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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

अध्याय ४ ब्राह्मण ४ मन्त्र २२ ३२१

अध्याय ४ ब्राह्मण ४ मन्त्र २२ ३२१
जो उसे प्राण का भी प्राण, चक्षु का भी चक्षु, श्रोत्र का भी श्रोत्र और मन का भी मन जानते हैं, वे उसे
पुरातन और अग्रगण्य ब्रह्म मानते हैं ॥ १८॥
मनसैवानुद्रष्टव्यं नेह नानास्ति किंचन। मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥
उस ब्रह्म को एकात्मभाव से अन्तर्मुखी होकर ही देखा जाना चाहिए। इसमें नानात्व विभेद नहीं है।
जो इसे नानात्व के रूप में देखता है, वह मृत्यु के द्वारा मृत्यु को प्राप्त करता है ॥ १९ ॥
एकधैवानुद्रष्टव्यमेतदप्रमेयं ध्रुवम्। विरजः पर आकाशादज आत्मा महान्ध्रुवः ॥२०॥
वह ब्रह्म जो एक ही प्रकार से दर्शन करने योग्य है, वह अप्रमेय एवं निश्चल है, निर्मल है, आकाश
से भी अधिक सूक्ष्म है, अजन्मा है और वह महान् आत्मा अनश्वर है ॥ २० ॥
तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः । नानुध्यायाद्बहूञ्छब्दान्वाचो विग्लापनं हि
तदिति ॥ २१ ॥
प्रज्ञावान् ब्राह्मण को चाहिए कि उसे ही जाने और उसी का चिन्तन-मनन करे। अधिक शब्दों के
जंजाल में न उलझे। वह तो वाणी का व्यर्थ श्रम ही है ॥ २१ ॥
[ शब्दों से मात्र संकेत मिलते हैं, फिर तो प्रत्यक्ष अनुभव से ही उसका बोध होता है। अस्तु, यहाँ व्यर्थ वाग्-
जंजाल से बचने का परामर्श दिया गया है।]
स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु य एषोऽन्तर्हृदय
आकाशस्तस्मिञ्छेते सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः स न साधुना कर्मणा
भूयान्नो एवासाधुना कनीयानेष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण
एषां लोकानामसंभेदाय तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन
तपसाऽनाशकेनैतमेव विदित्वा मुनिर्भवति एतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति
एतद्ध स्म वैतत्पूर्वे विद्वांसः प्रजां न कामयन्ते किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्माऽयं
लोक इति ते ह स्म पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं
चरन्ति या ह्येव पुत्रैषणा सा वित्तैषणा या वित्तैषणा सा लोकैषणोभे ह्येते एषणे एव
भवतः । स एष नेति नेत्यात्माऽनगृह्यो नहि गृह्यतेऽशीर्यो नहि शीर्यतेऽसङ्गो नहि
सज्यतेऽसितो न व्यथते न रिष्यत्येतमु हैवैते न तरत इत्यतः पापमकरवमित्यतः
कल्याणमकरवमित्युभे उ हैवैष एते तरति नैनं कृताकृते तपतः ॥ २२ ॥
यह आत्मा महान्, अमृत, अज, विज्ञानमय तथा हृदयाकाशशायी है। यह सबको वश में रखने वाला
तथा सबका नियन्त्रक और अधिपति है। यह पुण्य कर्मों से प्रवृद्ध नहीं होता और न ही पापकृत्यों से ह्रास
को प्राप्त होता है। यह सभी प्राणियों का स्वामी, उनका ईश्वर और सर्वभूत पालक है। लोकों की मर्यादा
बनाये रखने के लिए इनको धारण करने वाला सेतु है। इस आत्मा को ब्राह्मण जन वेदों का अध्ययन करके
यज्ञ, दान और कामना रहित तप के द्वारा जानते हैं। इसी को जानकर वे मुनि बनते हैं। इस (आत्मारूपी)
लोक की कामना करते हुए ही त्यागी पुरुष सब कुछ त्याग कर संन्यास ग्रहण करते हैं। पहले के विद्वान

३२२ बृहदारण्यकोपनिषद्
सन्तान आदि सकाम कर्मों के फल प्राप्त करने की आकांक्षा नहीं करते थे अर्थात् इससे विरत रहते हुए ये
सोचते थे कि हमारा लोक तो आत्म लोक है, सन्तति आदि का हम क्या करेंगे ? इसी कारण वे पुत्रैषणा,
वित्तैषणा और लोकैषणा से ऊँचे उठकर भिक्षाटन करते थे। पुत्रैषणा ही वित्तैषणा और वित्तैषणा ही
लोकैषणा है। आत्मा का ज्ञान देते समय विद्वज्जन 'नेति-नेति' ही कहते हैं, क्योंकि वह ग्रहण नहीं किया
जा सकता अर्थात् अग्राह्य है। वह आत्मा असङ्ग अर्थात् आसक्ति रहित है, अहिंस्य है, बन्धन रहित अर्थात्
मुक्त है, व्यथा रहित है और कभी नष्ट न होने वाला है। पाप और पुण्य दोनों को लाँघने में ये समर्थ हैं,
क्योंकि ये किए हुए और न किए हुए दोनों ही प्रकार के कर्मों से लिप्त नहीं होता ॥ २२ ॥
तदेतदृचाभ्युक्तम् । एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य न वर्धते कर्मणा नो कनीयान् ।
तस्यैव स्यात्पदवित्तं विदित्वा न लिप्यते कर्मणा पापकेनेति । तस्मादेवंविच्छान्तो दान्त
उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वाऽत्मन्येवात्मानं पश्यति सर्वमात्मानं पश्यति नैनं पाप्मा
तरति सर्वं पाप्मानं तरति नैनं पाप्मा तपति सर्वं पाप्मानं तपति विपापो विरजोऽविचिकित्सो
ब्राह्मणो भवत्येष ब्रह्मलोकः सम्राडेनं प्रापितोऽसीति होवाच याज्ञवल्क्यः सोऽहं भगवते
विदेहान् ददामि मां चापि सह दास्यायेति ॥ २३ ॥
इसी तथ्य का उल्लेख ऋचा में भी मिलता है- ब्रह्मवेत्ता (ब्रह्मविद्) की यह महिमा नित्य है, जो कर्म
के द्वारा न प्रवृद्ध होती है और न ह्रास को ही प्राप्त होती है। उस महिमा के स्वरूप का ही ज्ञान प्राप्त करना
चाहिए। उसका ज्ञान प्राप्त करके फिर वह पापकर्म से लिप्त नहीं होता। इस प्रकार ज्ञान रखने वाला शान्त
चित्त, तपस्वी, उपरत, तितीक्षा करने वाला और समाहित चित्त वाला होकर आत्मा में ही आत्मा का दर्शन
करता है, सभी को अपने आत्मा के रूप में ही देखता है। फिर कोई पाप उसे नहीं व्याप्तता, वह पापों को
लाँघ जाता है। वह पाप शून्य, मलरहित, संशयहीन और ब्राह्मण हो जाता है। हे राजन् ! यही ब्रह्मलोक है,
आप यहाँ तक पहुँच गये हैं। तब जनक बोले- हे भगवन् ! मैं आपको नमन करता हूँ और आपकी सेवार्थ
(आपके श्री चरणों में ) स्वयं को भी समर्पित करता हूँ ॥ २३ ॥
स वा एष महानज आत्माऽन्नादो वसुदानो विन्दते वसु य एवं वेद ॥ २४ ॥
यह महान् आत्मा जन्म न लेने वाला, अन्न भक्षक और कर्मफल प्रदाता है। इसे इस प्रकार जानने
वाला मनुष्य समस्त कर्मों का फल प्राप्त कर लेता है ॥ २४ ॥
स वा एष महानज आत्माजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्रह्माभयं वै ब्रह्माभयँ हि वै ब्रह्म
भवति य एवं वेद ॥ २५ ॥
यह महान् आत्मा अज, जरारहित, मृत्युरहित, अमर एवं भयरहित ब्रह्म स्वरूप है। जो अभय है, वही
ब्रह्म है, ऐसा जानने वाला अभय ब्रह्म स्वरूप हो जाता है ॥ २५ ॥