१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय ४ ब्राह्मण १ मन्त्र २ ३०३
अध्याय ४ ब्राह्मण १ मन्त्र २ ३०३
॥ अथ चतुर्थोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमं ब्राह्मणम् ॥
जनको ह वैदेह आसांचक्रेऽथ ह याज्ञवल्क्य आवव्राज तꣳ होवाच याज्ञवल्क्य
किमर्थमचारीः पशूनिच्छन्नण्वन्तानित्युभयमेव सम्राडिति होवाच ॥ १ ॥
विदेहराज जनक सिंहासन पर आरूढ़ थे। उसी समय उनके पास महर्षि याज्ञवल्क्य जी आये। राजा
जनक ने पूछा- हे याज्ञवल्क्य जी ! आपका आगमन किस निमित्त हुआ है ? आप पशुओं की इच्छा से पधारे
हैं या सूक्ष्म प्रश्नों की इच्छा से ? याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया- राजन् ! मैं दोनों प्रयोजनों से यहाँ आया हूँ॥ १॥
यत्ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे जित्वा शैलिनिर्वाग्वै ब्रह्मेति यथा
मातृमान्पितृमानाचार्यवान्ब्रूयात्तथा तच्छैलिनिरब्रवीद्वाग्वै ब्रह्मेत्यवदतो हि किꣳ
स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत्सम्राडिति स वै नो
ब्रूहि याज्ञवल्क्य वागेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा प्रज्ञेत्येनदुपासीत का प्रज्ञता याज्ञवल्क्य
वागेव सम्राडिति होवाच वाचा वै सम्राड् बन्धुः प्रज्ञायत ऋग्वेदो यजुर्वेदः
सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि
व्याख्यानानीष्टꣳ हुतमाशितं पायितमयं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि वाचैव
सम्राट् प्रज्ञायन्ते वाग्वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं वाग्जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो
भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभꣳ सहस्रं ददामीति होवाच जनको
वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ २ ॥
याज्ञवल्क्य जी ने कहा- हे राजन् ! आप से किसी विद्वान् ने ब्रह्म के विषय में जो कुछ कहा हो, वह
सब हम श्रवण करने के लिए आये हैं। विदेहराज जनक ने कहा- शैलिनि (शिलिन के पुत्र) जित्वा ने
वाक् को ही ब्रह्म कहा है। याज्ञवल्क्य बोले- जिस प्रकार कोई, माता-पिता और गुरु के द्वारा शिक्षित
होकर कहता है, उसी प्रकार उस जित्वा ने वाक् ही ब्रह्म है- ऐसा कहा है; क्योंकि जो वाक् रहित है
(गूँगा है), क्या उसे ब्रह्म का कोई लाभ प्राप्त हो सकता है ? क्या उस जित्वा ने आपको वाक् का आश्रय
स्थल और उसकी प्रतिष्ठा भी बताई है, जनक ने कहा- नहीं, मुझे तो इस विषय में नहीं बताया।
याज्ञवल्क्य जी बोले- यह उपदेश एक पादीय अथवा अपूर्ण है। जनक ने कहा- तो उसके विषय में सम्यक्
रूप से आप ही हमें बताएँ। याज्ञवल्क्य जी ने कहा- वाक् (वाणी) ही उस ब्रह्म का आयतन अर्थात् शरीर
है और आकाश ही उसकी प्रतिष्ठा है। प्रज्ञा समझ कर उसकी ही उपासना करनी चाहिए। जनक जी ने
पूछा- प्रज्ञता (प्रज्ञा) क्या है ? ऋषि बोले वाक् ही प्रज्ञता (प्रज्ञा) है। हे राजन् ! वाक् शक्ति के द्वारा ही
बन्धु- बान्धवों का ज्ञान होता है तथा ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का ज्ञान होता है। उसी वाक्
के माध्यम से इतिहास, पुराण, उपनिषद्, विद्या, श्लोक, सूत्र, अनुव्याख्यान, व्याख्यान, यज्ञकर्म, हुत, अशित
(भूखे व्यक्ति को भोजन कराने के धर्म), पायित (प्यासे व्यक्ति को पानी पिलाने के धर्म), इहलोक,
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परलोक और समस्त भूतों का ज्ञान होता है। हे सम्राट् ! वस्तुतः वाक् ही ब्रह्म है, जो ऐसा जानते हैं, उन
विद्वानों का यह वाक् परित्याग नहीं करती। ऐसे विद्वान् पुरुष को सभी प्राणी उपहार प्रदान करते हैं। वह
स्वयं देवता बनकर देवों के बीच निवास करता है। यह सुनकर विदेहराज जनक ने कहा- इस ज्ञान के
निमित्त (दक्षिणा स्वरूप) मैं आपको ऐसी सहस्त्र गौएँ प्रदान करता हूँ, जिनसे हाथी के समान विशाल बैल
उत्पन्न हों। ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा- मेरे पिता ऐसा मानते थे कि शिष्य (अथवा जिज्ञासु) को पूर्ण शिक्षण
(ज्ञान) दिये बिना दक्षिणा के रूप में उसका धन ग्रहण नहीं करना चाहिए ॥ २ ॥
[ शिष्य जब वाञ्छित विद्या प्राप्त करके तुष्ट हो जाता था, तब वह स्वयं गुरु से गुरु-दक्षिणा लेने का आग्रह
करता था। गुरु भी अपना दायित्व पूर्ण हुए बिना दान स्वीकार नहीं करते थे।]
यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्म उदङ्कः शौल्बायनः प्राणो वै ब्रह्मेति यथा
मातृमान्पितृमानाचार्यवान्ब्रूयात्तथा तच्छौल्बायनोऽब्रवीत्प्राणो वै ब्रह्मेत्यप्राणतो हि किँ
स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत्सम्राडिति स वै नो
ब्रूहि याज्ञवल्क्य प्राण एवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा प्रियमित्युपासीत का प्रियता
याज्ञवल्क्य प्राण एव सम्राडिति होवाच प्राणस्य वै सम्राट् कामायायाज्यं
याजयत्यप्रतिगृह्यस्य प्रतिगृह्णात्यपि तत्र वधाशङ्कं भवति यां दिशमेति प्राणस्यैव सम्राट्
कामाय प्राणो वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं प्राणो जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो
भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभः सहस्रं ददामीति होवाच जनको
वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ३॥
याज्ञवल्क्य ने कहा- आपसे किसी भी विद्वान् ने ब्रह्म के विषय में जो भी कुछ कहा हो, वह हमसे
कहिए। विदेहराज जनक ने कहा- शुल्बपुत्र उदङ्क ने मुझसे ब्रह्म के विषय में यह कहा है कि प्राण ही ब्रह्म
है। (याज्ञवल्क्य ने कहा-) जिस प्रकार कोई माता-पिता और गुरु के द्वारा शिक्षित होकर कहता है, उसी
प्रकार उदङ्क ने प्राण ही ब्रह्म है- ऐसा कहा है; क्योंकि प्राण के बिना कुछ भी कर सकना सम्भव नहीं है।
याज्ञवल्क्य ने कहा- क्या उन्होंने (शौल्बायन ने) प्राण के आयतन और आश्रय स्थल के विषय में भी
बताया है ? राजा जनक ने कहा- इस सन्दर्भ में उन्होंने कुछ नहीं बताया, तब याज्ञवल्क्य बोले- यह तो एक
पैर वाला अथवा अपूर्ण शिक्षण हुआ। राजा जनक ने कहा- तो फिर आप ही उस ज्ञान को सम्यक् रूप से
कहें। याज्ञवल्क्य बोले- प्राण का शरीर प्राण ही है, आकाश उसकी प्रतिष्ठा है। प्राण को प्रिय मानकर ही
उसकी उपासना करनी चाहिए। जनक ने पूछा- यह प्रियता किसे कहते हैं? याज्ञवल्क्य ने कहा- प्राण की
कामना (प्रियता) से ही यजन न करने योग्य से यज्ञ कराया जाता है। दान न लेने योग्य से भी दान प्राप्त
किया जाता है तथा इसी की प्रियता के कारण जिस दिशा में भी गमन करते हैं, उसी में मृत्यु का भय या
उसकी आशंका प्रतीत होती है। हे राजन् ! ये सब प्राण के निमित्त ही होता है। अतः हे सम्राट् ! प्राण ही ब्रह्म
है, ऐसा जानकर कार्य करने वाले का प्राण कभी परित्याग नहीं करता। समस्त भूत उसे उपहार प्रदान
करते हैं। वह व्यक्ति देवता होकर उन्हीं के मध्य विराजता है। विदेहराज जनक ने कहा- ऋषिवर !
हाथी के आकार वाले बैलों को प्रदान करने वाली सहस्र गौएँ मैं आपको दक्षिणा रूप में प्रदान करता
हूँ। ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा- मेरे पिताश्री की यह धारणा थी कि बिना पूर्ण ज्ञान दिये शिष्य से दक्षिणा
ग्रहण नहीं करनी चाहिए ॥ ३ ॥