कि हम भुवः के आश्रय में हैं, तो इसका आशय यह है कि हम अग्नि के
आश्रय में हैं, हम वायु के आश्रय में हैं, हम आदित्य के आश्रय में हैं ॥ ६ ॥
अध्याय ३ खण्ड १६ मन्त्र ५ १२३
अध्याय ३ खण्ड १६ मन्त्र ५ १२३
अथ यदवोचꣳ स्वः प्रपद्य इत्यृग्वेदं प्रपद्ये यजुर्वेदं प्रपद्ये सामवेदं प्रपद्य
इत्येव तदवोचं तदवोचम्॥ ७॥
तथा जब हमने कहा कि हम स्वः के आश्रय में हैं, तो इसका आशय यह है कि हम ऋग्वेद के आश्रय
में हैं, हम यजुर्वेद के आश्रय में हैं तथा हम सामवेद के आश्रय में हैं। यहाँ यही कहा गया है॥ ७॥
॥ षोडशः खण्डः ॥
पुरुषो वाव यज्ञस्तस्य यानि चतुर्विꣳशतिवर्षाणि तत्प्रातःसवनं चतुर्विꣳशत्यक्षरा
गायत्री गायत्रं प्रातःसवनं तदस्य वसवोऽन्वायत्ताः प्राणा वाव वसव एते हीदꣳ सर्वं
वासयन्ति ॥ १ ॥
सुनिश्चित रूप से पुरुष ही यज्ञ है। पुरुष के जो प्रथम चौबीस वर्ष हैं, वे प्रातः सवन हैं, क्योंकि गायत्री
चौबीस अक्षरों वाली है और प्रातः सवन गायत्री छन्द से सम्बंधित है। वसुगण प्रातः सवन के अनुगामी हैं।
प्राण ही वसुगण हैं, क्योंकि ये सबको आवास देने वाले हैं ॥ १ ॥
तं चेदेतस्मिन्वयसि किंचिदुपतपेत्स ब्रूयात्प्राणा वसव इदं मे प्रातःसवनं माध्यन्दिनꣳ
सवनमनुसन्तनुतेति माहं प्राणानां वसूनां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो ह
भवति ॥ २ ॥
यदि इस प्रातः सवन की आयु (चौबीस वर्ष की अवधि) में कोई कष्ट उत्पन्न हो, तो इस प्रकार कहे-
प्राणरूप वसुगण हमारे प्रातः सवन को माध्यन्दिन सवन के साथ एकीकृत कर दें, जिससे हम प्राणरूप
वसुगणों के मध्य में ही यज्ञ करते हुए उनसे विमुख न हों (संयुक्त रहें)। ऐसा कहने पर वह उस कष्ट से
छूटकर नीरोग हो जाता है॥ २॥
अथ यानि चतुश्चत्वारिꣳशद्वर्षाणि तन्माध्यन्दिनꣳ सवनं चतुश्चत्वारिꣳशदक्षरा त्रिष्टुप्
त्रैष्टुभं माध्यन्दिनं सवनं तदस्य रुद्रा अन्वायत्ताः प्राणा वाव रुद्रा एते हीदꣳ सर्वꣳ
रोदयन्ति ॥ ३ ॥
तदनन्तर जो आगे- चौवालीस वर्ष की अवधि है, वह माध्यन्दिन सवन है। त्रिष्टुप् छन्द चौवालीस
अक्षरों का है और माध्यन्दिन सवन त्रिष्टुप् छन्द से सम्बन्धित है। रुद्रगण माध्यन्दिन सवन के अनुगामी हैं।
निश्चय ही प्राण रुद्र हैं, क्योंकि ये सम्पूर्ण प्राणियों को रुलाते हैं ॥ ३॥
तं चेदेतस्मिन्वयसि किंचिदुपतपेत्स ब्रूयात्प्राणा रुद्रा इदं मे माध्यन्दिनꣳ सवनं
तृतीयसवनमनुसन्तनुतेति माहं प्राणानाꣳ रुद्राणां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत
एत्यगदो ह भवति ॥ ४॥
इस माध्यन्दिन सवन की आयु में कोई कष्ट उत्पन्न हो, तो इस प्रकार कहे- प्राणरूप रुद्रगण हमारे
माध्यन्दिन सवन को तृतीय सवन के साथ एकीकृत कर दें, जिससे हम प्राणरूप रुद्रगणों के मध्य यज्ञ करते
हुए उनसे विमुख न हों। ऐसा कहने पर वह उस कष्ट से छूटकर नीरोग हो जाता है॥ ४॥
अथ यान्यष्टाचत्वारिꣳशद्वर्षाणि तृतीयसवनमष्टाचत्वारिꣳशदक्षरा जगती जागतं
तृतीयसवनं तदस्यादित्या अन्वायत्ताः प्राणा वावादित्या एते हीदꣳ सर्वमाददते ॥ ५ ॥
१२४ छाान्दोग्यापनिषद्
अब जो अड़तालीस वर्ष की अवधि है, वह तृतीय सवन है। जगती छन्द अड़तालीस अक्षरों का है
तथा तृतीय सवन जगती छन्द से सम्बन्धित है। आदित्यगण इस तृतीय सवन के अनुगामी हैं। प्राण ही
आदित्यगण हैं, क्योंकि ये ही सम्पूर्ण विषयों को ग्रहण करते हैं॥ ६॥
तं चेदेतस्मिन्वयसि किंचिदुपतपेत्स ब्रूयात्प्राणा आदित्या इदं मे तृतीयसवन-
मायुरनुसन्तनुतेति माहं प्राणानामादित्यानां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो
हैव भवति॥ ६॥
इस तृतीय सवन की आयु में यदि कोई कष्ट उत्पन्न हो तो इस प्रकार कहे- प्राणरूप आदित्यगण हमारे
तृतीय सवन को सम्पूर्ण आयु के साथ एकीकृत कर दें, हम प्राणरूप आदित्यगणों के मध्य यज्ञ करते हुए
उनसे विमुख न हों। ऐसा कहकर वे उस कष्ट से मुक्त होकर नीरोग हो जाते हैं॥ ६॥
एतद्ध स्म वै तद्विद्वानाह महिदास ऐतरेयः स किं म एतदुपतपसि योऽहमनेन न
प्रेष्यामीति स ह षोडशं वर्षशतमजीवत्प्रह षोडशं वर्षशतं जीवति य एवं वेद॥ ७॥
इस उपासना को जानने वाले ऐतरेय महिदास ने कहा था- हे रोग! तू मुझे क्यों सन्तप्त करता है, मैं निश्चय
ही इससे मृत्यु को नहीं प्राप्त कर सकता। ऐसा कहकर वे रोग से मुक्ति पा जाते थे और एक सौ सोलह वर्ष तक
जीवित रहे। जो साधक इस प्रकार इस उपासना को जानता है, वह एक सौ सोलह वर्ष तक जीवित रहता है॥ ७॥
॥ सप्तदशः खण्डः॥
स यदशिशिषति यत्पिपासति यन्न रमते ता अस्य दीक्षाः॥ १॥
जो साधक खाने एवं पीने की इच्छा तो करता है, पर जो इसमें आसक्त नहीं होता, यही उसकी दीक्षा है॥ १॥
अथ यदश्नाति यत्पिबति यद्रमते तदुपसदैरेति॥ २॥
फिर जो खाता है, जो पीता है और जो उसमें प्रसन्न होता है, वह उपसदों का स्थान प्राप्त करता है॥ २॥
अथ यद्धसति यज्जक्षति यन्मैथुनं चरति स्तुतशस्त्रैरेव तदेति॥ ३॥
तथा जो हँसता है, जो भक्षण करता है एवं जो मैथुन करता है, वह स्तुति के स्तोत्रों को प्राप्त करता है॥ ३॥
अथ यत्तपो दानमार्जवमहिंसा सत्यवचनमिति ता अस्य दक्षिणाः॥ ४॥
तथा जो तप, दान, सरल स्वभाव, अहिंसा और सत्यवचन से युक्त हैं, वे उस साधक की दक्षिणा हैं॥ ४॥
तस्मादाहुः सोष्यत्यसोष्टेति पुनरुत्पादनमेवास्य तन्मरणमेवास्यावभृथः॥ ५॥
प्रसूता माता को लोग कहते हैं- यह प्रसूता होगी अथवा यह प्रसूता हुई, वह काल पुरुष का पुनर्जन्म
है तथा मृत्यु अवभृथ स्नान के सदृश है॥ ५॥
तद्धैतद्घोर आङ्गिरसः कृष्णाय देवकीपुत्रायोक्त्वोवाचापिपास एव स बभूव
सोऽन्तवेलायामेतत्त्रयं प्रतिपद्येताक्षितमस्यच्युतमसि प्राणसंशितमसीति तत्रैते द्वे ऋचौ
भवतः॥ ६॥
घोर आङ्गिरस ऋषि ने देवकीपुत्र भगवान् कृष्ण को यह तत्त्वदर्शन समझाया, जिससे कि वे अन्य
उपासनाओं के सम्बन्ध में पिपासा मुक्त हो गये थे- साधक को मृत्युकाल में इन तीन मंत्रों का स्मरण
कराना चाहिए- १. तुम अक्षय अनश्वर स्वरूप हो, २. तुम अच्युत- अटल पतित न होने वाले हो, ३. तुम
अतिसूक्ष्म प्राणस्वरूप हो। इस विषय में दो ऋचाएँ निर्दिष्ट हैं॥ ६॥
अध्याय ३ खण्ड १८ मन्त्र ५ १२५
अध्याय ३ खण्ड १८ मन्त्र ५ १२५
आदित्यप्रत्नस्य रेतसः । उद्वयन्तमसस्परि ज्योतिः पश्यन्त उत्तरꣳस्वः पश्यन्त उत्तरं देवं
देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तममिति ज्योतिरुत्तममिति ॥ ७॥
[ प्रथम ऋचा पूर्णतः इस प्रकार है- 'आदित्यप्रत्नस्य रेतसो ज्योतिः पश्यन्ति वासरम्। परो यदिध्यते दिवि।'
( आनन्दगिरिकृत टीका से ) इसका अर्थ इस प्रकार है- उस पुरातन पुरुष का तेज ही सर्वत्र संव्याप्त है। उसी का
प्रकाश हम सर्वत्र संव्याप्त देखते हैं। वह परम पुरुष दीप्तिमान् होकर समस्त पदार्थों में तेजरूप में प्रकट होता है।
दूसरी ऋचा 'उद्वयं तमसस्परि'......., जो यहाँ प्रस्तुत है, का अर्थ इस प्रकार है- ]
'तमिस्रा ( अज्ञानरूप) को दूर करने वाले परब्रह्म के प्रकाश को देखते हुए और आत्म ज्योति को
देखते हुए हम देवों में देदीप्यमान सूर्य रूप सर्वोत्तम ज्योति को प्राप्त हुए ॥ ७ ॥
॥ अष्टादशः खण्डः ॥
मनो ब्रह्मेत्युपासीतेत्यध्यात्ममथाधिदैवतमाकाशो ब्रह्मेत्युभयमादिष्टं भवत्यध्यात्मं
चाधिदैवतं च ॥ १ ॥
मन ब्रह्मस्वरूप है- इस प्रकार उपासना करे । यह आध्यात्मिक विवेचन है। आकाश ब्रह्मस्वरूप है-
इस प्रकार उपासना करे-यह आधिदैविक विवेचन है। इस प्रकार यह आध्यात्मिक और आधिदैविक दोनों
का विवेचन हुआ॥ १ ॥
तदेतच्चतुष्पादब्रह्म। वाक् पादः प्राणः पादश्चक्षुः पादः श्रोत्रं पाद इत्यध्यात्म-
मथाधिदैवतमग्निः पादो वायुः पाद आदित्यः पादो दिशः पाद इत्युभयमेवादिष्टं
भवत्यध्यात्मं चैवाधिदैवतं च ॥ २ ॥
वह (मनोमय ब्रह्म) चार पादों वाला है। वाणी, प्राण, चक्षु और श्रोत्र- ये चार पाद हैं। यह
आध्यात्मिक विवेचन हुआ। इसी प्रकार आधिदैविक विवेचन में आकाशरूप ब्रह्म चार पादों का है।
अग्नि, वायु, आदित्य और दिशाएँ- ये चार पाद हैं। इस प्रकार यह आध्यात्मिक और आधिदैविक
दोनों का विवेचन हुआ॥ २ ॥
वागेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः। सोऽग्निना ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति
च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ३ ॥
वाणी ही मनोमय ब्रह्म का चतुर्थ पाद है। वह अग्निरूप ज्योति से दीप्तिमान् और तेजस्वी होती है। जो
साधक इस प्रकार जानता है, वह कीर्ति, यश और ब्रह्मतेज के द्वारा देदीप्यमान और तेजस्वी होता है॥ ३ ॥
प्राण एव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः। स वायुना ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च
तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ४॥
प्राण ही मनोमय ब्रह्म का चतुर्थ पाद है। वह वायुरूप ज्योति से दीप्तिमान् और तेजस्वी होता है। जो
साधक इस प्रकार जानता है, वह कीर्ति, यश और ब्रह्मतेज के द्वारा देदीप्यमान और तेजस्वी होता है॥ ४ ॥
चक्षुरेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स आदित्येन ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च
तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ५ ॥
चक्षु ही मनोमय ब्रह्म का चतुर्थ पाद है। वह आदित्यरूप ज्योति से दीप्तिमान् और तेजस्वी होता है।
जो साधक इस प्रकार जानता है, वह कीर्ति, यश और ब्रह्मवर्चस से देदीप्यमान और तेजस्वी होता है॥ ५ ॥
॥ एकोनविंशः खण्डः ॥
१२६ छान्दोग्योपनिषद्
श्रोत्रमेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स दिग्भिर्ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति
च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद य एवं वेद ॥ ६ ॥
श्रोत्र ही मनोमय ब्रह्म का चतुर्थ पाद है। वह दिशाओं रूपी ज्योति से दीप्तिमान् और तेजस्वी होता है।
जो साधक इस प्रकार जानता है, वह कीर्ति, यश और ब्रह्मवर्चस से देदीप्यमान और तेजस्वी होता है ॥ ६ ॥
॥ एकोनविंशः खण्डः ॥
आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशस्तस्योपव्याख्यानमसदेवेदमग्र आसीत्तत्सदासीत्तत्समभव-
तदाण्डं निरवर्तत तत्संवत्सरस्य मात्रामशयत तन्निरभिद्यत ते आण्डकपाले रजतं च
सुवर्णं चाभवताम् ॥ १ ॥
आदित्य ही ब्रह्म है, ऐसा विवेचन मिलता है। उसी की विविध व्याख्याएँ की जाती हैं। आदि
में यह असत्रूप (अदृश्य) ही था, तदनन्तर वह सत्रूप (प्रत्यक्ष-प्रकट) हुआ। वह विकसित
होकर अण्डे में परिवर्तित हुआ। कालान्तर में वह अण्ड विकसित होकर फूटा। उसके दो खण्ड
हुए- एक रजत, दूसरा स्वर्ण ॥ १ ॥
तद्यद्रजतं सेयं पृथिवी यत्सुवर्णं सा द्यौर्यज्जरायु ते पर्वता यदुल्बं समेघो नीहारो
या धमनयस्ता नद्यो यद्वास्तेयमुदकं स समुद्रः ॥ २ ॥
उनमें जो खण्ड रजत रूप प्रकट हुआ, वह यह पृथिवी है और जो स्वर्णरूप खण्ड प्रकट हुआ, वह
द्युलोक है। उस अण्डे का जो जरायु भाग था, वे पर्वत हैं, जो उल्ब भाग था, वह मेघयुक्त कुहरा है, जो
धमनियां थीं, वे नदियाँ हैं तथा जो मूत्राशय का जल था, वह समुद्र है ॥ २ ॥
अथ यत्तदजायत सोऽसावादित्यस्तं जायमानं घोषा उलूलवोऽनूदतिष्ठन्त् सर्वाणि च
भूतानि च सर्वे च कामास्तस्मात्तस्योदयं प्रति प्रत्यायनं प्रति घोषा उलूलवोऽनूत्तिष्ठन्ति
सर्वाणि च भूतानि सर्वे चैव कामाः ॥ ३ ॥
उस अण्डे से जो उत्पन्न हुआ, वह आदित्य ही है। उससे विस्फोट जन्य तीव्र घोष उत्पन्न हुआ, उसी
से सम्पूर्ण प्राणी और सम्पूर्ण भोग-साधन उत्पन्न हुए हैं। इसीलिए आदित्य के उदय और अस्त होने पर
तीव्र घोष होता है और समस्त प्राणी एवं सम्पूर्ण भोग-साधन विकसित होते हैं ॥ ३ ॥
स य एतमेवं विद्वानादित्यं ब्रह्मेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनं साधवो घोषा आ च
गच्छेयुरुप च निम्रेडेरन्निम्रेडेरन् ॥४॥
इस प्रकार जो 'आदित्य ही ब्रह्म है', यह जानकर उपासना करता है, इसके समीप सुखप्रद घोष सुनाई
देते हैं और उसे सुख प्रदान करते हैं, सन्तोष प्रदान करते हैं ॥ ४ ॥
अध्याय ४ खण्ड १ मन्त्र ६ १२७
अध्याय ४ खण्ड १ मन्त्र ६ १२७
॥ अथ चतुर्थोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमः खण्डः ॥
जानश्रुतिर्ह पौत्रायणः श्रद्धादेयो बहुदायी बहुपाक्य आस स ह सर्वत
आवसथान्मापयांचक्रे सर्वत एव मेऽत्स्यन्तीति ॥ १ ॥
जनश्रुत राजा के प्रपौत्र श्रद्धापूर्वक बहुत धन दान किया करते थे। उनके यहाँ बहुत अन्न
पकाया जाता था। उन्होंने अपने राज्य में अनेक विश्रामालय बनवा दिये थे, ताकि लोग वहाँ ठहरकर
भोजन ग्रहण कर सकें ॥ १ ॥
अथ ह हँसा निशायामतिपेतुस्तद्धैवँ हँसो हँसमभ्युवाद हो होऽयि भल्लाक्ष
भल्लाक्ष जानश्रुतेः पौत्रायणस्य समं दिवा ज्योतिराततं तन्मा प्रसाङ्क्षीस्तत्त्वा मा
प्रधाक्षीरिति ॥ २ ॥
फिर एक बार रात्रि के समय दो हंस उस राज्य के ऊपर से उड़ते हुए जा रहे थे, उनमें से एक हंस
ने दूसरे से कहा- हे मन्द दृष्टि ! जनश्रुत राजा के प्रपौत्र का तेज द्युलोक के सदृश व्याप्त हो रहा है। तू उसे
स्पर्श न कर, वह तुझे भस्म न कर दे ॥ २ ॥
तमु ह परः प्रत्युवाच कम्बर एनमेतत्सन्तः सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो नु कथँ
सयुग्वा रैक्व इति ॥ ३ ॥
दूसरे हंस ने कहा - अरे तुम किस महत्त्वाकांक्षी राजा के लिए सम्मानजनक शब्द कहते हो। क्या
यह गाड़ी वाले रैक्व के सदृश है ? इस पर पहले वाले हंस ने कहा- यह गाड़ी वाला रैक्व कौन है ? ॥ ३ ॥
यथा कृतायविजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनँ सर्वं तदभिसमेति यत्किंच प्रजाः साधु
कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद स मयैतदुक्त इति ॥ ४ ॥
जिस प्रकार द्यूत क्रीड़ा में पुरुष कृतसंज्ञक पासे को जीतकर सम्पूर्ण निम्न पासे अपने अधीन कर
लेता है, उसी प्रकार राजा जो कुछ सत्कर्म करता है, वह सब रैक्व को प्राप्त हो जाता है। वह रैक्व जिस (गूढ़
तत्त्व दर्शन) को जानता है, उसे कोई नहीं जानता। उनके विषय में मैं इतना ही जानता हूँ ॥ ४ ॥
तदु ह जानश्रुतिः पौत्रायण उपशुश्राव स ह संजिहान एव क्षत्तारमुवाचाङ्गारे ह
सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो नु कथँ सयुग्वा रैक्व इति ॥ ५ ॥
हंसों की वार्ता को जनश्रुत के प्रपौत्र ने सुना। प्रातःकाल उठते ही उन्होंने स्तुतिकर्ता सेवकों से कहा- क्या
तुम मेरी स्तुति गाड़ी वाले रैक्व के समान करते हो ? सेवकों ने कहा- यह गाड़ी वाला रैक्व कौन है ? ॥ ५ ॥
यथा कृतायविजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनँ सर्वं तदभिसमेति यत्किंच प्रजाः साधु
कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद स मयैतदुक्त इति ॥ ६ ॥
जिस प्रकार द्यूतक्रीड़ा में पुरुष कृत नामक पासे को जीतकर अन्य सभी निम्न पासे को अपने अधीन
कर लेता है, उसी प्रकार राजा जो कुछ सत्कर्म करता है, वह सब रैक्व को प्राप्त हो जाता है। जो कुछ रैक्व
जानते हैं, उसे कोई और नहीं जानता, ऐसा उनके विषय में मुझसे कहा गया है ॥ ६ ॥
जहाँ ब्राह्मण की खोज की जाती है, वहाँ उन्हें ढूँढ़ो ॥ ७ ॥
१२८ छान्दोग्योपनिषद्
स ह क्षत्तान्विष्य नाविदमिति प्रत्येयाय तँ होवाच यत्रारे ब्राह्मणस्यान्वेषणा
तदेनमच्छेति ॥ ७ ॥
वे सेवक रैक्व को ढूँढ़ने के पश्चात् वापस लौटकर कहते हैं- 'उसे नहीं पा सके'। तब राजा ने कहा-
जहाँ ब्राह्मण की खोज की जाती है, वहाँ उन्हें ढूँढ़ो ॥ ७ ॥
सोऽधस्ताच्छकटस्य पामानं कषमाणमुपोपविवेश तँ हाभ्युवाद त्वं नु भगवः
सयुग्वा रैक्व इत्यहँ ह्या ३ इति ह प्रतिजज्ञे स ह क्षत्ताऽविदमिति प्रत्येयाय ॥ ८ ॥
उन्होंने एक शकट के नीचे खाज खुजाते हुए रैक्व को देखकर उनसे पूछा- भगवन्! क्या आप ही
गाड़ी वाले रैक्व हैं ? उनने कहा हाँ मैं ही हूँ। ऐसा जानकर सेवक राजा के पास चले आये ॥ ८ ॥
॥ द्वितीयः खण्डः ॥
तदुह जानश्रुतिः पौत्रायणः षट् शतानि गवां निष्कमश्वतरीरथं तदादाय प्रतिचक्रमे
तँ हाभ्युवाद ॥ १ ॥
तब राजा जनश्रुत के प्रपौत्र छः सौ गौएँ, एक हार और खच्चरों से खींचा जाने वाला एक रथ लेकर
रैक्व के पास गये और बोले ॥ १ ॥
रैक्वेमानि षट् शतानि गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथो नु म एतां भगवो देवताँ
शाधि यां देवतामुपास्स इति ॥ २ ॥
हे रैक्व! ये छः सौ गौएँ, एक हार और खच्चरों से जुतां एक रथ आपके निमित्त लाया हूँ, इसे
ग्रहण करें। हे भगवन्! आप जिस देवता की उपासना करते हैं, उसका मुझे उपदेश करें। ऐसा राजा
ने रैक्व से कहा ॥ २ ॥
तमु ह परः प्रत्युवाचाह हारेत्वा शूद्र तवैव सह गोभिरस्त्विति तदुह पुनरेव जानश्रुतिः
पौत्रायणः सहस्रं गवां निष्कमश्वतरीरथं दुहितरं तदादाय प्रतिचक्रमे ॥ ३ ॥
उस राजा से रैक्व ने कहा- हे क्षुद्र ! गौएँ, हार और रथ अपने पास रखो। तब जनश्रुत के प्रपौत्र एक
सहस्र गौएँ, एक हार, खच्चरों से जुता रथ और अपनी कन्या लेकर उनके पास आये ॥ ३ ॥
तँ हाभ्युवाद रैक्वेदं सहस्रं गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथ इयं जायाऽयं ग्रामो
यस्मिन्नास्सेऽन्वेव मा भगवः शाधीति ॥ ४ ॥
राजा ने रैक्व से कहा- हे रैक्व ! ये एक हजार गौएँ, यह हार, खच्चरों से जुता रथ, यह पत्नी और यह
गाँव (जिसमें आप रहते हैं) आप ले लें। हे भगवन् ! मुझे ईश्वरीय अनुशासन बतायें ॥ ४ ॥
तस्या ह मुखमुपोद्गृह्णन्नुवाचाजहारेमाः शूद्रानेनैव मुखेनालापयिष्यथा इति ते हैते
रैक्व पर्णा नाम महावृषेषु यत्रास्मा उवास तस्मै होवाच ॥ ५ ॥
तब रैक्व ने उस राजकन्या को विद्या ग्रहण का द्वार समझकर राजा से कहा- 'हे क्षुद्र ! आप ये जो
कुछ लाए हैं, ये सब गौण हैं; परन्तु विद्या ग्रहण के इस द्वार से आप (प्रसन्न करके) मुझसे उपदेश कराते
हैं'। इस प्रकार जितने क्षेत्र में वे 'रैक्व' रहते थे, वे सभी गाँव महावृष देश में 'रैक्वपर्ण' के नाम से प्रसिद्ध
हुए। (इससे प्रसन्न होकर) उन (रैक्व) ने उस राजा से कहा- ॥ ५ ॥
अध्याय ४ खण्ड ३ मन्त्र ८ १२१
अध्याय ४ खण्ड ३ मन्त्र ८ १२१
॥ तृतीयः खण्डः ॥
वायुर्वाव संवर्गो यदा वा अग्निरुद्वायति वायुमेवाप्येति यदा सूर्योऽस्तमेति
वायुमेवाप्येति यदा चन्द्रोऽस्तमेति वायुमेवाप्येति ॥ १ ॥
वायु ही संवर्ग है। जब अग्नि शान्त होती है, तो वायु में ही समाहित होती है। जब सूर्य अस्त होता
है, तो वायु में ही समाहित होता है और जब चन्द्रमा अस्त होता है, तो वायु में ही समाहित हो जाता है॥
यदाप उच्छुष्यन्ति वायुमेवापियन्ति वायुर्हेवैतान्सर्वान्संवृङ्क्त इत्यधिदैवतम् ॥ २॥
जब जल सूखता है, तो वायु में ही समाहित हो जाता है। इस प्रकार वायु ही इन सबको अपने में
समाहित कर देने वाला है। यह आधिदैविक उपासना है॥ २॥
अथाध्यात्मं प्राणो वाव संवर्गः स यदा स्वपिति प्राणमेव वागप्येति प्राणं चक्षुः
प्राणःश्रोत्रं प्राणं मनः प्राणो ह्येवैतान्सर्वान्संवृङ्क्त इति ॥ ३ ॥
अब आध्यात्मिक तत्त्व का विवेचन किया जाता है। प्राण ही संवर्ग है। जब साधक सोता है, तब प्राण
में ही वागिन्द्रिय समाहित हो जाती है। प्राण में ही चक्षु, श्रोत्र और मन समाहित हो जाते हैं। इस प्रकार प्राण
ही इन सबको अपने में समाहित कर लेने वाला है॥ ३॥
तौ वा एतौ द्वौ संवर्गों वायुरेव देवेषु प्राणः प्राणेषु ॥ ४ ॥
इस प्रकार मात्र दो ही संवर्ग हैं। देवताओं में वायु संवर्ग हैं और इन्द्रियों में प्राण संवर्ग है॥४॥
अथ ह शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च काक्षसेनिं परिविष्यमाणौ ब्रह्मचारी
बिभिक्षे तस्मा उ ह न ददतुः ॥ ५॥
एक समय शौनक कापेय और अभिप्रतारी काक्षसेनि को जब भोजन परोसा जा रहा था, तब एक
ब्रह्मचारी ने उनसे भिक्षा माँगी; किन्तु उन्होंने (उसकी पात्रता परखे बिना) भिक्षा नहीं दी॥ ५॥
स होवाच महात्मनश्चतुरो देव एकः कः स जगार भुवनस्य गोपास्तं कापेय
नाभिप्रश्यन्ति मर्त्या अभिप्रतारिन्बहुधा वसन्तं यस्मै वा एतदन्नं तस्मा एतन्न दत्तमिति ॥ ६ ॥
तब उस ब्रह्मचारी ने कहा- भुवनों के स्वामी उन देव प्रजापति ने चार महान् स्वरूपों को अपने में
समाहित कर लिया है। हे कापेय! हे अभिप्रतारिन्! विभिन्न स्वरूपों में निवास करने वाले उन देव को
मनुष्य नहीं देख पाते और जिसके लिए यह अन्न है, उसे (देव प्रजापति को ) ही अन्न नहीं दिया गया ॥ ६ ॥
तदु ह शौनकः कापेयः प्रतिमन्वानः प्रत्येयायात्मा देवानां जनिता प्रजानाःहिरण्यदंष्ट्रो
बभसो ऽनसूरिर्महान्तमस्य महिमानमाहुरनद्यमानो यदनन्नमत्तीति वै वयं
ब्रह्मचारिन्नेदमुपास्महे दत्तास्मै भिक्षामिति ॥ ७॥
उनके कथन का शौनक कापेय मुनि ने विचार किया और ब्रह्मचारी से कहा- जो देवताओं की
आत्मा, प्रजाओं के जनक, हिरण्यदंष्ट्र, भक्षणवृत्ति वाले, बुद्धिमान् और महिमावान् हैं, जो दूसरों से न खाये
जाने वाले और अन्न न खाने वाले हैं। हे ब्रह्मचारिन् ! हम उसी देव की उपासना करते हैं- ऐसा कहकर
उन्होंने ब्रह्मचारी को भिक्षा देने का आदेश दिया ॥ ७॥
तस्मा उ ह ददुस्ते वा एते पञ्चान्ये पञ्चान्ये दश संतस्तत्कृतं तस्मात्सर्वासु दिक्ष्वन्नमेव
दशकृतः सैषा विराडन्नादी तयेदः सर्वं दृष्टः सर्वमस्येदं दृष्टं भवत्यन्नादो भवति य एवं
वेद य एवं वेद ॥ ८॥