१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय ४ ब्राह्मण ६ मन्त्र ३ ३२७
अध्याय ४ ब्राह्मण ६ मन्त्र ३ ३२७
रसास्वादन करे, किसके माध्यम से किसे कहे, किसके द्वारा किसका मनन करे, किससे किसका स्पर्श
करे, किससे किसे जाने ? हे मैत्रेयी ? जिसके द्वारा सभी को जाना जाता है, उसे किसके द्वारा जाने ? वह
आत्मा अग्राह्य है, जिसके विषय में 'नेति-नेति' ऐसा कहा गया है। उसका कभी नाश नहीं होता- वह
अशीर्य (नष्ट न होने वाला) है, वह किसी से आसक्त नहीं होता- वह असङ्ग है, वह कभी बन्धन में नहीं
बँधता- वह अबद्ध है। हे मैत्रेयी ! सर्वज्ञाता को किसके द्वारा जाना जाए ? अरी मैत्रेयी ! अमृतत्व की प्राप्ति
के लिए इतना ज्ञान (शिक्षा) बहुत है, ऐसा कहकर याज्ञवल्क्य (परिव्रज्या हेतु) चले गये ॥ १५ ॥
॥ षष्ठं ब्राह्मणम् ॥
अथ वंशः (पौतिमाष्यात्) पौतिमाष्यो गौपवनाद्वौपवनः पौतिमाष्यात्पौतिमाष्यो
गौपवनाद्वौपवनः कौशिकात्कौशिकः कौण्डिन्यात्कौण्डिन्यः शाण्डिल्याच्छाण्डिल्यः
कौशिकाच्च गौतमाच्च गौतमः ॥ १॥ आग्निवेश्यादाग्निवेश्यो गार्ग्याद्गार्ग्यो गार्ग्याद्गार्ग्यो
गौतमाद्गौतमः सैतवात्सैतवः पाराशर्यायणात्पाराशर्यायणो गार्ग्यायणाद्गार्ग्यायण उद्दालकायं-
नादुद्दालकायनो जाबालायनज्जाबालायनो माध्यन्दिनायनान्माध्य-
न्दिनायनः सौकरायणात्सौकरायणः काषायणा-त्काषायणः सायकायनात्सायकायनः
कौशिकायनेः कौशिकायनिः ॥ २॥ घृतकौशिकाद्धृतकौशिकः पाराशर्यायणात्पा-
राशर्यायणःपाराशर्यात्पाराशर्यो जातूकर्ण्याज्जातूकर्ण्य आसुरायणाच्च यास्काच्चासुरा-
यणस्त्रैवणेस्त्रैवणिरापजङ्गनेरापजङ्घनिरासुरेरासुरिर्भारद्वाजाद्भारद्वाज आत्रेयादात्रेयो
माण्टेर्माण्टिर्गौतमाद्गौतमो गौतमाद्गौतमो वात्स्याद्वात्स्य शाण्डिल्याच्छाण्डिल्यः कैशोर्या-
त्काप्यात्कैशोर्यः काप्यः कुमारहारितात्कुमारहारितो गालवाद्गालवो विदर्भीकौण्डि-
न्याद्विदर्भीकौण्डिन्यो वत्सनपातो बाभ्रवाद्धत्सनपाद्वाभ्रवः पथः सौभरात्पन्थाः
सौभरोऽयस्यादाङ्गिरसादयास्य आङ्गिरस आभूतेस्त्वाष्ट्रादाभूतिस्त्वाष्ट्रो विश्वरूपात्त्वा-
ष्ट्राद्विश्वरूपस्त्वाष्ट्रोऽश्विभ्यामश्विनौ दधीच आथर्वणाद्दध्यङ्ङाथर्वणो दैवादथर्वांदैवो मृत्योः
प्राध्वंसनान्मृत्युःप्राध्वंसनःप्रध्वंसनात्प्रध्वंसन एकऋषेरेकर्षिर्विप्रचित्तेर्विप्रचित्ति-
व्यंष्टेर्व्यष्टिः सनारोः सनारुः सनातनात्सनातनः सनगात्सनगः परमेष्ठिनः परमेष्ठी ब्रह्मणो
ब्रह्म स्वयंभु ब्रह्मणे नमः ॥ ३ ॥
अब (याज्ञवल्कीय काण्ड का) वंश वर्णन किया जाता है। पौतिमाष्य ने गौपवन से, गौपवन ने
पौतिमाष्य से, पौतिमाष्य ने गौपवन से, गौपवन ने कौशिक से, कौशिक ने कौण्डिन्य से, कौण्डिन्य ने
शाण्डिल्य से, शाण्डिल्य ने कौशिक और गौतम से (ज्ञानार्जन किया), गौतम ने आग्निवेश्य से, आग्निवेश्य
ने गार्ग्य से, गर्गवंशी ने गर्गवंशी से, गर्गवंशी ने गौतम से, गौतम ने सैतव से, सैतव ने पाराशर्यायण
(पराशर पुत्र) से, पाराशर्यायण ने गार्ग्य पुत्र से, गार्ग्य पुत्र ने उद्दालकायन से, उद्दालकायन ने जाबालायन
से, जाबालायन ने माध्यन्दिनायन से, माध्यन्दिनायन ने सौकरायण से, सौकरायण ने काषायण से, काषायण
ने सायकायन से, सायकायन ने कौशिकायनि से (ज्ञानार्जन किया); कौशिकायनि ने घृतकौशिक से,
३२८ बृहदारण्यकोपनिषद्
घृतकौशिक ने पाराशर्यायण से, पाराशर्यायण ने पाराशर्य से, पाराशर्य ने जातूकण्र्य से, जातूकण्र्य ने
आसुरायण और यास्क से, आसुरायण ने त्रैवणि से, त्रैवणि ने औपजन्धनि से, औपजन्धनि ने आसुरि से,
आसुरि ने भरद्वाजवंशी से, भरद्वाजवंशी ने आत्रेय से, आत्रेय ने माण्टि से, माण्टि ने गौतम से, गौतम ने
गौतम से, गौतम ने वात्स्य से, वात्स्य ने शाण्डिल्य के द्वारा, शाण्डिल्य ने कैशोर्य काप्य के द्वारा, कैशोर्यकाप्य
ने कुमार हारित के द्वारा, कुमार हारित ने गालव के माध्यम से, गालव ने विदर्भी कौण्डिन्य से, विदर्भी
कौण्डिन्य ने वत्सनपाद् बाभ्रव के द्वारा, वत्सनपाद् बाभ्रव ने पन्थासौभर के द्वारा, पन्थासौभर ने अयास्य
आङ्गिरस से, अयास्य आङ्गिरस ने आभूति त्वाष्ट्र से, आभूति त्वाष्ट्र ने विश्वरूप त्वाष्ट्र से, विश्वरूप त्वाष्ट्र ने
अश्विनीकुमारों के द्वारा, अश्विद्वय ने दधीचि आथर्वण के माध्यम से, दध्यङ् आथर्वण ने अथर्वांदैव से,
अथर्वांदैव ने मृत्यु प्राध्वंसन के द्वारा, मृत्यु प्राध्वंसन ने प्रध्वंसन के द्वारा, प्रध्वंसन ने एकर्षि के द्वारा, एकर्षि
ने विप्रचित्ति के माध्यम से, विप्रचित्ति ने व्यष्टि के माध्यम से, व्यष्टि ने सनारु से, सनारु ने सनातन से,
सनातन ने सनग से, सनग ने परमेष्ठी के द्वारा और परमेष्ठी ने ब्रह्मा से (ज्ञान प्राप्त किया); ब्रह्म तो स्वयंभू
है, उस ब्रह्म को नमन है ॥ १-३ ॥
॥ अथ पञ्चमोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमं ब्राह्मणम् ॥
ॐ पूर्णमदःपूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ ३ खं ब्रह्म खं पुराणं वायुरं खमिति ह स्माह कौरव्यायणीपुत्रो वेदो यं ब्राह्मणा
विदुर्वेदैनेन यद्वेदितव्यम् ॥ १ ॥
वह (ब्रह्म) पूर्ण है, यह (जगत् भी) पूर्ण है। (उस) पूर्ण ब्रह्म से ही यह पूर्ण विश्व प्रादुर्भूत हुआ
है। उस पूर्ण ब्रह्म सें से इस पूर्ण जगत् को निकाल लेने पर पूर्ण ब्रह्म ही शेष रहता है। ॐ (इस अक्षर) से
संबोधित खं (अनन्त आकाश या परम व्योम) ब्रह्म है। आकाश सनातन (परमात्म रूप) है। जिस
(आकाश) से वायु विचरण करता है, वह आकाश ही 'खं' है- ऐसा कौरव्यायणी पुत्र का कथन है। यह
ओंकार स्वरूप ब्रह्म ही वेद है- इस प्रकार (ज्ञानी) ब्राह्मण जानते हैं, क्योंकि जो जानने योग्य है, वह सब
इस ओंकार रूप वेद से ही जाना जा सकता है ॥ १ ॥
॥ द्वितीयं ब्राह्मणम् ॥
त्रयः प्राजापत्याः प्रजापतौ पितरि ब्रह्मचर्यमूषुर्दैवा मनुष्या असुरा उषित्वा ब्रह्मचर्यं
देवा ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्टा ३ इति व्यज्ञासिष्मेति
होचुर्दाम्यतेति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति ॥ १ ॥
देव, मानव तथा असुर इन तीनों प्रजापति के पुत्रों ने ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए प्रजापति के यहाँ
निवास किया। ब्रह्मचर्य वास पूर्ण करने के पश्चात् देवताओं ने (प्रजापति से) कहा- 'आप हमें उपदेश