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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

अध्याय २ खण्ड ९ मन्त्र ६ १०३

अध्याय २ खण्ड ९ मन्त्र ६ १०३
इस प्रकार से जानने वाला जो पुरुष वाणी में सप्तविध साम की उपासना करता है, वह वाणी के
सारतत्त्व को प्राप्त कर लेता है तथा प्रचुर अन्न एवं अन्न को पचाने की सामर्थ्य भी प्राप्त कर लेता है ॥ ३ ॥
॥ नवमः खण्डः ॥
अथ खल्वमुमादित्यं सप्तविधँ सामोपासीत सर्वदा समस्तेन साम मां प्रति मां
प्रतीति सर्वेण समस्तेन साम ॥ १ ॥
अब आदित्य के रूप में सप्तविध साम की उपासना का वर्णन किया जाता है। आदित्य सदा ही सम
रहता है, अतः वह साम है। सभी को यही अनुभूत होता है कि वह हमारे प्रति सम है, अतः वह सभी के
प्रति समान भाव वाला होने से भी साम है ॥ १ ॥
तस्मिन्निमानि सर्वाणि भूतान्यन्वायत्तानीति विद्यात्तस्य यत्पुरोदयात्स हिंकारस्तदस्य
पशवोऽन्वायत्तास्तस्मात्ते हिंकुर्वन्ति हिंकारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ २ ॥
इस आदित्य के ये सम्पूर्ण प्राणी अनुगामी हैं। उसके उदय के पूर्व का रूप हिंकार है। सम्पूर्ण पशु
आदि उसके हिंकार रूप के ही अनुगामी हैं। वे उस आदित्य रूप साम के हिंकार रूप के उपासक हैं।
उसके उदय होने पर सभी हिंकार करने लगते हैं ॥ २ ॥
अथ यत्प्रथमोदिते स प्रस्तावस्तदस्य मनुष्या अन्वायत्तास्तस्मात्ते प्रस्तुतिकामाः
प्रशँसाकामाः प्रस्तावभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ३ ॥
उदीयमान सूर्य का जो प्रारंभिक रूप है, वह प्रस्ताव है। सभी मनुष्य उसी रूप के अनुगामी हैं। वे इस
सामरूप प्रस्ताव के स्तोता हैं और उसी की प्रत्यक्ष तथा परोक्ष रूप में स्तुति करने की अभिलाषा रखते हैं॥ ३ ॥
अथ यत्सङ्गववेलायाँ स आदिस्तदस्य वयाँस्यन्वायत्तानि तस्मात्तान्यन्तरिक्षेऽना-
रम्भणान्यादायात्मानं परिपतन्त्यादिभाजीनि ह्येतस्य साम्नः ॥ ४ ॥
जो सङ्गव वेला (सूर्योदय से तीन मुहूर्त अर्थात् लगभग ढाई घण्टे तक का समय) में आदित्य का
रूप रहता है, वह आदि रूप है। समस्त पक्षीगण उसी रूप के आश्रय में रहते हैं। वे उसी आदि रूप साम
का भजन करने वाले हैं, अतः वे अपने आश्रय को छोड़कर अन्तरिक्ष में स्वच्छन्द विचरण करते हैं ॥ ४ ॥
अथ यत्संप्रति मध्यन्दिने स उद्गीथस्तदस्य देवा अन्वायत्तास्तस्मात्ते सत्तमाः प्राजापत्या-
नामुद्गीथभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ५ ॥
तदनन्तर मध्य दिवस में आदित्य का जो रूप होता है, वह उद्गीथ रूप है। समस्त देवगण
उसी उद्गीथ रूप के अनुगामी हैं। चूँकि वे उद्गीथ रूप साम के भागी (उपासक) हैं, अतः
प्रजापति से उत्पन्न प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ हैं ॥ ५ ॥
अथ यदूर्ध्वं मध्यन्दिनात्प्रागपराह्नात्स प्रतिहारस्तदस्य गर्भा अन्वायत्तास्तस्मात्ते
प्रतिहृता नावपद्यन्ते प्रतिहारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ६ ॥
आदित्य का जो रूप मध्याह्न के बाद और अपराह्न से पूर्व का होता है, वह प्रतिहार है। सभी
गर्भ उसी रूप के अनुगामी हैं। चूँकि वे प्रतिहाररूप साम के भागी हैं, अतः वे ऊपर की ओर
आकृष्ट होने पर भी नीचे नहीं गिरते ॥ ६ ॥

१०४ छान्दाग्योपनिषद्
अथ यदूर्ध्वमपराह्नात्प्रागस्तमयात्स उपद्रवस्तदस्यारण्या अन्वायत्तास्तस्मात्ते पुरुषं
दृष्ट्वा कक्षः श्वभ्रमित्युपद्रवन्त्युपद्रवभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ७॥
अपराह्न के पश्चात् और सूर्यास्त के पहले आदित्य का जो रूप होता है, वह उपद्रव है। सभी वन्य
प्राणी उस रूप के अनुगामी हैं, अतः वे पुरुष को देखकर भय से वन अथवा गुफा में चले जाते हैं ॥ ७ ॥
अथ यत्प्रथमास्तमिते तन्निधनं तदस्य पितरोऽन्वायत्तास्तस्मात्तान्निदधति
निधनभाजिनो ह्येतस्य साम्न एवं खल्वमुमादित्यः सप्तविधः सामोपास्ते ॥ ८ ॥
तत्पश्चात् अस्त होते हुए सूर्य का जो रूप है, वह निधन है। पितृगण उसके उस रूप के अनुगामी हैं।
चूँकि वे पितृगण निधन रूप साम के उपासक हैं, अतः उन्हें प्रजा (श्राद्धकाल में दर्भ पर) स्थापित करती
है। इस प्रकार इस आदित्य रूप साम की सप्तविध उपासना की जाती है ॥ ८ ॥
॥ दशमः खण्डः ॥
अथ खल्वात्मसंमितमतिमृत्यु सप्तविधःसामोपासीत हिंकार इति त्र्यक्षरं प्रस्ताव
इति त्र्यक्षरं तत्समम् ॥ १ ॥
तदनन्तर आत्मा तुल्य अतिमृत्यु रूप सप्तविध साम की उपासना का वर्णन किया जाता है। शब्द
'हिंकार' तीन अक्षरों वाला है तथा 'प्रस्ताव' भी तीन अक्षरों वाला है, अतः दोनों समान हैं ॥ १ ॥
आदिरिति द्वयक्षरं प्रतिहार इति चतुरक्षरं तत इहैकं तत्समम् ॥ २ ॥
शब्द 'आदि' दो अक्षरों से बना है और 'प्रतिहार' शब्द चार अक्षरों से बना है। इसमें से एक अक्षर
निकालकर 'आदि' शब्द में जोड़ने से वे समान हो जाते हैं ॥ २ ॥
उद्गीथ इति त्र्यक्षरमुपद्रव इति चतुरक्षरं त्रिभिस्त्रिभिः समं भवत्यक्षरमतिशिष्यते
त्र्यक्षरं तत्समम् ॥ ३ ॥
'उद्गीथ' शब्द तीन अक्षरों वाला है और उपद्रव चार अक्षरों वाला है। ये तीन-तीन अक्षरों में समान हैं, एक
अक्षर शेष रह जाता है। यह शेष रहने वाला 'अक्षर' कहा जाता है, इसमें भी तीन अक्षर हैं, अतः वह भी समान है ॥
निधनमिति त्र्यक्षरं तत्सममेव भवति तानि ह वा एतानि द्वाविंशतिरक्षराणि ॥ ४ ॥
'निधन' शब्द तीन अक्षरों वाला है, यह उनके समान ही है। इस प्रकार कुल सात शब्दों में बाईस अक्षर हैं ॥
एकविंशत्यादित्यमाप्नोत्येकविंशो वा इतोऽसावादित्यो द्वाविंशेन परमादित्या-
ज्जयति तन्नाकं तद्विशोकम् ॥ ५ ॥
इक्कीस अक्षरों से साधक आदित्य लोक को प्राप्त करता है। (बारह मास, पाँच ऋतुएँ और तीन लोक
मिलकर बीस होते हैं) आदित्य ही इक्कीसवाँ अक्षर है। बाईसवें अक्षर से साधक आदित्य से परे सुख
स्वरूप, शोक रहित (स्वर्ग) लोक को प्राप्त करता है ॥ ५ ॥
आप्नोति हादित्यस्य जयं परो हास्यादित्यजयाज्जयो भवति य एतदेवं
विद्वानात्मसंमितमतिमृत्यु सप्तविधः सामोपास्ते सामोपास्ते ॥ ६ ॥
इस प्रकार जो साधक परमात्म-तुल्य अति मृत्युरूप सप्तविध साम की उपासना करता है, वह
इक्कीसवें अक्षर से आदित्य रूप साम की उपासना करता है और आदित्य लोक को जीत लेता है। बाईसवें
अक्षर से वह आदित्य से परे लोक पर विजय प्राप्त करता है ॥ ६ ॥