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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

अध्याय ५ मन्त्र ६ ४१९

अध्याय ५ मन्त्र ६ ४१९
॥ अथ पञ्चमोऽध्यायः ॥
द्वे अक्षरे ब्रह्मपरे त्वनन्ते विद्याविद्ये निहिते यत्र गूढे।
क्षरं त्वविद्या ह्यमृतं तु विद्या विद्याविद्ये ईशते यस्तु सोऽन्यः ॥ १ ॥
(कार्य) ब्रह्म से भी उत्कृष्ट, वह अनन्त सत्ता अविनाशी है, जिसमें विद्या और अविद्या दोनों निहित
हैं और जो प्राणियों की हृदय गुहा में निहित है। क्षरणशील (नश्वर तो) 'अविद्या' है और अविनाशी
(जीवात्मा) 'विद्या' है। जो विद्या और अविद्या दोनों पर शासन करता है, वह इन दोनों से भिन्न सत्ता है ॥
यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको विश्वानि रूपाणि योनीश्च सर्वाः।
ऋषिं प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानैर्बिभर्ति जायमानं च पश्येत् ॥ २ ॥
जो अद्वितीय परमात्मा प्रत्येक योनि का अधिष्ठाता है, जो सम्पूर्ण (चौरासी लाख) योनियों को
विभिन्न रूप प्रदान करता है। जिसने सबसे पहले उत्पन्न हुए कपिल मुनि को विशिष्ट ज्ञान-सम्पदा से
सम्पन्न किया तथा उन्हें उत्पन्न होते हुए देखा था (वही विद्या-अविद्या से परे परमतत्त्व है) ॥ २ ॥
एकैकं जालं बहुधा विकुर्वन्नस्मिन्क्षेत्रे संहरत्येष देवः।
भूयः सृष्ट्वा पतयस्तथेशः सर्वाधिपत्यं कुरुते महात्मा ॥ ३ ॥
यह प्रकाश स्वरूप परमात्मा सृष्टि काल में इस जगत् क्षेत्र में एक-एक जाल (कर्मफल बन्धन) को
अनेक प्रकार से विभक्त कर स्थापित करता हुआ प्रलयकाल में उसका संहार कर देता है। वह परमेश्वर
(कल्पान्तर के आरम्भ में) प्रजापतियों की सृष्टि करके उन सब पर अपना आधिपत्य रखता है ॥ ३ ॥
सर्वा दिश ऊर्ध्वमधश्च तिर्यक्प्रकाशयन्भ्राजते यद्वनड्‌वान्।
एवं स देवो भगवान्वरेण्यो योनिखभावानधितिष्ठत्येकः ॥ ४ ॥
जिस प्रकार सूर्यदेव अकेले ही ऊपर-नीचे और इधर-उधर की सभी दिशाओं को प्रकाशित करते
हुए देदीप्यमान होते हैं, उसी प्रकार वह परम पुरुष भगवान् प्रकाशस्वरूप और वरणीय होकर अकेले ही
समस्त उत्पत्तिकारक शक्तियों पर अपना आधिपत्य रखता है ॥ ४ ॥
यच्च स्वभावं पचति विश्वयोनिः पाच्यांश्च सर्वान्परिणामयेद्यः।
सर्वमेतद्विश्वमधितिष्ठत्येको गुणांश्च सर्वान्विनियोजयेद्यः ॥ ५ ॥
जो परमात्मा सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति का कारणभूत है, जो समस्त तत्त्वों के स्वभाव को परिपक्व
करता है, जो समस्त पकाये गये (अथवा परिवर्तनशील) पदार्थों को विविध रूपों में परिणत करता है, जो
सम्पूर्ण गुणों (सत्त्व, रजस्, तमस्) को उनके अनुरूप कार्यों में नियुक्त करता है, जो सम्पूर्ण जगत् का
अधिष्ठाता है (वह परब्रह्म है) ॥ ५ ॥
तद्वेदगुह्योपनिषत्सु गूढं तद्ब्रह्मा वेदयते ब्रह्मयोनिम्।
ये पूर्वं देवा ऋषयश्च तद्विदुस्ते तन्मया अमृता वै बभूवुः ॥ ६ ॥
वह परमात्मा वेदों के गुह्य सारभूत उपनिषदों में निहित है, वेद के उत्पन्नकर्ता उस परमात्मा को
ब्रह्मा जानते थे। जो पुरातन देवगण और ऋषिगण उसे (परमात्मतत्त्व को) जानते थे, वे निश्चित ही उसमें
तन्मय होकर अमृतस्वरूप हो गये थे ॥ ६ ॥

४२० श्वेताश्वतरोपनिषद्
गुणान्वयो यः फलकर्मकर्ता कृतस्य तस्यैव न चोपभोक्ता।
स विश्वरूपस्त्रिगुणस्त्रिवर्त्मा प्राणाधिपः संचरति स्वकर्मभिः ॥ ७॥
जो गुणों से युक्त, फलप्राप्ति के उद्देश्य से कर्म करने वाला और अपने किये गये कर्म के फल का
उपभोग करने वाला जीवात्मा है, वह विभिन्न रूपों को धारण करता हुआ तीन गुणों (सत्, रज, तम) से
युक्त होकर तीन मार्गों (देवयान, पितृयान तथा लौकिक योनियों या धर्म, अधर्म तथा ज्ञान मार्ग) से गमन
करता है। वह प्राणों का अधिपति जीवात्मा अपने कर्मों के अनुसार विविध योनियों में गमन करता है ॥ ७॥
अङ्गुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः संकल्पाहंकारसमन्वितो यः।
बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन चैव आराग्रमात्रोऽप्यपरोऽपि दृष्टः ॥ ८॥
जो अंगुष्ठ मात्र परिमाणवाला, सूर्य सदृश प्रकाशस्वरूप और सङ्कल्प तथा अहङ्कार से युक्त है, जो
बुद्धि और आत्मा के विशिष्ट गुणों से युक्त है, यह आरे (लकड़ी चीरने का यन्त्र) की नोंक सदृश सूक्ष्म,
परमात्मा से भिन्न अस्तित्व वाला (जीवात्मा) योगियों द्वारा देखा गया है ॥ ८ ॥
वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च।
भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥ ९॥
एक बाल की नोंक के सौवें भाग के पुनः सौ भागों में विभक्त करने पर, जो कल्पित भाग होता है, जीव
का स्वरूप उसी के बराबर (अतिसूक्ष्म) समझना चाहिए, परन्तु वही अनन्त रूपों में विस्तृत भी हो जाता है ॥ ९॥
[ चेतना की सूक्ष्म इकाई की सूक्ष्मता का अनुमान कराने के लिए ऋषि ने यह उदाहरण दिया है।]
नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसकः। यद्यच्छरीरमादत्ते तेन तेन स युज्यते ॥ १०॥
यह जीवात्मा न तो स्त्री है, न पुरुष है और न ही नपुंसक है। यह जिस-जिस शरीर को ग्रहण
करता है, उसी-उसी से सम्बद्ध हो जाता है ॥ १० ॥
संकल्पनस्पर्शनदृष्टिमोहैर्ग्रासांबुवृष्ट्यात्मविवृद्धिजन्म।
कर्मानुगान्यनुक्रमेण देही स्थानेषु रूपाण्यभिसंप्रपद्यते ॥ ११॥
अन्न और जल के सेवन से जिस प्रकार शरीर परिपुष्ट होता है (उसकी वृद्धि होती है), उसी प्रकार
सङ्कल्प, स्पर्श, दृष्टि और मोह से जीवात्मा का जन्म और विस्तार (अनेक योनियों में) होता है। जीवात्मा
अपने किये हुए कर्मों के फल के अनुसार भिन्न-भिन्न स्थानों में भिन्न-भिन्न शारीरिक रूपों को बार-बार
धारण करता है ॥ ११ ॥
स्थूलानि सूक्ष्माणि बहूनि चैव रूपाणि देही स्वगुणैर्वृणोति।
क्रियागुणैरात्मगुणैश्च तेषां संयोगहेतुरपरोऽपि दृष्टः ॥ १२ ॥
जीवात्मा अपने आन्तरिक गुणों (ममता, अहंता, आकांक्षा आदि) के अनुसार स्थूल और सूक्ष्म
बहुत से रूप धारण करता है। अपने क्रियात्मक गुणों (संस्कारों) तथा चेतनात्मक गुणों (चिन्तन, मनन,
सङ्कल्प आदि) के अनुरूप शरीर धारण कराने वाला हेतु कोई दूसरा (परमपिता परमात्मा) भी देखा
(जाना) गया है ॥ १२ ॥
अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम्।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ १३ ॥