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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

अध्याय ८ खण्ड ३ मन्त्र २ १८५

अध्याय ८ खण्ड ३ मन्त्र २ १८५
और यदि वह गन्धमाल्य लोक की कामना वाला होता है, तो उसके संकल्प बल से ही गन्धमाल्यादि
वहाँ एकत्रित हो जाते हैं। उस गन्धमाल्य लोक से सम्पन्न होकर वह महान् वृद्धि को प्राप्त होता है॥ ६॥
अथ यद्यन्नपानलोककामो भवति संकल्पादेवास्यान्नपाने समुत्तिष्ठतस्तेनान्नपानलोकेन
संपन्नो महीयते ॥ ७॥
और यदि वह अन्न-जल से सम्बन्धित लोक की इच्छा करने वाला होता है, तो उसके संकल्प से ही
अन्न-जल प्राप्त हो जाता है। उस अन्न-जल लोक के सम्बन्ध से ऐश्वर्य का अनुभव करता है॥ ७॥
अथ यदि गीतवादित्रलोककामो भवति संकल्पादेवास्य गीतवादित्रे समुत्तिष्ठतस्तेन
गीतवादित्रलोकेन संपन्नो महीयते ॥ ८ ॥
और यदि वह गीत-वाद्य आदि से सम्बन्धित लोक की कामना करने वाला होता है, तो उसके द्वारा
किये हुए संकल्प से ही गीत-वाद्य आदि वहाँ उपस्थित हो जाते हैं। गीत-वाद्य आदि लोक से युक्त वह
महान् वृद्धि को प्राप्त होता है ॥ ८ ॥
अथ यदि स्त्रीलोककामो भवति संकल्पादेवास्य स्त्रियः समुत्तिष्ठन्ति तेन स्त्रीलोकेन
संपन्नो महीयते ॥ ९ ॥
और यदि वह स्त्रीलोक की इच्छा वाला होता है, तो उसकी दृढ़ संकल्प शक्ति से ही समस्त स्त्रियाँ
वहाँ उसके पास एकत्रित हो जाती हैं। उस स्त्रियों के लोक से युक्त वह वृद्धि को प्राप्त होता है ॥ ९ ॥
यं यमन्तमभिकामो भवति यं कामं कामयते सोऽस्य संकल्पादेव समुत्तिष्ठति तेन
संपन्नो महीयते ॥ १० ॥
वह जिस-जिस क्षेत्र या प्रदेश की कामना करता है तथा साथ ही जिस भोग-प्राप्ति की इच्छा करता
है, वह सभी कुछ उसके संकल्प मात्र से उसे प्राप्त हो जाता है। उन सभी से युक्त वह महान् महिमा अथवा
वृद्धि को प्राप्त होता है ॥ १० ॥
॥ तृतीयः खण्डः ॥
त इमे सत्याः कामा अनृतापिधानास्तेषां सत्यानां सतामनृतमपिधानं यो यो
ह्रास्येतः प्रैति न तमिह दर्शनाय लभते ॥ १ ॥
वे ये सत्यकाम होते हुए भी अनृत (मिथ्या आदि) तृष्णा से आवृत्त रहते हैं। सत्य होने पर भी अनृत
से वे आच्छादित हैं, क्योंकि मनुष्य के जो -जो सम्बन्धी यहाँ से शरीर का परित्याग करके जाते हैं, उन्हें
वह पुनः देखने के लिए प्राप्त नहीं कर पाता ॥ १ ॥
अथ ये चास्येह जीवा ये च प्रेता यच्चान्यदिच्छन्न लभते सर्वं तदत्र गत्वा विन्दतेऽत्र
ह्यस्यैते सत्याः कामा अनृतापिधानास्तद्यथापि हिरण्यनिधिं निहितमक्षेत्रज्ञा उपर्युपरि
संचरन्तो न विन्देयुरेवमेवेमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन
हि प्रत्यूढाः ॥ २ ॥
इसके पश्चात् मनुष्य अपने जीवित या मृत (पुत्रादि) परिजनों को तथा अन्य वांछित पदार्थों को चाहते
हुए भी नहीं प्राप्त कर पाता। उन सभी को यह मनुष्य हृदयरूपी आकाश में स्थित ब्रह्म को जानकर प्राप्त कर

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लेता है; क्योंकि यहाँ से सत्यकाम मिथ्या से आच्छादित रहते हैं। इस सन्दर्भ में यह उदाहरण है कि जिस
प्रकार भूमि में गड़े हुए स्वर्ण के कोष को अनभिज्ञ व्यक्ति उसके ऊपर विचरण करते हुए भी नहीं जानते;
ठीक इसी तरह यह समस्त प्रजा नित्य प्रति ब्रह्मलोक को गमन करती हुई, उसे नहीं प्राप्त कर पाती, क्योंकि
यह अनृत (मिथ्या) के माध्यम से हरण कर ली गई है ॥ २ ॥
स वा एष आत्मा हृदि तस्यैतदेव निरुक्तꣳ हृदयमिति तस्माद्धृदयमहरहर्वा एवंवित्स्वर्गं
लोकमिति ॥ ३ ॥
वह आत्मा हृदय में ही स्थित है। 'हृदय' का अर्थ 'हृदि अयम्' अर्थात् यह हृदय में है। यही इसकी
निरुक्ति (व्युत्पत्ति) है। इस तरह से जो व्यक्ति आत्मतत्त्व को हृदय में जानता है, वह प्रतिदिन स्वर्गलोक
में ही गमन करता है ॥ ३ ॥
अथ य एष संप्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभि-
निष्पद्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मणो नाम
सत्यमिति ॥ ४॥
यह जो सम्प्रसाद अर्थात् निर्मलता को प्राप्त आत्मा है, वह इस शरीर का परित्याग करके उत्कृष्ट अवस्था
(परम ज्योति) को प्राप्त करते हुए अपने मूल स्वरूप में स्थित हो जाता है। यही आत्मा है। यही अमृत और
अभय है। यही ब्रह्म है। इस प्रकार आचार्य ने अपने शिष्यों से कहा- उस ब्रह्म का नाम ही सत्य है ॥ ४ ॥
तानि ह वा एतानि त्रीण्यक्षराणि सतीयमिति तद्यत्सत्तदमृतमथ यत्ति तन्मर्त्यमथ
यद्यं तेनोभे यच्छति यदनेनोभे यच्छति तस्माद्यमहरहर्वा एवंवित्स्वर्गं लोकमिति ॥ ५ ॥
उस ब्रह्म के तीन नामाक्षर 'सकार' 'तकार' और 'यम्' हैं। इनमें 'सकार' अमृत है, 'तकार' मर्त्य
है और 'यम्' दोनों का नियामक है। चूँकि इसी से वह दोनों का नियमन करता है। अतः 'यम्' को जो
भी व्यक्ति इस तरह से जानता है, वह स्वर्गलोकगामी होता है ॥ ५ ॥
॥ चतुर्थः खण्डः ॥
अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिरेषां लोकानामसंभेदाय नैतꣳ सेतुमहोरात्रे तरतो न जरा न
मृत्युर्न शोको न सुकृतं न दुष्कृतꣳ सर्वे पाप्मानोऽतो निवर्तन्तेऽपहतपाप्मा ह्येष ब्रह्मलोकः ॥
पृथ्वी आदि लोकों को महाविनाश से बचाये रखने के लिए यह आत्मा सेतु का कार्य करता है। इस
आत्मा रूप सेतु का दिन-रात उल्लंघन नहीं कर सकते। इसे जरा, मृत्यु, शोक, सुकृत और दुष्कृत भी
प्रभावित नहीं करते। समस्त पाप इससे दूर हट जाते हैं, क्योंकि यह ब्रह्मलोक पापरहित है ॥ १ ॥
तस्माद्वा एतꣳ सेतुं तीर्त्वान्धः सन्ननन्धो भवति विद्धः सन्नविद्धो भवत्युपतापी
सन्ननुपतापी भवति तस्माद्वा एतꣳ सेतुं तीर्त्वापि नक्तमहरेवाभिनिष्पद्यते सकृद्विभातो
ह्येवैष ब्रह्मलोकः ॥ २ ॥
इसी कारण से इस सेतु रूप आत्मा को प्राप्त करके मनुष्य अन्धा होने पर भी सब कुछ देखता
(जानता) रहता है। इसी तरह शोकग्रस्त होने पर भी (वह) शोक मुक्त हो जाता है। रोगग्रस्त होते हुए भी
वह निरोगी होता है। इसी कारण से आत्मारूपी सेतु को पार करने के उपरान्त अन्धकाररूपी रात्रि भी
प्रकाशरूपी दिन में परिणत हो जाती हैं, क्योंकि यह ब्रह्मलोक सदैव प्रकाश स्वरूप ही है ॥ २ ॥