१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 129, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४ खण्ड ३ मन्त्र ८ १२१
॥ तृतीयः खण्डः ॥
वायुर्वाव संवर्गो यदा वा अग्निरुद्वायति वायुमेवाप्येति यदा सूर्योऽस्तमेति
वायुमेवाप्येति यदा चन्द्रोऽस्तमेति वायुमेवाप्येति ॥ १ ॥
वायु ही संवर्ग है। जब अग्नि शान्त होती है, तो वायु में ही समाहित होती है। जब सूर्य अस्त होता
है, तो वायु में ही समाहित होता है और जब चन्द्रमा अस्त होता है, तो वायु में ही समाहित हो जाता है॥
यदाप उच्छुष्यन्ति वायुमेवापियन्ति वायुर्हेवैतान्सर्वान्संवृङ्क्त इत्यधिदैवतम् ॥ २॥
जब जल सूखता है, तो वायु में ही समाहित हो जाता है। इस प्रकार वायु ही इन सबको अपने में
समाहित कर देने वाला है। यह आधिदैविक उपासना है॥ २॥
अथाध्यात्मं प्राणो वाव संवर्गः स यदा स्वपिति प्राणमेव वागप्येति प्राणं चक्षुः
प्राणःश्रोत्रं प्राणं मनः प्राणो ह्येवैतान्सर्वान्संवृङ्क्त इति ॥ ३ ॥
अब आध्यात्मिक तत्त्व का विवेचन किया जाता है। प्राण ही संवर्ग है। जब साधक सोता है, तब प्राण
में ही वागिन्द्रिय समाहित हो जाती है। प्राण में ही चक्षु, श्रोत्र और मन समाहित हो जाते हैं। इस प्रकार प्राण
ही इन सबको अपने में समाहित कर लेने वाला है॥ ३॥
तौ वा एतौ द्वौ संवर्गों वायुरेव देवेषु प्राणः प्राणेषु ॥ ४ ॥
इस प्रकार मात्र दो ही संवर्ग हैं। देवताओं में वायु संवर्ग हैं और इन्द्रियों में प्राण संवर्ग है॥४॥
अथ ह शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च काक्षसेनिं परिविष्यमाणौ ब्रह्मचारी
बिभिक्षे तस्मा उ ह न ददतुः ॥ ५॥
एक समय शौनक कापेय और अभिप्रतारी काक्षसेनि को जब भोजन परोसा जा रहा था, तब एक
ब्रह्मचारी ने उनसे भिक्षा माँगी; किन्तु उन्होंने (उसकी पात्रता परखे बिना) भिक्षा नहीं दी॥ ५॥
स होवाच महात्मनश्चतुरो देव एकः कः स जगार भुवनस्य गोपास्तं कापेय
नाभिप्रश्यन्ति मर्त्या अभिप्रतारिन्बहुधा वसन्तं यस्मै वा एतदन्नं तस्मा एतन्न दत्तमिति ॥ ६ ॥
तब उस ब्रह्मचारी ने कहा- भुवनों के स्वामी उन देव प्रजापति ने चार महान् स्वरूपों को अपने में
समाहित कर लिया है। हे कापेय! हे अभिप्रतारिन्! विभिन्न स्वरूपों में निवास करने वाले उन देव को
मनुष्य नहीं देख पाते और जिसके लिए यह अन्न है, उसे (देव प्रजापति को ) ही अन्न नहीं दिया गया ॥ ६ ॥
तदु ह शौनकः कापेयः प्रतिमन्वानः प्रत्येयायात्मा देवानां जनिता प्रजानाःहिरण्यदंष्ट्रो
बभसो ऽनसूरिर्महान्तमस्य महिमानमाहुरनद्यमानो यदनन्नमत्तीति वै वयं
ब्रह्मचारिन्नेदमुपास्महे दत्तास्मै भिक्षामिति ॥ ७॥
उनके कथन का शौनक कापेय मुनि ने विचार किया और ब्रह्मचारी से कहा- जो देवताओं की
आत्मा, प्रजाओं के जनक, हिरण्यदंष्ट्र, भक्षणवृत्ति वाले, बुद्धिमान् और महिमावान् हैं, जो दूसरों से न खाये
जाने वाले और अन्न न खाने वाले हैं। हे ब्रह्मचारिन् ! हम उसी देव की उपासना करते हैं- ऐसा कहकर
उन्होंने ब्रह्मचारी को भिक्षा देने का आदेश दिया ॥ ७॥
तस्मा उ ह ददुस्ते वा एते पञ्चान्ये पञ्चान्ये दश संतस्तत्कृतं तस्मात्सर्वासु दिक्ष्वन्नमेव
दशकृतः सैषा विराडन्नादी तयेदः सर्वं दृष्टः सर्वमस्येदं दृष्टं भवत्यन्नादो भवति य एवं
वेद य एवं वेद ॥ ८॥