१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय ७ खण्ड ४ मन्त्र ३ १७१
अध्याय ७ खण्ड ४ मन्त्र ३ १७१
'कार्य करूँ', तभी कार्य करता है, जब पुत्र और पशुओं की इच्छा करता है, उसी समय वह उनको प्राप्त
करता है तथा जब वह संकल्प करता है कि इस लोक एवं दूसरे लोक के वैभव को प्राप्त करूँ, तभी वह
उसको, प्राप्त करता है। मन ही आत्मा, मन ही लोक एवं मन ही ब्रह्म है। अतः हे नारद ! तुम इस श्रेष्ठ मन
की उपासना करो ॥ १ ॥
स यो मनो ब्रह्मेत्युपास्ते यावन्मनसो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो मनो
ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो मनसो भूय इति मनसो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥
जो व्यक्ति मन को 'यह ब्रह्म है' ऐसा मानकर उसकी ब्रह्म के रूप में उपासना करता है, वह व्यक्ति जहाँ
तक मन की गति है, वहाँ तक अपनी इच्छा से गतिशील हो जाता है। (नारद ने कहा-) हे भगवन् ! क्या मन से
भी बढ़कर कोई है ? (सनत्कुमार ने कहा-) हाँ मन से भी बढ़कर है। (तब नारद जी ने कहा-) हे भगवन् ! मुझे
उसी का उपदेश प्रदान करने की कृपा करें ॥ २ ॥
॥ चतुर्थः खण्डः ॥
संकल्पो वाव मनसो भूयान्यदा वै संकल्पयतेऽथ मनस्यत्यथ वाचमीरयति तामु
नाम्नीरयति नाम्नि मन्त्रा एकं भवन्ति मन्त्रेषु कर्माणि ॥ १ ॥
सनत्कुमार जी ने कहा- 'संकल्प' मन से अधिक श्रेष्ठ है। जब व्यक्ति संकल्प करता है, तभी वह
बोलने की इच्छा करते हुए वाक् शक्ति को प्रेरणा प्रदान करता है। वह उसको नाम के प्रति प्रवृत्त करता है।
नाम के अन्तर्गत ही सभी मंत्र एकाकार हो जाते हैं तथा मन्त्रों में ही सभी कर्म एकरूप हो जाते हैं ॥ १ ॥
तानि ह वा एतानि संकल्पैकायनानि संकल्पात्मकानि संकल्पे प्रतिष्ठितानि
समक्लृपतां द्यावापृथिवी समकल्पेतां वायुश्चाकाशं च समकल्पन्तापश्च तेजश्च तेषाᳵ
संक्लृप्त्यै वर्षᳵ संक्लृपते वर्षस्य संक्लृप्त्या अन्नᳵसंक्लृपतेऽन्नस्य संक्लृप्त्यै प्राणाः
संक्लृपन्ते प्राणानाᳵ संक्लृप्त्यै मन्त्राः संक्लृपन्ते मन्त्राणाᳵ संक्लृप्त्यै कर्माणि संक्लृपन्ते
कर्मणाᳵ संक्लृप्त्यै लोकः संक्लृपते लोकस्य संक्लृप्त्यै सर्वᳵ संक्लृपते स एष संकल्पः
संकल्पमुपास्स्वेति ॥ २ ॥
(हे नारद !) सर्वप्रथम जो मन, वाणी आदि का वर्णन किया गया है, वह संकल्परूप, संकल्पमय
और अपने संकल्प में प्रतिष्ठित है। स्वर्ग एवं पृथिवी संकल्प करने वाले प्रतीत होते हैं। इसी प्रकार वायु
तथा आकाश, जल और तेज भी संकल्प बल से युक्त हैं। इन सभी के संकल्प बल से वृष्टि को सामर्थ्य
प्राप्त होती है। (अथवा उन द्युलोक एवं पृथिवी के संकल्प से वृष्टि होती है।) वृष्टि के संकल्प से अन्न को
समर्थता मिलती है। अन्न के संकल्प से प्राण समर्थ होते हैं। प्राणों के संकल्प से मन्त्र समर्थ होते हैं। मन्त्रों
के संकल्प से कर्मों को सामर्थ्य मिलती है एवं कर्मों के संकल्प से लोक (फल) समर्थ होता है। हे नारद !
तुम ऐसे ही इस श्रेष्ठ संकल्प की उपासना करो ॥ २ ॥
स यः संकल्पं ब्रह्मेत्युपास्ते कॢप्तान्वै स लोकान् ध्रुवान् ध्रुवः प्रतिष्ठितान्
प्रतिष्ठितोऽव्यथमानानव्यथमानोऽभिसिध्यति यावत्संकल्पस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो
भवति यः संकल्पं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवः संकल्पाद्भूय इति संकल्पाद्वाव भूयोऽस्तीति
तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ ३ ॥
१७२ छान्दोग्योपनिषद्
(हे नारद!) जो व्यक्ति यह संकल्प 'यही ब्रह्म है', ऐसा जानकर उसकी उपासना करता है, वह
विधाता द्वारा रचित ध्रुवलोकों को स्वयं ध्रुवरूप होकर, प्रतिष्ठित लोकों को स्वयं प्रतिष्ठित होकर तथा
पीड़ा रहित लोकों को स्वयं पीड़ा रहित होकर पूर्णरूपेण प्राप्त करता है। जिस स्थान तक संकल्प की गति
होती है, वहाँ तक उसकी इच्छानुसार गति हो जाती है। तब नारद जी ने पूछा- हे भगवन्! क्या संकल्प से
भी कुछ श्रेष्ठ है ? सनत्कुमार जी ने कहा- हाँ है, संकल्प से भी श्रेष्ठ है। (नारद ने कहा) हे भगवन्! मुझे
उसी (श्रेष्ठ तत्त्व) का उपदेश करें॥ ३॥
॥ पञ्चमः खण्डः ॥
चित्तं वाव संकल्पाद्भूयो यदा वै चेतयतेऽथ संकल्पयतेऽथ मनस्यत्यथ वाचमीरयति
तामु नाम्नीरयति नाम्नि मन्त्रा एकं भवन्ति मन्त्रेषु कर्माणि ॥ १ ॥
(हे नारद!) 'चित्त' संकल्प से अधिक श्रेष्ठ है। जब व्यक्ति चिन्तन से युक्त होता है, तभी संकल्प
करता है। तदनन्तर इच्छा करते हुए वाणी एवं नाम को प्रेरित करता है। नाम मन्त्रानुरूप एवं मन्त्र कर्मानुरूप
होकर तदाकार हो जाते हैं॥ १ ॥
तानि ह वा एतानि चित्तैकायनानि चित्तात्मानि चित्ते प्रतिष्ठितानि तस्माद्यद्यपि
बहुविदचित्तो भवति नायमस्तीत्येवैनमाहुर्यदयं वेद यद्वा अयं विद्वानेत्थमचित्तः स्यादित्यथ
यद्यल्पविच्चित्तवान्भवति तस्मा एवोत शुश्रूषन्ते चित्तꣳह्येवैषामेकायनं चित्तमात्मा चित्तं
प्रतिष्ठा चित्तमुपास्स्वेति ॥ २ ॥
(हे नारद!) संकल्प, मन, वाणी, मन्त्र, कर्म आदि सभी चित्त में विलीन होने वाले, चित्त द्वारा प्रकट
होने वाले एवं चित्त में ही स्थिर होने वाले होते हैं। यदि कोई व्यक्ति विशेष रूप से विद्वान् होते हुए भी
अचित्त (अर्थात् चिन्तनशीलता से रहित) हो, तो प्रायः लोग यही कहते हैं कि यह कुछ भी नहीं है। यदि
इसने कुछ सुना होता और इसमें विद्वत्ता होती, तो इस तरह से अचित्त नहीं होता। कोई व्यक्ति कम विद्वान्
होकर भी यदि चित्तयुक्त होता है, तो लोग उसकी बात सुनना चाहते हैं। इस प्रकार हे नारद! चित्त ही
संकल्प का (एक मात्र) उत्पत्ति केन्द्र है। तुम चित्त की ही उपासना करो ॥२ ॥
स यश्चित्तं ब्रह्मेत्युपास्ते चित्तान्वै स लोकान् ध्रुवान् ध्रुवः प्रतिष्ठितान् प्रतिष्ठितो
ऽव्यथमानानव्यथमानोऽभिसिद्ध्यति यावच्चित्तस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति
यश्चित्तं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवश्चित्ताद्भूय इति चित्ताद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे
भगवान्ब्रवीत्विति ॥ ३ ॥
हे नारद! इस तरह से जो व्यक्ति चित्त की ब्रह्म रूप में उपासना करता है, वह चित्त (अर्थात् बुद्धि
युक्त गुणों) से उपचित हुए ध्रुवलोकों को स्वयं ध्रुव होकर, प्रतिष्ठित लोकों को स्वयं प्रतिष्ठित होकर और
कष्ट न पाने वाले लोकों को स्वयं पीड़ा (कष्ट) न प्राप्त करते हुए सहजता से प्राप्त कर लेता है। जहाँ तक
चित्त का विषय (गति) है, वहाँ तक उसकी इच्छानुरूप गति हो जाती है। (नारद जी ने पूछा-) हे
भगवन्! क्या चित्त से भी कुछ श्रेष्ठ है ? (सनत्कुमार जी ने कहा-) हाँ है, चित्त से भी श्रेष्ठ है। तब नारद
जी ने कहा- हे भगवन्! मुझे वही बताने का अनुग्रह करें ॥३ ॥